सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवि्ष॑य |
ग्रथित को निरन्तर नाडी स्वेद
अछ्जी को जोक लगाकर
मृदित को वला ते से
संमूढ पिडका में
अवमन्यमें
उत्तमा में
शतपोनक, रक्तजन्य मं
द्रा विञ्चतितमोऽध्यायः
मुखरोग चिकित्सा व्यास्यान
खाध्य ओष्ठ प्रकोपं की
चिकित्सा
दन्तमूल मेँ होनेवाल रोगों की
चिकित्सा
द्न्तवेष्टमें
उपकुशरोग में
शिरोविरेचन
दन्त नाडी को सामान्य
नस्य मेँ बरतने के ल्यि सिद्ध तैल
चिकित्सा
जिहागत साध्य रोगों की
चिकित्सा
ं ताह के रोगोंकी चिकित्सा
कण्ठ के रोगों की चिकित्सा । स्नेहिक धूम सवंसरमे ` उत्तम है
सअसाध्यमुखरोग
पष्ठ
४७०
४७०9
४७०
४७०9
४७१
४७१
४७१
४७१
४७१
४७९१
४७२९
४७९
, ४७२
४७२ ।
४७२९
४७३
४७४
` ४७४
४७४
४७१
त्रयोविशतितमोऽध्यायः `
शोफं की चिकित्साका
व्याख्यान
अवयव मे उत्पन्न शोफ छ
` प्रकारका दै सवसर शोथ पाच प्रकारका दहै श्वयथु शोथ
` वातजन्य शोथ
.. आमाशय मे स्थित दोष ऊपर के
भाम मे.शोय उसन्न करता ह . सामान्य् चिकित्सा
फ को नष्ट करने के छ्यि
ष्याज्च 2,
४७
४७५
४७५
४७१
` ४७६
४७६ .
, ४७७
४७७.
विषय
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पृषु
चतुविशतितमोऽभ्यायः
अनागताबाधा प्रतिषेध अध्याय का
व्याख्यान ४७८
आरोग्य चाहनेवाले को एतिदिन
क्या करना चाहिये ४७८
प्रथम दातुन करना ४७८
जिह्वा साफ करने के छ्यि मुख
ग्रह्नाङक्न ४७८
आंखों मेँ आंजन क्गाना ४७६
पान खाना उत्तमदहै ४७६
शिर पर ते क्गाना ४७६
शिर पर लगने के ल्यितैल ४७६
कधी का करना ४७६
कानों मे ते डालना ४७६
स्नेह का अभ्यंप ४७६
सम्पूणं अंगों का परिषेक ४७६
स्नेह का अभ्यंग जहां नहीं करना
चाहिये ४८9
व्यायाम के संबंध में २
उबटन लगना ४८१
उद्घषण ओर उद्वतन ४८१
स्नान ४८१
पूखों कौ माला तथा
सुन्द्र् बख्र ४८१
मुख पर ठेप करने से ४८२
ओखां मे काजल ठ्गना ४८२
आहार ' ४८२
पैरों का धोना तथा तैर मल्ना ४८२
जूते का पहनना ४८२
शिर पर पगड़ी आदि पहनना ४८२
छाते का धारण करना ४८२
हाथमे दण्डेका धारण करना ४८२
आराम करना 2८
मुसाफरी ४८२
सुखदायक शय्या पर सोना ठरे
संबाहन (चापी करना) ४८३
वायुसेवन् ४८३
मनुष्य के त्यागने योग्य -४८३-४८१
श 9 । 4 क
विषय पृष
जो २ दोष ऊुपित होते हं ४८५
मेथुन मे अयोग्य तथा
योग्य स्री ४८ पंचर्विशतितमोऽध्यायः £
मिश्रक चिकित्सा का व्याख्यान ४८७
परिपोट ४८७
स्नेहदादि उपचार धटे
पठित रोग को नष्ट करने के स्यि तैक ` ४८टं बार घने, पंघराङे तथा कालत बनाने का तैक ४८८
मुख पर अभ्यंग करने के ल्य
सिद्ध धुत ४८८
राजाओंके योग्य छेष ४६०
षडबिशतितमोऽध्यायः, `
क्षीणव्रलीय वाजीकरण चिकित्सा
व्य सख्यान् ४६९०
वाजीक्रण योग किनके ल्यं उत्तम ४६१ वाजोकरण के तीन प्रकार ४६१ क्खीबता का वणन ४६१
भ्रष्ठ वाजीकर विधि ४६२ वाजीकर अनेक योग ४६२-४६३
सप्रविशतितसोऽभ्यायः
सर्वोपघातशमनीय अध्याय का
व्याख्षान् ४६३
वय स्थिर रहने का उपाय ४६३ विंडंग-तण्डुर चूणं ४६४
रक्त पित्तजन्य रोगां मे गम्भीरी कल्य ४६५
बल की चाहवाछरे के ल्यं
४ह१् `
ओषधियां ४६५ .
वाराही कन्द मू का चूण ४६१.
ओंखों के तेज के छियं
अष्टाविरतितमोऽध्यायः
मेषायुष्कामीय रसायन चिक्रित्वा ` व्याख्यान
मेधा ओर आयु की कामनावाले
के छियि चण
मेघावी के ल्यि मण्डूकपणी