सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
विषय
आँख के यह कुछ छिहत्तर रोग ६१४
अष्टमोऽध्यायः
चिकित्सक प्रविभाग विज्ञानीय
अध्याय की व्याख्या ६१४
ग्यारह प्रकार के छेदन करने योग्य रोग ६१४
नौ रोग लेखन के योग्य ६१४
पाँच रोग भेदन के योग्य ६१४
पंद्रह रोग वेधन के योग्य ६१४
१२ रोग शस्त्रकर्म के अयोग्य हैं ६१४
सात रोग याप्य हैं ६१४
पन्द्रह रोग असाध्य हैं ६१४
नवमोऽध्यायः
बातामिष्यन्द प्रतिषेध चिकित्सा का व्याख्यान ६१५
अभिष्यन्द और अविमन्य वाले रोगी का सिरामोक्षण ६१५
योग्य उपनाहों से स्वेद दें ६१५
भोजन ग्राह्य ६१५
भोजनोपरान्त घृत पान ६१५
सिद्ध किया तैल नस्य में ६१६
सिद्ध किये दूध का परिषेक, आश्च्योतन में ६१६
अभिष्यंद में अंजनादि ६१६
दशमोऽध्यायः
पित्तामिष्यन्द प्रतिषेध का व्याख्यान ६१६
पित्त जन्य अविमन्य में पित्तज अभिष्यन्द आदि में ६१७
सिद्ध किया घृत, दूध, नस्य आदि के योग ६१७
आश्च्योतन ६१७
अम्लाद्युषित में सिरामोक्षण न करे ६१७
एकादशोऽध्यायः
श्लेष्माभिष्यन्द प्रतिषेध व्याख्या ६१८
कफजन्य अभिष्यन्द और अविमन्य में ६१८
बलासमप्रियत रोग में ६१९
विषय
पिष्टक रोग ६१९
योगांजन ६१९
द्वादशोऽध्यायः
रक्ताभिष्यन्द प्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान ६१९
अभिमन्य, अभिष्यन्द, सिरोत्पात और सिराहर्ष ६१९
उपरोक्त रोगों में पुरातन घृत तथा सिरामोक्षण करे ६१९
विरेचन के बाद शोधन ६२०
आँखों के चारों ओर प्रलेप ६२०
अतिशय पीड़ा होने पर चारों ओर के लिये विविध अंजन ६२०-६२३
त्रयोदशोऽध्यायः
लेख्य रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२३
लेखन के योग्य जो ९ रोग कहे हैं उनमें सामान्य विधि जिसमें रक्तस्त्राव आदि न हो वह लेखन भली प्रकार जानो ६२३
ठीक प्रकार लेखन न होने के दोष ६२३
अतिस्त्रावित का लक्षण ६२४
किन २ में लेखन करना चाहिये ६२४
चतुर्दशोऽध्यायः
मेघ रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२४
पकी हुई बिसग्रन्थि के लिये लगप के भिन्न हो जाने पर ६२४
अंजन नामिका में स्वेदन ६२४
कुमिग्रन्थि में स्वेदन करने से कफज उपनाह में ६२४
बिसग्रन्थि आदि पाँचों मेघ योग्य रोगों के अपक्व होने पर ६२४
पञ्चदशोऽध्यायः
छेद्य रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२४
सैंधव के चूर्ण से आँख में क्षोभ उत्पन्न करना ५२५
अर्म के क्षोभित हो जाने पर ६२५
जो अर्म मछली के जाल के समान फैला हो ६२५
विषय
प्रतिसारण के लिये ६२५
शूल होने पर ६२५
यदि अर्म कुछ वच जाये ६२५
जो अर्म छोटा दही के समान ६२५
जो अर्म चमड़े के समान मोटा हो ६२५
अगं के हट जाने से स्वाभाविक वर्ण ६२५
सिराजाल में जो सिरा कठिन हो ६२५
जो पिडका औषधियों से शान्त न हो ६२५
सिराजाल, सिरापिडका में यवक्षार से प्रतिसारण ६२५
अश्रुनाड़ी ब्रण होने के कारण ६२५
चूर्णांजन से अर्म, पिडका आदि नष्ट ६२५
पलक पर स्वेद देकर ६२६
षोडशोऽध्यायः
पद्मकोप प्रतिषेध का व्याख्यान ६२९
पलकों में होनेवाले पद्मकोप के विषय में ६२६
यदि इससे पद्मकोप शान्त न हो तो प्रतिसारण आदि ६२६
बालों की जो नई पंक्ति पैदा हो गई है उसके विषय में ६२७
पद्मकोप को नष्ट करने के लिये सब उपायों को बरते ६२७
सप्तदशोऽध्यायः
हृष्टिगत रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२७
३ रोग साध्य ३ असाध्य ६ याप्य ६२७
पित्तविदग्ध हृष्टि में ६२७
अंजन दोनों रोगों में उत्तम है ६२७
पित्त एवं कफ दोनों विदग्ध हृष्टियों में अंजन करे ६२८
दिवान्ध और राग्यन्ध दोनों को नष्ट करने के लिये अंजन ६२८