सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १]
सूत्रस्थानम्
७
तेषां संशोधनसंशमनाहाराचाराः सम्यक्प्रयुक्ता निग्रहहेतवः ॥ २७ ॥
सम्यक् प्रकार से प्रयुक्त किये गये संशमन, आहार और विहार, इन रोगों का निग्रह करते हैं। संशोधन—बाह्य संशोधन और अन्तः संशोधन। बाह्य संशोधन—शस्त्र, क्षार, अग्नि प्रलेप आदि से होता है, और आभ्यन्तर संशोधन—वमन, विरेचन, आस्थापन और रक्तमोक्षण—इन चार प्रकार से होता है। (कोई रक्तमोक्षण के स्थान पर शिरोविरेचन मानते हैं)।
संशमन—न शोधयति यद्दोषान् समासोदीरयत्यपि।
समीकरोति कुद्वांश्च तत् संशमनमुच्यते।
यह संशमन भी दो प्रकार का है—बाह्य और आभ्यन्तर। बाह्य संशमन—आलेप, परिषेक, अभ्यंग, कवच, गण्डूष आदि आदि रूपमें है। आभ्यन्तर संशमन—पाचन, लेखन, बृंहण, विष प्रशमन आदि रूप में हैं।
आहार चार प्रकार का है—पेय, भक्ष्य, लेह्य और चूर्ण। यह चार प्रकार का आहार-दोष प्रशमन, व्याधि प्रशमन और स्वास्थ्यकर भेद से तीन प्रकार का है।
आचार—शारीरिक, वाचिक और मानसिक कर्म है। इसमें उत्तेजण, अवक्षेपण आदि शारीरिक कर्म स्वाध्याय आदि वाचिक, संकरूप चिन्तन आदि मानसिक कर्म हैं ॥ २७ ॥
प्राणिनां पुनर्भूतमाहारो बलवर्णौजसां च। स षट्सु रसेष्वायत्तः, रसाः पुनर्द्व्याश्रयाः, द्व्याणि पुनरोषधयः। तारतु द्विविधाः—स्थावरा जङ्गमाश्च ॥ २८ ॥
आहार प्राणियों का तथा इनके बल, वर्ण और ओज का मूल है। यह आहार छ रसों के अधीन है। रस द्रव्य के अधीन है, और औषधियाँ ही द्रव्य हैं। औषधियाँ दो प्रकार की हैं, यथा—स्थावर और जंगम ॥ २८ ॥
तासां स्थावराश्चतुर्विधाः—वनस्पतयो, वृक्षाः, वीरुधः, औषधय इति। तासु अपुष्पाः फलवन्तो वनस्पतयः, पुष्पफलवन्तो वृक्षाः, प्रतानवत्यः स्तम्बिन्यश्च वीरुधः, फलपाकनिष्ठा औषधय इति ॥ २९ ॥
चरक में कहा है—
(१) एकरसाहारः कर्शनीयानाम्—
सर्वरसाभ्यवहारी बलकराणाम् ॥
(२) वर्णः प्रसादः सौस्वर्ष जीवितं प्रतिभा सुखम्।
पुष्टिः पुष्टिः बलं मेधा सर्वमन्ते प्रतिष्ठितम् ॥
चरक सु० अ० २७। ३४९।
२ औषधि शब्द से—स्थावर और जङ्गम में पाथिव द्रव्यों का भी ग्रहण करना चाहिये। जैसा कि चरक में कहा है— पुनस्तत् त्रिविधम्-जंगमोद्भूतपाथिवम्। च. सू. अ. १।
इनमें स्थावर औषधियाँ चार प्रकार की हैं—वनस्पति, वृक्ष, वीरुध और औषधि। इनमें से जिनमें पुष्प आये बिना फल आता है, वे वनस्पति कहाती हैं। जिनमें पुष्प और फल दोनों होते हैं, उनको वृक्ष कहते हैं। जो फेलेनेवाली एवं गुलम रूप (थम्बला रूप) होती हैं, वे वीरुध (बेल) कहाती हैं। जो फल के पकने तक ही अस्तित्व रखती हैं वे औषधि हैं।
वि० मन्तव्य—‘अपुष्पा’ शब्द का अर्थ—‘अविद्यमान-पुष्पाः’ (डरलन), ‘येषां पुष्पमन्तरेणैव फलजनम्’ (हाराण्यचन्द्र) तथा ‘फलैः वनस्पतिः’ (चरक) ‘विना पुष्पैः फलैर्युक्ता वटोदुम्बर-रादयः’ चक्रपाणिः, तथा—‘तेषां अपुष्पा फलिनो वनस्पतय इति स्मृताः’ हारीत, ‘तैरपुष्पाद् वनस्पतिः’ अमरकोश-आदि वनस्पति शास्त्र के अनुसार पुष्प का न होना ही विद्व है-सत्य है सही है, परन्तु आधुनिक वनस्पतिशास्त्र का अध्ययन करनेवाले ‘अहश्यपुष्पाः’ अर्थ करते हैं, अर्थ ही नहीं करते प्राचीनों को बुरा-भला भी कह डालते हैं, यद्यपि वे स्वयं गतानुगतिक हैं, फलतः उनकी कल्पना भी निराधार है, कारण सुनिये—पुष्प-विकसनो धातु से ‘पुष्प’ शब्द निष्पन्न होता है। पुष्प वह है जो विकसित होता है—खिलता है—फूलता है और वट उदुम्बर आदि पर इस प्रकार के फूल आते भी नहीं हैं और भगवान् चरक ने इन्द्रियस्थान अ० २ में लिखा है कि—फल चापि भवेत् किञ्चित् पुष्पं यस्य न विद्यते—अर्थात् ऐसे फल भी होते हैं जिनका पूर्वज पुष्प नहीं होता ॥ २९ ॥
जङ्गमाः खल्वपि चतुर्विधाः—जरायुजाण्डजस्वेदजो-द्विज्जः। तत्र पशुमनुष्यव्यालादयो जरायुजाः, खगसर्प-सरीसृपप्रभृतयोऽण्डजाः, क्रुमिकीटपिपौलिकाप्रभृतयः स्वेदजाः, इन्द्रगोपमण्डूकप्रभृतय उद्भिज्जः ॥ ३० ॥
जंगम औषधि भी चार प्रकार की हैं। यथा—जरायुज, अण्डज, स्वेदज और, उद्भिज। इन चारों में—पशु, मनुष्य, व्याल (हिंसक पशु) आदि जरायुज हैं। पक्षि, सर्प, अजगर आदि अण्डज हैं। क्रुमि, कीड़ा-चिज्जटी आदि स्वेदज हैं। वीरबहूटी, मेंढक आदि उद्भिज हैं ॥ ३० ॥
तत्र स्थावरेभ्यस्त्वक्पत्रपुष्पफलमूलकन्दनिर्यासस्वर-सादयः प्रयोजनवन्तः, जङ्गमेभ्यश्चर्मनखरोमरुधिरा-दयः ॥ ३१ ॥
१ ‘अपुष्पा इति—पुष्पाणामतिसूक्ष्मतया पुष्पाधारकर्णिकया (Receptacles) आच्छादितत्वाच्च अदृश्यपुष्पा इत्यर्थः ॥ सुश्रुत निर्णय० मू०।
२ मेंढक और वीरबहूटी-उद्भिज हैं—यह विचारणीय है? आजकल का विज्ञान इनको ऐसा नहीं मानता।