सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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विषय
पच साध्य बिद्रधियां
वातजन्यविद्रषि
पित्तजविद्रधि
करंजादिघत
कफजन्यविद्रषि में
रक्तजन्य ओर आगन्व॒ज
विद्रधिर्या
कृफजन्य अन्तः विद्रधि
पक्र विद्रधि की चिकिस्छा
मज्जाजन्यविद्रषि सप्रदओोऽध्यायः विसरष-नाडी-स्तन रोग
चिकित्सा ६ साध्य तथा असाध्य विप
वातजन्यविसप
पित्तजन्यविसपं मे केप
गोयांदिघत
कृफजन्य विखप के लिये अजगन्धा
आदि्छेप
वरुणादिगण का प्रयोग
वरेण को शोघन करनेवाला
तेल ` पित्तजन्य नादी =
कोष्टस्थित नाडी को नष्ट
करने का घत
कफजन्य नाडी में
हाल्यजन्य नाडी में
कृश दुं पुरष की नाडी
सब वर्तयां नाड्यां में
बरतनी चाहिये
दुध क विक्त होने पर
उसका शोघन
स्तन विद्रधि
ग्रन्थि, अपची अदु द्, गक्ग्ण्ड ।
। चिकित्षा का व्याख्यान
४५
2
सुश्रतसं हितां
पुष | विषय
४५१ | पित्तजन्य म्रन्थि मे
४५१ | कफजन्य ग्रन्थि मं
५१ | जो ग्रन्थि उपरोक्त चिकित्षा
से शातन दहो उसे चीरकर
निकाल दं
मांस कन्दी के लि
मे दोजन्यग्रन्थि में
जीमूतक आदि से सिद्ध घुत
ममंस्थान से रहित स्थानों मे
अपक्त म्रथिरयों के विषय में
इन्द्रवस्तिमम
अपंचियों क निड्त्ति के यि
रोपण काल में
कर्कार चूर्णं आदि पित्ताबुदमें कफाबुद में
अन्द् पर ल्ेपादि ` मेदो द स्वेदन आदिः
बातजन्य गण्ड मे स्वेद
कफजन्य गण्ड मं स्वेद आदि
४५४
४५४
४५४
४५४
४५४
$प्र ४
क न च ४५४
मेदोजन्य गलगण्ड में ४११ स्नेहन आदि
४१५
४५५
५२ का व्याख्यान `
बृद्धिरोग
वातब्रद्धि मे -
पित्तजन्य इद्धि में
फफजन्य बृद्धि भ
मेदजन्य ब्द्धि्मे ..
. | मूत्रजन्यव्रद्धिमे
-साध्यउपदंशोर्मे
वातजन्य उपदंश में
वैत्तिकं उपदंश मे
५५६
४५७ ४१७
| प्रकारे उपद्श् के ल्थि चूण
गर्रण्डरोग मे चिकट आदि `
एकोनविज्ञोऽध्यायः
चरद्धिः उपदंश, श्टीपद, चिकित्सा
अत्रबदिको छोड बाकी-छ ~ =:
--3 ४६२ - ४६३
२४६३
९२
~ ~
ः = < | < 4 ४६४ ४६४
४: कफजन्य उपदंश मँ ~ ˆ - : ४६४
| उपद्् चिक्त्ा सब : 1 ४६५ ६
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-जवुमणि आदि ्
न्यच्छ, व्यंग ओर नीलिका
-चिषश्ड प्रकशमं.
गुद्श्रशम -4
एकविंशतितमोऽध्यायः |
शक्रदोष चिकिस्वा का व्याख्यान . ४५
अष्टील्कामे ` -
विषय
उपद॑शों मँ रोपण के स्यि तेख तरणजन्य विषपं के.ख्यि चूं
रक्त जन्य ओर सन्निपातजन्य
उपदश
सन्निपातजन्य उपदंश में विशेष
चिकित्सा
वातजन्यश्लोपद मे स्नेहन आदि
कफजन्य श्लोपद् में
पित्तजन्य श्लोपद् में
पानीयक्षार
काकादनी आदिमे सिद
किथा तेख
त्रिफला क्राथ मिलाया क्षार
विंशतितमोऽध्यायः
लुद्ररोग चिकित्साका व्याख्यान
अपक्व अजगल्लिका मं
स्वेद तथा लेप
पित्तजन्य विसपुः
चिप्परोग~;“
पकी विदारिका को चीरना
शकरा दकी चिकित्सा
पाददारी मे स्नेहन आदि
अलसरोगण म~~
इन्द्रलुक्त मं
अरूषिका में
दाङ्णकःरोग मं मसूरिका मे
युवान पिड़काओं मे
पद्मिनी कटक रोगमं.
परिवर्तिकामं
वल्मीकमं ._
अहिपूतना रोग मं
सषपी मं व्रण रोपकः तेल