भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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विषयांलुक्रमणिकां

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पित्तविदग्ध हृष्टि में रसौतप्रशस्त शलाका६३४सेक आश्च्योतन पुटपाक की भांति
आदि६२८व्यधन के दोष से रोग६३४तीनों रूपों में६३८
पित्तविदग्ध हृष्टि के सौवेदना में अन्य योग६३४कितनी बूँद बरतनी चाहिये६३८
वीरांजन आदि चूर्ण६२८हृष्टि की निर्मलता के लियेपारिषेक का कारणकाल६३८
पित्तविदग्ध हृष्टि में अंजन६२८शुभ अंजन६३५कफज रोग में६३८
राज्यन्ध को नष्ट करनेवालाअष्टादशोऽध्यायःशिर में उत्पन्न अतिप्रबल रोगों
अंजन६२८क्रियाकल्य का व्याख्यान६३५को नष्ट करके६३८
राज्यन्ध में गोमूत्र आदि६२८आंखों पर तर्पण६३५दोष के लक्षण स्पष्ट होने पर६३८
राज्यन्ध में लुद्रांजन६२८तर्पण में तृप्ति के लक्षण६३५मधुर रस को छोड़कर पांच रस६३८
नक्तान्ध में अंजन६२९अतितर्पण से दोष६३६प्रसादन अंजन६३८
राज्यन्धता को नष्ट करने केहीनतर्पण से दोष६३६प्रातः सारथ वा रात्रि में कौन सा
लिये अन्य योग६२९इनमें दोषकी अधिकता केअंजन बरतना६३८
वातजःय तिमिर में संस्कृत तैल६२९अनुसार चिकित्सा६३६गुटिका, रसक्रिया, चूर्णभेद से
पुरातन घृत आदि तिमिरो मेंआँख जिसे तर्पण द्वारा अवश्यअंजन तीन प्रकार का है६३९
उत्तम६२९बल मिलता है६३६लेखन अंजन की वर्ति का प्रमाण६३९
पित्तजन्य तिमिर में६२९पुटपाक कब करनी चाहिये६३६रसांजन की मात्रा६३९
बकरी का घी नस्य में उत्तम है६२९पुटपाक के तीन प्रकार६३६इन अंजनों के लिये इनके
अणुतैल वायु एवं रक्तजन्यपित्त रक्तज व्रण के लियेसमान गुणवाले पात्र बरते६३९
तिमिर में६२९रोपण पुटपाक६३६शलाकाओं का अकार६३९
वातज तिमिर में६२९स्वेदन पुटपाक २०० गिनने तक६३६शलाका से अंजन को लगाना६३९
अन्य कई प्रकार के अंजन६२९लेखन द्रव्यों को मिलाकरप्रत्यंजन कब बरतना६३९
नस्य, रसक्रिया, धूमपान आदि६३०लेखन पुटपाक६३६किन में अंजन नहीं करना६३९
श्लैष्मिक लिंगनाश कीरोपण पुटपाक ३०० गिनने तक६३६किन हालतों में लगाने से
चिकित्सा६३२लेखन आदि पुटपाक कितनेअंजन दोष करता है६३९
वेधन के पीछे धावन सेदिन बरतना६३६अकालकृत अंजन से उत्पन्नरोग६४०
सेचन आदि६३२परहेज पालने का समय६३६लेखन अंजन के सम्यग् योग में६४०
भली प्रकार लेखन हुआतर्पण किये तथा पुटपाक लियेलेखन अंजन के अतियोग में६४०
जानने के लक्षण६३३व्यक्ति को त्याज्य६३७लेखन के हीन योग में६४०
सिरावेध विधि में६३३तर्पण और पुटपाक के मिथ्याप्रसादन अंजन के सम्यग् योग६४०
दैवकृत छेद से अन्यत्र वेधनआचरण में६३७प्रसादांजन के अतियोग में६४०
होने पर६३३पुटपाक के सम्यग् योग से६३७सफलता चाहनेवाला मात्रा से
अपांग के पास वेधन होने पर६३३पुटपाक के अतियोग से६३७अंजन करे६४०
पूर्ण पका धन शलाका के अग्रपुटपाक प्रसादन६३७अनुक्त अंजनों में हजारों रूप
भाग के छूने मात्र से नष्टअतिउष्ण और अतितीक्ष्णकी कल्पना६४१
होता है६३३तर्पण एवं पुटपाक६३७हृष्टिवल को बढ़ाने के लिये
लिंगनाश अपूर्ण कच्छा होनेठीक मात्रा में तर्पण बरतने से६३७श्रेष्ठ अंजन६४१
पर वेधन होने से वापिसतर्पण और पुटपाक के प्रारंभएकोनविंशतिसप्तमोऽध्यायः
आता है६३४और अन्त में६३७नयनाभिघात प्रतिषेध का व्याख्यान६४१
शलाका दोष६३४दोष के अनुसार उपयुक्ततीक्ष्णांजन, धूप, घूल, आदि से
आश्च्योतन६३७आंखों में आघात की चिकित्सा६४२