भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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वका = `

अ० १ |

तस्याङ्गवरमाद्य प्रस्यक्षागमायुसानोपमानैरविरदध

मुच्यमानसुपधारय ॥१६॥

इस आयुवंद्‌ के श्रेष्ठ एवं आदिम अङ्ग को- प्रत्यक्ष

अनुमान उपमान ओर आगम इन चार प्रमाणो से अविसेध

रूप मे कहता हू, सुनो ' ॥ १६

एतद्धयङ्ग प्रथमं, प्रागभिघातव्रणसंरोहायज्ञभिरः-

सन्धानाच्च । श्रयते हि यथा-““सुद्रेण यज्ञस्य शिरश्छिन्न- मिति, ततो देवा अस्विनावभिगम्योचुः- भगवन्तो ! नः

श्रेष्ठतमो युवां भविष्यथः, सवद्भ्यां यज्ञस्य शिरः सन्धा-

तव्यमिति । तावूचतुरेवमस्वि्ति। अथ तयोरथं देवा

इन्द्र यज्ञभागेन प्रसादयन्‌ । ताध्यां यज्ञस्य जिर

संहितम्‌?” इति ॥१७।।

इन आटो अङ्गं से-- यह शल्य अङ्ग ही प्रधान दै।

वयोक्रि-- प्रथम देवासुर संग्राम मे वणो्पत्ति के रोहण होने से

ओर यज्ञ का सिर जोड़ने के कारण-यह शल्यतन्ब प्रधान

है । एेखा परम्परा से सुना जाता है कि--^सद्रने यज्ञ का सिर

काट दिया था, तब देवताओं ने अश्विनी कुमारो के पास

जाकर क्‌ कि “ आप दोनों यज्ञ का सिर जोड देः| इस

प्रकार करने से आप हम मे अतिश्रेष्ठ होंगे । अशिनां ने कहा

कि- अच्छा, एेसादहीहो। तव देवताओं ने इन अश्विनः

। कुमारो के यज्ञमागके ल्यि इन्द्र को प्रसन्न किया | अश्विनी

नक 914०-4 ५५०.

कुमारां ने यज्ञ का सिर जोड़ दिया” ।| १७]

अष्टास्पि नायुवदतन्त्रष्वैतदेवाधिकमभिमतम्‌,

आद्युक्रियाकरणायन्त्रशखक्षाराग्तिप्रणिधानात्‌ सबतन््र￾सामान्याञ्च ॥९८॥

आयुवद के आगो तन्नो मे यदह -शल्यतन्र ही सब से

अधिक मान्य है । क्योकि यन्न, शखर, क्षारं ओर अग्नि

प्रयोग मे शीघ्र क्रिया करने के कारण तथा शालाक्य आदि सखव

तन्त्रो में सामान्य होने के कारण | ¦

वक्तव्य- शल्य तन्व; मे--यन्, शसन, क्षार आदि का

प्रयोग रीघ्र होने सेरोगकी निद्त्तिमी शीघद्ी होती है।

(२ ओषध-चिकिस्सा म जितना मय गता है, शख-चिकित्सा मेँ + कम कगता है । दूखरी बात--आयुवेंद के शेष सब अङ्गं को ` किसी 1 न किसी रूप मे शल्य तन्न की अपेक्षा रहती दै। इसी

। १ चरकमे तीनही प्रमाण मने हं, यथ त्रिविधं ख.

` रोगविशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा-आप्तोपदेश प्रत्त त्यम्‌, -अत्‌-

माने चेति ।॥ चरकं वि० अ० ४1

२.अश्विनौ देवभिषजौ यज्ञवाहाविति स्मृतो ।

यज्ञ्य हि शिरशिछन्तं पुनस्ताभ्यां समाहितम्‌ ॥

एतश्चान्यर्चं बहुभिः कर्मभिभिषगु त्तमो ।

बभूवतुमृशं पूज्पानिद््रादीनां महात्मनाम. ~ `.

ष क अय्‌जका राज ताया उ का -21 यक कज वक त -- 7

1

सूत्रस्थानम्‌ | ५

९। € क,9 ऋ.9 ९) सं चरक म अशरोग मं, गुल्म मे, उद्ररोग में (शल्यचिकित्सकः को सहायता ेने के स्यि कहा ३१ ॥शद्‌] ` तदिदं शाश्वतं पुण्यं स्वग्यं यज्चस्यमायुष्यं वृत्तिकरं चेति ॥१९॥

वह यह शाल्यशास्र शश्वत (अविनाशि), पुण्य का निपित्त

वग के ल्यि मंगल का-यश का खाधन, आयु के च््यि हित- कारी ओर दूसरी जीविका का साधन है ॥ {€॥ ब्रह्मा म्रोवाच ततः प्रजापतिरधिजने, तस्मादशिविनौ

श्विभ्यामिन्द्रः इन्द्रादहं, मया विह प्रदेयमर्थिभ्यः

जाहितहेतोः ।(२०॥

इस आयुर्वेद का ब्रह्मा ने उपदेश क्रिया, ब्रह्मा से प्रजा- पति दक्न ने पदा, दक्ष प्रजापति से अश्विनी कुमारो ने सीला अशिनो से हन्द्र ने ओर इन्द्र से मेने ( षन्वतरि ने ) पदा । मुभे तो इख मव्य लोक मे-प्रजाके कल्याणके ल्यि. अथि रूप मे शिष्य रूप से आये हए ठमकरो देना रैर ।२०॥

अक्ति चात्र￾अहं हि धन्वन्त्रिरादिदेबो जरार्जामरव्युहरोऽमराणाम्‌। शल्याङ्गसङ्ञरपरेरुपेतं प्रा्ठोऽस्मि गां भूय इहोपदेष्टम्‌ २९ इस विधयमे कहा भी है-

देवताओं कौ द्धावस्था, रोगउ तथा मल्यु दूर ` करनेवाला

१ अरोग मे -तत्राहुरेके शस्त्रेण कर्तनं हितमर्शसाम ।

दाहं तारण चाप्येके दाहमेके तथाऽग्िना ॥ गुत्मरोग मे-

तत्र धान्वतरीयाणामधिकारः क्रियाविधो ।

वेदयानां क तयोग्यानां व्यधशोधनरोपणे ॥ | ` उदररोग मे इदं तु शल्यहतु णां कर्म स्याद्‌ दृ्टकर्मणाम्‌ ॥ | चरक चि० अ० १३ ।

२ कहा हं--सम्यग्‌ गुरुमुखादधीत्य . यो न प्रयच्छत्यन्तेवा- `

सभ्यः स खलु ऋणी गुरुजनस्य महदेनो विन्दति ॥

(£ अ्विना--शब्द आजकर के 1. 8. 8. ऽ. या

॥4. 13. 1८. 5. का प्रतिनिधि ह । वेदिक देवताओं मे येही

युग ह, ओर इनके दोनों प्रकार के सजिकर शीर मँ डिकर कार्य

मिरुते हं । यथा-सजिकर-यज्ञस्य- हि शिररिछन्ं पतस्ताभ्यां `

` समाहितम्‌ ।

सेडिकक-भागवश्च्यवनः कामी बद्धः सन्‌ विकृति गतः 1

वीतवरणस्वरोपेतः ङतस्ताम्या पुनर्युका-॥1- ~ ~> `

३ देवताओं को भी रोग होते है, यथा-- ~. . ` = ह

` -खालित्यं गरुडध्वजस्य शिरसि, स्ताकिब्रणो ब्रह्मणो।॥ _ मे ०

~ घोरं चापि -जलोदरं ~ च वरूणस्येन्दोस्तथेव . क्षयः श

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