भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

इनमें स्थावर औषधियों से—छाल, पत्ता, फूल, फल, मूल, कन्द, गोद और स्वरस आदि (तैल, क्षार, कांटे आदि) अङ्ग बरते जाते हैं। जङ्गम औषधियों से—चमड़ा, नख, बाल, रक्त आदि का उपयोग होता है ॥ ३१ ॥

पार्थिवाः सुवर्णरजतमणिमुक्तासनःशिलामृत्कपाला- दयः ॥ ३२ ॥

पार्थिव औषधियाँ—स्वर्ण, रजत, ( चाँदी ), मणि, मुक्ता, मैनसिल, मिट्टी का ठिकरा आदि हैं१ ॥ ३२ ॥

कालकृतास्तु प्रवातनिवातातपच्छायाज्योत्स्नातमः श्रोतोष्णवर्षाहोरात्रपक्षमासस्वयंनदादयः संवत्सरविशेषाः ॥

कालकृत औषध—अतिवायुवाला, वायुरहित स्थान, धूप, छाया, ज्योत्स्ना ( चाँदनी ), अन्धकार, शीत, उष्ण, वर्षा, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, आदि ( निमेष, काष्ठ, ओला आदि ) संवत्सर के विभाग को कालकृत कहते हैं ।

चिकित्सा में इनका उपयोग होता है । यथा-प्रवातं वर्जयेत्, निवातागारमाश्रयेत्, इत्यादि—

इसी प्रकार प्रवालपिष्टी बनाने में प्रवाल को चाँदनी में रखते हैं । इसी तरह भिन्न भिन्न कुष्ठ रोगों को भिन्न भिन्न समय तक भूमि या धान्य राशि में रखने का विधान है । यथा—

लाजोल्लोशीरकचन्दनानि दत्त्वा प्रवाते निशि वासयेच्च । उत्तर अ० ४८ ।

( २ ) “निवाते देशे निचितं कृत्वा” । सु० सू० ११ ।

( ३ ) ‘मदनफलानामातपपरिशुष्काणाम्’ । सु० अ० ४३ ॥

त एते स्वभावत एव दोषाणां संचयप्रकोपप्रशमप्रती- कारहेतवः प्रयोजनवन्तरश्च ॥ ३४ ॥

ये सब स्वभाव से ही दोषों के संचय, प्रकोप प्रशमन और प्रतिकार में कारण हैं, और चिकित्सा में उपयोगी हैं ॥ ३४ ॥

भवन्ति चात्र श्लोका—

शरीराणां विकाराणांमेष वर्गश्चतुर्विधः ।

प्रकोपे प्रशमे चैव हेतुरकृत्विचिकित्सकैः ॥ ३५ ॥

इस विषय में श्लोक है—१

चिकित्सकों ने इस चार प्रकार के वर्ग को शारीरिक रोगों के प्रकोप में तथा रोगों की शान्ति में कारण कहा है । ( चार प्रकार का वर्ग—स्थावर, जङ्गम, पार्थिव और कालकृत है ) ॥

आगन्तवस्तु ये रोगास्ते द्विधा निपतन्ति हि ।

मनस्थन्ये शरीरेऽन्ये तेषां तु द्विविधा क्रिया ॥३६॥

शरीरपतितानां तु शरीरबदुपक्रमः ।

मानसानां तु शब्दादिष्विष्टो वर्गः सुखावहः ॥ ३७ ॥

आगन्तुज रोग दो प्रकार से होते हैं । एक—मन में और दूसरे शरीर में होते हैं । इन दोनों की चिकित्सा दो प्रकार की है । शरीर में होनेवाले रोगों की—शारीरिक रोगों की भाँति चिकित्सा है, और मनमें होनेवाले रोगों की शब्द-स्पर्श-रस और गन्ध इनका सुखकारी उपयोग करना चिकित्सा है ॥ ३६, ३७ ॥

एवमेतत् पुरुषो व्याधिरौषधं क्रियाकाल इति चतुष्टयं समासेन व्याख्यातम् । तत्र पुरुषग्रहणात् तत्संबन्धद्रव्य- समूहो भूतादिरुक्तस्तदङ्गप्रत्यङ्गविकल्पाश्च त्वङ्गमांसा- स्थिसिरास्तायुप्रभृतयः, व्याधिग्रहणाद् वातपित्तकफगा- णितसन्निपातवैषम्यनिमित्ता सर्व एव व्याधयो व्याख्याताः, औषधग्रहणाद् द्रव्यरसगुणवीर्यविपाकानामादेशः, क्रिया- ग्रहणात् स्नेहादीनि छेद्यादीनि च कर्माणि व्याख्यातानि, कालग्रहणात् सर्वक्रियाकालानामादेशः ॥ ३८ ॥

इस प्रकार से पुरुष, व्याधि, औषध और क्रियाकाल इन चारों की संक्षेप में व्याख्या कर दी है । इनमें पुरुष शब्द से इस पुरुष को उत्पन्न करनेवाले पंचमहामूल द्रव्यसमूह, एवं इस पुरुष के अङ्ग प्रत्यङ्ग के भेद, त्वचा, मांस, अस्थि, सिरा स्नायु, आदि भी कह दिये हैं । व्याधि शब्द से-वात, पित्त, कफ, रक्त एवं इनके सन्निपात तथा विषमता से होनेवाले सब रोगों की व्याख्या कर दी है । औषध शब्द से—द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक का ग्रहण कर लिया है । क्रिया शब्द से स्नेह आदि एवं छेद्य आदि कर्मों की व्याख्या कर दी है । काल शब्द से—सम्पूर्ण क्रियाओं के काल का कथन किया है२ ॥ ३८ ॥

१ चरक में कहा है—

गद्योवतो यः पुनः श्लोकेरर्थः समनुगीयते ।

तद् व्यक्तिव्यवसायार्थ द्विरुक्तं तत्र गृहीते ॥

च० नि० अ० १ ॥

२ पहले जो ‘कालकृत’—शब्द आया है, वहाँ पर कोई ‘क्रियाकाल’ ऐसा कहते हैं । जैसा मानुमती में कहा है कि— “क्रियाणां स्नेहघमनादिनां तथा छेद्यादीनां च प्रवृत्ति-निवृत्त-उप-

१ अत्र पार्थिवेषु मुक्तायाः पाठोऽनार्थः प्रतिभाति । मुक्तायाः शुक्लाख्यजलचरप्राणिन्यन्त्यात् ( सु० नि० मूल० ) ।

यह नोट श्री यादवजी त्रिकमजी महाराज ने सुश्रुत संहिता ( मूल ) निर्णयसागर में दिया है । परन्तु पीछे उन्होंने ही बताया कि यह पाठ ठीक है । क्योंकि मुक्ता में स्वर आदि पार्थिव गुण देखकर इसको पार्थिव कहा है न कि उत्पत्ति की दृष्टि से । इस लिये यह प्रमाद का पाठ नहीं है ।