सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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अ० १ |
तस्याङ्गवरमाद्य प्रस्यक्षागमायुसानोपमानैरविरदध
मुच्यमानसुपधारय ॥१६॥
इस आयुवंद् के श्रेष्ठ एवं आदिम अङ्ग को- प्रत्यक्ष
अनुमान उपमान ओर आगम इन चार प्रमाणो से अविसेध
रूप मे कहता हू, सुनो ' ॥ १६
एतद्धयङ्ग प्रथमं, प्रागभिघातव्रणसंरोहायज्ञभिरः-
सन्धानाच्च । श्रयते हि यथा-““सुद्रेण यज्ञस्य शिरश्छिन्न- मिति, ततो देवा अस्विनावभिगम्योचुः- भगवन्तो ! नः
श्रेष्ठतमो युवां भविष्यथः, सवद्भ्यां यज्ञस्य शिरः सन्धा-
तव्यमिति । तावूचतुरेवमस्वि्ति। अथ तयोरथं देवा
इन्द्र यज्ञभागेन प्रसादयन् । ताध्यां यज्ञस्य जिर
संहितम्?” इति ॥१७।।
इन आटो अङ्गं से-- यह शल्य अङ्ग ही प्रधान दै।
वयोक्रि-- प्रथम देवासुर संग्राम मे वणो्पत्ति के रोहण होने से
ओर यज्ञ का सिर जोड़ने के कारण-यह शल्यतन्ब प्रधान
है । एेखा परम्परा से सुना जाता है कि--^सद्रने यज्ञ का सिर
काट दिया था, तब देवताओं ने अश्विनी कुमारो के पास
जाकर क् कि “ आप दोनों यज्ञ का सिर जोड देः| इस
प्रकार करने से आप हम मे अतिश्रेष्ठ होंगे । अशिनां ने कहा
कि- अच्छा, एेसादहीहो। तव देवताओं ने इन अश्विनः
। कुमारो के यज्ञमागके ल्यि इन्द्र को प्रसन्न किया | अश्विनी
नक 914०-4 ५५०.
कुमारां ने यज्ञ का सिर जोड़ दिया” ।| १७]
अष्टास्पि नायुवदतन्त्रष्वैतदेवाधिकमभिमतम्,
आद्युक्रियाकरणायन्त्रशखक्षाराग्तिप्रणिधानात् सबतन््रसामान्याञ्च ॥९८॥
आयुवद के आगो तन्नो मे यदह -शल्यतन्र ही सब से
अधिक मान्य है । क्योकि यन्न, शखर, क्षारं ओर अग्नि
प्रयोग मे शीघ्र क्रिया करने के कारण तथा शालाक्य आदि सखव
तन्त्रो में सामान्य होने के कारण | ¦
वक्तव्य- शल्य तन्व; मे--यन्, शसन, क्षार आदि का
प्रयोग रीघ्र होने सेरोगकी निद्त्तिमी शीघद्ी होती है।
(२ ओषध-चिकिस्सा म जितना मय गता है, शख-चिकित्सा मेँ + कम कगता है । दूखरी बात--आयुवेंद के शेष सब अङ्गं को ` किसी 1 न किसी रूप मे शल्य तन्न की अपेक्षा रहती दै। इसी
। १ चरकमे तीनही प्रमाण मने हं, यथ त्रिविधं ख.
` रोगविशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा-आप्तोपदेश प्रत्त त्यम्, -अत्-
माने चेति ।॥ चरकं वि० अ० ४1
२.अश्विनौ देवभिषजौ यज्ञवाहाविति स्मृतो ।
यज्ञ्य हि शिरशिछन्तं पुनस्ताभ्यां समाहितम् ॥
एतश्चान्यर्चं बहुभिः कर्मभिभिषगु त्तमो ।
बभूवतुमृशं पूज्पानिद््रादीनां महात्मनाम. ~ `.
ष क अय्जका राज ताया उ का -21 यक कज वक त -- 7
1
सूत्रस्थानम् | ५
९। € क,9 ऋ.9 ९) सं चरक म अशरोग मं, गुल्म मे, उद्ररोग में (शल्यचिकित्सकः को सहायता ेने के स्यि कहा ३१ ॥शद्] ` तदिदं शाश्वतं पुण्यं स्वग्यं यज्चस्यमायुष्यं वृत्तिकरं चेति ॥१९॥
वह यह शाल्यशास्र शश्वत (अविनाशि), पुण्य का निपित्त
वग के ल्यि मंगल का-यश का खाधन, आयु के च््यि हित- कारी ओर दूसरी जीविका का साधन है ॥ {€॥ ब्रह्मा म्रोवाच ततः प्रजापतिरधिजने, तस्मादशिविनौ
श्विभ्यामिन्द्रः इन्द्रादहं, मया विह प्रदेयमर्थिभ्यः
जाहितहेतोः ।(२०॥
इस आयुर्वेद का ब्रह्मा ने उपदेश क्रिया, ब्रह्मा से प्रजा- पति दक्न ने पदा, दक्ष प्रजापति से अश्विनी कुमारो ने सीला अशिनो से हन्द्र ने ओर इन्द्र से मेने ( षन्वतरि ने ) पदा । मुभे तो इख मव्य लोक मे-प्रजाके कल्याणके ल्यि. अथि रूप मे शिष्य रूप से आये हए ठमकरो देना रैर ।२०॥
अक्ति चात्रअहं हि धन्वन्त्रिरादिदेबो जरार्जामरव्युहरोऽमराणाम्। शल्याङ्गसङ्ञरपरेरुपेतं प्रा्ठोऽस्मि गां भूय इहोपदेष्टम् २९ इस विधयमे कहा भी है-
देवताओं कौ द्धावस्था, रोगउ तथा मल्यु दूर ` करनेवाला
१ अरोग मे -तत्राहुरेके शस्त्रेण कर्तनं हितमर्शसाम ।
दाहं तारण चाप्येके दाहमेके तथाऽग्िना ॥ गुत्मरोग मे-
तत्र धान्वतरीयाणामधिकारः क्रियाविधो ।
वेदयानां क तयोग्यानां व्यधशोधनरोपणे ॥ | ` उदररोग मे इदं तु शल्यहतु णां कर्म स्याद् दृ्टकर्मणाम् ॥ | चरक चि० अ० १३ ।
२ कहा हं--सम्यग् गुरुमुखादधीत्य . यो न प्रयच्छत्यन्तेवा- `
सभ्यः स खलु ऋणी गुरुजनस्य महदेनो विन्दति ॥
(£ अ्विना--शब्द आजकर के 1. 8. 8. ऽ. या
॥4. 13. 1८. 5. का प्रतिनिधि ह । वेदिक देवताओं मे येही
युग ह, ओर इनके दोनों प्रकार के सजिकर शीर मँ डिकर कार्य
मिरुते हं । यथा-सजिकर-यज्ञस्य- हि शिररिछन्ं पतस्ताभ्यां `
` समाहितम् ।
सेडिकक-भागवश्च्यवनः कामी बद्धः सन् विकृति गतः 1
वीतवरणस्वरोपेतः ङतस्ताम्या पुनर्युका-॥1- ~ ~> `
३ देवताओं को भी रोग होते है, यथा-- ~. . ` = ह
` -खालित्यं गरुडध्वजस्य शिरसि, स्ताकिब्रणो ब्रह्मणो।॥ _ मे ०
~ घोरं चापि -जलोदरं ~ च वरूणस्येन्दोस्तथेव . क्षयः श
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