सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
विषयानुक्रमणिका
२५
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| अहिण्डुका " " | ५६३ |
| शुक्रवृन्द " " | ५६३ |
| विच्छू के तीन प्रकार | ५६३ |
| विच्छू ३० हैं | ५६३ |
| मन्द विष विच्छू का वर्णन | " |
| मध्यम विष विच्छू " " | ५६३ |
| तीक्ष्णविष वाले विच्छू | ५६४ |
| तीव्र और मध्य विष वाले विच्छू की चिकित्सा सर्प दंश की तरह | ५६४ |
| चिकित्सा | ५६४ |
| मकड़ी विष अतिभयानक | ५६४ |
| मकड़ी विष थोड़ी मात्रा में फैला हुआ कठिनाई से जाना जाता है | ५६४ |
| मकड़ी विष सात से १५ दिनों में ही मार देता है | ५६४ |
| मकड़ियाँ सात प्रकार से विष निकालती हैं | ५६४ |
| लताओं के विषय में पुराना इतिहास, काटने के सामान्य लक्षण साध्यासाध्य और मेदों के साथ चिकित्सा | ५६५-५६८ |
| कीटों के काटने से उत्पन्न ब्रणों की चिकित्सा | ५६८ |
| कर्णिका को निकालने के लिये | ५६८ |
| उत्तरतन्त्रम् | |
| प्रथमोऽध्यायः | |
| औपद्रविक अध्याय का व्याख्यान | ५६६ |
| शिर के रोग | ५६६ |
| आँख की आकृति | ५६६ |
| आँख में मांस पृथ्वी से, रक्त अनि से आदि | ५६६ |
| कृष्णमंडल तथा दृष्टि के भाग | ५६६ |
| आँख में पाँच मण्डल | ६०० |
| आँख में छू सन्धियाँ | ६०० |
| आँख में छू पटल | ६०० |
| आँखों को बाँधनेवाली खिरायुत श्लेष्मा | ६०१ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| विपरीत गतिवाले दोष अतिशय भयानक रोग उत्पन्न करते हैं | ६०१ |
| रोग का पूर्वरूप | ६०१ |
| आँखों के उत्पन्न रोगों में पूर्वरूप देखकर चिकित्सा करें | ६०१ |
| पहले कारण का परित्याग बाद में वातादि दोषों का | ६०१ |
| नेत्रों में उत्पन्न रोगों के कारण | ६०१ |
| आँख के ७६ रोग | ६०१ |
| वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, रक्तजन्य तथा सर्वगत नेत्र रोगों में | ६०१ |
| बाह्य रोगों में दो असाम्य हैं | ६०२ |
| द्वितीयोऽध्यायः | |
| सन्धिगत रोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०२ |
| सन्धिगत रोग ६ हैं | ६०२ |
| पूयालस किसे कहते हैं | ६०२ |
| कनीनिका प्रदेश, पूयस्वाव, श्लेष्मस्वाव, रक्तस्वाव, पित्तस्वाव के लक्षण | ६०३ |
| पर्वणी, अलजी, क्रमिग्रन्थि के लक्षण | ६०३ |
| तृतीयोऽध्यायः | |
| वर्त्तमगत रोगविज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०३ |
| २१ रोग रोगवर्त्त में लक्षणों सहित | ६०३-६०६ |
| चतुर्थोऽध्यायः | |
| शुक्लगत रोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०६ |
| आँख के शुक्ल भाग में ११ रोग | ६०६ |
| पञ्चमोऽध्यायः | |
| कृष्णगत रोगविज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०७ |
| कृष्णभाग में होने वाले ४ रोग | ६०७ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| षष्ठोऽध्यायः | |
| सर्वगत रोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०८ |
| सर्वगत रोगों में कुल १७ रोग हैं | ६०८ |
| आँखों के सब रोग अभिष्यन्द के कारण हैं | ६०८ |
| वाताभिष्यन्द, पित्ताभिष्यन्द, कफाभिष्यन्द तथा रक्ताभिष्यन्द में | ६०८ |
| अधिमन्थ के सामान्य लक्षण वातज, पित्तज, कफज, रक्ताधिमन्थ में | ६०८ |
| उपरोक्त कितने २ दिनों में दृष्टि नष्ट कर देते हैं | ६०९ |
| सखोफ पाक | ६०९ |
| हताविमन्थ | ६०९ |
| वातपर्याप | ६०९ |
| शुष्काक्षिपाक | ६१० |
| अन्वतो वात | ६१० |
| अस्लाधुषित | ६१० |
| सिरोत्पात-खिराप्रदर्ष | ६१० |
| सप्तमोऽध्यायः | |
| दृष्टिगत विज्ञानीय अध्याय का व्याख्या | ६१० |
| दृष्टि का प्रमाण, उत्पत्ति आदि | ६१० |
| दृष्टि में आश्रित १२ भयानक रोग | ६१० |
| पटलों में प्रविष्ट तिमिर रोग रोग के लक्षण | ६११ |
| परिल्लाधि रोग | ६१२ |
| रक्तजन्य मण्डल | ६१२ |
| छूः लिंगनाश | ६१३ |
| पित्त से विदग्ध दृष्टि | ६१३ |
| कफ से विदग्ध दृष्टि | ६१३ |
| धूमदर्शी | ६१३ |
| हृस्वजड्य | ६१३ |
| नकुलान्ध | ६१३ |
| गम्भीरका | ६१३ |
| निमित्तजन्य रोग | ६१३ |
| अनिमित्तजलिंगनाश | ६१३ |
२६
सुश्रुतसंहिता
विषय
आँख के यह कुछ छिहत्तर रोग ६१४
अष्टमोऽध्यायः
चिकित्सक प्रविभाग विज्ञानीय
अध्याय की व्याख्या ६१४
ग्यारह प्रकार के छेदन करने योग्य रोग ६१४
नौ रोग लेखन के योग्य ६१४
पाँच रोग भेदन के योग्य ६१४
पंद्रह रोग वेधन के योग्य ६१४
१२ रोग शस्त्रकर्म के अयोग्य हैं ६१४
सात रोग याप्य हैं ६१४
पन्द्रह रोग असाध्य हैं ६१४
नवमोऽध्यायः
बातामिष्यन्द प्रतिषेध चिकित्सा का व्याख्यान ६१५
अभिष्यन्द और अविमन्य वाले रोगी का सिरामोक्षण ६१५
योग्य उपनाहों से स्वेद दें ६१५
भोजन ग्राह्य ६१५
भोजनोपरान्त घृत पान ६१५
सिद्ध किया तैल नस्य में ६१६
सिद्ध किये दूध का परिषेक, आश्च्योतन में ६१६
अभिष्यंद में अंजनादि ६१६
दशमोऽध्यायः
पित्तामिष्यन्द प्रतिषेध का व्याख्यान ६१६
पित्त जन्य अविमन्य में पित्तज अभिष्यन्द आदि में ६१७
सिद्ध किया घृत, दूध, नस्य आदि के योग ६१७
आश्च्योतन ६१७
अम्लाद्युषित में सिरामोक्षण न करे ६१७
एकादशोऽध्यायः
श्लेष्माभिष्यन्द प्रतिषेध व्याख्या ६१८
कफजन्य अभिष्यन्द और अविमन्य में ६१८
बलासमप्रियत रोग में ६१९
विषय
पिष्टक रोग ६१९
योगांजन ६१९
द्वादशोऽध्यायः
रक्ताभिष्यन्द प्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान ६१९
अभिमन्य, अभिष्यन्द, सिरोत्पात और सिराहर्ष ६१९
उपरोक्त रोगों में पुरातन घृत तथा सिरामोक्षण करे ६१९
विरेचन के बाद शोधन ६२०
आँखों के चारों ओर प्रलेप ६२०
अतिशय पीड़ा होने पर चारों ओर के लिये विविध अंजन ६२०-६२३
त्रयोदशोऽध्यायः
लेख्य रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२३
लेखन के योग्य जो ९ रोग कहे हैं उनमें सामान्य विधि जिसमें रक्तस्त्राव आदि न हो वह लेखन भली प्रकार जानो ६२३
ठीक प्रकार लेखन न होने के दोष ६२३
अतिस्त्रावित का लक्षण ६२४
किन २ में लेखन करना चाहिये ६२४
चतुर्दशोऽध्यायः
मेघ रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२४
पकी हुई बिसग्रन्थि के लिये लगप के भिन्न हो जाने पर ६२४
अंजन नामिका में स्वेदन ६२४
कुमिग्रन्थि में स्वेदन करने से कफज उपनाह में ६२४
बिसग्रन्थि आदि पाँचों मेघ योग्य रोगों के अपक्व होने पर ६२४
पञ्चदशोऽध्यायः
छेद्य रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२४
सैंधव के चूर्ण से आँख में क्षोभ उत्पन्न करना ५२५
अर्म के क्षोभित हो जाने पर ६२५
जो अर्म मछली के जाल के समान फैला हो ६२५
विषय
प्रतिसारण के लिये ६२५
शूल होने पर ६२५
यदि अर्म कुछ वच जाये ६२५
जो अर्म छोटा दही के समान ६२५
जो अर्म चमड़े के समान मोटा हो ६२५
अगं के हट जाने से स्वाभाविक वर्ण ६२५
सिराजाल में जो सिरा कठिन हो ६२५
जो पिडका औषधियों से शान्त न हो ६२५
सिराजाल, सिरापिडका में यवक्षार से प्रतिसारण ६२५
अश्रुनाड़ी ब्रण होने के कारण ६२५
चूर्णांजन से अर्म, पिडका आदि नष्ट ६२५
पलक पर स्वेद देकर ६२६
षोडशोऽध्यायः
पद्मकोप प्रतिषेध का व्याख्यान ६२९
पलकों में होनेवाले पद्मकोप के विषय में ६२६
यदि इससे पद्मकोप शान्त न हो तो प्रतिसारण आदि ६२६
बालों की जो नई पंक्ति पैदा हो गई है उसके विषय में ६२७
पद्मकोप को नष्ट करने के लिये सब उपायों को बरते ६२७
सप्तदशोऽध्यायः
हृष्टिगत रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२७
३ रोग साध्य ३ असाध्य ६ याप्य ६२७
पित्तविदग्ध हृष्टि में ६२७
अंजन दोनों रोगों में उत्तम है ६२७
पित्त एवं कफ दोनों विदग्ध हृष्टियों में अंजन करे ६२८
दिवान्ध और राग्यन्ध दोनों को नष्ट करने के लिये अंजन ६२८
विषयांलुक्रमणिकां
३७
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| पित्तविदग्ध हृष्टि में रसौत | प्रशस्त शलाका | ६३४ | सेक आश्च्योतन पुटपाक की भांति | ||
| आदि | ६२८ | व्यधन के दोष से रोग | ६३४ | तीनों रूपों में | ६३८ |
| पित्तविदग्ध हृष्टि के सौ | वेदना में अन्य योग | ६३४ | कितनी बूँद बरतनी चाहिये | ६३८ | |
| वीरांजन आदि चूर्ण | ६२८ | हृष्टि की निर्मलता के लिये | पारिषेक का कारणकाल | ६३८ | |
| पित्तविदग्ध हृष्टि में अंजन | ६२८ | शुभ अंजन | ६३५ | कफज रोग में | ६३८ |
| राज्यन्ध को नष्ट करनेवाला | अष्टादशोऽध्यायः | शिर में उत्पन्न अतिप्रबल रोगों | |||
| अंजन | ६२८ | क्रियाकल्य का व्याख्यान | ६३५ | को नष्ट करके | ६३८ |
| राज्यन्ध में गोमूत्र आदि | ६२८ | आंखों पर तर्पण | ६३५ | दोष के लक्षण स्पष्ट होने पर | ६३८ |
| राज्यन्ध में लुद्रांजन | ६२८ | तर्पण में तृप्ति के लक्षण | ६३५ | मधुर रस को छोड़कर पांच रस | ६३८ |
| नक्तान्ध में अंजन | ६२९ | अतितर्पण से दोष | ६३६ | प्रसादन अंजन | ६३८ |
| राज्यन्धता को नष्ट करने के | हीनतर्पण से दोष | ६३६ | प्रातः सारथ वा रात्रि में कौन सा | ||
| लिये अन्य योग | ६२९ | इनमें दोषकी अधिकता के | अंजन बरतना | ६३८ | |
| वातजःय तिमिर में संस्कृत तैल | ६२९ | अनुसार चिकित्सा | ६३६ | गुटिका, रसक्रिया, चूर्णभेद से | |
| पुरातन घृत आदि तिमिरो में | आँख जिसे तर्पण द्वारा अवश्य | अंजन तीन प्रकार का है | ६३९ | ||
| उत्तम | ६२९ | बल मिलता है | ६३६ | लेखन अंजन की वर्ति का प्रमाण | ६३९ |
| पित्तजन्य तिमिर में | ६२९ | पुटपाक कब करनी चाहिये | ६३६ | रसांजन की मात्रा | ६३९ |
| बकरी का घी नस्य में उत्तम है | ६२९ | पुटपाक के तीन प्रकार | ६३६ | इन अंजनों के लिये इनके | |
| अणुतैल वायु एवं रक्तजन्य | पित्त रक्तज व्रण के लिये | समान गुणवाले पात्र बरते | ६३९ | ||
| तिमिर में | ६२९ | रोपण पुटपाक | ६३६ | शलाकाओं का अकार | ६३९ |
| वातज तिमिर में | ६२९ | स्वेदन पुटपाक २०० गिनने तक | ६३६ | शलाका से अंजन को लगाना | ६३९ |
| अन्य कई प्रकार के अंजन | ६२९ | लेखन द्रव्यों को मिलाकर | प्रत्यंजन कब बरतना | ६३९ | |
| नस्य, रसक्रिया, धूमपान आदि | ६३० | लेखन पुटपाक | ६३६ | किन में अंजन नहीं करना | ६३९ |
| श्लैष्मिक लिंगनाश की | रोपण पुटपाक ३०० गिनने तक | ६३६ | किन हालतों में लगाने से | ||
| चिकित्सा | ६३२ | लेखन आदि पुटपाक कितने | अंजन दोष करता है | ६३९ | |
| वेधन के पीछे धावन से | दिन बरतना | ६३६ | अकालकृत अंजन से उत्पन्नरोग | ६४० | |
| सेचन आदि | ६३२ | परहेज पालने का समय | ६३६ | लेखन अंजन के सम्यग् योग में | ६४० |
| भली प्रकार लेखन हुआ | तर्पण किये तथा पुटपाक लिये | लेखन अंजन के अतियोग में | ६४० | ||
| जानने के लक्षण | ६३३ | व्यक्ति को त्याज्य | ६३७ | लेखन के हीन योग में | ६४० |
| सिरावेध विधि में | ६३३ | तर्पण और पुटपाक के मिथ्या | प्रसादन अंजन के सम्यग् योग | ६४० | |
| दैवकृत छेद से अन्यत्र वेधन | आचरण में | ६३७ | प्रसादांजन के अतियोग में | ६४० | |
| होने पर | ६३३ | पुटपाक के सम्यग् योग से | ६३७ | सफलता चाहनेवाला मात्रा से | |
| अपांग के पास वेधन होने पर | ६३३ | पुटपाक के अतियोग से | ६३७ | अंजन करे | ६४० |
| पूर्ण पका धन शलाका के अग्र | पुटपाक प्रसादन | ६३७ | अनुक्त अंजनों में हजारों रूप | ||
| भाग के छूने मात्र से नष्ट | अतिउष्ण और अतितीक्ष्ण | की कल्पना | ६४१ | ||
| होता है | ६३३ | तर्पण एवं पुटपाक | ६३७ | हृष्टिवल को बढ़ाने के लिये | |
| लिंगनाश अपूर्ण कच्छा होने | ठीक मात्रा में तर्पण बरतने से | ६३७ | श्रेष्ठ अंजन | ६४१ | |
| पर वेधन होने से वापिस | तर्पण और पुटपाक के प्रारंभ | एकोनविंशतिसप्तमोऽध्यायः | |||
| आता है | ६३४ | और अन्त में | ६३७ | नयनाभिघात प्रतिषेध का व्याख्यान | ६४१ |
| शलाका दोष | ६३४ | दोष के अनुसार उपयुक्त | तीक्ष्णांजन, धूप, घूल, आदि से | ||
| आश्च्योतन | ६३७ | आंखों में आघात की चिकित्सा | ६४२ |
२८
सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| इनका उपचार तुरन्त सात दिन से पहले करना | ६४२ |
| चोट लगी आंख पर पटलों में हुये क्षत का साध्यासाध्य विचार | ६४२ |
| यदि नेत्र अन्दर बहुत दब गया हो | ६४२ |
| कुक्कुणक रोग और उसकी चिकित्सा | ६४३ |
| पलकों को घोने के लिये इसमें उपयोगी अज्ञान लेपादि | ६४३ |
| विशतितमोऽध्यायः | |
| कर्णगत रोग विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान | ६४४ |
| कर्णगत रक्त रोग | ६४४ |
| कष्टसाध्य शूल | ६४४ |
| कर्ण प्रसाद रोग | ६४४ |
| वाषिर्ष रोग | ६४४ |
| कर्णसंखाव | ६४४ |
| कर्णकण्ठ | ६४४ |
| कर्णगृध्र | ६४५ |
| कर्णप्रतिनाह | ६४५ |
| क्रमिकण | ६४५ |
| कर्णपाक | ६४५ |
| पूतिकर्णक | ६४५ |
| एकविंशतितमोऽध्यायः | |
| कर्णगत रोग प्रतिषेध का व्याख्यान | ६४५ |
| कर्ण रोग में पथ्य | ६४५ |
| कर्ण शूलादि चार रोगों में सामान्य औषध | ६४५ |
| नाडीस्वेद और पिण्डस्वेद | ६४५ |
| पीपल के पत्तों का तेल | ६४५ |
| कर्ण शूल में वला तैल | ६४६ |
| कानों में डालने की वसा | ६४६ |
| वेदना की शान्ति के लिये स्नेह | ६४६ |
| वेदना नाश के लिये लहसुन आदि | ६४६ |
| कर्णशूल में घृत | ६४६ |
| दीपिका तैल | ६४७ |
| कर्ण शूल के लिये अन्य प्रयोग | ६४७ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| कर्णशूल में मूत्र कई प्रकार के तेल कर्णशूल के लिये तथा अन्य कई योग | ६४७ |
| द्वारविंशतितमोऽध्यायः | |
| नासागत रोग विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान | ६४६ |
| ११ नासारोग | ६४६ |
| अपीनसरोग के लक्षण | ६४६ |
| पूतिनासा के लक्षण | ६४६ |
| नासागाक के लक्षण | ६५० |
| पूररक्त के लक्षण | ६५० |
| क्ष्वशु के लक्षण | ६५० |
| भ्रंशशु के लक्षण | ६५० |
| दीप्त के लक्षण | ६५० |
| नासा प्रतिनाह | ६५० |
| नासा परिखाव | ६५० |
| नासा परिशोष | ६५१ |
| सात अबुर्द | ६५१ |
| पांच प्रकार के प्रतिशयाय | ६५१ |
| त्रयोविंशतितमोऽध्यायः | |
| नासागत रोग प्रतिषेधका व्याख्यान | ६५१ |
| अपीनस और पूतिनासा में | ६५१ |
| अवपीडन के रूप में नश्य | ६५१ |
| नसापाक में | ६५१ |
| पूररक्त में चिकित्सा क्ष्वशु और भ्रंशशु चिकित्सा | ६५१ |
| दीप्त, नासानाह, नासाखाव | ६५२ |
| चतुर्विंशतितमोऽध्यायः | |
| प्रतिशयाय प्रतिषेधका व्याख्यान | ६५२ |
| प्रतिशयाय के कारण | ६५२ |
| पूर्वरूप | ६५२ |
| वातजन्य, पित्तज, कफज, सन्निपातज रक्तजन्य, प्रतिशयाय में | ६५२ |
| दुष्ट प्रतिशयाय | ६५३ |
| नूतन प्रतिशयाय को छोड़ सब में घृतपान | ६५४ |
| अपक्व प्रतिशयाय में स्वेद | ६५४ |
| कफको शिरोविरेचनसे खींचना | ६५४ |
| पीनस रोगी को असेव्य | ६५४ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| तक्षण पीनस के लिये वातिक प्रतिशयाय में पित्तरक्त जन्य प्रतिशयाय में कफजन्य प्रतिशयाय में सन्निपातजन्य प्रतिशयाय इनमें तैल के योग | ६५४ |
| पंचविंशतितमोऽध्यायः | |
| शिरोरोग विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान | ६५५ |
| ११ प्रकार की शिरोवेदना | ६५५ |
| सूर्यावर्त्तक | ६५६ |
| वायु, पित्त, कफ के प्रकोप से शिरोरोग | ६५७ |
| सन्निपात तथा रक्तजन्य, कुमिजन्य शिरो रोग | ६५७ |
| अनन्त वात के लक्षण | ६५७ |
| शंखक के लक्षण | ६५७ |
| षड्विंशतितमोऽध्यायः | |
| शिरोरोग प्रतिषेध का व्याख्यान | ६५७ |
| वातजन्य में वातव्याधि की चिकित्सा | ६५७ |
| इसमें खाने योग्य | ६५८ |
| घृत तथा लेपादि | ६५८ |
| कफजन्य में चिकित्सा | ६५८ |
| क्षयजन्य की चिकित्सा | ६५८ |
| जिस रोगी के शिर को क्रमि खाते हों | ६५९ |
| अर्घावभेदक में | ६५९ |
| अनन्त, शंखक, आदि की चिकित्सा | ६५९ |
| सप्तविंशतितमोऽध्यायः | |
| नवग्रहाकृति विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान | ६६० |
| बालकों के ग्रहों के लक्षण, उनकी चिकित्सा, उत्पत्ति तथा कारण | ६६१-६६२ |
| अष्टाविंशतितमोऽध्यायः | |
| स्कन्दग्रह प्रतिषेध का व्याख्यान | ६६२ |
| स्कन्दग्रह से आकांत बच्चों की शान्ति के लिये उपाय तथा रक्ष्य विधि | ६६२ |
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ुश्र॑तसंहितौं ३9
विषय प्रष्ठ | विषय प विषय |
बात पित्त रमे क्वाथ क्षयरोगी को व्याञ्य ७१६ पाण्डुरोग चार प्रकारका है ९ ।
आदि ६८७ | धमं के अविरोधी विषय ७१६ | पूवर्प ०१
सन्निपात ज्वर मे क्वाथ आदि £ द्विचस्वारिशत्चमोऽभ्यायः खव पाण्डुरोग के रक्षण न |
सब्र उरो को नष्ट करने का गुल्मप्रतिषेध का व्याख्यान ७१७ | उशन्न ध ।
योग ६८६ | गुल्म पांच प्रकार का ७१७ | साध्य पाण्डुरोगी को धृत चूण 8
विषम उवरादि में भिन्नयोग ६६० | गुल्म का रक्षण ७१७ | आदि अनेक योग ०३९...
(प को नष्ट गुल्म के नाम काकारण ७१७ | पठ्चचत्वारिञत्तमोऽध्यायः |
र ६९० | गुल्म पकता नदी ७९७ | रक्त पित्त प्रतिषेध का
न २ सिद्ध किये तेल ६६० | पांच प्रकार का गुल्म कुपित व्याख्यान ह
0 ६६२ | होने पर तीन प्रकार के ७१७ | विदग्ध हआ रक्त दोनों मागो से
कफवातादि उवरां में ६६३ | पूवरूप ७१७ | प्रवृत्त होता है |
उपद्रव नाशक विशेष चिकित्सा ६६४ | वातः पित्त, कफः सन्निपातः साध्यासाध्य विचार ०
नस्य, विरेचन, स्नेह।दि ६९४ | रक्तजन्य गुल्म ७१८ | पूर्वरूप ० २
= ~ ७२४ ज्वर मे धृत देने का समय ६६६ | निरू श अनुवासनों से लाल ल (त
जवर मुक्त रोगी के लक्षण ६६७ | चिकित्वा` 8 || उन ७.५
ज्वर महादेव के क्रोध से ुभआ ६६७ | सलनिपातजन्य गुल्म मे तनिदोष ७९५ बदु
अतिसार प्रतिषेधका नाशक. चिकित्सा ७९६ भोषव ४ र
व्याख्यान | ही देनं ह
६६७ | चिकादि धृत िग्बायधृतः त २६
कारण ६६७ | दाधिक पूत, रसोनादि धृत॒ ७१६ | ऊर्ष्वमामी कौ
लक्षण व पंचतृणमूलादि घृत एर | विरेचन से ७२७ ,
सम््राति ६९७ । पानीयकषार ल उखके बाद् ७३७
अतिषार छः प्रकार का है ६६८ अरिष्ट ९८ मृद वमन सिद्धघृत पशप ७२७
पूचस्प ६ | शटा, दन्ती आदि की गोलियां ७२१ रने के व्यि लेह् तथाफल ७२७ |
असाध्य का लक्षण ६€ गुल्मरोगि्यों के लि | 2 पित्त नाच के छ्य अनेक
चिकित्छा (त ८ उद्ररोग, वात व्याधि आदिम ७२१ योग ७२७ ७३६ ,
एकचत्वारिखत्तमोऽध्यायः 8 श म ७२३ षट्चत्वारिसत्तमोऽध्यायः =
न त (१ शाः कर मू्खाप्रतिषेष का व्याख्यान ७३६
कारण तथा लक्षण ७१०.७१२ | योग मिन्न २ मूढ का करण ७३६
पूवरूप ७२४.७२७ | मोहमू्छी ७३९ `
अधः मृदु शोषन दे ७१४ निचस्वारिशत्तमोऽष्यायः || मृच्छा के छ प्रकार ७२६.
शोषन हो जाने पर. खाने हृद्गेग प्रतिषेष का व्याख्यान ७२७ | खश्चण | ७२६ .
७१४ | वाता र | ८
उपद्रव शान्त होने पर बृंहण ७ । < व प से ३ प्रकार रतजन्य, मयजनितृ . ।
व्यवायशोषी के लि क सान्नपरात् से चार प्रकार ७२७ | विषजनित मछ म इसके ६
समनाकेष्मि ७११ | जन्य रो किमे अनेक योग ८५
~ ओोषरोग का एक = | ङभजन्य, हृद्रोग मं ७२७-२८ || संन्यास सं्ावाला ७४५
` महीनेमंनाश - चतुञ्चत्वारिरत्तमोऽध्याय संज्ञ ७१५ | पाण्डुरोग प्रतिषेष का 1 आ जाने पर ७४१
हुन दि | व्यास्यान २ सप्रच त्वारिशत्तमोऽभ्यांयः ^
७१५ | पाण्डुरोग कै कारण ` ७३ पानस्य प्रतिषेष का 1
= = € व्ाख्यान - ७४२ |
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३२
सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| चार रसों के संयोग | ७६६ | षट्चषट्टितमोऽध्यायः | कितने एकवाले, दो वाले अथवा | ||
| छ रसों का संयोग | ८०० | तंत्रयुक्ति अध्याय का व्याख्यान | ८०६ | तीन वाले | ८०९ |
| स्वस्थवृत्त अध्याय का | ८०१ | ३२ तंत्र युक्तियाँ | ८०६ | पथ्य रसों से अविकृत तीन | |
| चिकित्सा प्रयोजन | ८०१ | तंत्र युक्तियों का लाभ | ८०६ | दोष | ८१० |
| जिस २ श्रुतु में जो २ दोष | अधिकरण, योग, पदार्थ, हेतुर्थ, | षोडश कलावाला पुरुष | ८१० | ||
| प्रकृपित होते हैं उन २ | उद्देश, निर्देश, उपदेश आदि | सत्त्व, रज, तम के भिन्न प्रकार | ८१० | ||
| श्रुतुओं में वे २ रस | के लक्षण | ८०७-८०९ | पृथक् रूप में वात, पित्त, कफ | ||
| देने चाहिये | ८०१-८०२ | षट्षष्टितमोऽध्यायः | तीन दोषों में | ८११ | |
| भोजन के १२ विभाग | ८०४ | दोष भेदविकल्प अध्याय का | दोष रक्तादि धातु आदि में | ||
| औषध के १० काल | ८०४ | व्याख्यान | ८०६ | मिलकर असंख्येय बनते हैं | ८१२ |
| आहारकाल | ८०५ | रसभेदविकल्प में कहे ६२ भेदों में | ब्राह्म वचन | ८१२ |
N श्रीनिर्णयचर्या ॥
सुश्रुतसंहिता
सूत्रस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
अथोतो वेदोक्तिसंध्योर्येन्यदयाख्याम् ॥ १ ॥ एथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'वेदोक्तिसं' नामक अध्याय की व्याख्या करने— जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १ ॥
यत्तस्य—वेदोक्तिसं के अभिप्राय आयुर्वेदोक्तिसं का है। यथा—“तस्यानुकृष्टुमतेमो वेदो वेदविदा मतः—” चरक में आयुर्वेद की उत्पत्ति के सम्बन्ध में स्पष्ट किया है, कि—
“न द्राक्षुर्वेदस्याभ्योत्पत्तिस्फलदभ्यं, अन्यत्रात्रयोशोपदे- वाभ्यामि ॥ एतेहे ह्यमधिकृत्योत्पत्तिमुपदिशन्त्येके ॥” च० सू० अ० ३० ॥ २७ ॥
भगवान् बालक का अभिप्राय—अतिशये जनवान् पुरुष से है, जैसा कि भगवान् का उल्लेख किया है—
उत्पत्तिकारणं चैव भूतानामागतं गतिम् । चैत्ति विद्यामविद्यां च स श्रेयं भगवदिति ॥
अथवा इसका दूसरा अर्थ—समस्त परवर्य, यथा, श्री आदि से युक्त को भगवान् कहा है। क्योंकि योगपुरुषों का यही परवर्य है—जैसा कि चरक में कहा है—
आवेशभतसौ मानमर्थात्तौ हृन्दतः क्रिया । दृष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिषिष्ठतश्चाप्यदण्डानम् ॥
१ भगवान् का लक्षण— भुजपातः, भुजनाञ्चैव धारणादव्यवहृतिः । द्रुवस्थानं समुदितम्— ॥ ३० सू० अ० ३ ॥
अथवा—यथा भुजपातः भुज संहरणं विद्योयते । उपहाय तक्षदयनिस्तृषिण उपहाः कृतः ॥ ४ ॥ चरक सू० अ० ३० ॥ २८ ॥
हिरण्यशना चोत्थि—फलां को भुजके के लिये-भुज की उपहाय होते हैं, यही पर शरीर को झुकाने के लिये भुज लाहिये।
इत्युक्तेष्वेमाख्याते योगिनो वृद्धेभ्यवसम् । शुद्धकृत्वसमाधानात् तत् संयमुपजयते ॥
चरक सू० अ० ११३० ॥ २९ ॥
परवर्यस्य समस्तस्य माहात्म्य-यशसाः प्रियः । वेमास्यथ प्रयत्नस्तदपण्णा भग इतीडना ॥
मानुषमताः ।
धन्वन्तरिः—धनुः सत्यं, वरयान्तिष्विचिन्ति गृह्णतेति फल- स्तरीः—शब्द मात्रा के पारंगत होने से 'धन्वन्तरि' ।
विशेष मन्तःय—यह सुश्रुत संहिता श्री नारायण (प्रति- हरेर्ज्योतिषो नारायण एव० ड० टी०) द्वारा प्रतिसंस्कृत (सम्पादित) है और प्रतिसंस्कृत ग्रन्थ में ४ प्रकार के सूत्र या वाक्य रहते हैं अथवा यों कहिये कि प्रतिसंस्कृत ग्रन्थ ४ प्रकार के वाक्यों से भरपूरित होता है, यथा—१—गुरुमत्र = आचार्य की वाक्य, २—शिष्येभ्यः या श्रेता की वाक्य (प्रश्न), ३—प्रतिहरेर्यकां का सूत्र जैसे यहाँ तथा वहाँ वहाँ “यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः” आदि ३ और ४—एकीय सूत्र अर्थात् किसी एक ऋषि (आचार्य) का मत, जिसका सुन न मानते हो परन्तु कुछ अवश्य मानते हो या उसमें उपवेष्टि हो, या सत्यांश हो, यथा—श्लो० स्थान० अ० ३ में रामसमभव में ऋषियों के अनेक मतों का वर्णन तथा श्लो० अ० ६ में “तत्र केचिद् आहुः” और यत्र तत्र “यद् आहुः एते” “इति केचित्” आदि वाक्य । इस प्रकार उनके चार प्रकार के वाक्यों से भरपू- रित ग्रन्थ सुगम, सरल एवं संक्षिप्त होता है ॥ ३ ॥
अथ सलु भगवन्तमप्यवरस्यपिगणपरिवृतमोक्षमस्य कागिराज दिवोदास धन्वन्तरिस्मोपधेनवचेतरेणीरधो- ष्टोषावतकरवीर्य (२) गोध्रुरक्षितसुश्रुतप्रभृतय उच्युः ॥३॥
देवताओं में श्रेष्ठ, ऋषियों के समूह से घिरे, वानप्रस्थाश्रम में रहते हुए—कागिराज, भगवान्, दिवोदास धन्वन्तरि की
१ जगदर्यसाम्नाद् भगवन्तः-तस्यान्तो व्याधिः प्रका- तस्यसम्भटकोऽयमः, तस्यातिः स्याप्यकालमुपनिवशतान् ॥
आयुष्यते ।
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अ० १]
सूत्रस्थानम्
३
वि० मन्तव्यम्—'इह खलु' का तात्पर्य-इस ग्रन्थ में या इस अध्याय में या हमारे विचार में यह माना जाता है, निश्चय किया गया है या कहा जाता है भले ही अन्य ग्रन्थों में प्रकरणों में अध्यायों में अथवा अन्य आचार्यों के विचार मत में कुछ भी माना जाता हो निश्चय किया गया हो या कहा जाता हो। इस प्रकार विरोध तथा विरोधाभास का निराकरण हो जाता है जो मित्र २ प्रकारों, दृष्टिकोणों या विधिभेदों के अनुसार कहे गये विषय विरुद्ध (परस्पर या पूर्वोपर विरोधी) प्रतीत होते हैं ॥
तद्यथा—शल्यं, शालाक्यं, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्यम्, अगदतन्त्रं, रसायनतन्त्रं, वाजीकरणतन्त्रमिति ॥७॥
यथा—शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्य, अगदतन्त्र, रसायनतन्त्र और वाजीकरण तन्त्र ॥७॥
अथास्य प्रत्यङ्गलक्षणसमासः—
तत्र, शल्यं नाम विविधतृणकाष्ठपाषाणपांशुलोहलोष्टास्थिबालनखपूयास्त्रावदुष्टव्रणान्तर्गर्भशल्योद्भरणार्थं, यन्त्र-शस्त्रस्त्रारान्नप्रणिधानव्रणविनिश्चयार्थं च ॥१॥
शालाक्यं नामोर्ध्वजत्रुगतानां श्रवणनयनबदनघ्राणादिसंश्रितानां व्याधीनामुपशमनार्थम् ॥२॥
कायचिकित्सा नाम सर्वाङ्गसंश्रितानां व्याधीनां ज्वररक्तपित्तशोषोन्मादापस्मारकुष्ठमेहातिसारादीनामुपशमनार्थम् ॥३॥
भूतविद्या नाम देवासुरगन्धर्वयक्षरक्षःपितृपिशाचनागमह्राद्युपसृष्टचेतसां शान्तिकर्मबलिहरणादिग्रहोपशमनार्थम् ॥४॥
कौमारभृत्यं नाम कुमारभरणधात्रीक्षीरदोषसंशोधनार्थं दुष्टस्तन्यग्रहसमुत्थानां च व्याधीनामुपशमनार्थम् ॥
अगदतन्त्रं नाम सर्पकीटतूतामूषकादिदुष्टविषयज्जन्तार्थं विविधविषसंयोगोपशमनार्थं च ॥६॥
रसायनतन्त्रं नाम वयःस्थापनमायुर्भधाबलकरं रोगाहरणसमर्थं च ॥७॥
वाजीकरणतन्त्रं नामाल्पदुष्टक्षीणविशुष्करेतसामाप्याग्रनमसादोपचयजनननिमित्तं प्रहर्षजननार्थं च ॥८॥
अब इन आठ अङ्गों में से प्रत्येक अङ्ग का लक्षण संक्षेप में कहते हैं। इनमें—
शल्य से अभिप्राय—नाना प्रकार के तिनके, काष्ठ, पत्थर, धूलि, लोहा, घातु, ढेला, अस्थि, बाल, नख, पूय, स्त्राव, दूषित व्रण, अन्तः शल्य, गर्भशल्य आदि को निकालने के लिये और यन्त्र, शस्त्र, स्नार, अग्नि के प्रयोग के लिये एवं व्रण के निश्चय के लिये, शल्य शास्त्र है।१
जत्रु ( ग्रीवामूल अथवा अंस सन्धि ) से ऊपर के रोग अर्थात्, कान, आँख, मुख और नासिका आदि में होनेवाले रोगों की शान्ति के लिये शालाक्य शास्त्र है।
वक्तव्य—जत्रु—शब्द से मिलता हुआ शब्द 'जात' या 'जोता' है। बैलों को गाड़ी में जोतते समय उनके गले के नीचे जो पड़ी या रस्सी जूले में बाँधी जाती है, उसे जोत कहते हैं। यह पड़ी जहाँ गले में बाँधती है, उस भाग का नाम जत्रु है।
(२) शलाका—पटलवेधनी—यह अर्थ है। लिंग नाश की चिकित्सा में शलाका का उपयोग सुश्रुत में बताया गया है। यथा—
नाधो नोर्ध्वं न पाश्चाभ्यां छिद्रं देवकृते ततः।
शलाकया प्रयत्नेन विश्वस्तं यवकृया ॥
मध्यप्रदेशिन्यंगुष्ठस्थिरहस्तगृहीतया।
दक्षिणेन भिषक् सव्यं विध्येत् सव्येन चेतर्त् ॥
सु० उ० अ० १७ ॥५६,६०॥
और चूँकि जत्रु से ऊपर के मुख, नाक, शिर, कान के रोगों में आँख के रोग ही अधिक हैं और इनमें आँख ही प्रधान है, इसलिये इस अङ्ग का नाम शालाक्य रक्खा गया है१।
(३) काय चिकित्सा—सारे अङ्गों में होने (प्रभाव डालने) वाले रोगों की अर्थात्, ज्वर, रक्तपित्त, शोष, उन्माद, अपस्मार, कुष्ठ, प्रमेह, अतिसार आदि रोगों की शान्ति के लिये कायचिकित्सा है।
वक्तव्य—'काय' का अर्थ सम्पूर्ण शरीर है, इसकी चिकित्सा कायचिकित्सा। अथवा 'कायति शब्दं करोति—इति कायो जाठराग्निः, अंगुलिपिहिते कर्णयुगले धुक इति शब्दश्रवणात् तास्थ्याद् वा कायशब्देन अग्निरुच्यते। उक्तं च भोजेन—
जाठरः प्राणिनामग्निः काय इत्यभिधीयते।
यस्तं चिकित्सेत् सीदन्तं स वै कायचिकित्सकः ॥
क्योंकि ज्वर, अतिसार आदि रोग अग्नि के दोष से ही होते हैं। इसी से कहा है—
शान्तेऽग्नीं प्रियते, युक्ते चिरं जीवत्यनामयः।
रोगी स्याद् विकृते मूलं, अग्निस्तस्मान्निरुच्यते ॥
चरक चि० अ० १५।
(४) भूतविद्या—देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितर, पिशाच, नाग, ग्रह आदि के आवेश से दूषित मनवालों की
अतिप्रवृद्ध मलदोषजं वा शरीरिणां स्थावरजंगमानाम्।
यत् किंचिदाबाधकरं शरीरे तत् सर्वमेव प्रवदन्ति शल्यम् ॥
१ जत्रु से ऊपर के रोगों में प्रायः शलाका से काम किया जाता है इससे शालाक्य नाम है।
१ शल्यम्—शल्य-हिंसायाम्-अथवा, शल्य-शलनम्—हिंसा इत्यर्थः—इसी से कहा है—
"~~ "4
५ ुश्रतसं हिता
शान्ति कर्म बक्िदान आदि के द्वार प्रह की शान्ति क ल्य
भूतविद्या दै । |
(५) कौमारमूत्य--ब्रालकं के भरएपोपषण धात्री के दुघ
क दोभों के संशोधन के लिये, दूषित स्तन्य के कारण (शरा
सकि) एवं इ््रह के कारण ( आगन्त॒ज ) रोगो कौ शा न्तिके
व्यि कोमारमभृत्य दे । स
(६) अगदतन्ब-खाप, कीड़ा, मकड़ी, चे आदि कं दश॒
से उन्न विषरोग की परीक्षा के व्यि तथा नाना प्रकारं के
विधो के संयोग से उन्न इए विकारो कौ शान्ति क ल्य
अगदतन्तर हे ।
(७) रसायनतन््र-अवस्था को बनाये रखने के ल्यः
आयु, मेधा ओर ब को बढाने के व्यि, तथा रोगों को दूर
करने की शक्ति के व्यि, १रसायनतन्तर दे ।
(८) बाजीकरण तन्ब- स्वभाव से ही अल्पवीयवाटे
पुरुषों मे वीयं को बद़ाने के यि, वात आदि मे दूषित शुक्रवालों में श॒क्र के शोधन के ट्य, किन्दीं कारणों से स्वाभाविक
परिमाण मे क्षीणशयक्रवालो में शुक्र की ब्द्धि के व्यि, बदा
वस्था के कारण शुष्कवीयंवाखों मे शुक्र पेदा करने के ल्यि
` तथा खीप्रसङ्ग मे प्रहपं उत्पन्न करने के च्थि वाजौकरण हे 1
एवमयसायुवदोऽषटाङ्ग उपदिश्यते; अत्र कस्म किमु
च्यतामिति (€)
~~ -- ~ -----*
१ रसायन-'रसराब्देन
लाभोपायः रसायनम् 1 जसा करि चरक मे कहा है-
लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम् ॥
२ जिस प्रकार आजकरू रावित के माप की इकाई घोडा माना
गया है, उसी प्रकार प्राचीनकार मं घोड़े की ही शक्ति से तुरना
की जाती थी) इसी संकटा द-
` “ज्जवाजितनं वाजिने कुर्वन्ति मनेन -इति वाजीकरणम् । येन वा
अत्यर्थ व्यज्यते स्त्रीषु शुक्रं तद् बाजोकरणम् 1” जैसा कि चरक
` मे कहा है--
येन नारीष साम्यं वाजिव्रल्लभते तरः ।
व्रजते चाधिके येन वाजीकरणमेव तत् 11
अथवा वाजो वेग प्रस्तावाच्छक्रस्य, स ~ विद्यते येषां ते.
वाजिनः, ते क्रियन्तेऽनेन इति वाजीकरणम् । अथवा ` वाजः, ाक्र- |
~ सोऽस्यास्ति-इति-वाजीः-अवाजी वाजी क्रियते येन तद वाजीकर- । . करणम् 1 कि वां, वाजो मैथुनम्-उक्तं हि हारीते-- |
वाजो नाम प्रकारत्वाच्तच्च मेयनसंञ्जितम ।
| वाजीकरणसंनाभिः संजाभिः पुस्त्वमेव ` प्रचक्षते ॥
रसकार्यत्वात् सवषामेव धातूनां
ग्रहणम् 1 तेन रसादीनां शुक्रान्तानां, कि वा रसवीर्यवपाकानामयन `
राक्रसर तिकर“किचित्, किचित् शक्रविवर्धनम् ।
| अ०१
इस प्रकार से यह आयुर्वेद आठ अज्ञोवाखा कहा जाता
है। इन आठ अङ्गं मे से किस अङ्ग का तुम्हारे मे से किसके
लिय, उपदेश करू, वहं कहौ ॥६॥।
त ऊचुः अस्माकं सवषामेव शल्यज्ञानं मूं खो
पदिश्जतु भगवानिति ॥१०॥
उन शिष्यो ने कहा--हे भगवन् ! आप राल्य ज्ञानको
मुख्य रखकर हम सब को आयुवेद का उपदेश दे ॥१०॥।
स उवाचेवमरिःति ॥११॥
भगवान् धन्वन्तरि ने कहा-एेसा हौ सदी ॥११॥
त॒ उचुभूयोऽपि भगवन्तम्-अस्माकमेकमतीन
मतममिसमीदय सुश्रतो भगवन्तं प्रद्यति; अस्म चोपदि-
रयमानं वयमप्युपधारयिष्यामः ॥१२॥
स॒श्रत आपसे पूछेगा जौर इस सुश्रुत को सम्बोधन करके कै
उपदे को हम सव धारण करगं ॥१२॥
स होवाचेवमस्सिति ॥१३॥
भगवान् धन्वन्तरि ने कहा--रेखा दी सही ।।१३॥
वत्स सुश्रत । इह खल्वरायुवदप्रयोजनं--व्याध्युपसछान् व्याधिपरिमोक्षः, स्वस्थस्य रक्वणं च ॥१४।।
शाख का प्रयोजन-रोगोंसे आक्रान्त प्राणियों कोरोगं से
आयुरस्मिन् विद्यते, अनेन वाऽध्युर्विन्दन्तिः इत्या-
युवद्ः ॥१५।। |
इनके संयोग का नाम आयु है, यह इस आयुवंद् में हे, अथवा
इस शाख के दवारा आयु प्राप्त होती दहे, इसल्यि यह आयु
वेद हेर ॥१५॥
सर तिवद्धिकरं किचित्, तरिविधं वष्यम् च्यते ॥
प्ररामनं च.1। चरक सूत्र अ०३०॥ - ५
२. (१) -हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम् ।
` _ - सान तच्च यच्चोवतमायुवदः स॒ उच्यते ॥
(२) हिताहिततः, सुखासुखंतः अ्रभााप्रपाणतक्च तदायु व॑द“
स स र^ | यतीत्यायुवंदः । यतस्चोयुष्याणिं, अनायुष्याणि च दव्यगुणकंमा
शठदास सत, यहं वाजकरण् तीन भकार कहा है। यथा-- । वेदयति ततोऽप्ययमायुरवेदः ॥ च० सू ० अ० ३० ।
| ` तत्र स् तिकर-स्त्रीस्पर्गादि, वद्धिकरं क्षीरादि; स तिवृद्धि
करं माषादि। | १ प्रयोजन. चास्य-स्वस्थस्थ स्व्ारथ्यरचणमातुरस्य विकार
उन िष्यों ने फिर मी भगवान् धन्वन्तरि को कहा-क्रि
एक विचारवाल्ते हम खों के अभिप्राय कोष्यानमंरखक्रर्
हे वत्व सुश्रत ! आयुवद्रोद्पत्ति के विषय मे-आयुवंद् . |
मुक्त करना ओर स्वस्थ मनुष्यों के स्वास्थ्य कीरक्षा करना है । ˆ
आयुवेद की निरुक्ति--शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व ओर आत्मा प
"---
2 ०9७०० [4.५
वका = `
अ० १ |
तस्याङ्गवरमाद्य प्रस्यक्षागमायुसानोपमानैरविरदध
मुच्यमानसुपधारय ॥१६॥
इस आयुवंद् के श्रेष्ठ एवं आदिम अङ्ग को- प्रत्यक्ष
अनुमान उपमान ओर आगम इन चार प्रमाणो से अविसेध
रूप मे कहता हू, सुनो ' ॥ १६
एतद्धयङ्ग प्रथमं, प्रागभिघातव्रणसंरोहायज्ञभिरः-
सन्धानाच्च । श्रयते हि यथा-““सुद्रेण यज्ञस्य शिरश्छिन्न- मिति, ततो देवा अस्विनावभिगम्योचुः- भगवन्तो ! नः
श्रेष्ठतमो युवां भविष्यथः, सवद्भ्यां यज्ञस्य शिरः सन्धा-
तव्यमिति । तावूचतुरेवमस्वि्ति। अथ तयोरथं देवा
इन्द्र यज्ञभागेन प्रसादयन् । ताध्यां यज्ञस्य जिर
संहितम्?” इति ॥१७।।
इन आटो अङ्गं से-- यह शल्य अङ्ग ही प्रधान दै।
वयोक्रि-- प्रथम देवासुर संग्राम मे वणो्पत्ति के रोहण होने से
ओर यज्ञ का सिर जोड़ने के कारण-यह शल्यतन्ब प्रधान
है । एेखा परम्परा से सुना जाता है कि--^सद्रने यज्ञ का सिर
काट दिया था, तब देवताओं ने अश्विनी कुमारो के पास
जाकर क् कि “ आप दोनों यज्ञ का सिर जोड देः| इस
प्रकार करने से आप हम मे अतिश्रेष्ठ होंगे । अशिनां ने कहा
कि- अच्छा, एेसादहीहो। तव देवताओं ने इन अश्विनः
। कुमारो के यज्ञमागके ल्यि इन्द्र को प्रसन्न किया | अश्विनी
नक 914०-4 ५५०.
कुमारां ने यज्ञ का सिर जोड़ दिया” ।| १७]
अष्टास्पि नायुवदतन्त्रष्वैतदेवाधिकमभिमतम्,
आद्युक्रियाकरणायन्त्रशखक्षाराग्तिप्रणिधानात् सबतन््रसामान्याञ्च ॥९८॥
आयुवद के आगो तन्नो मे यदह -शल्यतन्र ही सब से
अधिक मान्य है । क्योकि यन्न, शखर, क्षारं ओर अग्नि
प्रयोग मे शीघ्र क्रिया करने के कारण तथा शालाक्य आदि सखव
तन्त्रो में सामान्य होने के कारण | ¦
वक्तव्य- शल्य तन्व; मे--यन्, शसन, क्षार आदि का
प्रयोग रीघ्र होने सेरोगकी निद्त्तिमी शीघद्ी होती है।
(२ ओषध-चिकिस्सा म जितना मय गता है, शख-चिकित्सा मेँ + कम कगता है । दूखरी बात--आयुवेंद के शेष सब अङ्गं को ` किसी 1 न किसी रूप मे शल्य तन्न की अपेक्षा रहती दै। इसी
। १ चरकमे तीनही प्रमाण मने हं, यथ त्रिविधं ख.
` रोगविशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा-आप्तोपदेश प्रत्त त्यम्, -अत्-
माने चेति ।॥ चरकं वि० अ० ४1
२.अश्विनौ देवभिषजौ यज्ञवाहाविति स्मृतो ।
यज्ञ्य हि शिरशिछन्तं पुनस्ताभ्यां समाहितम् ॥
एतश्चान्यर्चं बहुभिः कर्मभिभिषगु त्तमो ।
बभूवतुमृशं पूज्पानिद््रादीनां महात्मनाम. ~ `.
ष क अय्जका राज ताया उ का -21 यक कज वक त -- 7
1
सूत्रस्थानम् | ५
९। € क,9 ऋ.9 ९) सं चरक म अशरोग मं, गुल्म मे, उद्ररोग में (शल्यचिकित्सकः को सहायता ेने के स्यि कहा ३१ ॥शद्] ` तदिदं शाश्वतं पुण्यं स्वग्यं यज्चस्यमायुष्यं वृत्तिकरं चेति ॥१९॥
वह यह शाल्यशास्र शश्वत (अविनाशि), पुण्य का निपित्त
वग के ल्यि मंगल का-यश का खाधन, आयु के च््यि हित- कारी ओर दूसरी जीविका का साधन है ॥ {€॥ ब्रह्मा म्रोवाच ततः प्रजापतिरधिजने, तस्मादशिविनौ
श्विभ्यामिन्द्रः इन्द्रादहं, मया विह प्रदेयमर्थिभ्यः
जाहितहेतोः ।(२०॥
इस आयुर्वेद का ब्रह्मा ने उपदेश क्रिया, ब्रह्मा से प्रजा- पति दक्न ने पदा, दक्ष प्रजापति से अश्विनी कुमारो ने सीला अशिनो से हन्द्र ने ओर इन्द्र से मेने ( षन्वतरि ने ) पदा । मुभे तो इख मव्य लोक मे-प्रजाके कल्याणके ल्यि. अथि रूप मे शिष्य रूप से आये हए ठमकरो देना रैर ।२०॥
अक्ति चात्रअहं हि धन्वन्त्रिरादिदेबो जरार्जामरव्युहरोऽमराणाम्। शल्याङ्गसङ्ञरपरेरुपेतं प्रा्ठोऽस्मि गां भूय इहोपदेष्टम् २९ इस विधयमे कहा भी है-
देवताओं कौ द्धावस्था, रोगउ तथा मल्यु दूर ` करनेवाला
१ अरोग मे -तत्राहुरेके शस्त्रेण कर्तनं हितमर्शसाम ।
दाहं तारण चाप्येके दाहमेके तथाऽग्िना ॥ गुत्मरोग मे-
तत्र धान्वतरीयाणामधिकारः क्रियाविधो ।
वेदयानां क तयोग्यानां व्यधशोधनरोपणे ॥ | ` उदररोग मे इदं तु शल्यहतु णां कर्म स्याद् दृ्टकर्मणाम् ॥ | चरक चि० अ० १३ ।
२ कहा हं--सम्यग् गुरुमुखादधीत्य . यो न प्रयच्छत्यन्तेवा- `
सभ्यः स खलु ऋणी गुरुजनस्य महदेनो विन्दति ॥
(£ अ्विना--शब्द आजकर के 1. 8. 8. ऽ. या
॥4. 13. 1८. 5. का प्रतिनिधि ह । वेदिक देवताओं मे येही
युग ह, ओर इनके दोनों प्रकार के सजिकर शीर मँ डिकर कार्य
मिरुते हं । यथा-सजिकर-यज्ञस्य- हि शिररिछन्ं पतस्ताभ्यां `
` समाहितम् ।
सेडिकक-भागवश्च्यवनः कामी बद्धः सन् विकृति गतः 1
वीतवरणस्वरोपेतः ङतस्ताम्या पुनर्युका-॥1- ~ ~> `
३ देवताओं को भी रोग होते है, यथा-- ~. . ` = ह
` -खालित्यं गरुडध्वजस्य शिरसि, स्ताकिब्रणो ब्रह्मणो।॥ _ मे ०
~ घोरं चापि -जलोदरं ~ च वरूणस्येन्दोस्तथेव . क्षयः श
[ । "कर (च
- = \ ट ५ प नर ~ 7 ^ + ५ ४४. अ
^
च च
६
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १
आदि देव धन्वन्तरि मैं हूँ। आयुर्वेद के अन्य अङ्गों सहित शल्य तन्त्र का उपदेश करने के लिये फिर से इस पृथ्वी पर आया हूँ ॥२१॥
असिन्धुछाच्छ पञ्चमहाभूतशरीरिसम्वायः पुरुष इत्युच्यते। तस्मिन् क्रिया, सोऽधिष्ठानं, तस्मात् ? लोकरूप द्वैविध्यात्, लोको हि द्विविधः—स्थावरो, जङ्गमश्च; द्विविधात्मक एवाग्नेयः सौम्यश्च, तद्भूयस्त्वात्। पञ्चात्मको वा; तत्र चतुर्विधो भूतग्रामः संस्वेदजजरायुजाण्डजो-द्विजसंज्ञः; तत्र पुरुषः प्रधानं, तस्योपकरणमन्यत्; तस्मात् 'पुरुषोऽधिष्ठानम्' ॥२२॥
इस आयुर्वेद शास्त्र में—पृथ्वी, अप, तेज, वायु और आकाश इन पाँच भूतों के और आत्मा के संयोग का नाम पुरुष है, ( मोक्ष शास्त्र में पञ्चिस तत्त्वों के संयोग को पुरुष कहते हैं )। इसी पुरुष में भेषज, शस्त्र, क्षार, अग्निकर्म तथा स्वास्थ्यकारक कर्म अभिप्रेत हैं। क्योंकि यही पुरुष स्वास्थ्य और रोग का अधिष्ठान है। यह नर जातीय पुरुष ही इसका अधिष्ठान इस लिये है—क्योंकि लोक दो प्रकार का है, एक स्थावर और दूसरा जङ्गम। ये दोनों प्रकार के लोक पंच महाभूतों से बने होने पर भी, दो प्रकार के गुण की अधिकता के कारण आग्नेय और सौम्य कहे जाते हैं।१ अथवा पाँच भूतों-वाला होने से, पाँच स्वभाववाले, ये दोनों प्रकार के लोक हैं। इनमें—सर्म्पूर्ण प्राणिसमूह, स्वेदज, जरायुज, अण्डज, और उद्विज—इन चार संज्ञाओंवाला है। इन सब में पुरुष ही प्रधान२ है। अन्य सब लोक इस पुरुष के साधनरूप हैं। इसीलिए इस शास्त्र का पुरुष ही अधिष्ठान है, ( हाथी, वृक्ष आदि नहीं हैं३ )।
विशेष मन्तव्य—यहाँ “पुरुष” प्राणिमात्र का नाम है, आयुर्वेद स्थावर = वनस्पति, वानस्पत्य, वीरुध तथा औषधि की चिकित्सा का तथा हाथी घोड़ा, गौ, भैंस आदि पशु एवं पक्षी आदि की चिकित्सा का भी उपदेश करता है और उत्तर-दायी है, परन्तु उन सब में पुरुष ( मानव ) प्रधान है, अतः इस शास्त्र ( सुश्रुत संहिता ) में प्रधान माना गया है और इसी को ध्यान में रखकर अङ्ग प्रत्यङ्ग आदि का वर्णन किया गया है ॥२२॥
१ (१) खादयश्चेतनापञ्चधातवः पुरुषः स्मृतः ॥चरका॥
(२) सौम्यं शुक्रमात्तवमानेयम् । चरक० शा० १ अ० ३। २ भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः, प्राणिनां बुद्धिजीविनः । बुद्धिमत्सु नरा श्रेष्ठाः.....। मनु० । ३ इसके लिये विस्तृत विवेचन-भानुमती टीका में दिया गया है, वहाँ देखा जा सकता है।
तद्वदुःखसंयोगा व्याधय उच्यन्ते ॥२३॥
इस पुरुष को जिनके संयोग से दुःख होता है, उनको व्याधियाँ ( विविध दुःखमादधतीति व्याधयः ) कहते हैं ॥२३॥
ते चतुर्विधाः—आगन्तवः, शारीराः, मानसाः, स्वाभाविकान्नाश्रिति ॥२४॥
ये व्याधियाँ चार प्रकार की हैं—आगन्तुक, शारीरिक, और स्वाभाविक२ ॥२४॥
तेषामागन्तवोऽभिघातनिमित्ताः ( ॥२५ ॥ )
शारीरास्त्वन्तपानमूला वातपित्तकफशोणितसननिपातवैषम्यनिमित्ता ( ॥२५ ॥ )
मानसास्तु क्रोधशोकभयहर्षविषादेष्याभ्यसूयादैन्यमात्सर्पकासलोभप्रभृतय इच्छाद्वेषभेदैर्भवन्ति ( ॥२५ ॥ )
स्वाभाविकान्स्तु लुपिपासाजराभृत्युनिद्राप्रकृ ( भृ )-तयः ( ॥२५ ॥ ) ॥२५॥
इनमें आगन्तुक रोग—शास्त्र आदि के अभिघातरूप कारणों से उत्पन्न होते हैं। शारीरिक रोग—अन्नपान के कारण, एवं वात, पित्त, कफ और रक्त इनसे एवं इनके सनिपात रूप में विषमता से उत्पन्न होते हैं। मानसिक रोग—क्रोध, शोक, भय, हर्ष, दुःख, ईर्ष्या, असूया, दीनता, मात्सर्प, काम, लोभ आदि से तथा इच्छा और द्वेष के भेदों से उत्पन्न होते हैं। स्वाभाविक रोग—भूख, प्यास, वृद्धावस्था, मृत्यु, निद्रा आदि हैं।
वि० मन्तव्य—शल्य एवं शालाक्य तन्त्रों में वातपित्तकफ के साथ रक्त को भी गिना जाता है और यूनानी चिकित्सा में रक्त (वृत्त) को विल्त (दोष) भी माना जाता है ॥२५॥
त एते मनःशरीराधिष्ठानाः ॥२६॥
ये चारों प्रकार के रोग मन और शरीर को आश्रय करके होते हैं।
इसी से चरक में कहा है—
कालखुद्वीन्द्रियाथीनां योगो मिथ्या न चाति च ।
द्व्याश्रयाणां व्याधीनां त्रिविधो हेतुसंग्रहः ॥
च० मू० अ० १ ॥
वि० मन्तव्य—उक्त चारों प्रकार की व्याधियों का अधिष्ठान—आश्रय या स्थान मन एवं शरीर हैं, अतः इन दोनों पर ही उनका प्रभाव भी पड़ता है ॥२६॥
१ चरक में रोग तीन प्रकार के माने हैं। यथा—त्रयो रोगा इति—निजागन्तुमानसाः। तत्र निजः शारीरदोषसमूहः, आगन्तुभूतविषवाव्यनिसंग्रहारादिसमूहः, मानसः पुनरिष्टस्यालाभात्माभाच्चानिष्टस्योपजायते ॥ चरकं सूत्र अ० ११ ।
अ० १]
सूत्रस्थानम्
७
तेषां संशोधनसंशमनाहाराचाराः सम्यक्प्रयुक्ता निग्रहहेतवः ॥ २७ ॥
सम्यक् प्रकार से प्रयुक्त किये गये संशमन, आहार और विहार, इन रोगों का निग्रह करते हैं। संशोधन—बाह्य संशोधन और अन्तः संशोधन। बाह्य संशोधन—शस्त्र, क्षार, अग्नि प्रलेप आदि से होता है, और आभ्यन्तर संशोधन—वमन, विरेचन, आस्थापन और रक्तमोक्षण—इन चार प्रकार से होता है। (कोई रक्तमोक्षण के स्थान पर शिरोविरेचन मानते हैं)।
संशमन—न शोधयति यद्दोषान् समासोदीरयत्यपि।
समीकरोति कुद्वांश्च तत् संशमनमुच्यते।
यह संशमन भी दो प्रकार का है—बाह्य और आभ्यन्तर। बाह्य संशमन—आलेप, परिषेक, अभ्यंग, कवच, गण्डूष आदि आदि रूपमें है। आभ्यन्तर संशमन—पाचन, लेखन, बृंहण, विष प्रशमन आदि रूप में हैं।
आहार चार प्रकार का है—पेय, भक्ष्य, लेह्य और चूर्ण। यह चार प्रकार का आहार-दोष प्रशमन, व्याधि प्रशमन और स्वास्थ्यकर भेद से तीन प्रकार का है।
आचार—शारीरिक, वाचिक और मानसिक कर्म है। इसमें उत्तेजण, अवक्षेपण आदि शारीरिक कर्म स्वाध्याय आदि वाचिक, संकरूप चिन्तन आदि मानसिक कर्म हैं ॥ २७ ॥
प्राणिनां पुनर्भूतमाहारो बलवर्णौजसां च। स षट्सु रसेष्वायत्तः, रसाः पुनर्द्व्याश्रयाः, द्व्याणि पुनरोषधयः। तारतु द्विविधाः—स्थावरा जङ्गमाश्च ॥ २८ ॥
आहार प्राणियों का तथा इनके बल, वर्ण और ओज का मूल है। यह आहार छ रसों के अधीन है। रस द्रव्य के अधीन है, और औषधियाँ ही द्रव्य हैं। औषधियाँ दो प्रकार की हैं, यथा—स्थावर और जंगम ॥ २८ ॥
तासां स्थावराश्चतुर्विधाः—वनस्पतयो, वृक्षाः, वीरुधः, औषधय इति। तासु अपुष्पाः फलवन्तो वनस्पतयः, पुष्पफलवन्तो वृक्षाः, प्रतानवत्यः स्तम्बिन्यश्च वीरुधः, फलपाकनिष्ठा औषधय इति ॥ २९ ॥
चरक में कहा है—
(१) एकरसाहारः कर्शनीयानाम्—
सर्वरसाभ्यवहारी बलकराणाम् ॥
(२) वर्णः प्रसादः सौस्वर्ष जीवितं प्रतिभा सुखम्।
पुष्टिः पुष्टिः बलं मेधा सर्वमन्ते प्रतिष्ठितम् ॥
चरक सु० अ० २७। ३४९।
२ औषधि शब्द से—स्थावर और जङ्गम में पाथिव द्रव्यों का भी ग्रहण करना चाहिये। जैसा कि चरक में कहा है— पुनस्तत् त्रिविधम्-जंगमोद्भूतपाथिवम्। च. सू. अ. १।
इनमें स्थावर औषधियाँ चार प्रकार की हैं—वनस्पति, वृक्ष, वीरुध और औषधि। इनमें से जिनमें पुष्प आये बिना फल आता है, वे वनस्पति कहाती हैं। जिनमें पुष्प और फल दोनों होते हैं, उनको वृक्ष कहते हैं। जो फेलेनेवाली एवं गुलम रूप (थम्बला रूप) होती हैं, वे वीरुध (बेल) कहाती हैं। जो फल के पकने तक ही अस्तित्व रखती हैं वे औषधि हैं।
वि० मन्तव्य—‘अपुष्पा’ शब्द का अर्थ—‘अविद्यमान-पुष्पाः’ (डरलन), ‘येषां पुष्पमन्तरेणैव फलजनम्’ (हाराण्यचन्द्र) तथा ‘फलैः वनस्पतिः’ (चरक) ‘विना पुष्पैः फलैर्युक्ता वटोदुम्बर-रादयः’ चक्रपाणिः, तथा—‘तेषां अपुष्पा फलिनो वनस्पतय इति स्मृताः’ हारीत, ‘तैरपुष्पाद् वनस्पतिः’ अमरकोश-आदि वनस्पति शास्त्र के अनुसार पुष्प का न होना ही विद्व है-सत्य है सही है, परन्तु आधुनिक वनस्पतिशास्त्र का अध्ययन करनेवाले ‘अहश्यपुष्पाः’ अर्थ करते हैं, अर्थ ही नहीं करते प्राचीनों को बुरा-भला भी कह डालते हैं, यद्यपि वे स्वयं गतानुगतिक हैं, फलतः उनकी कल्पना भी निराधार है, कारण सुनिये—पुष्प-विकसनो धातु से ‘पुष्प’ शब्द निष्पन्न होता है। पुष्प वह है जो विकसित होता है—खिलता है—फूलता है और वट उदुम्बर आदि पर इस प्रकार के फूल आते भी नहीं हैं और भगवान् चरक ने इन्द्रियस्थान अ० २ में लिखा है कि—फल चापि भवेत् किञ्चित् पुष्पं यस्य न विद्यते—अर्थात् ऐसे फल भी होते हैं जिनका पूर्वज पुष्प नहीं होता ॥ २९ ॥
जङ्गमाः खल्वपि चतुर्विधाः—जरायुजाण्डजस्वेदजो-द्विज्जः। तत्र पशुमनुष्यव्यालादयो जरायुजाः, खगसर्प-सरीसृपप्रभृतयोऽण्डजाः, क्रुमिकीटपिपौलिकाप्रभृतयः स्वेदजाः, इन्द्रगोपमण्डूकप्रभृतय उद्भिज्जः ॥ ३० ॥
जंगम औषधि भी चार प्रकार की हैं। यथा—जरायुज, अण्डज, स्वेदज और, उद्भिज। इन चारों में—पशु, मनुष्य, व्याल (हिंसक पशु) आदि जरायुज हैं। पक्षि, सर्प, अजगर आदि अण्डज हैं। क्रुमि, कीड़ा-चिज्जटी आदि स्वेदज हैं। वीरबहूटी, मेंढक आदि उद्भिज हैं ॥ ३० ॥
तत्र स्थावरेभ्यस्त्वक्पत्रपुष्पफलमूलकन्दनिर्यासस्वर-सादयः प्रयोजनवन्तः, जङ्गमेभ्यश्चर्मनखरोमरुधिरा-दयः ॥ ३१ ॥
१ ‘अपुष्पा इति—पुष्पाणामतिसूक्ष्मतया पुष्पाधारकर्णिकया (Receptacles) आच्छादितत्वाच्च अदृश्यपुष्पा इत्यर्थः ॥ सुश्रुत निर्णय० मू०।
२ मेंढक और वीरबहूटी-उद्भिज हैं—यह विचारणीय है? आजकल का विज्ञान इनको ऐसा नहीं मानता।
८
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
इनमें स्थावर औषधियों से—छाल, पत्ता, फूल, फल, मूल, कन्द, गोद और स्वरस आदि (तैल, क्षार, कांटे आदि) अङ्ग बरते जाते हैं। जङ्गम औषधियों से—चमड़ा, नख, बाल, रक्त आदि का उपयोग होता है ॥ ३१ ॥
पार्थिवाः सुवर्णरजतमणिमुक्तासनःशिलामृत्कपाला- दयः ॥ ३२ ॥
पार्थिव औषधियाँ—स्वर्ण, रजत, ( चाँदी ), मणि, मुक्ता, मैनसिल, मिट्टी का ठिकरा आदि हैं१ ॥ ३२ ॥
कालकृतास्तु प्रवातनिवातातपच्छायाज्योत्स्नातमः श्रोतोष्णवर्षाहोरात्रपक्षमासस्वयंनदादयः संवत्सरविशेषाः ॥
कालकृत औषध—अतिवायुवाला, वायुरहित स्थान, धूप, छाया, ज्योत्स्ना ( चाँदनी ), अन्धकार, शीत, उष्ण, वर्षा, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, आदि ( निमेष, काष्ठ, ओला आदि ) संवत्सर के विभाग को कालकृत कहते हैं ।
चिकित्सा में इनका उपयोग होता है । यथा-प्रवातं वर्जयेत्, निवातागारमाश्रयेत्, इत्यादि—
इसी प्रकार प्रवालपिष्टी बनाने में प्रवाल को चाँदनी में रखते हैं । इसी तरह भिन्न भिन्न कुष्ठ रोगों को भिन्न भिन्न समय तक भूमि या धान्य राशि में रखने का विधान है । यथा—
लाजोल्लोशीरकचन्दनानि दत्त्वा प्रवाते निशि वासयेच्च । उत्तर अ० ४८ ।
( २ ) “निवाते देशे निचितं कृत्वा” । सु० सू० ११ ।
( ३ ) ‘मदनफलानामातपपरिशुष्काणाम्’ । सु० अ० ४३ ॥
त एते स्वभावत एव दोषाणां संचयप्रकोपप्रशमप्रती- कारहेतवः प्रयोजनवन्तरश्च ॥ ३४ ॥
ये सब स्वभाव से ही दोषों के संचय, प्रकोप प्रशमन और प्रतिकार में कारण हैं, और चिकित्सा में उपयोगी हैं ॥ ३४ ॥
भवन्ति चात्र श्लोका—
शरीराणां विकाराणांमेष वर्गश्चतुर्विधः ।
प्रकोपे प्रशमे चैव हेतुरकृत्विचिकित्सकैः ॥ ३५ ॥
इस विषय में श्लोक है—१
चिकित्सकों ने इस चार प्रकार के वर्ग को शारीरिक रोगों के प्रकोप में तथा रोगों की शान्ति में कारण कहा है । ( चार प्रकार का वर्ग—स्थावर, जङ्गम, पार्थिव और कालकृत है ) ॥
आगन्तवस्तु ये रोगास्ते द्विधा निपतन्ति हि ।
मनस्थन्ये शरीरेऽन्ये तेषां तु द्विविधा क्रिया ॥३६॥
शरीरपतितानां तु शरीरबदुपक्रमः ।
मानसानां तु शब्दादिष्विष्टो वर्गः सुखावहः ॥ ३७ ॥
आगन्तुज रोग दो प्रकार से होते हैं । एक—मन में और दूसरे शरीर में होते हैं । इन दोनों की चिकित्सा दो प्रकार की है । शरीर में होनेवाले रोगों की—शारीरिक रोगों की भाँति चिकित्सा है, और मनमें होनेवाले रोगों की शब्द-स्पर्श-रस और गन्ध इनका सुखकारी उपयोग करना चिकित्सा है ॥ ३६, ३७ ॥
एवमेतत् पुरुषो व्याधिरौषधं क्रियाकाल इति चतुष्टयं समासेन व्याख्यातम् । तत्र पुरुषग्रहणात् तत्संबन्धद्रव्य- समूहो भूतादिरुक्तस्तदङ्गप्रत्यङ्गविकल्पाश्च त्वङ्गमांसा- स्थिसिरास्तायुप्रभृतयः, व्याधिग्रहणाद् वातपित्तकफगा- णितसन्निपातवैषम्यनिमित्ता सर्व एव व्याधयो व्याख्याताः, औषधग्रहणाद् द्रव्यरसगुणवीर्यविपाकानामादेशः, क्रिया- ग्रहणात् स्नेहादीनि छेद्यादीनि च कर्माणि व्याख्यातानि, कालग्रहणात् सर्वक्रियाकालानामादेशः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार से पुरुष, व्याधि, औषध और क्रियाकाल इन चारों की संक्षेप में व्याख्या कर दी है । इनमें पुरुष शब्द से इस पुरुष को उत्पन्न करनेवाले पंचमहामूल द्रव्यसमूह, एवं इस पुरुष के अङ्ग प्रत्यङ्ग के भेद, त्वचा, मांस, अस्थि, सिरा स्नायु, आदि भी कह दिये हैं । व्याधि शब्द से-वात, पित्त, कफ, रक्त एवं इनके सन्निपात तथा विषमता से होनेवाले सब रोगों की व्याख्या कर दी है । औषध शब्द से—द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक का ग्रहण कर लिया है । क्रिया शब्द से स्नेह आदि एवं छेद्य आदि कर्मों की व्याख्या कर दी है । काल शब्द से—सम्पूर्ण क्रियाओं के काल का कथन किया है२ ॥ ३८ ॥
१ चरक में कहा है—
गद्योवतो यः पुनः श्लोकेरर्थः समनुगीयते ।
तद् व्यक्तिव्यवसायार्थ द्विरुक्तं तत्र गृहीते ॥
च० नि० अ० १ ॥
२ पहले जो ‘कालकृत’—शब्द आया है, वहाँ पर कोई ‘क्रियाकाल’ ऐसा कहते हैं । जैसा मानुमती में कहा है कि— “क्रियाणां स्नेहघमनादिनां तथा छेद्यादीनां च प्रवृत्ति-निवृत्त-उप-
१ अत्र पार्थिवेषु मुक्तायाः पाठोऽनार्थः प्रतिभाति । मुक्तायाः शुक्लाख्यजलचरप्राणिन्यन्त्यात् ( सु० नि० मूल० ) ।
यह नोट श्री यादवजी त्रिकमजी महाराज ने सुश्रुत संहिता ( मूल ) निर्णयसागर में दिया है । परन्तु पीछे उन्होंने ही बताया कि यह पाठ ठीक है । क्योंकि मुक्ता में स्वर आदि पार्थिव गुण देखकर इसको पार्थिव कहा है न कि उत्पत्ति की दृष्टि से । इस लिये यह प्रमाद का पाठ नहीं है ।
अ० २ ] २
सूत्रस्थानम्
भवति चात्र—
बीजं चिकित्सितस्यैतत् समासेन प्रकीर्तितम् ।
सर्विशमध्यायशतमस्य व्याख्या भविष्यति ॥२६॥
इस विषय में श्लोक है—
चिकित्सा शास्त्र का यह बीज संक्षेप में कहा है । इस संक्षेप में कहे हुए विषय की व्याख्या एक सौ बीस अध्याय में की जायगी ॥२६॥
तच्च सर्विशमध्यायशतं पञ्चसु स्थानेषु । तत्र सूत्र-निदानशारीरचिकित्सितकल्पेष्वर्थवशात् संविभज्योत्तरे तन्त्रे शेषान्तर्थात् बद्ध्यामः ॥४०॥
ये एक सौ बीस अध्याय पाँच स्थानों में विभक्त हैं । यथा-सूत्रस्थान, निदानस्थान, शारीरस्थान, चिकित्सास्थान और कल्पस्थान । प्रयोजन वश इन एक सौ बीस अध्यायों को पाँच स्थानों में विभक्त करके, शेष विषय की उत्तरतन्त्र में व्याख्या करेंगे१ ।
भवति चात्र—
स्वयम्भुवा प्रोक्तमिदं सनातनं
पठेद्भिः यः काशिपतिप्रकाशितम् ।
स पुण्यकर्मा मुनि पूजितो नृपे
रसुक्षये शक्रसलोकतां व्रजेत् ॥४१॥
कहा भी है—इस विषय में श्लोक है—
ब्रह्मा से कहे हुए और काशिपति से प्रकाशित किये इस सनातन शास्त्र का पृथ्वी पर जो पुरुष अभ्यास करता है, वह पुण्यकर्माशाली पुरुष पृथ्वी पर तो राजाओं से सम्मानित होता है, और मरने पर इन्द्र के समान लोक को अर्थात् स्वर्ग को पाता है । ( इस शास्त्र से ऐहलौकिक और पारलौकिक दोनों ही प्रकार का सुख मिलता है ) ॥४१॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने वेदोत्पत्तिनाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
द्वितीयोऽध्यायः
अथातः शिष्योपनयनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
पिछले अध्याय में इस शास्त्र के अध्ययन के ऐहिक तथा
दर्शन-कालः क्रियाकालः ।”
इसी प्रकार—
(२) नान्यः कालः क्रियातोऽस्ति, क्रिया नान्याऽथैवाप्यथात् ।
प्राधान्यात् पुरुषस्यात्र ततो व्याधितुष्टयम् ॥ क्रियाविशिष्टः कालो वा, कालो वा तच्चतुष्टयम् ॥ इसलिये ये चार ही हैं, पाँच नहीं ।
१ जैसा कि कहा है—“अधिकृत्य कृतं यस्मात् तन्त्रमेतदुपद्रवान्”—अर्थात् शल्य शास्त्र के व्रण आदि में होनेवाले उपद्रवों के लिये इस उत्तरतन्त्र को कहा है ।
पारलौकिक फल को बताकर अब अध्ययन विधि को बताने के लिए ‘शिष्योपनयनीय’ नामक अध्याय का अवतरण करते हैं । जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था१ ॥१-२॥
ब्राह्मणक्षत्रियवश्यानामन्यतममन्वयवयःशीलऔर्यौश-चाचारविनयशक्तिबलमेधाधृतिस्मृतिमतिप्रतिपत्तियुक्ततनुजिह्वाघटन्ताग्रभृजुवक्राक्षिनासं प्रसन्नचित्तवाक्चोष्टकलेशसहं च भिषक् शिष्यमुपनयेत् ; अतो विपरीतगुणं नोपनयेत् ॥३॥
जिस प्रकार के शिष्य का उपनयन करना चाहिये वह कहते हैं—
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य में से किसी एक जाति के, शुद्ध वंश में अथवा आयुर्वेद पढ़नेवाले कुल में उत्पन्न बालक या तरुण अवस्थावाले, शील-शूरता पवित्रता कुल तथा, देश के व्यवहार को जाननेवाले, नम्रता, उत्साह-शक्ति, बल, मेधा, स्मृति ( स्मरण ), मति, प्रतिपत्ति ( उत्तमसूक्ष्म युक्त ), पतली जिह्वा, पतले ओठ, पतले दाँतों के अग्रभागवाले, सरल मुख-नासिका-आँखोंवाले, प्रसन्नचित्त, मधुरवाणी, सुन्दर चेष्टा-वाले और कष्ट को सहन करनेवाले शिष्य का वैध उपनयन करे । इन उपरोक्त गुणों से विपरीत गुणवाले शिष्य का उपनयन नहीं करना चाहिये । ( अकुलीन को पढ़ाने का निषेध है । यथा-अकुलीनं त्यजेत् शिष्यम् । वियोनि म्लेच्छजातिं च )
उपनयनीय तु ब्राह्मणं प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनदात्रेषु प्रशस्तायां दिशि शुचौ समे देशे चतुर्हस्तं चतुरस्रं स्थडिलमुपलिप्य गोमयेन, दभैः संस्तौर्यं, रत्नपुष्पलाजभक्तैर्व्रताः पूजयित्वा विप्रान् भिषजश्च, तत्रोल्लिख्याभ्युद्वय च दक्षिणतो ब्रह्मणं स्थापयित्वाऽग्नितुमुपसमाधाय, खदिरपलाशदेवदारुबिल्वानां समिद्धिश्चतुर्णां वा क्षीरिबुद्धानां ( न्यमोधोढुम्बराश्चथमधूकानां ) दधिमधुघृताक्ताभिर्दोर्वाहौमिकेन विधिना सप्रणवाभिर्साह्याहूतिभिः स्तुवेण-ज्याहुतीर्जुह्यात्, ततः प्रतिदैवतमूर्धीश्च स्वाहाकारं कुर्यात्, शिष्यमपि कारयेत् ॥४॥
उपनयन विधि—
उपनयन के योग्य ब्राह्मण शिष्य को उपनयन देने के लिये वैद्यप्रशस्त तिथि, प्रशस्त करण, प्रशस्त मुहूर्त, प्रशस्त नक्षत्र में, प्रशस्त दिशा में ( प्राची या उत्तर दिशा ), पवित्र, समान स्थान में चार हाथ बराबर, लम्बा-चौड़ा, चारकोणवाले स्थान
१ उपनयन हो चुकने पर भी आयुर्वेद शास्त्र को पढ़ने के लिये फिर उपनयन दिया जाता है । क्योंकि उपनयन का अर्थ—शिष्य का गुरु के समीप आना है । इस विधि से शिष्य गुरु के नजदीक आता है । इसी कारण से गुरु-शिष्य मिलकर परस्पर प्रतिज्ञायें करते हैं ।
१०
मुश्रुतसंहिता
[ ७० ]
को गोबर से लेपकर इस पर कुशा बिछा दे। फिर रत्न, फूल, लाजा, ( चावल आदि ) अन्न से देवताओं का, ब्राह्मणों का, वैद्यों का पूजन करे। फिर, इस स्थान पर ऊर्ध्वमुखी रेखाकरके इसे जल से प्रोक्षण करके, ब्रह्मा को दक्षिण दिशा में बैठाकर अग्नि प्रज्वलित करे। खैर, ढाक, देवदार, विल्व इनकी समिधाओं से, अथवा, बड़, गूजर, पीपल, सहुवा इन चार खीरी वृक्षों की समिधा से, दही, शहद, घी इनके साथ दार्वी होम विधि से, ओं मूः स्वाहा, ओं सुवः स्वाहा, ओं स्वः स्वाहा—इस ओंकार विधि पूर्वक सुवे से घृत की आहुति देते हुए, तथा प्रत्येक के लिये (ब्रह्मणे स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा, अश्विभ्यां स्वाहा, इन्द्राय स्वाहा), प्रत्येक ऋषि के लिये (धन्वन्तरये स्वाहा, भारद्वाजाय स्वाहा, अत्रेयाय स्वाहा) 'स्वाहा' इस शब्द के साथ घी की आहुति देवे। शिष्य भी इसी प्रकार से करे।
वि० मन्त्रव्यं—ज्योतिःशास्त्रानुसार—उपनयन के लिये—प्रशस्त तिथि—द्वितीया, तृतीया, प्रतिपदा, एकादशी, द्वादशी तथा दशमी। भद्रा से अतिरिक्त कर्ण, नक्षत्र—हस्त, अश्विनी पुष्य, तीनों उत्तरा, रोहिणी, आरुलेवा, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, मूल, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, तीनों पूर्वा, आर्द्रा। वार—रविवार, बुध, गुरु, शुक्र। उक्त तिथियाँ शुक्लपक्ष की हों और कृष्णपक्ष में प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त। समय—मध्याह्न से पूर्व। मास—ब्राह्मण के लिये वसन्त—चैत्र एवं वैशाख, क्षत्रिय के लिये मीक्षम—ज्येष्ठ एवं आषाढ़, वैश्य के लिये शरद—आश्विन एवं कार्तिक। मुहूर्त—दैवज्ञ से पूछिये ॥ ४ ॥
ब्राह्मणस्त्रयाणां वर्णानामुपयनं कर्तुमर्हति, राजन्यो द्रव्यस्य, वैश्यो वैश्यस्येवेति। (शूद्रमाप कुलगुणसंपन्नं मन्त्रवर्जमुपनीतमध्यापयेदित्येके) ॥५॥
ब्राह्मण तीनों वर्णों का उपनयन कर सकता है, क्षत्रिय दो वर्णों का (अपना और वैश्य का), वैश्य—वैश्य का ही उपनयन कर सकता है। कई आचार्यों का मत है कि यदि शूद्र आयुर्वेद पाठि कुल में उत्पन्न हो, तथा शौच शील आदि गुणों से युक्त हो तो, मन्त्र (ओं मूः स्वाहा) को छोड़कर इसको उपनयन देकर आयुर्वेद पढ़ाना चाहिये। (चरक) में ब्राह्मण, राजन्य और वैश्य के लिये आयुर्वेद पढ़ने का विधान करके—फिर 'सामान्यतो वा धर्मार्थकामपरिग्रहार्थं सर्वैः'—यह कह दिया है ॥ ५ ॥
ततोऽग्निं त्रिःपरिणीयामिनसाक्षिकं जिष्यं वृयात्—कामक्रोधलोभमोहमानाहङ्कारैर्योपाख्यपैशुन्यानुनालस्या-
१ दार्वी होमविधि—मीमांसासादर्शन के आठवें अध्याय के चौथे पाद में देखिये। अथवा सामान्य होम की विधि से यज्ञ करना चाहिये।
यशस्यानि हित्वा नीचनखरोष्णा शूचिना कषायवाससा सत्यव्रतब्रह्मचर्याभिवादनतपरेणावश्यं भवितव्यं, मदनु-मतस्थानगमनशयनासनभोजनाध्ययनतपरेण भूत्वा मत्प्रियहितेषु वर्तितव्यम्; अतोऽन्यथा ते वर्तमानस्याधर्मो भवति, अफला च विद्या, न च प्राकार्यं प्राप्नोति ॥६॥ अहं वा त्वयि सम्यग्वर्तमाने यद्यन्यथादर्शी स्यामेनोभारभवेयमफलविद्यश्च ॥७॥
स्वाहाकार के पीछे अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा कराके शिष्य को—अग्नि की साक्षि रखकर आचार्य उपदेश दे—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान, अहंकार, ईर्ष्या, कठोरवाणी, खल्ला, भूत, आलस्य एवं निन्दित कर्मों को छोड़कर, नख और सिर के बाल कटाकर, पवित्रता के साथ, कषाय वस्त्र पहिनकर, सत्य, शास्त्रोक्त नियम, ब्रह्मचर्य, नामोच्चारण पूर्वक अभिवन्दन करते हुए, सदा बरतना चाहिए। मेरी आज्ञा से उठना, बैठना, जाना, सोना, खाना, पढ़ना चाहिये। मेरे प्रिय एवं हितकारी कार्यों में तुमको बरतना चाहिए। यदि इससे विपरीत करोगे तो तुमको अधर्म होगा, विद्या भी निष्फल जायेगी, विद्या कभी प्रकाशित नहीं होगी। और यदि तुम्हारे ठीक प्रकार से व्यवहार करने पर भी मैं इसमें विपरीत मिथ्याचरण करूँ तो मैं पाप का भागी बनूँ और मेरी विद्या व्यर्थ हो। (चरक में—“त्रिः पक्षस्य केशश्मश्रुलोमनखान् संहरेत्”—यह पाठ है—परन्तु शाल्यशास्त्र होने से इसमें इस नियम का अपवाद रखकर—'सदा नीचनखरोष्णा'—इसका पालन करना चाहिये) ॥ ६-७ ॥
द्विजगुरुदरिद्रमित्रप्रव्रजितोपनतसाध्वनाथाभ्युपगतानां चात्मबान्धवानामिव स्वभेषजैः प्रतिकर्तव्यम्, एवं साधु भवति; व्याधशाकुनिकपतितपापकारिणां च न प्रतिकर्तव्यम्; एवं विद्या प्रकाशते, मित्रयशोधर्मार्थकामांश्च प्राप्नोति ॥८॥
रोगी परिचर्या के लिये उपदेश—
ब्राह्मण, गुरु, दरिद्र, मित्र, संन्यासी, पास में नम्रतापूर्वक आये, सत्युत्पन्न, अनाथ, दूर से आये सज्जनों को चिकित्सा स्वजनों को भाँति अपनी औषधियों से करनी चाहिये। इस प्रकार करने से मंगल होता है। व्याध, चिड़ियार, नीच, पाप कर्म करनेवालों की चिकित्सा में अर्थ लाभ की इच्छा से भी प्रवृत्त नहीं होना चाहिये। इस प्रकार करने से विद्या प्रकाशित होती है, तथा मित्र, यश, धर्म अर्थ और काम की प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥
१ चरक विमान—अध्याय में इसको सुन्दर रूप से लिखा है, यथा—त्वया गोब्राह्मणमादै कृत्वा सर्वप्राणभूतां शर्माशयितव्यम्। सर्वात्मना चातुराणामारोग्याय प्रयतितव्यम्। जीवित-
अ० ३ ]
सूत्रस्थानम्
११
भवतश्चात्र—
कृष्णेऽष्टमी तन्निधनेऽहनी द्वे शुक्ले तथाऽप्येवमहर्द्विसन्ध्यम् अकालविद्युस्तनयित्वुपोषे स्वतन्त्रराष्ट्रक्षितिपञ्चथासु ॥ ६ ॥ शमशानयानाद्यतनाहेषु मनोत्सवौत्पातिकदर्शनेषु। नाध्येयमन्येषु च येषु विप्रा नाधीयते नाशुचिना च नित्यम् ॥ १० ॥
अनध्याय काल—
कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी और पञ्चदशी (अमावस) शुक्ल पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी और पञ्चदशी (पूर्णिमा) ये तीनों तिथियाँ, दोनों संध्याकाल-प्रातःसायम्, बिना समय के (हेमन्त—विशिर काल में) विद्युत, या बिजली की कड़क अथवा वृष्टि के होने पर (अथवा मल मास में) अपनी सम्बन्धियों की-राष्ट्र की, और राजा की पीड़ा में, शमशान में, सवारी में, मार्ग में, वन में, संग्राम में, महोत्सव (कौमुदी महोत्सवादि) में, अनिष्ट सूचक उत्पातों के दर्शन में, तथा ब्राह्मण जिन समयों में अध्ययन नहीं करते उन समयों में, (वीणा आदि के बजने के समय) अविविन्न अवस्था में अध्ययन नहीं करना चाहिये।
वि० मन्तव्य—स्वतन्त्रराष्ट्रक्षितिपञ्चथासु—अर्थात्—स्वाधीन राज्य के सम्प्राट् की व्यथा (रुग्णावस्था) में, अद्यतनाऽऽहेवेषु—अर्थात् आज भर के युद्धकाल में अनध्याय होना चाहिये, साधारण सामन्तों की रुग्णावस्था में और लम्बे युद्धकाल में नहीं। येषु विप्रा नाधीयते—अर्थात् प्रतिपदा तिथि ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने शिष्योपनयनीयो नाम
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः ।
अथातोऽध्ययनसंप्रदाानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
शिष्य के उपनयन के अनंतर शास्त्र के सम्यक् प्रकार से दान करने के लिये 'अध्ययन संप्रदाानीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं। जैसा भगवान्-धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १, २ ॥
हेतोरपि चातुरेभ्यो नाभिद्रोध्यव्यम् ।
अथ्यद् वा—भेवजं प्राप्तकालमप्यातुरस्य नैवं विधस्य कुर्यात् । तद्यथा—अनपवादप्रतीकारस्य धनस्यापरिचारकस्य वैद्यमानिनः चण्डासूयकस्य तीव्राधर्मरुचैरतिक्षीणबलमांसशोणितस्यासाध्यरोगोपहतस्य मुमुषुं लिगान्वितस्य चेति । एवविधं ह्यातुरमुपचरन् भिषक् पापीयसाऽयशसा योगमुच्छति ॥ चरक वि० अ० ३ ॥ और-चरक सिद्धि अ० २ में चण्डः साहसिको भीरुः कृतदन्तो व्यग्र एव च—इत्यादि देखिये ।
प्रागभिहितं 'सवित्रमध्यायशतं पञ्चसु स्थानेषु' (सू. अ. १) तत्र सूत्रस्थानमध्यायाः षट्चत्वारिंशत्, षोडश निदानानि, दश शारीराणि, चत्वारिंशच्चिकित्सितानि, अष्टौ कल्पाः, तदुत्तरं षट्षष्टिः ॥ ३ ॥
प्रथम जो कहा है कि एक सौ बीस अध्यायों च स्थानों में विभक्त हैं। यथा—सूत्रस्थान में ४६ अध्याय, निदानस्थान में १६, शारीरस्थान में १०, चिकित्सास्थान में ४०, कल्प में ८, उत्तर स्थान में ६६ अध्याय हैं। (एक सौ बीस अध्यायों में उत्तर स्थान के अध्यायों को गिनती नहीं है।) ॥ ३ ॥
वेदोत्पत्तिः शिष्यनयस्तथाऽध्ययनदानिकः ।
प्रभाषणाप्रहरणाद्युत्तुचर्याऽथ यान्निक्रः ॥ ४ ॥
शस्त्रावचारणं योग्या विशिखाक्षारकल्पनम् ।
अरिन्तकर्म जलौकाख्या हृध्याया रक्तवर्णनम् ॥ ५ ॥
दोषधातुमलाद्यानां विज्ञानाभ्याय एव च ।
कर्णव्यधासपक्वषावालेषो व्रणयुपासनम् ॥ ६ ॥
हिताहितां व्रणप्रश्नो व्रणास्त्रावच यः पृथक् ।
कृत्याकृत्यविधिः शिष्योऽधिः समुदेशीय एव च ॥ ७ ॥
विनिश्चयः शस्त्रविधौ प्रनष्टज्ञानिकस्तथा ।
शूल्योद्वृत्तिव्रणज्ञानं दूतस्वप्ननिर्दर्शनम् ॥ ८ ॥
पञ्चेन्द्रिय तथा छाया स्वभावाद्भेकृतं तथा ।
अवारणो युक्तसेनीय आतुरक्रमभूमिकौ ॥ ९ ॥
मिश्रकाख्यो द्रव्यगणः संशुद्धौ शमने च यः ।
द्रव्यादीनां च विज्ञानं विशेषो द्रव्यगोऽपरः ॥ १० ॥
रसज्ञानं वमनार्थमध्यायो रेचन्याय च ।
द्रवद्रव्यविधिस्तद्रवन्तपानविधिस्तथा ॥ ११ ॥
सूचनात् सूत्रणाच्छैव सवनाच्छार्थसन्ततेः ।
षट् चत्वारिंशदध्यायं सूत्रस्थानं प्रचक्षते ॥ १२ ॥
प्रत्येक स्थान के अध्यायों का नाम कहते हैं—
वेदोत्पत्ति, शिष्योपनयनीय, अध्ययनसंप्रदायनीय प्रभाषणीय, अप्रोपहरणीय, अद्युत्तुचर्या, यन्त्रविधि, शस्त्रावचरणीय, योग्यासूत्रीय, विशिखानुप्रवेशनीय, क्षारपाकविधि, अग्निर्मंविधि, जलौकावचरणीय, शोणितवर्णनीय, दोषधातुमलक्ष्यवृद्धि विज्ञानीय, कर्णव्यधबन्धनविधि, आमपक्वेषणीय, व्रणा-लेपनविधि, व्रणतोपासननीय, हिताहितीयाध्याय, व्रणप्रश्न, व्रण-स्त्राव विज्ञानीय, कृत्याकृत्यविधि, व्याधिसमुदेशीय, अष्टविध-शस्त्रकर्मध्याय, प्रनष्टशल्यविज्ञानीय, शल्योपनयनीय, विपरीता-विपरीतव्रण विज्ञानीय, विपरीताविपरीत दूत स्वप्न विज्ञानीय, पञ्चेन्द्रियार्थविप्रतिपत्ति, छायाविप्रतिपत्ति, स्वभावविप्रतिपत्ति, अवारणीय, युक्तसेनीय, आतुरोपक्रमणीय, भूमिप्रविभागीय, मिश्रक, द्रव्यसंशोधन संशमनीय, द्रव्यरसगुणवीर्यविपाकविज्ञानीय, द्रव्यविशेष विज्ञानीय, वमन द्रव्य विकल्प विज्ञानीय, विरेचन द्रव्य विकल्प विज्ञानीय, द्रवद्रव्यविधि, अन्तपान
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३ ]
१२
विधि ये छि्यालीस अध्याय हैं। अर्थों को सूचित करने से (एक देश के कहने से अनुक्त अर्थ को ग्रहण करने से) अर्थों को यथास्थान रखने से, अर्थों के जानने से (अनुसन्धान से) इन छि्यालिस अध्यायों को सूत्रस्थान कहते हैं ॥ ४-१२ ॥
वातव्याधिकमर्गसि साश्मरिश्च भगन्दरः।
कुष्ठमेहोदरं मूढो विद्वधिः परिसर्पणम् ॥ १३ ॥
प्रन्थिबुद्धिबुद्धशुक्रमनाश्च मुखरोगिकम्।
हेतुलक्षणनिर्देशान्निदानानौति षोडश ॥ १४ ॥
निदानस्थान के अध्याय—
वातव्याधि, अर्श, अश्मरि, भगन्दर, कुष्ठ, प्रमेह, मूढगर्भ, विद्वधि, उदर, परिसर्प (विसर्प), प्रन्थि (प्रन्थि, अपची, अबुंद, गलगण्ड), बुद्धि (उपदंश, बुद्धि, श्लीपद), बुद्धरोग, शुक्ररोग, भग्नरोग और मुखरोग ये सोलह निदानस्थान में अध्याय हैं। रोगोत्पत्ति का कारण (हेतु) और लक्षण (रोग को बतानेवाले चिह्न) का निर्देश करने से इसको निदानस्थान कहते हैं ॥
भूतचिन्ता रजःशुद्धिगर्भावक्रान्तिरेव च।
व्याकरणं च गर्भस्य शरीरस्य च यत् स्मृतम् ॥ १५ ॥
प्रत्येकं मर्मनिर्देशः शिरावर्णनमेव च।
सिराव्यधो धमनीनां गर्भिण्या व्याकृतिस्तथा ॥ १६ ॥
निर्दिष्टानि दशैतानि शासीराणि महर्षिणा।
विज्ञानार्थं शरीरस्य भिषजं योगिनामपि ॥ १७ ॥
शारीरस्थान के अध्याय—
भूतचिन्ता (पञ्चभूत सम्बन्धी), रजःशुद्धि (शुक्रशोणित की शुद्धि), गर्भावक्रान्ति, गर्भव्याकरण शारीर, शरीरव्याकरण (शरीर का विवरण), प्रत्येक मर्म निर्देश, शिरावर्णनशारीर, सिराव्यध विधि, धमनी व्याकृति, गर्भिणी व्याकृति—ये दश अध्याय पूज्य धन्वन्तरि ने वैद्यों तथा रोगियों के लिये शरीर का विशेष रूप में ज्ञान कराने के लिये कहे हैं। (चरक में भी सुमुख के लिये निर्देश शारीर ज्ञान से सत्या बुद्धि उत्पन्न होकर मोक्ष में प्रवृत्त कराती है) ॥ १५-१७ ॥
द्विवर्णयो ज्रणः सद्यो भग्नानां वातरोगिकम्।
महावातिकमर्गसि साश्मरिश्च भगन्दरः ॥ १८ ॥
कुष्ठानां महतां चापि मैहिकं पैडिकं तथा।
मधुमेहचिकित्सा च तथा चोदरिणामपि ॥ १९ ॥
मूढगर्भचिकित्सा च विद्वधोनां विसर्पिणाम्।
प्रन्थिबुद्धयुपदंशानां तथा च क्षुद्ररोगिणाम् ॥ २० ॥
शुक्रदोषचिकित्सा च तथा च मुखरोगिणाम्।
शोफस्थानगतानां च निषेधो मिश्रकं तथा ॥ २१ ॥
१ इसी में कहा है
शरीरं सर्वथा सर्वं सर्वदा वेद यो भिषक्।
आयुर्वेदं सात्कृत्यैव वेद लोकमुखप्रदम् ॥
देखिये चरक शारीर ५-६
वाजीकरं च यत् क्षीणे सर्वाबाधशमोऽपि च।
मेधायुष्करणं चापि स्वभावव्याधिवारणम् ॥ २२ ॥
निवृत्तसंतापकरं कीर्तितं च रसायनम्।
स्नेहोपयोगिकः स्वेदो वमने सविरेचने ॥ २३ ॥
तयोर्न्यापन्चिकित्सा च नेत्रवस्तिविभागिकः।
नेत्रवस्तिविपत्सिद्धिस्तथा चोत्तरवस्तिकः ॥ २४ ॥
निरूहक्रमसंज्ञश्च तथैवातुरसंज्ञकः।
धमनस्य विधिश्चान्त्यश्चत्वारिंशदिति स्मृताः ॥ २५ ॥
प्रायश्चित्तं प्रशमनं चिकित्सा शान्तिकर्म च।
पर्यायस्तस्य निर्देशाच्चिकित्सास्थानमुच्यते ॥ २६ ॥
चिकित्सास्थान के अध्याय—
द्विवर्णीय, सद्योज्रण, भग्नरोग, वातव्याधि, महावातव्याधि, अर्शचिकित्सा, अश्मरि, भगन्दर रोग, कुष्ठ, महाकुष्ठरोग, प्रमेह, प्रमेह पिडिका, मधुमेह, उदररोग, मूढगर्भ, विद्वधि, विसर्प (नाड़ीस्तन रोग), प्रन्थि (प्रन्थि, अपची, अबुंद, गलगण्ड), बुद्धि (बुद्धि, उपदंश, श्लीपद), बुद्धरोग, शुक्ररोग, मुखरोग, शोफ-रोग, अनागत बाध प्रतिषेध (चिकित्सा,) मिश्रक, क्षीणबलीय वाजीकरण चिकित्सा, सर्वाबाधशम (रसायनसर्वाबाधशमनीय), मेधायुष्कामीय रसायन, स्वभाव व्याधि प्रतिषेधीय रसायन, निवृत्त संतापीय, स्नेहोपयोगीय, स्वेदावचरणीय, वमन विरेचन साध्योपद्रव, वमन विरेचन व्यापन्चिकित्सा, नेत्र वस्ति प्रमाण प्रविभाग, नेत्र वस्ति व्यापत्, उत्तर वस्ति, निरूहोपक्रम चिकित्सा, आतुरोपद्रव, धूमनस्यविधि (धूम, नस्य, कवल ग्रह) यह अन्तिम अध्याय है—इस प्रकार से ४० अध्याय इस स्थान में हैं। चिकित्सा के पर्याय—प्रायश्चित्त, प्रशमन, चिकित्सा, शान्तिकर्म, ये चिकित्सा के पर्याय हैं। चिकित्सा का विवरण होने से इसे चिकित्सास्थान कहते हैं। चरक में—व्याधिहर, पथ्य, साधन, प्रकृतिस्थापन और औषध ये अन्य भी पर्याय हैं।
वि० मन्तव्य—प्रायश्चित्त=रोगनिवृत्ति के लिए अनेक विध व्रत उपवास आदि कर्म, प्रशमन—शारीरिक एवं मानसिक दोषों की शान्ति के उपाय, चिकित्सारोगप्रतिकार, शान्तिकर्म—रोगजनक स्यादि ग्रहों तथा देवादि एवं बालग्रहों की शान्ति के कर्म, व्याधिहर—रोग नाशन के उपाय, पथ्य या जीवनयात्रा के लिये उपयोगी भाचार (आहार-विहार), साधन सिद्धि—सफलता के उपाय=जरा आलस्य आदि के नाशक उपाय, औषध=आत्ममस्त शरीर में औष=उचित ताप या दीप्ति का आधान करने-रखने का उपाय, प्रकृतिस्थापन-प्रकृति=स्वास्थ्य में स्थापित रखने का उपाय तथा हित=धारण एवं पोषण का उपाय। अतएव चिकित्सास्थान में केवल रोगप्रतिकार के ही उपाय नहीं लिखे गये हैं, अपितु स्वास्थ्य के लिये भी रसायन एवं वाजीकरण का वर्णन करने के लिये अनेक अध्याय