सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १
आदि देव धन्वन्तरि मैं हूँ। आयुर्वेद के अन्य अङ्गों सहित शल्य तन्त्र का उपदेश करने के लिये फिर से इस पृथ्वी पर आया हूँ ॥२१॥
असिन्धुछाच्छ पञ्चमहाभूतशरीरिसम्वायः पुरुष इत्युच्यते। तस्मिन् क्रिया, सोऽधिष्ठानं, तस्मात् ? लोकरूप द्वैविध्यात्, लोको हि द्विविधः—स्थावरो, जङ्गमश्च; द्विविधात्मक एवाग्नेयः सौम्यश्च, तद्भूयस्त्वात्। पञ्चात्मको वा; तत्र चतुर्विधो भूतग्रामः संस्वेदजजरायुजाण्डजो-द्विजसंज्ञः; तत्र पुरुषः प्रधानं, तस्योपकरणमन्यत्; तस्मात् 'पुरुषोऽधिष्ठानम्' ॥२२॥
इस आयुर्वेद शास्त्र में—पृथ्वी, अप, तेज, वायु और आकाश इन पाँच भूतों के और आत्मा के संयोग का नाम पुरुष है, ( मोक्ष शास्त्र में पञ्चिस तत्त्वों के संयोग को पुरुष कहते हैं )। इसी पुरुष में भेषज, शस्त्र, क्षार, अग्निकर्म तथा स्वास्थ्यकारक कर्म अभिप्रेत हैं। क्योंकि यही पुरुष स्वास्थ्य और रोग का अधिष्ठान है। यह नर जातीय पुरुष ही इसका अधिष्ठान इस लिये है—क्योंकि लोक दो प्रकार का है, एक स्थावर और दूसरा जङ्गम। ये दोनों प्रकार के लोक पंच महाभूतों से बने होने पर भी, दो प्रकार के गुण की अधिकता के कारण आग्नेय और सौम्य कहे जाते हैं।१ अथवा पाँच भूतों-वाला होने से, पाँच स्वभाववाले, ये दोनों प्रकार के लोक हैं। इनमें—सर्म्पूर्ण प्राणिसमूह, स्वेदज, जरायुज, अण्डज, और उद्विज—इन चार संज्ञाओंवाला है। इन सब में पुरुष ही प्रधान२ है। अन्य सब लोक इस पुरुष के साधनरूप हैं। इसीलिए इस शास्त्र का पुरुष ही अधिष्ठान है, ( हाथी, वृक्ष आदि नहीं हैं३ )।
विशेष मन्तव्य—यहाँ “पुरुष” प्राणिमात्र का नाम है, आयुर्वेद स्थावर = वनस्पति, वानस्पत्य, वीरुध तथा औषधि की चिकित्सा का तथा हाथी घोड़ा, गौ, भैंस आदि पशु एवं पक्षी आदि की चिकित्सा का भी उपदेश करता है और उत्तर-दायी है, परन्तु उन सब में पुरुष ( मानव ) प्रधान है, अतः इस शास्त्र ( सुश्रुत संहिता ) में प्रधान माना गया है और इसी को ध्यान में रखकर अङ्ग प्रत्यङ्ग आदि का वर्णन किया गया है ॥२२॥
१ (१) खादयश्चेतनापञ्चधातवः पुरुषः स्मृतः ॥चरका॥
(२) सौम्यं शुक्रमात्तवमानेयम् । चरक० शा० १ अ० ३। २ भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः, प्राणिनां बुद्धिजीविनः । बुद्धिमत्सु नरा श्रेष्ठाः.....। मनु० । ३ इसके लिये विस्तृत विवेचन-भानुमती टीका में दिया गया है, वहाँ देखा जा सकता है।
तद्वदुःखसंयोगा व्याधय उच्यन्ते ॥२३॥
इस पुरुष को जिनके संयोग से दुःख होता है, उनको व्याधियाँ ( विविध दुःखमादधतीति व्याधयः ) कहते हैं ॥२३॥
ते चतुर्विधाः—आगन्तवः, शारीराः, मानसाः, स्वाभाविकान्नाश्रिति ॥२४॥
ये व्याधियाँ चार प्रकार की हैं—आगन्तुक, शारीरिक, और स्वाभाविक२ ॥२४॥
तेषामागन्तवोऽभिघातनिमित्ताः ( ॥२५ ॥ )
शारीरास्त्वन्तपानमूला वातपित्तकफशोणितसननिपातवैषम्यनिमित्ता ( ॥२५ ॥ )
मानसास्तु क्रोधशोकभयहर्षविषादेष्याभ्यसूयादैन्यमात्सर्पकासलोभप्रभृतय इच्छाद्वेषभेदैर्भवन्ति ( ॥२५ ॥ )
स्वाभाविकान्स्तु लुपिपासाजराभृत्युनिद्राप्रकृ ( भृ )-तयः ( ॥२५ ॥ ) ॥२५॥
इनमें आगन्तुक रोग—शास्त्र आदि के अभिघातरूप कारणों से उत्पन्न होते हैं। शारीरिक रोग—अन्नपान के कारण, एवं वात, पित्त, कफ और रक्त इनसे एवं इनके सनिपात रूप में विषमता से उत्पन्न होते हैं। मानसिक रोग—क्रोध, शोक, भय, हर्ष, दुःख, ईर्ष्या, असूया, दीनता, मात्सर्प, काम, लोभ आदि से तथा इच्छा और द्वेष के भेदों से उत्पन्न होते हैं। स्वाभाविक रोग—भूख, प्यास, वृद्धावस्था, मृत्यु, निद्रा आदि हैं।
वि० मन्तव्य—शल्य एवं शालाक्य तन्त्रों में वातपित्तकफ के साथ रक्त को भी गिना जाता है और यूनानी चिकित्सा में रक्त (वृत्त) को विल्त (दोष) भी माना जाता है ॥२५॥
त एते मनःशरीराधिष्ठानाः ॥२६॥
ये चारों प्रकार के रोग मन और शरीर को आश्रय करके होते हैं।
इसी से चरक में कहा है—
कालखुद्वीन्द्रियाथीनां योगो मिथ्या न चाति च ।
द्व्याश्रयाणां व्याधीनां त्रिविधो हेतुसंग्रहः ॥
च० मू० अ० १ ॥
वि० मन्तव्य—उक्त चारों प्रकार की व्याधियों का अधिष्ठान—आश्रय या स्थान मन एवं शरीर हैं, अतः इन दोनों पर ही उनका प्रभाव भी पड़ता है ॥२६॥
१ चरक में रोग तीन प्रकार के माने हैं। यथा—त्रयो रोगा इति—निजागन्तुमानसाः। तत्र निजः शारीरदोषसमूहः, आगन्तुभूतविषवाव्यनिसंग्रहारादिसमूहः, मानसः पुनरिष्टस्यालाभात्माभाच्चानिष्टस्योपजायते ॥ चरकं सूत्र अ० ११ ।