भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

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बस्ति में जलन होने पर५३६ग्राहीबस्ति५४५नस्य का समय५५३
उत्तर बस्ति किन रोगों को नष्ट करती है५३६बन्ध्या स्त्रियों के लिये बस्तियाँ५४५नस्य के पूर्व५५३
अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायःमाधुवैतलिक बस्तियाँ५४६स्नेह की मात्रा आठ बिन्दु५५४
निरुहक्रम चिकित्सा व्याख्यान५४०युक्तस्थ, दोषहर बस्ति, सिद्धनस्य में त्याज्य५५४
अनुवासन दिये हुये व्यक्ति कोबस्ति आदि५४६नस्य के योग, अतियोग अयोग के लक्षण५५४
निरुह बस्ति तथा उसे देने का प्रकार५४०एकोत्तचत्वारिंशत्तमोऽध्यायःशिरो विरेचन स्नेह की मात्रा५५४
बस्ति देने के लक्षण उत्पन्न होने पर निरुह बस्ति बन्द कर देवे५४०आतुरोपद्रव चिकित्सा का व्या० स्नेहपान, वमन विरेचन आदि लिये कायागनिमंद हो जाती तीनमाप यवागू५४७प्रयोग की दृष्टि से नस्य के तीन लक्षण५५४
कोमल प्रकृतिवालों को अधिक मात्रा में बस्ति न देवे५४०कफपित्त की अधिकतावाले के लिये तर्पणादि विधि५४७सर्पदष्ट, मूर्च्छित पुरुषों के लिये५५५
भली प्रकार निरुह हुआ जानने के लक्षण५४१रोगी एक एक अनुवासन बस्ति लेकर तीन दिन तक परहेज करे५४८कोमल प्रकृति स्त्रियों के सिर को शोधन के लिये५५५
भली प्रकार निरुह होने के पश्चात् कर्म५४२व्रण रोगी, आदि गिद्धी के कच्चे वर्तन के समान है५४८नस्य के लिये अयोग्य५५५
आस्थापन और स्नेह बस्ति से रोगी को शान्ति५४२क्रोध करने पर कुपित हुआ पित्त, दाह प्यास आदि करता है५४८अतिमात्रा, अतिशीत आदि से हानियाँ५५५
निरुह देने के दिन वायु के कोप का भय५४२चत्वारिंशत्तमोऽध्यायःहानियों की चिकित्सा कैसे५५५
एक मुहूर्त प्रतीक्षा करने पर निरुह बस्ति के बाहर न आने पर५४२धूमनस्य कवलग्रह चिकित्सा का व्याख्यान५५५प्रतिमर्श नस्य का उपयोग५५५
विपरीत गतिमान् वायु से दोष भोजन करने पर आस्थापन नहीं देना चाहिये५४२धूम पाँच प्रकार का है प्रायोगिक धूम के लिये वर्ति वमन करानेवाले द्रव्यों को वामनीय धूम में बरते५५०१४ समय५५६
अवस्थानुसार निरुह देना चाहिये५४२धूमनेत्र को बनाने के लिये धूम पीने के प्रकार५५०भित्र २ समय में लिये नस्य के गुण५५६
निरुह में देने योग्य५४२धूम पीने का समय५५०कवल ग्रहण की विधि५५६
स्वस्थावस्था में क्वाथ आदि का भाग५४२स्नेहिक धूम स्नेह एवं उपलेंप से वायु को शमन करता है५५०गण्डूष का लक्षण५५७
कल्पना विधि५४२धूमनेत्र को बनाने के लिये धूम पीने के प्रकार५५०कवल में शुद्धि के लक्षण५५७
बारह प्रसृतवाले निरुह५४३धूम पीने का समय५५०तिल आदि का कवल जले हुये मुल के दाह को नष्ट करता है५५७
पृथक् रूप से बस्तियाँ५४३-५४६स्नेहिक धूम स्नेह एवं उपलेंप से वायु को शमन करता है५५०औषध का बुद्धि पूर्वक विभाग करके चार रूपों में प्रतिसारण५५७
शोधनबस्तियाँ५४५धूम के गुण५५०
लेखनबस्तियाँ५४५धूमपान के तीन योग्य५५०
बुँहणबस्तियाँ५४५धूमपान में कितने कितने घूँट और कैसे लेने चाहिये५५०
बाजीकरबस्तियाँ५४५नस्य की विधि५५०
पिच्छाबस्ति५४५नस्य के पाँच प्रकार५५०
किन रोगों को ठीक करने के लिये नस्य लेना ठीक है५५३

कल्पस्थान

प्रथमोऽध्यायः

अन्नगान रक्षा कल्प का व्याख्यान५५८
वैद्य निरन्तर राजा की विष से रक्षा करे५५८
राजा को कभी किसी का विश्वास नहीं करना चाहिये
वैद्य की योगता५५८
रसोई कैसे हो५५६
रसोई का अधिकारी वैद्य गुणों