सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ
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विषयानुक्रमणिका
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| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| व्याख्या | १२० |
| आठ महारोग | १२१ |
| वैद्य को किन रोगियों का परित्याग करना चाहिये | १२२ |
| चतुर्विंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| युक्तसेनीय नामक अध्याय की व्याख्या | १२२ |
| राजा की रक्षा वैद्य को किस प्रकार करनी चाहिये | १२३ |
| १०१ साल की काल मृत्यु | १२३ |
| पुरोहित वैद्य से श्रेष्ठ है | १२४ |
| राजा के व्यसनों में फँसने के कारण | १२४ |
| चिकित्सा कर्म की सफलता में चार कारण वस्तुएँ | १२४ |
| वैद्य के गुण | १२४ |
| रोगी मनुष्य के गुण | १२४ |
| क्षेपज के गुण | १२४ |
| परिचारक के गुण | १२४ |
| पञ्चत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| आतुरोपक्रमणीय अध्याय की व्याख्या | १२४ |
| चिकित्सा से पहले रोगी की आयु परीक्षा | १२४ |
| दीर्घायु के लक्षण | १२५ |
| मध्यमायु पुरुष के लक्षण | १२६ |
| जघन्य आयु के लक्षण | १२६ |
| आयु के विज्ञान के लिये अङ्ग प्रत्यंग का ज्ञान, प्रमाण एवं सार | १२६ |
| क्रिया का लक्षण | १२८ |
| अग्नि के चार प्रकार | १२९ |
| विषमार्गिन | १२९ |
| तीक्ष्णार्गिन | १२९ |
| समार्गिन | १२९ |
| जाठराग्नि | १३० |
| वय तीन प्रकार की है | १३० |
| बृद्धावस्था में बाल्यावस्था के समान औषध मात्रा | १३० |
| देह परीक्षा | १३१ |
| देश तीन प्रकार का है | १३१ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| मुख साध्य रोग | १३१ |
| षट्त्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| भूमिप्रविभागीय नामक अध्याय की व्याख्या | १३२ |
| भूमि का दो प्रकार का विभाग | १३२ |
| विशेष भूमि परीक्षा | १३२ |
| गन्ध, वर्ण एवं रस से उक्त भूमि का प्रकार की है | १३३ |
| औषधियों को रखने का स्थान | १३३ |
| सप्तत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| मिश्रक अध्याय की व्याख्या | १३४ |
| सन्निपातजन्य शोथ को नष्ट करने के प्रलेप | १३४ |
| लेप का संस्कार | १३४ |
| पाचन द्रव्य | १३४ |
| दारण द्रव्य | १३४ |
| पीडन द्रव्य | १३४ |
| शोथन द्रव्य | १३४ |
| वर्ति | १३५ |
| कल्क | १३५ |
| संशोधनघृत | १३५ |
| तैल | १३५ |
| शोथन चूर्ण | १३५ |
| शोथनी रसक्रिया | १३५ |
| धूपन | १३५ |
| रोपणकषाय | १३५ |
| रोपणवर्ति | १३५ |
| व्रण के संरोहण के लिये कल्क | १३५ |
| सिद्ध घृत | १३५ |
| रोपण तैल | १३५ |
| रोपणचूर्ण | १३६ |
| रोपण कार्य के लिए रस क्रिया | १३६ |
| मांसवर्धन कार्य में प्रशस्त औषधियाँ | १३६ |
| उभरे हुए मांस को काटने के लिये | १३६ |
| अष्टत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| द्रव्यसंप्रहणीय अध्याय की व्याख्या | १३६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| सैतीस द्रव्य समूह के नाम आरग्वधादिगण | १३६ |
| सालसारदिगण | १३६ |
| वीरतर्वादिगण | १३७ |
| लोब्रादिगण | १३७ |
| अर्कादिगण | १३७ |
| सुरसादिगण | १३७ |
| मुष्कादिगण | १३७ |
| पित्तक्यादिगण | १३७ |
| एलादिगण | १३७ |
| वचादि तथा हरिद्रादिगण | १३८ |
| श्यामादिगण | १३८ |
| बृहत्यादिगण | १३८ |
| पटोलादिगण | १३८ |
| काकोल्यादिगण | १३९ |
| ऊषकादिगण | १३९ |
| सारिवादिगण | १३९ |
| अञ्जनादिगण | १३९ |
| पुरुषादिगण | १३९ |
| अम्बुघादिगण | १३९ |
| न्यम्रोघादिगण | १३९ |
| गुड्द्यादिगण | १३९ |
| उत्पलादिगण | १३९ |
| मुस्तादिगण | १३९ |
| त्रिफला | १३९ |
| त्रिकटु | १३९ |
| आमलक्यादिगण | १३९ |
| त्रप्वादिगण | १३९ |
| पञ्चमूल | १३९ |
| महापञ्चमूल | १३९ |
| वक्षमूल | १३९ |
| वल्लीपञ्चमूल | १४० |
| कण्टकपञ्चमूल | १४० |
| तुष्ट्यपञ्चकमूल | १४० |
| एकोनचत्वारिंशतिसप्तमोऽध्यायः | |
| संशोधनसंशमनीय नामक अध्याय की व्याख्या | १४१ |
| दो प्रकार के संशोधन | १४१ |
| शिरीरविरचन द्रव्य | १४२ |
| संशमनद्रव्य | १४२ |