भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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विषयानुक्रमणिका

२३

विषयपृष्ठ
से युक्त मनुष्य हो५५६
भन्य कैसे हों५५६
रसोई में काम करनेवाले सब वैद्य के अधीन हों५५६
विषदाता की पहचान५५६
कभी २ सज्जन पुरुष भी असाधुओं जैसी चेष्टा कर लेते हैं५६०
विष देने के साधन५६१
विषैले भोजन की परीक्षा में पशु पक्षियों का उपयोग५६०
विषैले अन्न के परोसने पर बाण के ऊपर जाने से हृदय आदि में दोष५६०
हाथों में लगा विषैला अन्न५६०
विषैला अन्न खाने से विकार५६१
अमाशय में गया विष५६१
पक्वाशय में पहुँचा विष५६१
दूध, मधु, पानी आदि तरल द्रव्यों में विष से विकार५६१
शाक, दाल, अन्न आदि में विष के विकार५६१
दातुन में विषका संचार होने से५६१
विषैला अम्यंग५६१
कंधी आदि के विष से युक्त होने पर दोष तथा उसका उपाय५६१
शिर, मुख, हाथी घोड़े ( आदि की पीठ पर ) विष लगाने से विकार तथा चिकित्सा५६२
नस्थ और धूम में विष होने से विकार तथा चिकित्सा५६२
विषले पुष्पों का विकार और चिकित्सा५६२
कान के तैल के विषैला होने पर विषैले अंजन से५६२
विषैले, जूते, खड़ाऊँ, आभूषण आदि के विकार तथा चिकित्सा५६२
वैद्य राजा को हर प्रकार से विष से बचाये५६३
विषयपृष्ठ
राजा सदा विषन्न द्रव्यों के साथ भन्य और भोजनों का सेवन करे५६३
द्वितीयोऽध्यायः
स्थावर विष विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान५६३
स्थावर और जंगम भेद से विष के दो प्रकार५६३
दस स्थावर विषके अधिष्ठान आठमूल विष, पांच पत्र विष, १२ फलविष, ५ पुष्प विष, ७ त्वक सार, ३ शीर विष, २ घातु विष, १३ कन्द विष५६३
सब मिलाकर ५५ स्थावर विष५६४
अवान्तर भेद५६४
भिन्न २ विषों के लक्षण५६६
तीक्ष्ण कन्दों का विस्तार५६५
विष के दसगुण५६५
दूषीविष संज्ञा५६५
दूषीविषके लक्षण५६५
विष नानाप्रकार के
रोगोत्पत्तिकारण५६६
स्थावर विष के लक्षण५६६
चिकित्सा५६६
अजेय घृत५६६
दूषीविषारि नाम का अगद५६७
तृतीयोऽध्यायः
जंगम विषविज्ञानीय कल्प का व्याख्यान५६७
जंगमविष के १६ स्थानों का विस्तार५६७
विष से दूषित जल और उसे दूर करने के उपाय५६८
विष से दूषित भूमि५६६
घास भूसा एवं भोजन गेहूँ आदि के विष से दूषित हो जाने पर उनकी चिकित्सा५६६
धूम या वायु के विष से युक्त होने पर५६६
विषयपृष्ठ
विष की उत्पत्ति५६६
विष में प्रायः सब गुण तीक्ष्ण होते हैं५६६
विष सॉप के सारे शरीर में फैला रहता है५७०
विषों में शीतल परिवेक, कीटों का विष मन्द होने से स्वेद दे सकते हैं५७१
विष से मरे प्राणी का मांस नहीं खाना चाहिये५७१
विषपान के लक्षण५७१
सभी विष उष्ण उपचार से दुगुने बढ़ते हैं५७१
असाध्य के लक्षण५७२
चतुर्थोऽध्यायः
सर्वदृष्टविज्ञानीय कल्प का व्याख्यान५७२
दंष्ट्रा विषवाले पृथ्वी के सॉप ८० प्रकार के हैं५७२
उनके पांच प्रकार के भेद तथा आकार दृष्टि से तीन प्रकार५७२
अतिशय क्रोधी सॉप काटते हैं और उनका काटना तीन प्रकार का है सर्पाङ्गभिद्य५७३
सॉपों के भिन्न २ विह्न आकार५७३
सॉपों के भी ब्राह्मण क्षत्रिय आदि चार वर्ण५७३
दर्वाँकर वायु को मण्डलि पित्त को राजिमान् कफ को कुपित करते हैं५७३
तीनों के धूमने का काल५७३
तीनों की अवस्था जो मृत्यु का कारण होती है५७४
डरनेवाले सॉप अत्यविष के होते हैं५७४
पुरुष, स्त्री तथा नपुंसक जाति सब सॉपों के दृष्ट लक्षणों के समान्य रूप५७६
भिन्न २ सॉपों के काटने से शरीर पर प्रभाव५७६