भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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विषयानुक्रमणिका

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प्रातः पी हुई औषध प्रशस्त है५१८शुद्ध रक्त और अशुद्ध रक्त की परीक्षा५२२अयोगजन्य हानियों को चिकित्सा५३०
दुर्बल मनुष्य के दोषों को थोड़ा २ करके बाहर निकाले५१८अन्न के शेष रहने पर निर्बल शरीर आदि के अति-तीक्ष्ण उष्ण अतिलवण आदि को पीने पर५२२सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः अनुवासन उत्तर बस्ति चिकित्सा व्याख्यान५३१
पके हुए दोषों की उपेक्षा करना ठीक नहीं५१८कूरकोष्ठ अतिलवण या अतिसिन्धु पुरुष में बरती हुई औषध५२३अनुवासन कब देना चाहिये बिना शोधन किये मनुष्य को स्नेहबस्ति नहीं देनी चाहिये५३१
मन्दगनि और कूर कोष्ठवाले के लिये अतिशय स्नेहगान पर स्निग्ध विरेचन नहीं पीना५१८जो मूर्खता से औषध के वेग को रोकता है जिस पुरुष के दोष ऊपर या नीचे प्रवृत्त हुये हों५२३अर्श, ग्रहणी रोग आदि वायुजन्य रोग को नष्ट करने का योग५३१
स्नेहसात्प्य व्यक्ति के लिये कोमल प्रकृतिवाले को थोड़ी हानि करनेवाली औषध५१८पञ्चत्रिंशत्तमोऽध्यायः नेत्रबस्ति प्रमाणप्रविभाग चिकित्सा का व्याख्यान५२४वात रोगियों में अनुवासन रूप से बरतनेवाला तैल५३१
स्नेहन, स्वेदन के बिना संशोधन५१८स्नेहादि कर्मों में बस्ति मुख्य किन रोगों में बस्ति बरतनी चाहिये५२४बस्ति में देने योग्य अनेक प्रकार के तैल५३१-५३३
स्नेहन स्वेदन से चलायमान दोष वमन विरेचन द्वापा जाते हैं५१९बस्ति के भिन्न २ परिमाण बस्ति के विषय में बस्ति के दो प्रकार कौन किसमें देनी चाहिये वायु के वेग को बस्ति ही सहन करती है५२५भली प्रकार निरुद्ध होने पर विविध तैल अनुवासन के लिये५३३
चतुर्त्रिंशत्तमोऽध्यायः वमन विरेचन व्यापत् चिकित्सा का व्याख्यान५१९बस्ति के दोष५२५रात्रि में बस्ति का प्रयोग न करे५३४
वमन विरेचन की व्यापत्ति १५ प्रकार की५१९अतिशय जोर से अथवा धीरे से दवाई बस्ति का दोष और उसको ठीक करने के उपाय५२५अपवाद अनुवासन लेने का काल जिसको अनुवासन देना हो५३४
भली प्रकार वमन न होने से तीक्ष्ण वमन देना चाहिये५१९अतिस्निग्ध में रुक्षबस्ति तथा रुक्ष में स्निग्ध५२६भली प्रकार अनुवासन के लक्षण५३४
अशुद्ध आमाशयवाले तथा प्रचुर कफवाले को विरेचन ठीक न होने पर तुरन्त अतिशय तीक्ष्ण विरेचन देना चाहिये५१९पट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः नेत्रबस्ति व्यापत् चिकित्सा नेत्र के हिल जाने से या घूम जाने से बस्ति के मोटा या छोटे होने से दोष५२६१९ बस्तियाँ शुक्रगत रोगों को भली प्रकार अच्छा करती हैं५३६
भली प्रकार विरेचन होने पर लक्षण देखकर वमन कराये५१९अतिशय जोर से अथवा धीरे से दवाई बस्ति का दोष और उसको ठीक करने के उपाय५२६१८ निरुद्ध और १८ बस्तियाँ को पालनेवाला मनुष्य बड़ा बलवान् होता है५३६
किस किस अवस्था में अतितोष्ण विरेचन देना चाहिये वायु की अधिकता में अतिशय स्नेह देकर स्वेद कराके फिर शोधन देवे५२०अतिस्निग्ध में रुक्षबस्ति तथा रुक्ष में स्निग्ध५२६स्नेह बस्ति और निरुद्ध एक साथ सेवन न करे५३६
अति मात्रा में स्नेह और स्वेदन करने पर वमन के अतियोग पर विरेचन के अतियोग पर५२०किस प्रकार की बस्ति दोष करती है५३०बहुत वायुवाले व्यक्ति को प्रतिदिन स्नेह बस्ति स्नेह बस्ति जन्य हानियाँ उत्तर बस्ति की व्याख्या कौनसी बस्ति अच्छी है बस्ति के शोधन के लिये मात्रा उत्तर बस्ति के वापिस न आने पर५३७