सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
विषय
मेधावी के लिए ब्राह्मी आदि का योग ४६७-४६८
आयुर्वर्षक मंत्र और औषध के साथ एक वर्ष में फल देने वाली रसायन ४६८
पाप दौर्भाग्य नष्ट करने के लिये रसायन ४६८
वचा चूर्ण आदि योग ४६८
मधु का योग ४६८
एकोत्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः
स्वभावव्याधि प्रतिषेधनीय रसायन का व्याख्यान ४६६
सोम का विधान ४६६
चौवीस नाम के सोम ४६६
सोम सेवन विधि ५००-५०१
सोम के पत्ते आदि कैसे होते हैं ५०१
सोम कहाँ होता है ५०२
त्रिंशत्तमोऽध्यायः
निवृत्तसन्तापीय अध्याय का व्याख्यान ५०२
रसायन के सेवन से देवताओं का आनन्द ५०२
सात पुरुष रसायन को सेवन न करें और सात ही कारणों से रसायन गुण नहीं करते ५०३
औषधी (सोम के सहस्र) का व्याख्यान ५०३
औषधियों की प्रथक २ पहचान इन सातों औषधियों को उखाड़ने के मन्त्र ५०४
सात औषधियों को दूँढने के स्थान ५०५
एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः
स्नेहोपयोगिक चिकित्सा का व्याख्यान ५०५
स्नेह की उत्पत्ति स्थान दो प्रकार का है ५०५
स्थायर स्नेहों का वर्णन ५०५
कषाय स्नेह पाकविधि ५०६
विषय
पल कुडव आदि का परिमाण स्नेहपाकविधि ५०७
स्नेहपान विधि ५०७
घृतपान, तैल, वसा, मज्जा के योग ५०७
पित्तविकार, वायुरोग और कफ की अधिकता में घी कैसे लेना चाहिए ५०७
तिरसठ प्रकार के रसों से घी का सेवन ५०७
केवल स्नेहपान उत्तम है ५०८
ऋतुओं में स्नेहपान का समय स्नेहपान के पीछे प्यास लगने पर गरम पानी स्नेह की मात्रा जीर्ण होने पर किनके लिये उत्तम है स्नेह के जीर्ण होने पर क्या करना चाहिये स्नेह के लिये घृत स्नेहपान का निषेध स्नेहन के अयोग में सम्यग स्निग्ध के लक्षण अतिसिग्ध के लक्षण स्नेह तथा रूक्षण स्नेह के नित्य सेवन का फल
द्वान्त्रिंशत्तमोऽध्यायः
स्वेदावचारणीय चिकित्सा का व्याख्यान ५१०
स्वेद चार प्रकार का है तापस्वेद, उष्मास्वेद, उपनाह स्वेद, द्रवस्वेद ५११
निरग्नि और साग्नि स्वेद ५१२
नस्य, वसित और शोधन के पहले स्वाद देना चाहिए बिना स्नेहन किया शरीर स्वेद से नष्ट हो जायगा छिपे हुए दोष भी स्वेद पर बाहर निकल आते हैं भली प्रकार दिया स्वेद से जड़ बनी सन्धियाँ क्रियाशील बन जाती हैं ५१३
विषय
किनको स्वेद नहीं देना चाहिये ५१३
त्रयखिण्णत्तमोऽध्यायः
वमन-विरेचन साध्य उपद्रव चिकित्सा व्याख्यान ५१४
दोषों के लिये सिद्धान्त दोषों को निकालने के लिये वमन और विरेचन ५१४
वमन विरेचन की विधि वमन भली प्रकार हुआ जानने के लक्षण ५१४
भली प्रकार वमन हो जाने के बाद क्या देना चाहिए वमन करनेवाले व्यक्ति को जो दोष नहीं होते वमन द्वारा कफ शोधन वमन का निषेध ऊर्ध्ववायु का लक्षण वमन के अयोग्य पुरुषों को वमन देने से रोग कष्ट साध्य अपवाद वमन के योग्य विरेचन कित्ते देना चाहिए विरेचन से पहले लघु भोजन कोष्ठ तीन प्रकार का है विरेचन पीने पर मल को न रोके विरेचन में मूत्र, मल आदि क्रम से आते हैं भली प्रकार विरेचन न होने पर दोष भली प्रकार विरेचन के लक्षण ठीक विरेचन न होने पर पेया न पिलाये विरेचन से पित्तजन्य दोषों का नाश विरेचन के योग्य अयोग्य युक्त विरेचन स्वभाव से दोषों को अघोषार्ग से निकालता है मृदु कोष्ठवाले व्यक्ति में अतितीक्ष्ण विरेचन दोषों को भली प्रकार नहीं निकालता ५१८