सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ
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सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| इनका उपचार तुरन्त सात दिन से पहले करना | ६४२ |
| चोट लगी आंख पर पटलों में हुये क्षत का साध्यासाध्य विचार | ६४२ |
| यदि नेत्र अन्दर बहुत दब गया हो | ६४२ |
| कुक्कुणक रोग और उसकी चिकित्सा | ६४३ |
| पलकों को घोने के लिये इसमें उपयोगी अज्ञान लेपादि | ६४३ |
| विशतितमोऽध्यायः | |
| कर्णगत रोग विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान | ६४४ |
| कर्णगत रक्त रोग | ६४४ |
| कष्टसाध्य शूल | ६४४ |
| कर्ण प्रसाद रोग | ६४४ |
| वाषिर्ष रोग | ६४४ |
| कर्णसंखाव | ६४४ |
| कर्णकण्ठ | ६४४ |
| कर्णगृध्र | ६४५ |
| कर्णप्रतिनाह | ६४५ |
| क्रमिकण | ६४५ |
| कर्णपाक | ६४५ |
| पूतिकर्णक | ६४५ |
| एकविंशतितमोऽध्यायः | |
| कर्णगत रोग प्रतिषेध का व्याख्यान | ६४५ |
| कर्ण रोग में पथ्य | ६४५ |
| कर्ण शूलादि चार रोगों में सामान्य औषध | ६४५ |
| नाडीस्वेद और पिण्डस्वेद | ६४५ |
| पीपल के पत्तों का तेल | ६४५ |
| कर्ण शूल में वला तैल | ६४६ |
| कानों में डालने की वसा | ६४६ |
| वेदना की शान्ति के लिये स्नेह | ६४६ |
| वेदना नाश के लिये लहसुन आदि | ६४६ |
| कर्णशूल में घृत | ६४६ |
| दीपिका तैल | ६४७ |
| कर्ण शूल के लिये अन्य प्रयोग | ६४७ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| कर्णशूल में मूत्र कई प्रकार के तेल कर्णशूल के लिये तथा अन्य कई योग | ६४७ |
| द्वारविंशतितमोऽध्यायः | |
| नासागत रोग विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान | ६४६ |
| ११ नासारोग | ६४६ |
| अपीनसरोग के लक्षण | ६४६ |
| पूतिनासा के लक्षण | ६४६ |
| नासागाक के लक्षण | ६५० |
| पूररक्त के लक्षण | ६५० |
| क्ष्वशु के लक्षण | ६५० |
| भ्रंशशु के लक्षण | ६५० |
| दीप्त के लक्षण | ६५० |
| नासा प्रतिनाह | ६५० |
| नासा परिखाव | ६५० |
| नासा परिशोष | ६५१ |
| सात अबुर्द | ६५१ |
| पांच प्रकार के प्रतिशयाय | ६५१ |
| त्रयोविंशतितमोऽध्यायः | |
| नासागत रोग प्रतिषेधका व्याख्यान | ६५१ |
| अपीनस और पूतिनासा में | ६५१ |
| अवपीडन के रूप में नश्य | ६५१ |
| नसापाक में | ६५१ |
| पूररक्त में चिकित्सा क्ष्वशु और भ्रंशशु चिकित्सा | ६५१ |
| दीप्त, नासानाह, नासाखाव | ६५२ |
| चतुर्विंशतितमोऽध्यायः | |
| प्रतिशयाय प्रतिषेधका व्याख्यान | ६५२ |
| प्रतिशयाय के कारण | ६५२ |
| पूर्वरूप | ६५२ |
| वातजन्य, पित्तज, कफज, सन्निपातज रक्तजन्य, प्रतिशयाय में | ६५२ |
| दुष्ट प्रतिशयाय | ६५३ |
| नूतन प्रतिशयाय को छोड़ सब में घृतपान | ६५४ |
| अपक्व प्रतिशयाय में स्वेद | ६५४ |
| कफको शिरोविरेचनसे खींचना | ६५४ |
| पीनस रोगी को असेव्य | ६५४ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| तक्षण पीनस के लिये वातिक प्रतिशयाय में पित्तरक्त जन्य प्रतिशयाय में कफजन्य प्रतिशयाय में सन्निपातजन्य प्रतिशयाय इनमें तैल के योग | ६५४ |
| पंचविंशतितमोऽध्यायः | |
| शिरोरोग विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान | ६५५ |
| ११ प्रकार की शिरोवेदना | ६५५ |
| सूर्यावर्त्तक | ६५६ |
| वायु, पित्त, कफ के प्रकोप से शिरोरोग | ६५७ |
| सन्निपात तथा रक्तजन्य, कुमिजन्य शिरो रोग | ६५७ |
| अनन्त वात के लक्षण | ६५७ |
| शंखक के लक्षण | ६५७ |
| षड्विंशतितमोऽध्यायः | |
| शिरोरोग प्रतिषेध का व्याख्यान | ६५७ |
| वातजन्य में वातव्याधि की चिकित्सा | ६५७ |
| इसमें खाने योग्य | ६५८ |
| घृत तथा लेपादि | ६५८ |
| कफजन्य में चिकित्सा | ६५८ |
| क्षयजन्य की चिकित्सा | ६५८ |
| जिस रोगी के शिर को क्रमि खाते हों | ६५९ |
| अर्घावभेदक में | ६५९ |
| अनन्त, शंखक, आदि की चिकित्सा | ६५९ |
| सप्तविंशतितमोऽध्यायः | |
| नवग्रहाकृति विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान | ६६० |
| बालकों के ग्रहों के लक्षण, उनकी चिकित्सा, उत्पत्ति तथा कारण | ६६१-६६२ |
| अष्टाविंशतितमोऽध्यायः | |
| स्कन्दग्रह प्रतिषेध का व्याख्यान | ६६२ |
| स्कन्दग्रह से आकांत बच्चों की शान्ति के लिये उपाय तथा रक्ष्य विधि | ६६२ |