सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुभुतसंहिता
विषय पृष्ठ
साँपों के विष के सात वेग ५७६
विष का पशु-पक्षियों पर प्रभाव ५७६
पञ्चमोऽध्यायः
सर्पदण्डविष चिकित्सित कल्प ५७७
व्याख्यान ५७७
सर्प के काटे हुये स्थान पर अरिष्टा ५७७
बाँधनी चाहिये ५७७
जहाँ अरिष्टा न बाँधी जा सके वह ५७७
स्थान अभिनसे जला दे ५७७
मुख को वस्त्रों से भरकर ५७७
चूसना ५७७
मंत्र जाननेवाला अरिष्टा को ५७८
भी मंत्रों से बाँधे ५७८
तपस्वियों के मंत्रों से विष ५७८
औषधियों से भी जल्दी नष्ट ५७८
होता है ५७८
मंत्र सीखने के उपाय ५७८
अगद उपचार ५७८
साँप काटने की चिकित्सा ५७८-५८२
विषयुक्त वस्तु से विद्ध हुये ५७९
के लक्षण ५७९
अस्थि विष के कारण उत्पन्न ५७९
व्रण की चिकित्सा ५७९
महागद ५८१
अजित अगद ५८१
तात्पर्य अगद ५८२
श्रृषभ अगद ५८२
संजीवनी अगद ५८२
लसुड़ा आदि से बनाया अगद ५८२
द्राक्षा आदि से मिलाया अगद ५८२
क्षेप, अंजन, नत्य ५८२
कीट विषों के नष्ट करने के ५८३
लिये क्वाथ ५८३
चूहों के विष को नाश करने के लिये ५८३
एकसर गण ५८३
षष्ठोऽध्यायः
दुन्दुभिस्त्वनीय कल्प का व्याख्यान ५८३
घावड़ी आदि से क्षार की भाँति ५८३
अगद विष को नाश के लिये ५८३
विषय पृष्ठ
कल्याणक घृत ५८४
अमृतघृत ५८४
महासुगन्धि अगद ५८४
विषपीडित व्यक्तियों के लिये अन्न ५८५
अविष मनुष्य ५८४, ५८५
सप्तमोऽध्यायः
मूषिक कल्प का व्याख्यान ५८५
शुक्रविषवाले १८ प्रकार के चूहे ५८५
इनके काटने के लक्षण ५८५
विस्तार से ५८५, ५८६
सब मूषिकों में शिरावेधन, संशोधन ५८६
सब चूहों के दंश में सुखदायक योग ५८६
विरेचन के लिये ५८६
सारिवा आदि के क्वाथ और क्वाथ में सिद्ध घृत ५८६
न भरनेवाले व्रण की चीरकर चिकित्सा करे ५८७
पागल विषवाले पशु के काटने से ५८७
जिस प्राणी से काटा गया हो उसके समान ही चेष्टा करने पर मनुष्य मर जाता है ५८८
जल त्रास का लक्षण ५८८
जलत्रास भी असाध्य है ५८८
पागल जानवरों के विष को नष्ट करने के लिये ५८८
शरपुंवा आदि का योग ५८८
पागल कुत्ते के काटने में नहलाना और उसके बाद संशोधन देवे ५८९
हिसक पशुओं के नख या दान्तों से जो क्षत हुआ हो ५८९
अष्टमोऽध्यायः
कीटकल्प का व्याख्यान ५९०
साँपों के शुक्र मल मूत्र आदि के सड़ने से उत्पन्न कीट ४ प्रकार के ५९०
विषय पृष्ठ
१८ प्रकार के वात स्वभाव के कीट ५९०
२४ कीट पित्रा प्रकृति के ५९०
१३ कीट कफ प्रकोपक हैं उपद्रव छ गलगोलिका के काटने से ५९१
आठ प्रकार के शतपदी आदि मण्डूक आदि आठ ५९१
विश्वभमरा के काटने से अहिण्डुका, कण्डूका, शूकंबुन्त के काटने से ५९१
पिपीलिका ६ प्रकार की ५९१
मक्खियाँ छ प्रकार की ५९२
मशक पाँच प्रकार की एक जाति में छ असाध्य है विषैले शव, मूत्र, मल से दोष ५९२
कष्ट साध्य दंश ५९२
१२ कीट प्राण नाशक इन कीटों के तोड़ण विष में मन्द विष ५९२
इन कीटों के नानाप्रकार के योगों से बने चूर्ण को गर कदना ५९२
एक जातिवाले कीटों को सामान्य सेदों से काटने के लक्षणों से साध्य असाध्य पाँच गोधेरक के काटने से ५९२
उग्रविषवाले कीटों के काटने पर सर्प विष की भाँति चिकित्सा ५९२
स्वेदन, आलेपन आदि ५९२
उत्कारिका स्वेदन में उत्तम कूठ आदि त्रिकण्टक विष में उत्तम है ५९२
गलगोलिका के विष नाश करनेवाला अगद कान खजुरा के विष को नाश करनेवाला अगद ५९२
मण्डूकों के विष को नाश करने वाला अगद ५९३
विश्वभमरा के विष को नाश करनेवाला अगद ५९३