सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ
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विषयानुक्रमणिका
२५
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| अहिण्डुका " " | ५६३ |
| शुक्रवृन्द " " | ५६३ |
| विच्छू के तीन प्रकार | ५६३ |
| विच्छू ३० हैं | ५६३ |
| मन्द विष विच्छू का वर्णन | " |
| मध्यम विष विच्छू " " | ५६३ |
| तीक्ष्णविष वाले विच्छू | ५६४ |
| तीव्र और मध्य विष वाले विच्छू की चिकित्सा सर्प दंश की तरह | ५६४ |
| चिकित्सा | ५६४ |
| मकड़ी विष अतिभयानक | ५६४ |
| मकड़ी विष थोड़ी मात्रा में फैला हुआ कठिनाई से जाना जाता है | ५६४ |
| मकड़ी विष सात से १५ दिनों में ही मार देता है | ५६४ |
| मकड़ियाँ सात प्रकार से विष निकालती हैं | ५६४ |
| लताओं के विषय में पुराना इतिहास, काटने के सामान्य लक्षण साध्यासाध्य और मेदों के साथ चिकित्सा | ५६५-५६८ |
| कीटों के काटने से उत्पन्न ब्रणों की चिकित्सा | ५६८ |
| कर्णिका को निकालने के लिये | ५६८ |
| उत्तरतन्त्रम् | |
| प्रथमोऽध्यायः | |
| औपद्रविक अध्याय का व्याख्यान | ५६६ |
| शिर के रोग | ५६६ |
| आँख की आकृति | ५६६ |
| आँख में मांस पृथ्वी से, रक्त अनि से आदि | ५६६ |
| कृष्णमंडल तथा दृष्टि के भाग | ५६६ |
| आँख में पाँच मण्डल | ६०० |
| आँख में छू सन्धियाँ | ६०० |
| आँख में छू पटल | ६०० |
| आँखों को बाँधनेवाली खिरायुत श्लेष्मा | ६०१ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| विपरीत गतिवाले दोष अतिशय भयानक रोग उत्पन्न करते हैं | ६०१ |
| रोग का पूर्वरूप | ६०१ |
| आँखों के उत्पन्न रोगों में पूर्वरूप देखकर चिकित्सा करें | ६०१ |
| पहले कारण का परित्याग बाद में वातादि दोषों का | ६०१ |
| नेत्रों में उत्पन्न रोगों के कारण | ६०१ |
| आँख के ७६ रोग | ६०१ |
| वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, रक्तजन्य तथा सर्वगत नेत्र रोगों में | ६०१ |
| बाह्य रोगों में दो असाम्य हैं | ६०२ |
| द्वितीयोऽध्यायः | |
| सन्धिगत रोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०२ |
| सन्धिगत रोग ६ हैं | ६०२ |
| पूयालस किसे कहते हैं | ६०२ |
| कनीनिका प्रदेश, पूयस्वाव, श्लेष्मस्वाव, रक्तस्वाव, पित्तस्वाव के लक्षण | ६०३ |
| पर्वणी, अलजी, क्रमिग्रन्थि के लक्षण | ६०३ |
| तृतीयोऽध्यायः | |
| वर्त्तमगत रोगविज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०३ |
| २१ रोग रोगवर्त्त में लक्षणों सहित | ६०३-६०६ |
| चतुर्थोऽध्यायः | |
| शुक्लगत रोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०६ |
| आँख के शुक्ल भाग में ११ रोग | ६०६ |
| पञ्चमोऽध्यायः | |
| कृष्णगत रोगविज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०७ |
| कृष्णभाग में होने वाले ४ रोग | ६०७ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| षष्ठोऽध्यायः | |
| सर्वगत रोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०८ |
| सर्वगत रोगों में कुल १७ रोग हैं | ६०८ |
| आँखों के सब रोग अभिष्यन्द के कारण हैं | ६०८ |
| वाताभिष्यन्द, पित्ताभिष्यन्द, कफाभिष्यन्द तथा रक्ताभिष्यन्द में | ६०८ |
| अधिमन्थ के सामान्य लक्षण वातज, पित्तज, कफज, रक्ताधिमन्थ में | ६०८ |
| उपरोक्त कितने २ दिनों में दृष्टि नष्ट कर देते हैं | ६०९ |
| सखोफ पाक | ६०९ |
| हताविमन्थ | ६०९ |
| वातपर्याप | ६०९ |
| शुष्काक्षिपाक | ६१० |
| अन्वतो वात | ६१० |
| अस्लाधुषित | ६१० |
| सिरोत्पात-खिराप्रदर्ष | ६१० |
| सप्तमोऽध्यायः | |
| दृष्टिगत विज्ञानीय अध्याय का व्याख्या | ६१० |
| दृष्टि का प्रमाण, उत्पत्ति आदि | ६१० |
| दृष्टि में आश्रित १२ भयानक रोग | ६१० |
| पटलों में प्रविष्ट तिमिर रोग रोग के लक्षण | ६११ |
| परिल्लाधि रोग | ६१२ |
| रक्तजन्य मण्डल | ६१२ |
| छूः लिंगनाश | ६१३ |
| पित्त से विदग्ध दृष्टि | ६१३ |
| कफ से विदग्ध दृष्टि | ६१३ |
| धूमदर्शी | ६१३ |
| हृस्वजड्य | ६१३ |
| नकुलान्ध | ६१३ |
| गम्भीरका | ६१३ |
| निमित्तजन्य रोग | ६१३ |
| अनिमित्तजलिंगनाश | ६१३ |