सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
वका = `
अ० १ |
तस्याङ्गवरमाद्य प्रस्यक्षागमायुसानोपमानैरविरदध
मुच्यमानसुपधारय ॥१६॥
इस आयुवंद् के श्रेष्ठ एवं आदिम अङ्ग को- प्रत्यक्ष
अनुमान उपमान ओर आगम इन चार प्रमाणो से अविसेध
रूप मे कहता हू, सुनो ' ॥ १६
एतद्धयङ्ग प्रथमं, प्रागभिघातव्रणसंरोहायज्ञभिरः-
सन्धानाच्च । श्रयते हि यथा-““सुद्रेण यज्ञस्य शिरश्छिन्न- मिति, ततो देवा अस्विनावभिगम्योचुः- भगवन्तो ! नः
श्रेष्ठतमो युवां भविष्यथः, सवद्भ्यां यज्ञस्य शिरः सन्धा-
तव्यमिति । तावूचतुरेवमस्वि्ति। अथ तयोरथं देवा
इन्द्र यज्ञभागेन प्रसादयन् । ताध्यां यज्ञस्य जिर
संहितम्?” इति ॥१७।।
इन आटो अङ्गं से-- यह शल्य अङ्ग ही प्रधान दै।
वयोक्रि-- प्रथम देवासुर संग्राम मे वणो्पत्ति के रोहण होने से
ओर यज्ञ का सिर जोड़ने के कारण-यह शल्यतन्ब प्रधान
है । एेखा परम्परा से सुना जाता है कि--^सद्रने यज्ञ का सिर
काट दिया था, तब देवताओं ने अश्विनी कुमारो के पास
जाकर क् कि “ आप दोनों यज्ञ का सिर जोड देः| इस
प्रकार करने से आप हम मे अतिश्रेष्ठ होंगे । अशिनां ने कहा
कि- अच्छा, एेसादहीहो। तव देवताओं ने इन अश्विनः
। कुमारो के यज्ञमागके ल्यि इन्द्र को प्रसन्न किया | अश्विनी
नक 914०-4 ५५०.
कुमारां ने यज्ञ का सिर जोड़ दिया” ।| १७]
अष्टास्पि नायुवदतन्त्रष्वैतदेवाधिकमभिमतम्,
आद्युक्रियाकरणायन्त्रशखक्षाराग्तिप्रणिधानात् सबतन््रसामान्याञ्च ॥९८॥
आयुवद के आगो तन्नो मे यदह -शल्यतन्र ही सब से
अधिक मान्य है । क्योकि यन्न, शखर, क्षारं ओर अग्नि
प्रयोग मे शीघ्र क्रिया करने के कारण तथा शालाक्य आदि सखव
तन्त्रो में सामान्य होने के कारण | ¦
वक्तव्य- शल्य तन्व; मे--यन्, शसन, क्षार आदि का
प्रयोग रीघ्र होने सेरोगकी निद्त्तिमी शीघद्ी होती है।
(२ ओषध-चिकिस्सा म जितना मय गता है, शख-चिकित्सा मेँ + कम कगता है । दूखरी बात--आयुवेंद के शेष सब अङ्गं को ` किसी 1 न किसी रूप मे शल्य तन्न की अपेक्षा रहती दै। इसी
। १ चरकमे तीनही प्रमाण मने हं, यथ त्रिविधं ख.
` रोगविशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा-आप्तोपदेश प्रत्त त्यम्, -अत्-
माने चेति ।॥ चरकं वि० अ० ४1
२.अश्विनौ देवभिषजौ यज्ञवाहाविति स्मृतो ।
यज्ञ्य हि शिरशिछन्तं पुनस्ताभ्यां समाहितम् ॥
एतश्चान्यर्चं बहुभिः कर्मभिभिषगु त्तमो ।
बभूवतुमृशं पूज्पानिद््रादीनां महात्मनाम. ~ `.
ष क अय्जका राज ताया उ का -21 यक कज वक त -- 7
1
सूत्रस्थानम् | ५
९। € क,9 ऋ.9 ९) सं चरक म अशरोग मं, गुल्म मे, उद्ररोग में (शल्यचिकित्सकः को सहायता ेने के स्यि कहा ३१ ॥शद्] ` तदिदं शाश्वतं पुण्यं स्वग्यं यज्चस्यमायुष्यं वृत्तिकरं चेति ॥१९॥
वह यह शाल्यशास्र शश्वत (अविनाशि), पुण्य का निपित्त
वग के ल्यि मंगल का-यश का खाधन, आयु के च््यि हित- कारी ओर दूसरी जीविका का साधन है ॥ {€॥ ब्रह्मा म्रोवाच ततः प्रजापतिरधिजने, तस्मादशिविनौ
श्विभ्यामिन्द्रः इन्द्रादहं, मया विह प्रदेयमर्थिभ्यः
जाहितहेतोः ।(२०॥
इस आयुर्वेद का ब्रह्मा ने उपदेश क्रिया, ब्रह्मा से प्रजा- पति दक्न ने पदा, दक्ष प्रजापति से अश्विनी कुमारो ने सीला अशिनो से हन्द्र ने ओर इन्द्र से मेने ( षन्वतरि ने ) पदा । मुभे तो इख मव्य लोक मे-प्रजाके कल्याणके ल्यि. अथि रूप मे शिष्य रूप से आये हए ठमकरो देना रैर ।२०॥
अक्ति चात्रअहं हि धन्वन्त्रिरादिदेबो जरार्जामरव्युहरोऽमराणाम्। शल्याङ्गसङ्ञरपरेरुपेतं प्रा्ठोऽस्मि गां भूय इहोपदेष्टम् २९ इस विधयमे कहा भी है-
देवताओं कौ द्धावस्था, रोगउ तथा मल्यु दूर ` करनेवाला
१ अरोग मे -तत्राहुरेके शस्त्रेण कर्तनं हितमर्शसाम ।
दाहं तारण चाप्येके दाहमेके तथाऽग्िना ॥ गुत्मरोग मे-
तत्र धान्वतरीयाणामधिकारः क्रियाविधो ।
वेदयानां क तयोग्यानां व्यधशोधनरोपणे ॥ | ` उदररोग मे इदं तु शल्यहतु णां कर्म स्याद् दृ्टकर्मणाम् ॥ | चरक चि० अ० १३ ।
२ कहा हं--सम्यग् गुरुमुखादधीत्य . यो न प्रयच्छत्यन्तेवा- `
सभ्यः स खलु ऋणी गुरुजनस्य महदेनो विन्दति ॥
(£ अ्विना--शब्द आजकर के 1. 8. 8. ऽ. या
॥4. 13. 1८. 5. का प्रतिनिधि ह । वेदिक देवताओं मे येही
युग ह, ओर इनके दोनों प्रकार के सजिकर शीर मँ डिकर कार्य
मिरुते हं । यथा-सजिकर-यज्ञस्य- हि शिररिछन्ं पतस्ताभ्यां `
` समाहितम् ।
सेडिकक-भागवश्च्यवनः कामी बद्धः सन् विकृति गतः 1
वीतवरणस्वरोपेतः ङतस्ताम्या पुनर्युका-॥1- ~ ~> `
३ देवताओं को भी रोग होते है, यथा-- ~. . ` = ह
` -खालित्यं गरुडध्वजस्य शिरसि, स्ताकिब्रणो ब्रह्मणो।॥ _ मे ०
~ घोरं चापि -जलोदरं ~ च वरूणस्येन्दोस्तथेव . क्षयः श
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- = \ ट ५ प नर ~ 7 ^ + ५ ४४. अ
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च च
६
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १
आदि देव धन्वन्तरि मैं हूँ। आयुर्वेद के अन्य अङ्गों सहित शल्य तन्त्र का उपदेश करने के लिये फिर से इस पृथ्वी पर आया हूँ ॥२१॥
असिन्धुछाच्छ पञ्चमहाभूतशरीरिसम्वायः पुरुष इत्युच्यते। तस्मिन् क्रिया, सोऽधिष्ठानं, तस्मात् ? लोकरूप द्वैविध्यात्, लोको हि द्विविधः—स्थावरो, जङ्गमश्च; द्विविधात्मक एवाग्नेयः सौम्यश्च, तद्भूयस्त्वात्। पञ्चात्मको वा; तत्र चतुर्विधो भूतग्रामः संस्वेदजजरायुजाण्डजो-द्विजसंज्ञः; तत्र पुरुषः प्रधानं, तस्योपकरणमन्यत्; तस्मात् 'पुरुषोऽधिष्ठानम्' ॥२२॥
इस आयुर्वेद शास्त्र में—पृथ्वी, अप, तेज, वायु और आकाश इन पाँच भूतों के और आत्मा के संयोग का नाम पुरुष है, ( मोक्ष शास्त्र में पञ्चिस तत्त्वों के संयोग को पुरुष कहते हैं )। इसी पुरुष में भेषज, शस्त्र, क्षार, अग्निकर्म तथा स्वास्थ्यकारक कर्म अभिप्रेत हैं। क्योंकि यही पुरुष स्वास्थ्य और रोग का अधिष्ठान है। यह नर जातीय पुरुष ही इसका अधिष्ठान इस लिये है—क्योंकि लोक दो प्रकार का है, एक स्थावर और दूसरा जङ्गम। ये दोनों प्रकार के लोक पंच महाभूतों से बने होने पर भी, दो प्रकार के गुण की अधिकता के कारण आग्नेय और सौम्य कहे जाते हैं।१ अथवा पाँच भूतों-वाला होने से, पाँच स्वभाववाले, ये दोनों प्रकार के लोक हैं। इनमें—सर्म्पूर्ण प्राणिसमूह, स्वेदज, जरायुज, अण्डज, और उद्विज—इन चार संज्ञाओंवाला है। इन सब में पुरुष ही प्रधान२ है। अन्य सब लोक इस पुरुष के साधनरूप हैं। इसीलिए इस शास्त्र का पुरुष ही अधिष्ठान है, ( हाथी, वृक्ष आदि नहीं हैं३ )।
विशेष मन्तव्य—यहाँ “पुरुष” प्राणिमात्र का नाम है, आयुर्वेद स्थावर = वनस्पति, वानस्पत्य, वीरुध तथा औषधि की चिकित्सा का तथा हाथी घोड़ा, गौ, भैंस आदि पशु एवं पक्षी आदि की चिकित्सा का भी उपदेश करता है और उत्तर-दायी है, परन्तु उन सब में पुरुष ( मानव ) प्रधान है, अतः इस शास्त्र ( सुश्रुत संहिता ) में प्रधान माना गया है और इसी को ध्यान में रखकर अङ्ग प्रत्यङ्ग आदि का वर्णन किया गया है ॥२२॥
१ (१) खादयश्चेतनापञ्चधातवः पुरुषः स्मृतः ॥चरका॥
(२) सौम्यं शुक्रमात्तवमानेयम् । चरक० शा० १ अ० ३। २ भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः, प्राणिनां बुद्धिजीविनः । बुद्धिमत्सु नरा श्रेष्ठाः.....। मनु० । ३ इसके लिये विस्तृत विवेचन-भानुमती टीका में दिया गया है, वहाँ देखा जा सकता है।
तद्वदुःखसंयोगा व्याधय उच्यन्ते ॥२३॥
इस पुरुष को जिनके संयोग से दुःख होता है, उनको व्याधियाँ ( विविध दुःखमादधतीति व्याधयः ) कहते हैं ॥२३॥
ते चतुर्विधाः—आगन्तवः, शारीराः, मानसाः, स्वाभाविकान्नाश्रिति ॥२४॥
ये व्याधियाँ चार प्रकार की हैं—आगन्तुक, शारीरिक, और स्वाभाविक२ ॥२४॥
तेषामागन्तवोऽभिघातनिमित्ताः ( ॥२५ ॥ )
शारीरास्त्वन्तपानमूला वातपित्तकफशोणितसननिपातवैषम्यनिमित्ता ( ॥२५ ॥ )
मानसास्तु क्रोधशोकभयहर्षविषादेष्याभ्यसूयादैन्यमात्सर्पकासलोभप्रभृतय इच्छाद्वेषभेदैर्भवन्ति ( ॥२५ ॥ )
स्वाभाविकान्स्तु लुपिपासाजराभृत्युनिद्राप्रकृ ( भृ )-तयः ( ॥२५ ॥ ) ॥२५॥
इनमें आगन्तुक रोग—शास्त्र आदि के अभिघातरूप कारणों से उत्पन्न होते हैं। शारीरिक रोग—अन्नपान के कारण, एवं वात, पित्त, कफ और रक्त इनसे एवं इनके सनिपात रूप में विषमता से उत्पन्न होते हैं। मानसिक रोग—क्रोध, शोक, भय, हर्ष, दुःख, ईर्ष्या, असूया, दीनता, मात्सर्प, काम, लोभ आदि से तथा इच्छा और द्वेष के भेदों से उत्पन्न होते हैं। स्वाभाविक रोग—भूख, प्यास, वृद्धावस्था, मृत्यु, निद्रा आदि हैं।
वि० मन्तव्य—शल्य एवं शालाक्य तन्त्रों में वातपित्तकफ के साथ रक्त को भी गिना जाता है और यूनानी चिकित्सा में रक्त (वृत्त) को विल्त (दोष) भी माना जाता है ॥२५॥
त एते मनःशरीराधिष्ठानाः ॥२६॥
ये चारों प्रकार के रोग मन और शरीर को आश्रय करके होते हैं।
इसी से चरक में कहा है—
कालखुद्वीन्द्रियाथीनां योगो मिथ्या न चाति च ।
द्व्याश्रयाणां व्याधीनां त्रिविधो हेतुसंग्रहः ॥
च० मू० अ० १ ॥
वि० मन्तव्य—उक्त चारों प्रकार की व्याधियों का अधिष्ठान—आश्रय या स्थान मन एवं शरीर हैं, अतः इन दोनों पर ही उनका प्रभाव भी पड़ता है ॥२६॥
१ चरक में रोग तीन प्रकार के माने हैं। यथा—त्रयो रोगा इति—निजागन्तुमानसाः। तत्र निजः शारीरदोषसमूहः, आगन्तुभूतविषवाव्यनिसंग्रहारादिसमूहः, मानसः पुनरिष्टस्यालाभात्माभाच्चानिष्टस्योपजायते ॥ चरकं सूत्र अ० ११ ।
अ० १]
सूत्रस्थानम्
७
तेषां संशोधनसंशमनाहाराचाराः सम्यक्प्रयुक्ता निग्रहहेतवः ॥ २७ ॥
सम्यक् प्रकार से प्रयुक्त किये गये संशमन, आहार और विहार, इन रोगों का निग्रह करते हैं। संशोधन—बाह्य संशोधन और अन्तः संशोधन। बाह्य संशोधन—शस्त्र, क्षार, अग्नि प्रलेप आदि से होता है, और आभ्यन्तर संशोधन—वमन, विरेचन, आस्थापन और रक्तमोक्षण—इन चार प्रकार से होता है। (कोई रक्तमोक्षण के स्थान पर शिरोविरेचन मानते हैं)।
संशमन—न शोधयति यद्दोषान् समासोदीरयत्यपि।
समीकरोति कुद्वांश्च तत् संशमनमुच्यते।
यह संशमन भी दो प्रकार का है—बाह्य और आभ्यन्तर। बाह्य संशमन—आलेप, परिषेक, अभ्यंग, कवच, गण्डूष आदि आदि रूपमें है। आभ्यन्तर संशमन—पाचन, लेखन, बृंहण, विष प्रशमन आदि रूप में हैं।
आहार चार प्रकार का है—पेय, भक्ष्य, लेह्य और चूर्ण। यह चार प्रकार का आहार-दोष प्रशमन, व्याधि प्रशमन और स्वास्थ्यकर भेद से तीन प्रकार का है।
आचार—शारीरिक, वाचिक और मानसिक कर्म है। इसमें उत्तेजण, अवक्षेपण आदि शारीरिक कर्म स्वाध्याय आदि वाचिक, संकरूप चिन्तन आदि मानसिक कर्म हैं ॥ २७ ॥
प्राणिनां पुनर्भूतमाहारो बलवर्णौजसां च। स षट्सु रसेष्वायत्तः, रसाः पुनर्द्व्याश्रयाः, द्व्याणि पुनरोषधयः। तारतु द्विविधाः—स्थावरा जङ्गमाश्च ॥ २८ ॥
आहार प्राणियों का तथा इनके बल, वर्ण और ओज का मूल है। यह आहार छ रसों के अधीन है। रस द्रव्य के अधीन है, और औषधियाँ ही द्रव्य हैं। औषधियाँ दो प्रकार की हैं, यथा—स्थावर और जंगम ॥ २८ ॥
तासां स्थावराश्चतुर्विधाः—वनस्पतयो, वृक्षाः, वीरुधः, औषधय इति। तासु अपुष्पाः फलवन्तो वनस्पतयः, पुष्पफलवन्तो वृक्षाः, प्रतानवत्यः स्तम्बिन्यश्च वीरुधः, फलपाकनिष्ठा औषधय इति ॥ २९ ॥
चरक में कहा है—
(१) एकरसाहारः कर्शनीयानाम्—
सर्वरसाभ्यवहारी बलकराणाम् ॥
(२) वर्णः प्रसादः सौस्वर्ष जीवितं प्रतिभा सुखम्।
पुष्टिः पुष्टिः बलं मेधा सर्वमन्ते प्रतिष्ठितम् ॥
चरक सु० अ० २७। ३४९।
२ औषधि शब्द से—स्थावर और जङ्गम में पाथिव द्रव्यों का भी ग्रहण करना चाहिये। जैसा कि चरक में कहा है— पुनस्तत् त्रिविधम्-जंगमोद्भूतपाथिवम्। च. सू. अ. १।
इनमें स्थावर औषधियाँ चार प्रकार की हैं—वनस्पति, वृक्ष, वीरुध और औषधि। इनमें से जिनमें पुष्प आये बिना फल आता है, वे वनस्पति कहाती हैं। जिनमें पुष्प और फल दोनों होते हैं, उनको वृक्ष कहते हैं। जो फेलेनेवाली एवं गुलम रूप (थम्बला रूप) होती हैं, वे वीरुध (बेल) कहाती हैं। जो फल के पकने तक ही अस्तित्व रखती हैं वे औषधि हैं।
वि० मन्तव्य—‘अपुष्पा’ शब्द का अर्थ—‘अविद्यमान-पुष्पाः’ (डरलन), ‘येषां पुष्पमन्तरेणैव फलजनम्’ (हाराण्यचन्द्र) तथा ‘फलैः वनस्पतिः’ (चरक) ‘विना पुष्पैः फलैर्युक्ता वटोदुम्बर-रादयः’ चक्रपाणिः, तथा—‘तेषां अपुष्पा फलिनो वनस्पतय इति स्मृताः’ हारीत, ‘तैरपुष्पाद् वनस्पतिः’ अमरकोश-आदि वनस्पति शास्त्र के अनुसार पुष्प का न होना ही विद्व है-सत्य है सही है, परन्तु आधुनिक वनस्पतिशास्त्र का अध्ययन करनेवाले ‘अहश्यपुष्पाः’ अर्थ करते हैं, अर्थ ही नहीं करते प्राचीनों को बुरा-भला भी कह डालते हैं, यद्यपि वे स्वयं गतानुगतिक हैं, फलतः उनकी कल्पना भी निराधार है, कारण सुनिये—पुष्प-विकसनो धातु से ‘पुष्प’ शब्द निष्पन्न होता है। पुष्प वह है जो विकसित होता है—खिलता है—फूलता है और वट उदुम्बर आदि पर इस प्रकार के फूल आते भी नहीं हैं और भगवान् चरक ने इन्द्रियस्थान अ० २ में लिखा है कि—फल चापि भवेत् किञ्चित् पुष्पं यस्य न विद्यते—अर्थात् ऐसे फल भी होते हैं जिनका पूर्वज पुष्प नहीं होता ॥ २९ ॥
जङ्गमाः खल्वपि चतुर्विधाः—जरायुजाण्डजस्वेदजो-द्विज्जः। तत्र पशुमनुष्यव्यालादयो जरायुजाः, खगसर्प-सरीसृपप्रभृतयोऽण्डजाः, क्रुमिकीटपिपौलिकाप्रभृतयः स्वेदजाः, इन्द्रगोपमण्डूकप्रभृतय उद्भिज्जः ॥ ३० ॥
जंगम औषधि भी चार प्रकार की हैं। यथा—जरायुज, अण्डज, स्वेदज और, उद्भिज। इन चारों में—पशु, मनुष्य, व्याल (हिंसक पशु) आदि जरायुज हैं। पक्षि, सर्प, अजगर आदि अण्डज हैं। क्रुमि, कीड़ा-चिज्जटी आदि स्वेदज हैं। वीरबहूटी, मेंढक आदि उद्भिज हैं ॥ ३० ॥
तत्र स्थावरेभ्यस्त्वक्पत्रपुष्पफलमूलकन्दनिर्यासस्वर-सादयः प्रयोजनवन्तः, जङ्गमेभ्यश्चर्मनखरोमरुधिरा-दयः ॥ ३१ ॥
१ ‘अपुष्पा इति—पुष्पाणामतिसूक्ष्मतया पुष्पाधारकर्णिकया (Receptacles) आच्छादितत्वाच्च अदृश्यपुष्पा इत्यर्थः ॥ सुश्रुत निर्णय० मू०।
२ मेंढक और वीरबहूटी-उद्भिज हैं—यह विचारणीय है? आजकल का विज्ञान इनको ऐसा नहीं मानता।
८
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
इनमें स्थावर औषधियों से—छाल, पत्ता, फूल, फल, मूल, कन्द, गोद और स्वरस आदि (तैल, क्षार, कांटे आदि) अङ्ग बरते जाते हैं। जङ्गम औषधियों से—चमड़ा, नख, बाल, रक्त आदि का उपयोग होता है ॥ ३१ ॥
पार्थिवाः सुवर्णरजतमणिमुक्तासनःशिलामृत्कपाला- दयः ॥ ३२ ॥
पार्थिव औषधियाँ—स्वर्ण, रजत, ( चाँदी ), मणि, मुक्ता, मैनसिल, मिट्टी का ठिकरा आदि हैं१ ॥ ३२ ॥
कालकृतास्तु प्रवातनिवातातपच्छायाज्योत्स्नातमः श्रोतोष्णवर्षाहोरात्रपक्षमासस्वयंनदादयः संवत्सरविशेषाः ॥
कालकृत औषध—अतिवायुवाला, वायुरहित स्थान, धूप, छाया, ज्योत्स्ना ( चाँदनी ), अन्धकार, शीत, उष्ण, वर्षा, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, आदि ( निमेष, काष्ठ, ओला आदि ) संवत्सर के विभाग को कालकृत कहते हैं ।
चिकित्सा में इनका उपयोग होता है । यथा-प्रवातं वर्जयेत्, निवातागारमाश्रयेत्, इत्यादि—
इसी प्रकार प्रवालपिष्टी बनाने में प्रवाल को चाँदनी में रखते हैं । इसी तरह भिन्न भिन्न कुष्ठ रोगों को भिन्न भिन्न समय तक भूमि या धान्य राशि में रखने का विधान है । यथा—
लाजोल्लोशीरकचन्दनानि दत्त्वा प्रवाते निशि वासयेच्च । उत्तर अ० ४८ ।
( २ ) “निवाते देशे निचितं कृत्वा” । सु० सू० ११ ।
( ३ ) ‘मदनफलानामातपपरिशुष्काणाम्’ । सु० अ० ४३ ॥
त एते स्वभावत एव दोषाणां संचयप्रकोपप्रशमप्रती- कारहेतवः प्रयोजनवन्तरश्च ॥ ३४ ॥
ये सब स्वभाव से ही दोषों के संचय, प्रकोप प्रशमन और प्रतिकार में कारण हैं, और चिकित्सा में उपयोगी हैं ॥ ३४ ॥
भवन्ति चात्र श्लोका—
शरीराणां विकाराणांमेष वर्गश्चतुर्विधः ।
प्रकोपे प्रशमे चैव हेतुरकृत्विचिकित्सकैः ॥ ३५ ॥
इस विषय में श्लोक है—१
चिकित्सकों ने इस चार प्रकार के वर्ग को शारीरिक रोगों के प्रकोप में तथा रोगों की शान्ति में कारण कहा है । ( चार प्रकार का वर्ग—स्थावर, जङ्गम, पार्थिव और कालकृत है ) ॥
आगन्तवस्तु ये रोगास्ते द्विधा निपतन्ति हि ।
मनस्थन्ये शरीरेऽन्ये तेषां तु द्विविधा क्रिया ॥३६॥
शरीरपतितानां तु शरीरबदुपक्रमः ।
मानसानां तु शब्दादिष्विष्टो वर्गः सुखावहः ॥ ३७ ॥
आगन्तुज रोग दो प्रकार से होते हैं । एक—मन में और दूसरे शरीर में होते हैं । इन दोनों की चिकित्सा दो प्रकार की है । शरीर में होनेवाले रोगों की—शारीरिक रोगों की भाँति चिकित्सा है, और मनमें होनेवाले रोगों की शब्द-स्पर्श-रस और गन्ध इनका सुखकारी उपयोग करना चिकित्सा है ॥ ३६, ३७ ॥
एवमेतत् पुरुषो व्याधिरौषधं क्रियाकाल इति चतुष्टयं समासेन व्याख्यातम् । तत्र पुरुषग्रहणात् तत्संबन्धद्रव्य- समूहो भूतादिरुक्तस्तदङ्गप्रत्यङ्गविकल्पाश्च त्वङ्गमांसा- स्थिसिरास्तायुप्रभृतयः, व्याधिग्रहणाद् वातपित्तकफगा- णितसन्निपातवैषम्यनिमित्ता सर्व एव व्याधयो व्याख्याताः, औषधग्रहणाद् द्रव्यरसगुणवीर्यविपाकानामादेशः, क्रिया- ग्रहणात् स्नेहादीनि छेद्यादीनि च कर्माणि व्याख्यातानि, कालग्रहणात् सर्वक्रियाकालानामादेशः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार से पुरुष, व्याधि, औषध और क्रियाकाल इन चारों की संक्षेप में व्याख्या कर दी है । इनमें पुरुष शब्द से इस पुरुष को उत्पन्न करनेवाले पंचमहामूल द्रव्यसमूह, एवं इस पुरुष के अङ्ग प्रत्यङ्ग के भेद, त्वचा, मांस, अस्थि, सिरा स्नायु, आदि भी कह दिये हैं । व्याधि शब्द से-वात, पित्त, कफ, रक्त एवं इनके सन्निपात तथा विषमता से होनेवाले सब रोगों की व्याख्या कर दी है । औषध शब्द से—द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक का ग्रहण कर लिया है । क्रिया शब्द से स्नेह आदि एवं छेद्य आदि कर्मों की व्याख्या कर दी है । काल शब्द से—सम्पूर्ण क्रियाओं के काल का कथन किया है२ ॥ ३८ ॥
१ चरक में कहा है—
गद्योवतो यः पुनः श्लोकेरर्थः समनुगीयते ।
तद् व्यक्तिव्यवसायार्थ द्विरुक्तं तत्र गृहीते ॥
च० नि० अ० १ ॥
२ पहले जो ‘कालकृत’—शब्द आया है, वहाँ पर कोई ‘क्रियाकाल’ ऐसा कहते हैं । जैसा मानुमती में कहा है कि— “क्रियाणां स्नेहघमनादिनां तथा छेद्यादीनां च प्रवृत्ति-निवृत्त-उप-
१ अत्र पार्थिवेषु मुक्तायाः पाठोऽनार्थः प्रतिभाति । मुक्तायाः शुक्लाख्यजलचरप्राणिन्यन्त्यात् ( सु० नि० मूल० ) ।
यह नोट श्री यादवजी त्रिकमजी महाराज ने सुश्रुत संहिता ( मूल ) निर्णयसागर में दिया है । परन्तु पीछे उन्होंने ही बताया कि यह पाठ ठीक है । क्योंकि मुक्ता में स्वर आदि पार्थिव गुण देखकर इसको पार्थिव कहा है न कि उत्पत्ति की दृष्टि से । इस लिये यह प्रमाद का पाठ नहीं है ।
अ० २ ] २
सूत्रस्थानम्
भवति चात्र—
बीजं चिकित्सितस्यैतत् समासेन प्रकीर्तितम् ।
सर्विशमध्यायशतमस्य व्याख्या भविष्यति ॥२६॥
इस विषय में श्लोक है—
चिकित्सा शास्त्र का यह बीज संक्षेप में कहा है । इस संक्षेप में कहे हुए विषय की व्याख्या एक सौ बीस अध्याय में की जायगी ॥२६॥
तच्च सर्विशमध्यायशतं पञ्चसु स्थानेषु । तत्र सूत्र-निदानशारीरचिकित्सितकल्पेष्वर्थवशात् संविभज्योत्तरे तन्त्रे शेषान्तर्थात् बद्ध्यामः ॥४०॥
ये एक सौ बीस अध्याय पाँच स्थानों में विभक्त हैं । यथा-सूत्रस्थान, निदानस्थान, शारीरस्थान, चिकित्सास्थान और कल्पस्थान । प्रयोजन वश इन एक सौ बीस अध्यायों को पाँच स्थानों में विभक्त करके, शेष विषय की उत्तरतन्त्र में व्याख्या करेंगे१ ।
भवति चात्र—
स्वयम्भुवा प्रोक्तमिदं सनातनं
पठेद्भिः यः काशिपतिप्रकाशितम् ।
स पुण्यकर्मा मुनि पूजितो नृपे
रसुक्षये शक्रसलोकतां व्रजेत् ॥४१॥
कहा भी है—इस विषय में श्लोक है—
ब्रह्मा से कहे हुए और काशिपति से प्रकाशित किये इस सनातन शास्त्र का पृथ्वी पर जो पुरुष अभ्यास करता है, वह पुण्यकर्माशाली पुरुष पृथ्वी पर तो राजाओं से सम्मानित होता है, और मरने पर इन्द्र के समान लोक को अर्थात् स्वर्ग को पाता है । ( इस शास्त्र से ऐहलौकिक और पारलौकिक दोनों ही प्रकार का सुख मिलता है ) ॥४१॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने वेदोत्पत्तिनाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
द्वितीयोऽध्यायः
अथातः शिष्योपनयनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
पिछले अध्याय में इस शास्त्र के अध्ययन के ऐहिक तथा
दर्शन-कालः क्रियाकालः ।”
इसी प्रकार—
(२) नान्यः कालः क्रियातोऽस्ति, क्रिया नान्याऽथैवाप्यथात् ।
प्राधान्यात् पुरुषस्यात्र ततो व्याधितुष्टयम् ॥ क्रियाविशिष्टः कालो वा, कालो वा तच्चतुष्टयम् ॥ इसलिये ये चार ही हैं, पाँच नहीं ।
१ जैसा कि कहा है—“अधिकृत्य कृतं यस्मात् तन्त्रमेतदुपद्रवान्”—अर्थात् शल्य शास्त्र के व्रण आदि में होनेवाले उपद्रवों के लिये इस उत्तरतन्त्र को कहा है ।
पारलौकिक फल को बताकर अब अध्ययन विधि को बताने के लिए ‘शिष्योपनयनीय’ नामक अध्याय का अवतरण करते हैं । जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था१ ॥१-२॥
ब्राह्मणक्षत्रियवश्यानामन्यतममन्वयवयःशीलऔर्यौश-चाचारविनयशक्तिबलमेधाधृतिस्मृतिमतिप्रतिपत्तियुक्ततनुजिह्वाघटन्ताग्रभृजुवक्राक्षिनासं प्रसन्नचित्तवाक्चोष्टकलेशसहं च भिषक् शिष्यमुपनयेत् ; अतो विपरीतगुणं नोपनयेत् ॥३॥
जिस प्रकार के शिष्य का उपनयन करना चाहिये वह कहते हैं—
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य में से किसी एक जाति के, शुद्ध वंश में अथवा आयुर्वेद पढ़नेवाले कुल में उत्पन्न बालक या तरुण अवस्थावाले, शील-शूरता पवित्रता कुल तथा, देश के व्यवहार को जाननेवाले, नम्रता, उत्साह-शक्ति, बल, मेधा, स्मृति ( स्मरण ), मति, प्रतिपत्ति ( उत्तमसूक्ष्म युक्त ), पतली जिह्वा, पतले ओठ, पतले दाँतों के अग्रभागवाले, सरल मुख-नासिका-आँखोंवाले, प्रसन्नचित्त, मधुरवाणी, सुन्दर चेष्टा-वाले और कष्ट को सहन करनेवाले शिष्य का वैध उपनयन करे । इन उपरोक्त गुणों से विपरीत गुणवाले शिष्य का उपनयन नहीं करना चाहिये । ( अकुलीन को पढ़ाने का निषेध है । यथा-अकुलीनं त्यजेत् शिष्यम् । वियोनि म्लेच्छजातिं च )
उपनयनीय तु ब्राह्मणं प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनदात्रेषु प्रशस्तायां दिशि शुचौ समे देशे चतुर्हस्तं चतुरस्रं स्थडिलमुपलिप्य गोमयेन, दभैः संस्तौर्यं, रत्नपुष्पलाजभक्तैर्व्रताः पूजयित्वा विप्रान् भिषजश्च, तत्रोल्लिख्याभ्युद्वय च दक्षिणतो ब्रह्मणं स्थापयित्वाऽग्नितुमुपसमाधाय, खदिरपलाशदेवदारुबिल्वानां समिद्धिश्चतुर्णां वा क्षीरिबुद्धानां ( न्यमोधोढुम्बराश्चथमधूकानां ) दधिमधुघृताक्ताभिर्दोर्वाहौमिकेन विधिना सप्रणवाभिर्साह्याहूतिभिः स्तुवेण-ज्याहुतीर्जुह्यात्, ततः प्रतिदैवतमूर्धीश्च स्वाहाकारं कुर्यात्, शिष्यमपि कारयेत् ॥४॥
उपनयन विधि—
उपनयन के योग्य ब्राह्मण शिष्य को उपनयन देने के लिये वैद्यप्रशस्त तिथि, प्रशस्त करण, प्रशस्त मुहूर्त, प्रशस्त नक्षत्र में, प्रशस्त दिशा में ( प्राची या उत्तर दिशा ), पवित्र, समान स्थान में चार हाथ बराबर, लम्बा-चौड़ा, चारकोणवाले स्थान
१ उपनयन हो चुकने पर भी आयुर्वेद शास्त्र को पढ़ने के लिये फिर उपनयन दिया जाता है । क्योंकि उपनयन का अर्थ—शिष्य का गुरु के समीप आना है । इस विधि से शिष्य गुरु के नजदीक आता है । इसी कारण से गुरु-शिष्य मिलकर परस्पर प्रतिज्ञायें करते हैं ।
१०
मुश्रुतसंहिता
[ ७० ]
को गोबर से लेपकर इस पर कुशा बिछा दे। फिर रत्न, फूल, लाजा, ( चावल आदि ) अन्न से देवताओं का, ब्राह्मणों का, वैद्यों का पूजन करे। फिर, इस स्थान पर ऊर्ध्वमुखी रेखाकरके इसे जल से प्रोक्षण करके, ब्रह्मा को दक्षिण दिशा में बैठाकर अग्नि प्रज्वलित करे। खैर, ढाक, देवदार, विल्व इनकी समिधाओं से, अथवा, बड़, गूजर, पीपल, सहुवा इन चार खीरी वृक्षों की समिधा से, दही, शहद, घी इनके साथ दार्वी होम विधि से, ओं मूः स्वाहा, ओं सुवः स्वाहा, ओं स्वः स्वाहा—इस ओंकार विधि पूर्वक सुवे से घृत की आहुति देते हुए, तथा प्रत्येक के लिये (ब्रह्मणे स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा, अश्विभ्यां स्वाहा, इन्द्राय स्वाहा), प्रत्येक ऋषि के लिये (धन्वन्तरये स्वाहा, भारद्वाजाय स्वाहा, अत्रेयाय स्वाहा) 'स्वाहा' इस शब्द के साथ घी की आहुति देवे। शिष्य भी इसी प्रकार से करे।
वि० मन्त्रव्यं—ज्योतिःशास्त्रानुसार—उपनयन के लिये—प्रशस्त तिथि—द्वितीया, तृतीया, प्रतिपदा, एकादशी, द्वादशी तथा दशमी। भद्रा से अतिरिक्त कर्ण, नक्षत्र—हस्त, अश्विनी पुष्य, तीनों उत्तरा, रोहिणी, आरुलेवा, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, मूल, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, तीनों पूर्वा, आर्द्रा। वार—रविवार, बुध, गुरु, शुक्र। उक्त तिथियाँ शुक्लपक्ष की हों और कृष्णपक्ष में प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त। समय—मध्याह्न से पूर्व। मास—ब्राह्मण के लिये वसन्त—चैत्र एवं वैशाख, क्षत्रिय के लिये मीक्षम—ज्येष्ठ एवं आषाढ़, वैश्य के लिये शरद—आश्विन एवं कार्तिक। मुहूर्त—दैवज्ञ से पूछिये ॥ ४ ॥
ब्राह्मणस्त्रयाणां वर्णानामुपयनं कर्तुमर्हति, राजन्यो द्रव्यस्य, वैश्यो वैश्यस्येवेति। (शूद्रमाप कुलगुणसंपन्नं मन्त्रवर्जमुपनीतमध्यापयेदित्येके) ॥५॥
ब्राह्मण तीनों वर्णों का उपनयन कर सकता है, क्षत्रिय दो वर्णों का (अपना और वैश्य का), वैश्य—वैश्य का ही उपनयन कर सकता है। कई आचार्यों का मत है कि यदि शूद्र आयुर्वेद पाठि कुल में उत्पन्न हो, तथा शौच शील आदि गुणों से युक्त हो तो, मन्त्र (ओं मूः स्वाहा) को छोड़कर इसको उपनयन देकर आयुर्वेद पढ़ाना चाहिये। (चरक) में ब्राह्मण, राजन्य और वैश्य के लिये आयुर्वेद पढ़ने का विधान करके—फिर 'सामान्यतो वा धर्मार्थकामपरिग्रहार्थं सर्वैः'—यह कह दिया है ॥ ५ ॥
ततोऽग्निं त्रिःपरिणीयामिनसाक्षिकं जिष्यं वृयात्—कामक्रोधलोभमोहमानाहङ्कारैर्योपाख्यपैशुन्यानुनालस्या-
१ दार्वी होमविधि—मीमांसासादर्शन के आठवें अध्याय के चौथे पाद में देखिये। अथवा सामान्य होम की विधि से यज्ञ करना चाहिये।
यशस्यानि हित्वा नीचनखरोष्णा शूचिना कषायवाससा सत्यव्रतब्रह्मचर्याभिवादनतपरेणावश्यं भवितव्यं, मदनु-मतस्थानगमनशयनासनभोजनाध्ययनतपरेण भूत्वा मत्प्रियहितेषु वर्तितव्यम्; अतोऽन्यथा ते वर्तमानस्याधर्मो भवति, अफला च विद्या, न च प्राकार्यं प्राप्नोति ॥६॥ अहं वा त्वयि सम्यग्वर्तमाने यद्यन्यथादर्शी स्यामेनोभारभवेयमफलविद्यश्च ॥७॥
स्वाहाकार के पीछे अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा कराके शिष्य को—अग्नि की साक्षि रखकर आचार्य उपदेश दे—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान, अहंकार, ईर्ष्या, कठोरवाणी, खल्ला, भूत, आलस्य एवं निन्दित कर्मों को छोड़कर, नख और सिर के बाल कटाकर, पवित्रता के साथ, कषाय वस्त्र पहिनकर, सत्य, शास्त्रोक्त नियम, ब्रह्मचर्य, नामोच्चारण पूर्वक अभिवन्दन करते हुए, सदा बरतना चाहिए। मेरी आज्ञा से उठना, बैठना, जाना, सोना, खाना, पढ़ना चाहिये। मेरे प्रिय एवं हितकारी कार्यों में तुमको बरतना चाहिए। यदि इससे विपरीत करोगे तो तुमको अधर्म होगा, विद्या भी निष्फल जायेगी, विद्या कभी प्रकाशित नहीं होगी। और यदि तुम्हारे ठीक प्रकार से व्यवहार करने पर भी मैं इसमें विपरीत मिथ्याचरण करूँ तो मैं पाप का भागी बनूँ और मेरी विद्या व्यर्थ हो। (चरक में—“त्रिः पक्षस्य केशश्मश्रुलोमनखान् संहरेत्”—यह पाठ है—परन्तु शाल्यशास्त्र होने से इसमें इस नियम का अपवाद रखकर—'सदा नीचनखरोष्णा'—इसका पालन करना चाहिये) ॥ ६-७ ॥
द्विजगुरुदरिद्रमित्रप्रव्रजितोपनतसाध्वनाथाभ्युपगतानां चात्मबान्धवानामिव स्वभेषजैः प्रतिकर्तव्यम्, एवं साधु भवति; व्याधशाकुनिकपतितपापकारिणां च न प्रतिकर्तव्यम्; एवं विद्या प्रकाशते, मित्रयशोधर्मार्थकामांश्च प्राप्नोति ॥८॥
रोगी परिचर्या के लिये उपदेश—
ब्राह्मण, गुरु, दरिद्र, मित्र, संन्यासी, पास में नम्रतापूर्वक आये, सत्युत्पन्न, अनाथ, दूर से आये सज्जनों को चिकित्सा स्वजनों को भाँति अपनी औषधियों से करनी चाहिये। इस प्रकार करने से मंगल होता है। व्याध, चिड़ियार, नीच, पाप कर्म करनेवालों की चिकित्सा में अर्थ लाभ की इच्छा से भी प्रवृत्त नहीं होना चाहिये। इस प्रकार करने से विद्या प्रकाशित होती है, तथा मित्र, यश, धर्म अर्थ और काम की प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥
१ चरक विमान—अध्याय में इसको सुन्दर रूप से लिखा है, यथा—त्वया गोब्राह्मणमादै कृत्वा सर्वप्राणभूतां शर्माशयितव्यम्। सर्वात्मना चातुराणामारोग्याय प्रयतितव्यम्। जीवित-
अ० ३ ]
सूत्रस्थानम्
११
भवतश्चात्र—
कृष्णेऽष्टमी तन्निधनेऽहनी द्वे शुक्ले तथाऽप्येवमहर्द्विसन्ध्यम् अकालविद्युस्तनयित्वुपोषे स्वतन्त्रराष्ट्रक्षितिपञ्चथासु ॥ ६ ॥ शमशानयानाद्यतनाहेषु मनोत्सवौत्पातिकदर्शनेषु। नाध्येयमन्येषु च येषु विप्रा नाधीयते नाशुचिना च नित्यम् ॥ १० ॥
अनध्याय काल—
कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी और पञ्चदशी (अमावस) शुक्ल पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी और पञ्चदशी (पूर्णिमा) ये तीनों तिथियाँ, दोनों संध्याकाल-प्रातःसायम्, बिना समय के (हेमन्त—विशिर काल में) विद्युत, या बिजली की कड़क अथवा वृष्टि के होने पर (अथवा मल मास में) अपनी सम्बन्धियों की-राष्ट्र की, और राजा की पीड़ा में, शमशान में, सवारी में, मार्ग में, वन में, संग्राम में, महोत्सव (कौमुदी महोत्सवादि) में, अनिष्ट सूचक उत्पातों के दर्शन में, तथा ब्राह्मण जिन समयों में अध्ययन नहीं करते उन समयों में, (वीणा आदि के बजने के समय) अविविन्न अवस्था में अध्ययन नहीं करना चाहिये।
वि० मन्तव्य—स्वतन्त्रराष्ट्रक्षितिपञ्चथासु—अर्थात्—स्वाधीन राज्य के सम्प्राट् की व्यथा (रुग्णावस्था) में, अद्यतनाऽऽहेवेषु—अर्थात् आज भर के युद्धकाल में अनध्याय होना चाहिये, साधारण सामन्तों की रुग्णावस्था में और लम्बे युद्धकाल में नहीं। येषु विप्रा नाधीयते—अर्थात् प्रतिपदा तिथि ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने शिष्योपनयनीयो नाम
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः ।
अथातोऽध्ययनसंप्रदाानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
शिष्य के उपनयन के अनंतर शास्त्र के सम्यक् प्रकार से दान करने के लिये 'अध्ययन संप्रदाानीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं। जैसा भगवान्-धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १, २ ॥
हेतोरपि चातुरेभ्यो नाभिद्रोध्यव्यम् ।
अथ्यद् वा—भेवजं प्राप्तकालमप्यातुरस्य नैवं विधस्य कुर्यात् । तद्यथा—अनपवादप्रतीकारस्य धनस्यापरिचारकस्य वैद्यमानिनः चण्डासूयकस्य तीव्राधर्मरुचैरतिक्षीणबलमांसशोणितस्यासाध्यरोगोपहतस्य मुमुषुं लिगान्वितस्य चेति । एवविधं ह्यातुरमुपचरन् भिषक् पापीयसाऽयशसा योगमुच्छति ॥ चरक वि० अ० ३ ॥ और-चरक सिद्धि अ० २ में चण्डः साहसिको भीरुः कृतदन्तो व्यग्र एव च—इत्यादि देखिये ।
प्रागभिहितं 'सवित्रमध्यायशतं पञ्चसु स्थानेषु' (सू. अ. १) तत्र सूत्रस्थानमध्यायाः षट्चत्वारिंशत्, षोडश निदानानि, दश शारीराणि, चत्वारिंशच्चिकित्सितानि, अष्टौ कल्पाः, तदुत्तरं षट्षष्टिः ॥ ३ ॥
प्रथम जो कहा है कि एक सौ बीस अध्यायों च स्थानों में विभक्त हैं। यथा—सूत्रस्थान में ४६ अध्याय, निदानस्थान में १६, शारीरस्थान में १०, चिकित्सास्थान में ४०, कल्प में ८, उत्तर स्थान में ६६ अध्याय हैं। (एक सौ बीस अध्यायों में उत्तर स्थान के अध्यायों को गिनती नहीं है।) ॥ ३ ॥
वेदोत्पत्तिः शिष्यनयस्तथाऽध्ययनदानिकः ।
प्रभाषणाप्रहरणाद्युत्तुचर्याऽथ यान्निक्रः ॥ ४ ॥
शस्त्रावचारणं योग्या विशिखाक्षारकल्पनम् ।
अरिन्तकर्म जलौकाख्या हृध्याया रक्तवर्णनम् ॥ ५ ॥
दोषधातुमलाद्यानां विज्ञानाभ्याय एव च ।
कर्णव्यधासपक्वषावालेषो व्रणयुपासनम् ॥ ६ ॥
हिताहितां व्रणप्रश्नो व्रणास्त्रावच यः पृथक् ।
कृत्याकृत्यविधिः शिष्योऽधिः समुदेशीय एव च ॥ ७ ॥
विनिश्चयः शस्त्रविधौ प्रनष्टज्ञानिकस्तथा ।
शूल्योद्वृत्तिव्रणज्ञानं दूतस्वप्ननिर्दर्शनम् ॥ ८ ॥
पञ्चेन्द्रिय तथा छाया स्वभावाद्भेकृतं तथा ।
अवारणो युक्तसेनीय आतुरक्रमभूमिकौ ॥ ९ ॥
मिश्रकाख्यो द्रव्यगणः संशुद्धौ शमने च यः ।
द्रव्यादीनां च विज्ञानं विशेषो द्रव्यगोऽपरः ॥ १० ॥
रसज्ञानं वमनार्थमध्यायो रेचन्याय च ।
द्रवद्रव्यविधिस्तद्रवन्तपानविधिस्तथा ॥ ११ ॥
सूचनात् सूत्रणाच्छैव सवनाच्छार्थसन्ततेः ।
षट् चत्वारिंशदध्यायं सूत्रस्थानं प्रचक्षते ॥ १२ ॥
प्रत्येक स्थान के अध्यायों का नाम कहते हैं—
वेदोत्पत्ति, शिष्योपनयनीय, अध्ययनसंप्रदायनीय प्रभाषणीय, अप्रोपहरणीय, अद्युत्तुचर्या, यन्त्रविधि, शस्त्रावचरणीय, योग्यासूत्रीय, विशिखानुप्रवेशनीय, क्षारपाकविधि, अग्निर्मंविधि, जलौकावचरणीय, शोणितवर्णनीय, दोषधातुमलक्ष्यवृद्धि विज्ञानीय, कर्णव्यधबन्धनविधि, आमपक्वेषणीय, व्रणा-लेपनविधि, व्रणतोपासननीय, हिताहितीयाध्याय, व्रणप्रश्न, व्रण-स्त्राव विज्ञानीय, कृत्याकृत्यविधि, व्याधिसमुदेशीय, अष्टविध-शस्त्रकर्मध्याय, प्रनष्टशल्यविज्ञानीय, शल्योपनयनीय, विपरीता-विपरीतव्रण विज्ञानीय, विपरीताविपरीत दूत स्वप्न विज्ञानीय, पञ्चेन्द्रियार्थविप्रतिपत्ति, छायाविप्रतिपत्ति, स्वभावविप्रतिपत्ति, अवारणीय, युक्तसेनीय, आतुरोपक्रमणीय, भूमिप्रविभागीय, मिश्रक, द्रव्यसंशोधन संशमनीय, द्रव्यरसगुणवीर्यविपाकविज्ञानीय, द्रव्यविशेष विज्ञानीय, वमन द्रव्य विकल्प विज्ञानीय, विरेचन द्रव्य विकल्प विज्ञानीय, द्रवद्रव्यविधि, अन्तपान
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३ ]
१२
विधि ये छि्यालीस अध्याय हैं। अर्थों को सूचित करने से (एक देश के कहने से अनुक्त अर्थ को ग्रहण करने से) अर्थों को यथास्थान रखने से, अर्थों के जानने से (अनुसन्धान से) इन छि्यालिस अध्यायों को सूत्रस्थान कहते हैं ॥ ४-१२ ॥
वातव्याधिकमर्गसि साश्मरिश्च भगन्दरः।
कुष्ठमेहोदरं मूढो विद्वधिः परिसर्पणम् ॥ १३ ॥
प्रन्थिबुद्धिबुद्धशुक्रमनाश्च मुखरोगिकम्।
हेतुलक्षणनिर्देशान्निदानानौति षोडश ॥ १४ ॥
निदानस्थान के अध्याय—
वातव्याधि, अर्श, अश्मरि, भगन्दर, कुष्ठ, प्रमेह, मूढगर्भ, विद्वधि, उदर, परिसर्प (विसर्प), प्रन्थि (प्रन्थि, अपची, अबुंद, गलगण्ड), बुद्धि (उपदंश, बुद्धि, श्लीपद), बुद्धरोग, शुक्ररोग, भग्नरोग और मुखरोग ये सोलह निदानस्थान में अध्याय हैं। रोगोत्पत्ति का कारण (हेतु) और लक्षण (रोग को बतानेवाले चिह्न) का निर्देश करने से इसको निदानस्थान कहते हैं ॥
भूतचिन्ता रजःशुद्धिगर्भावक्रान्तिरेव च।
व्याकरणं च गर्भस्य शरीरस्य च यत् स्मृतम् ॥ १५ ॥
प्रत्येकं मर्मनिर्देशः शिरावर्णनमेव च।
सिराव्यधो धमनीनां गर्भिण्या व्याकृतिस्तथा ॥ १६ ॥
निर्दिष्टानि दशैतानि शासीराणि महर्षिणा।
विज्ञानार्थं शरीरस्य भिषजं योगिनामपि ॥ १७ ॥
शारीरस्थान के अध्याय—
भूतचिन्ता (पञ्चभूत सम्बन्धी), रजःशुद्धि (शुक्रशोणित की शुद्धि), गर्भावक्रान्ति, गर्भव्याकरण शारीर, शरीरव्याकरण (शरीर का विवरण), प्रत्येक मर्म निर्देश, शिरावर्णनशारीर, सिराव्यध विधि, धमनी व्याकृति, गर्भिणी व्याकृति—ये दश अध्याय पूज्य धन्वन्तरि ने वैद्यों तथा रोगियों के लिये शरीर का विशेष रूप में ज्ञान कराने के लिये कहे हैं। (चरक में भी सुमुख के लिये निर्देश शारीर ज्ञान से सत्या बुद्धि उत्पन्न होकर मोक्ष में प्रवृत्त कराती है) ॥ १५-१७ ॥
द्विवर्णयो ज्रणः सद्यो भग्नानां वातरोगिकम्।
महावातिकमर्गसि साश्मरिश्च भगन्दरः ॥ १८ ॥
कुष्ठानां महतां चापि मैहिकं पैडिकं तथा।
मधुमेहचिकित्सा च तथा चोदरिणामपि ॥ १९ ॥
मूढगर्भचिकित्सा च विद्वधोनां विसर्पिणाम्।
प्रन्थिबुद्धयुपदंशानां तथा च क्षुद्ररोगिणाम् ॥ २० ॥
शुक्रदोषचिकित्सा च तथा च मुखरोगिणाम्।
शोफस्थानगतानां च निषेधो मिश्रकं तथा ॥ २१ ॥
१ इसी में कहा है
शरीरं सर्वथा सर्वं सर्वदा वेद यो भिषक्।
आयुर्वेदं सात्कृत्यैव वेद लोकमुखप्रदम् ॥
देखिये चरक शारीर ५-६
वाजीकरं च यत् क्षीणे सर्वाबाधशमोऽपि च।
मेधायुष्करणं चापि स्वभावव्याधिवारणम् ॥ २२ ॥
निवृत्तसंतापकरं कीर्तितं च रसायनम्।
स्नेहोपयोगिकः स्वेदो वमने सविरेचने ॥ २३ ॥
तयोर्न्यापन्चिकित्सा च नेत्रवस्तिविभागिकः।
नेत्रवस्तिविपत्सिद्धिस्तथा चोत्तरवस्तिकः ॥ २४ ॥
निरूहक्रमसंज्ञश्च तथैवातुरसंज्ञकः।
धमनस्य विधिश्चान्त्यश्चत्वारिंशदिति स्मृताः ॥ २५ ॥
प्रायश्चित्तं प्रशमनं चिकित्सा शान्तिकर्म च।
पर्यायस्तस्य निर्देशाच्चिकित्सास्थानमुच्यते ॥ २६ ॥
चिकित्सास्थान के अध्याय—
द्विवर्णीय, सद्योज्रण, भग्नरोग, वातव्याधि, महावातव्याधि, अर्शचिकित्सा, अश्मरि, भगन्दर रोग, कुष्ठ, महाकुष्ठरोग, प्रमेह, प्रमेह पिडिका, मधुमेह, उदररोग, मूढगर्भ, विद्वधि, विसर्प (नाड़ीस्तन रोग), प्रन्थि (प्रन्थि, अपची, अबुंद, गलगण्ड), बुद्धि (बुद्धि, उपदंश, श्लीपद), बुद्धरोग, शुक्ररोग, मुखरोग, शोफ-रोग, अनागत बाध प्रतिषेध (चिकित्सा,) मिश्रक, क्षीणबलीय वाजीकरण चिकित्सा, सर्वाबाधशम (रसायनसर्वाबाधशमनीय), मेधायुष्कामीय रसायन, स्वभाव व्याधि प्रतिषेधीय रसायन, निवृत्त संतापीय, स्नेहोपयोगीय, स्वेदावचरणीय, वमन विरेचन साध्योपद्रव, वमन विरेचन व्यापन्चिकित्सा, नेत्र वस्ति प्रमाण प्रविभाग, नेत्र वस्ति व्यापत्, उत्तर वस्ति, निरूहोपक्रम चिकित्सा, आतुरोपद्रव, धूमनस्यविधि (धूम, नस्य, कवल ग्रह) यह अन्तिम अध्याय है—इस प्रकार से ४० अध्याय इस स्थान में हैं। चिकित्सा के पर्याय—प्रायश्चित्त, प्रशमन, चिकित्सा, शान्तिकर्म, ये चिकित्सा के पर्याय हैं। चिकित्सा का विवरण होने से इसे चिकित्सास्थान कहते हैं। चरक में—व्याधिहर, पथ्य, साधन, प्रकृतिस्थापन और औषध ये अन्य भी पर्याय हैं।
वि० मन्तव्य—प्रायश्चित्त=रोगनिवृत्ति के लिए अनेक विध व्रत उपवास आदि कर्म, प्रशमन—शारीरिक एवं मानसिक दोषों की शान्ति के उपाय, चिकित्सारोगप्रतिकार, शान्तिकर्म—रोगजनक स्यादि ग्रहों तथा देवादि एवं बालग्रहों की शान्ति के कर्म, व्याधिहर—रोग नाशन के उपाय, पथ्य या जीवनयात्रा के लिये उपयोगी भाचार (आहार-विहार), साधन सिद्धि—सफलता के उपाय=जरा आलस्य आदि के नाशक उपाय, औषध=आत्ममस्त शरीर में औष=उचित ताप या दीप्ति का आधान करने-रखने का उपाय, प्रकृतिस्थापन-प्रकृति=स्वास्थ्य में स्थापित रखने का उपाय तथा हित=धारण एवं पोषण का उपाय। अतएव चिकित्सास्थान में केवल रोगप्रतिकार के ही उपाय नहीं लिखे गये हैं, अपितु स्वास्थ्य के लिये भी रसायन एवं वाजीकरण का वर्णन करने के लिये अनेक अध्याय
अ० ३ ]
सूत्रस्थानम्
१३
लिखे गये हैं। पाठक ध्यान देने की कृपा करें— विशेषतः वे, जो कहा करते हैं कि रसायन एवं वाजीकरण के लिये पृथक् स्थान का सन्निवेश क्यों नहीं किया गया है ॥२६॥
अन्नस्य रक्षा विज्ञानं स्थावरस्येतस्य च ।
सर्पदृष्टविषज्ञानं तस्यैव च चिकित्सितम् ॥२७॥
दुन्दुभेर्मुषिकाणां च कीटानां कल्प एव च ।
अष्टौ कल्पाः समाख्याता विषभेषजकल्पनात् ॥२८॥
अध्यायानां शतं विशमेवमेतदुदीरितम् ।
कल्पस्थान के अध्याय
अन्नपानरक्षा विज्ञानीय, स्थावर विष विज्ञानीय, जंगमविष विज्ञानीय, सर्पदृष्ट चिकित्सा, दुन्दुभि स्वनीय, मूषिककल्प, कीट कल्प—ये आठ अध्याय इस कल्प स्थान में हैं। विषोषध के जानने से इसको कल्प कहते हैं। (कई लोग—दुन्दुभिस्वनीय को मूषिक कल्प के पीछे पढ़ते हैं।) इस प्रकार से पूर्व कहे हुए १२० अध्याय पूर्ण हो जाते हैं।
वि० मन्तव्य—कल्पस्थान अगदतन्त्र का नामान्तर है, जिसको विषविज्ञान भी कह सकते हैं। इस तन्त्र में औषध का ही नाम “अगद” है जिसका अर्थ है—जिसके सेवन से गद = रोग = विषविकार उत्पन्न ही न हो अथच नष्ट—दूर भी हो जाय ॥२७, २८॥
अतः परं स्वनाभनैव तन्त्रमुत्तरमुच्यते ॥२९॥
अधिकृत्य कृतं यस्मात्तन्त्रमेतदुपद्रवान् ।
औपद्रविक इत्येष तस्याप्रयत्वान्तिरुच्यते ॥३०॥
सन्धौ वर्त्मनि शुक्ले च कृष्णे सर्वत्र दृष्टिषु ।
संविज्ञानार्थमध्याया गदानां तु प्रति प्रति ॥३१॥
चिकित्साप्रविभागो यो वाताभिष्यन्दवारणः ।
पैतस्य श्लैभिकस्यापि रौधिरस्य तथैव च ॥३२॥
लेख्यभेवानिषेधौ च छेदानां वर्त्मदृष्टिषु ।
क्रियाकल्पोऽभिघातश्च कर्णात्थास्तच्चिकित्सितम् ॥३३॥
घ्राणोत्थानां च विज्ञानं तद्गदप्रतिषेधनम् ।
प्रतिशयायनिषेधश्च शिरोगदविचेचनम् ॥३४॥
चिकित्सा तद्गदानां च शालाक्यं तन्त्रमुच्यते ।
नवग्रहाकृतिज्ञानं स्कन्दस्य च निषेधनम् ॥३५॥
अपस्मारशकुन्योश्च रेवत्याश्च पुनः पृथक् ।
पूतनायास्तथाऽन्धायाः शीतपूतनमण्डिका ॥३६॥
नैगमेषचिकित्सा च ग्रहोत्पत्तिः सयोनिजा ।
कुमारतन्त्रमित्येतच्छाखोरैषु च कीर्तितम् ॥३७॥
शल्य तन्त्र का प्रतिपादन करके अर्थवशात् उत्तर तन्त्र को कहते हैं।
इसके आगे अपने (उत्तर) नाम से ही उत्तर तन्त्र कहते हैं। व्रण के उपद्रव ज्वर आदि को बताने के लिये इस तन्त्र को कहते हैं। इस उत्तर तन्त्र के प्रथम अध्याय में कहे हुए उपद्रवों का तथा दुःसाध्य एवं अपरिसंख्येय आँख आदि के
रोगों का वर्णन होने से इसके प्रथम अध्याय को ‘औपद्रविक’ कहते हैं ॥
सन्धि, वर्त्म, शुक्ल, कृष्ण, सर्वगत, और दृष्टिगत रोगों को बताने के लिये प्रत्येक के लिये पृथक् पृथक् अध्याय कहे हैं। इस प्रकार से छः अध्याय हैं। सातवां चिकित्सा प्रविभागीय, वाताभिष्यन्द, पिताभिष्यन्द, कृफाभिष्यन्द, रक्ताभिष्यन्द, लेख्यरोगप्रतिषेध, भेद्यरोग प्रतिषेध, छेद्यरोग प्रतिषेध, यद्मकोप प्रतिषेध, दृष्टिगत रोग प्रतिषेध, क्रियाकल्पोपक्रम, नयनाभिघात प्रतिषेध, कर्णगतरोग विज्ञानीय, कर्णगतरोग प्रतिषेध, नाखिकागत रोग प्रतिषेध, प्रतिशयाय प्रतिषेध, शिरोरोग विज्ञानीय, शिरोरोग प्रतिषेध, इनका शालाक्य तन्त्र में समावेश होता है।
कुमार तंत्र—नवग्रहाकृति विज्ञानीय, स्कन्दग्रह प्रतिषेध, स्कन्दापस्मारप्रतिषेध, शकुनि प्रतिषेध, रेवती प्रतिषेध, पूतना प्रतिषेध, अन्ध पूतना प्रतिषेध, शीत पूतना प्रतिषेध, सुख मण्डिका प्रतिषेध, नैगमेष प्रतिषेध, ग्रहोत्पत्ति, योनिच्चापत्तिषेध—इसका तथा शरीर स्थान में कहे (रजःशुद्धि और गर्भावकान्ति) को कुमारतंत्र कहते हैं।
वि०—मन्तव्य—उक्त १२० अध्यायों में जो अनेक स्थलों पर बार-बार कहा गया है कि ‘अन्य अर्थों (विषयों) को उत्तर तन्त्र में कहा जायगा’। उनका वर्णन किया गया है। और उसमें उपद्रव अर्थात् दोष विकृति—दोष वैषम्य से उत्पन्न तथा भूतावेश से उत्पन्न उपद्रवों—वाधाओं—रोगों का वर्णन किया गया है। कुमार तन्त्र कौमार भृत्य का नामान्तर है। शारीर स्थान के गर्भिणी व्याकरण नामक (१० वें) अध्याय में कौमार भृत्य का बहुत सा विषय लिखा गया है ॥२६—३७॥
ज्वरातिसारशोषाणां गुल्महृद्वोगिणामपि ।
पाण्डूनां रक्तपित्तस्य मूच्छीयाः पानजाश्च ये ॥३८॥
तृष्णायाश्छर्द्विहिकानां निषेधः श्वासकासयोः ।
स्वरभेदचिकित्सा च क्रुन्मुदावर्तिनोः पृथक् ॥३९॥
विस्मृचिकारोचक्योर्मूत्राघातविकृच्छ्रयोः ।
इति कायचिकित्सायाः शेषमत्र प्रकीर्तितम् ॥४०॥
कायचिकित्सा के अध्याय—
ज्वर, अतिसार, शोष, गुल्म, हृदयरोग, पाण्डु, रक्तपित्त, मूच्छी, पानाल्यप्रतिषेध, तृष्णा, छर्द्विहिका, श्वास, कास, स्वरभेद, क्रुमि, उदावर्त्त, विस्मृचिका, अरोचक, मूत्राघात, मूत्रकृच्छ्र, ये इसीसे कायचिकित्सा के शेष रोग इस उत्तरतंत्र में कह दिये हैं ॥३८-४०॥
अमानुषनिषेधश्च तथाऽऽपस्मारिकोऽपरः ।
उन्मादप्रतिषेधश्च भूतविद्या निरुच्यते ॥४१॥
भूतविद्या—अमानुषीय रोग प्रतिषेध, अपस्मार, उन्माद रोग प्रतिषेध, इन तीन अध्यायों को अपस्मार, कहते हैं ॥४१॥
१४
मुश्रुतसंहिता
[ अ० ३ ]
रसभेदाः स्वस्थवृत्तं युक्त्यस्तान्निकाश्या याः । दोषभेदा इति ज्ञेया अध्यायास्तन्त्रभूषणाः ॥४२॥ तन्त्रभूषण अध्यायों को कहते हैं—
रस भेद कल्प, स्वस्थवृत्त, तन्त्रयुक्तियाँ, दोषभेदकल्प—ये चार अध्याय शास्त्र के अलंकार हैं। इन से शास्त्र की प्रतिष्ठा है। (तंत्रयुक्तियाँ चरक कोटिल्य आदि सब में एक समान ही प्रायः दी हैं) ॥४२॥
श्रेष्ठत्वादुत्तरं ह्येतत्तन्त्रमाहूर्महर्षयः ।
बह्वर्थसंग्रहान्छेष्टमुत्तरं वाऽपि पश्चिमम् ॥४३॥
शालाक्यतन्त्रं कौमारं चिकित्सा कायिकी च या ।
भूतविद्येति चत्वारि तन्त्रे तूत्तरसंज्ञिते ॥४४॥
वाजोकरं चिकित्सासु रसायनविधित्थथा ।
विषतन्त्रं पुनः कल्पाः शल्यज्ञानं समन्ततः ॥४५॥
इत्यष्टाङ्गमिदं तन्त्रमादिदेवप्रकाशितम् ।
विधिनाऽधीत्य युञ्जाना भवन्ति प्राणदा मुनि ॥४६॥
उत्तरतंत्र के नाम का कारण—
महर्षि लोग इस तंत्र को श्रेष्ठ होने से उत्तरतंत्र कहते हैं।
इसमें शालाक्य, कुमार, कायचिकित्सा, भूतविद्या आदि बहुत से अर्थों का संग्रह होने से यह श्रेष्ठतंत्र है, पश्चिम (अन्तिम) होने से भी इस तंत्र को उत्तरतंत्र कहते हैं।
उत्तर तंत्र में कहे शालाक्य, कौमार, कायचिकित्सा, भूतविद्या, ये चार चिकित्सायें, वाजीकरण चिकित्सा, रसायन विधि, कल्पस्थानोक्त विष तंत्र; ये तीन प्रथम कहे शल्य तंत्र में सब तंत्रों में शल्य ज्ञान, यह आठ अंगोंवाला तंत्र धन्वन्तरि द्वारा प्रकाशित हुआ है। इस आठों अंगोंवाले तंत्र को विधि पूर्वक पढ़कर प्रयोग करता हुआ मनुष्य पृथिवी पर 'प्राणा-भिसर' प्राणों को देनेवाला कहलाता है। चरक में- कहा है—
(प्राणानामेकेऽभिसरा हन्तारो रोगाणाम् ।
रोगाणामेकेऽभिसरा हन्तारः प्राणानाम् ।) ॥४३-४६॥
एतद्द्रव्यवश्यमध्ययम्, अधीत्य च कर्माध्यवश्यमुपा- सितन्यम्, उभयज्ञो हि भिषग् राजाहो भवति ॥४७॥
यह तंत्र अवश्य ही पढ़ना चाहिये; और पढ़कर कर्म में अवश्य इसका अभ्यास करना चाहिये। दोनों कार्यों को जानने-वाला वैद्य राजा से पूजित होता है ॥४७॥
भवन्ति चात्र—
यस्तु केवलशास्त्रज्ञः कर्मस्वपरिनिष्ठितः ।
स मुह्यत्यातुरं प्राप्य प्राप्य भीरुरिवाहवम् ॥४८॥
यस्तु कर्मसु निष्णातो धाष्ट्यच्छास्त्रबहिष्कृतः ।
स सत्सु पूजां नाप्नोति वर्ध चच्छृति राजतः ॥४९॥
उभावैतावनिपुणवसमर्थो स्वकर्मणि ।
अर्धवेदधरावेतावेकपक्षविष द्विजौ ॥५०॥
'वर्ध चच्छृति राजतः' के स्थान में 'वर्ध चाहृति राजतः' पाठ अधिक उपयुक्त एवं संगत है।
कहा भी है—(यह शास्त्र की रीति है) गद्य के पीछे श्लोक से आरम्भ होता है जो मनुष्य-वैद्य केवल शास्त्र को ही जानता है, और कर्मों के विषय में अशिक्षित है; वह वैद्य रोगी को देखकर उसी प्रकार से घबरा जाता है, जिस प्रकार कि डरनोक आदमी संग्राम में पहुँचकर डर जाता है। और जो वैद्य कर्मों के विषय में भली प्रकार शिक्षित है और शास्त्र से बाहर है, धृष्टता के कारण जिसने शास्त्र का अध्ययन नहीं किया, वह वैद्य सज्जनों में पूजित नहीं होता, अपितु राजाद्वारा वर्ध किये जाने योग्य है। ये दोनों प्रकार के व्यक्ति अशिक्षित, अपने कार्य करने में असमर्थ, आधे ज्ञान को धारण करनेवाले-एक पाँखवाले पक्षी के समान हैं। जिस प्रकार कि एक पंख का पक्षी उड़ नहीं सकता, उसी प्रकार ये भी काम नहीं कर सकते ॥४८-५०॥
ओषधयोऽमृतकल्पास्तु शस्त्राग्निविषोपमा ।
भवन्त्यज्ञैरपहृतास्तस्मादेतान् विवर्जयेत् ॥५१॥
प्र०—किस कारणसे राजा द्वारा वर्ध किया जाने योग्य है ?
उत्तर—अमृत के समान प्रभाव करनेवाली औषधियाँ मूढ़ मनुष्यों द्वारा प्रयुक्त की जाने पर शस्त्र, विजली और विष के समान प्रभाव करती हैं। इसलिये इन ऊगर कहे मूढ़ वैद्यों का त्याग करना चाहिये ॥५१॥
स्नेहादिष्वनभिज्ञो यश्छेद्यादिषु च कर्मसु ।
स निहन्ति जनं लोभात् कुर्वैद्यो नृपदोषतः ॥५२॥
और जो वैद्य स्नेहादि कार्यों में तथा छेद्य आदि कर्मों में (शल्यतंत्र तथा कायचिकित्सा में—आठों में यही मुख्य है) अनभिज्ञ हैं, वे कुसित वैद्य राजा के प्रमाद के कारण लोभ वश से मनुष्य को मार देते हैं। (इसी से आगे कहेंगे कि राजा की आज्ञा से चिकित्सा कर्म करना चाहिये) ॥५२॥
यस्तुभयज्ञो मतिमान् स समर्थोऽथसाधने ।
आहवे कर्म निर्बोद्धुं द्विचक्रः स्यन्दनो यथा ॥५३॥
जो वैद्य शास्त्र एवं कर्म दोनों को जानता है तथा ऊहा-पोह जानवाला है, वह आरोग्य करने में समर्थ है, जिस प्रकार कि संग्राम में दोनों पहियोंवाला रथ कार्य करने में समर्थ रहता है ॥५३॥
अथ वत्स ! तदैतदध्ययेयं यथा तथोपधारय मया प्रोच्यमानम्—अथ शुचये कृतोत्तरासङ्गायाऽव्याकुलायोपस्थितायाध्ययनकाले शिष्याय यथाशक्ति गुरुरुपदिशेत् ।
१ चरक में—श्रुतदृष्टक्रियाकालमात्राज्ञानबहिष्कृताः । वर्जनीया हि ते मृत्योरुत्तरसूचरा भुवि ॥ (२) योगादपि विषं तीक्ष्ण-मृत्युर्भेषजं भवेत् । भेषजं चापि दुर्मुक्तं तीक्ष्णं संपद्यते विषम् ॥
चरक-सूत्र-अ० १
अ० ४ ]
सूत्रस्थानम्
१५
पदं पादं श्लोकं वा, ते च पदपादश्लोका भूयः क्रमेणानुसन्धेयाः, एवमेकैकशो घटयेदात्मना चानुपठेतु, अद्वृत्तमविलम्बितमविशङ्कितमननुनासिकं सुव्यक्ताक्षरमपीडितवर्णमक्षिध्रवौष्ठहस्तेरनभिनीतं सुसंस्कृतं नाण्युच्चैनीतिनीचैश्च स्वरेः पठेतु । न चान्तरेण कश्चिद् ब्रजेत तयोरधीयानयोः ॥१४॥
हे वत्स ! यह आयुर्वेद जिस प्रकार पढ़ना चाहिये वह सुझाये कहा हुआ सुनो । नैतिक कार्य करके पवित्र होने पर उत्तरीय वस्त्र धारण करके एकाग्रचित्त से अभिवादन करके अध्ययन काल के उपस्थित होने पर शिष्य के लिये गुरु यथाशक्ति ( शिष्य की उत्तम, मध्यम अवय बुद्धि से ) पद, (सुप्तिष्ठन्त) पाद ( श्लोक का एक चरण ) अथवा श्लोक का (चारों चरण) पढ़ाये और ये पद, पाद श्लोक फिर बार-बार क्रम से घटित करे शिष्य को समझाये ।
पाठ करने की विधि—नतो बहुत जल्दी, न बहुत रुक रुक कर, बिना भय के, बिना नासिका स्वर के, साफ अक्षर (उच्चारणों) से, वर्ण को बिना खाये (दवाये), आँख, भू, ओठ, हाथों को बिना चलाये-नचाये, साफ मधुर आवाज से, न बहुत ऊँचे न बहुत नीचे-मध्यम स्वर से पाठ करे । पढ़ते हुए गुरु शिष्य के बीच में कोई न आये ॥१५॥
(चरक में—यह विधि विस्तार से दी है१))
भवतश्चात्र —
शुचिर्गुरुपरो दक्षस्तन्द्रानिद्राविवर्जितः ।
पठन्नेतेन विधिना शिष्यः शास्त्रान्तमाप्नुयात् ॥१५॥
कहा भी है—
बाह्य और अन्दर की पवित्रता से, गुरु के कार्य में तत्पर चतुर, आलस्य रहित होकर इस विधि से जो शिष्य पढ़ता है, वह इस शास्त्र की समाप्ति तक पहुँचता है ॥१५॥
वाकसौष्ठवेऽर्थविज्ञाने प्रागहस्ये कसन्तिपुणे । तदभ्यासे च सिद्धौ च यतेयाध्ययनान्तगः ॥१६॥
अतिसुष्ठ वाणी के, अर्थज्ञान के, धृष्टता, उत्साह, कर्मनिपुणता, कर्म के अभ्यास में, तथा वाञ्छित अर्थ की सिद्धि में यत्न करता रहे ।
वि० मन्तव्य—पढ़ने के अन्त में प्रतिदिन वाणी की
१ यथा—अध्ययनविधिः—कल्पः कृतचणः प्रातस्छयायोपन्युपं वा कृत्वाऽऽवश्यकमुपास्य उपस्पृश्यादकं देवपिणोद्वाहणगुरुवृद्धिसिद्धाचार्यम्यो तमस्कृत्य समे शुचौ देशे सुखोपविष्टः मनःपुरःसराभिवर्गभिः सूत्रमनुक्रामन् पुनः पुनरावर्त्येदं बुद्ध्या सम्यग् अनुप्रविश्यार्थतत्त्वं स्वदोषपरिहारार्थं परदोषप्रमाणार्थं च । एवं मध्यदिनेऽपराह्ने रात्रौ च शस्वदं अपरिहापयन्मध्ययनमभ्यस्येतु ।
चरक वि० अ० ८ ।
सुष्ठुता = वाक्योच्चारण की सुन्दरता में, अर्थों को विशेषरूप से जानने में, प्रतिभा (नवीन र सूक्ष्म) की प्राप्ति में, चिकित्सा विषयक कार्य कौशल में, शास्त्राभ्यास में या उक्त कार्यों के अभ्यास ( बार र करने ) में तथा सिद्धि ( सफलता ) के पूर्ण करने में प्रयत्न करे—करता रहे ॥१५॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽध्ययनसंप्रदानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
चतुर्थोऽध्यायः
अथातः प्रभाषणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
पढ़े हुए शास्त्र को फिर अर्थ रूप में व्याख्यान करने का नाम 'प्रभाषण' है । उसी प्रभाषणीय अध्याय को कहते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिए कहा था ॥१,२॥
अधिगतमप्यध्ययनमप्रभाषितमर्थतः खरस्य चन्दनभार इव केवलं परिश्रमकरं भवति ॥३॥
पढ़ा हुआ शास्त्र यदि अर्थ पूर्वक जाना न जाये, तो वह गधे के चन्दन के बोझ के समान केवल निरर्थक (परिश्रम-कारक) होता है ॥३॥
भवति चात्र —
यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य चेत्ता न तु चन्दनस्य । एवं हि शास्त्राणि बहुन्यधीत्य चार्थेषु मृदाः खरवद्रहन्ति ॥
कहा भी है—
जिस प्रकार गधा केवल चन्दन बोझ को उठानेवाला होता है, वह चन्दन की सुगन्ध को नहीं जानता, इसी प्रकार जो शिष्य बहुत से शास्त्रों को केवल पढ़ लेते हैं, अर्थ को नहीं समझते, वे केवल बोझ को उठानेवाले होते हैं ॥४॥
तस्मात् सविज्ञमध्यायगतमनुपदपादश्लोकमनुवर्णयितव्यमनुश्रोतव्यं च, कस्मात् ? सूक्ष्मा हि द्रव्यरसगुणवीर्यविपाकदोषधातुमलाशयमर्मसिरास्नायुसन्ध्यस्थिगर्भसंभवद्रव्यसमूहविभागास्तथा प्रतृष्टश्लयोद्घरणत्रणविनिश्चयभग्नविकल्पाः साध्ययाप्यप्रत्याख्येयता च विकाराणासेवमादयश्चान्ये विशेषाः सहस्रशो ये विचिन्त्यमाना विमलविपुलबुद्धेरपि बुद्धिमाकुलीकुतुः किं पुनरल्पबुद्धेः ? तस्मादवश्यमनुपदपादश्लोकमनुवर्णयितव्यमनुश्रोतव्यं च ॥५॥
इसीलिए उत्तरतन्त्र के साथ एक सौ बीस अध्याय पद, पाद-पाद, श्लोक-श्लोक करके आचार्य को व्याख्यान करना चाहिये शिष्य को सुनना चाहिये । क्योंकि—द्रव्य (स्थावरादि), रस (मधुरादि), गुण (गुर्वादि), वीर्य (शीत-उष्ण), विपाक (मधुरादि), दोष (वातादि), धातु (रसादि), मल (स्वेदादि), आशय (कोष्ठादि), गर्भ, शिरा, स्नायु, सन्धि,
१६
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ५ ]
अस्थि, गर्भोत्पत्ति के कारण द्रव्य ( शुक्र-शोणित ) समूहों का विभाग, इसी प्रकार-त्वचादि में छिपे शल्य का निकालना, वातादि के भेद से व्रण का निश्चय, भ्रम के भेद ( अनेक प्रकार के), रोगों का साध्य, याप्य, और असाम्य भेद आदि की दृष्टि से हजारों प्रकार के भेद बन जाते हैं। इन भेदों का चिन्तन ज्ञान बहुत विशाल बुद्धिवाले मनुष्य की बुद्धि को भी विचलित कर देता है, फिर अल्प बुद्धिवाले मनुष्य का क्या कहना ? इसलिये आचार्य को अवश्य ही एक-एक पद, पाद और श्लोक की व्याख्या भली प्रकार करनी चाहिये, और शिष्य को सुननी चाहिये ॥५॥
अन्यशास्त्रोपपन्नानां चार्थानामिहोपनीतानामर्थवशा तेषां तद्विधेभ्य एव व्याख्यानमनुश्रोतव्यं, कस्मात् ? न ह्येकस्मिन् शास्त्रे शक्यः सर्वशास्त्राणामवरोधः कर्तुम् ॥
प्रयोजन वश जो व्याकरण, सांख्य, न्याय, वैशेषिक, ज्योतिष शास्त्र आदि यहाँ इस शास्त्र में आये हैं—उन शास्त्रों को उन शास्त्रों के ज्ञाताओं से समझना और सुनना चाहिये। क्योंकि—एक ही शास्त्र में सब शास्त्रों का समावेश करना असम्भव है ॥६॥
भवति चात्र—
एकं शास्त्रमधीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम् ।
तस्माद्विदुह्रतः शास्त्रं विज्ञानीयाच्चिकित्सकः ॥७॥
कहा भी है—एक ही शास्त्र को पढ़नेवाला व्यक्ति शास्त्र के निश्चय को नहीं जान सकता। इसलिये जिसने बहुत से शास्त्र पढ़े हों वही चिकित्सक शास्त्र को समझ सकता है ॥७॥
शास्त्रं गुरुमुखोद्गीर्णसादायोपास्य चासक्तु ।
यः कर्म कुरुते वैद्यः स वैद्योऽन्ये तु तस्कराः ॥८॥
गुरु के मुख से उपदेश किये शास्त्र को ग्रहण करके, पाठ एवं अर्थ द्वारा बार-बार अभ्यास करके जो वैद्य कर्म करता है वह वैद्य है, शेष सब चोर हैं१ ॥८॥
औपधेनवमौरश्च सौश्रुतं पौष्कलावतम् ।
शेषाणां शल्यतन्त्राणां मूलान्येतानि निर्दिशेत् ॥९॥
गूढ़ार्थ को समझने के लिये जिन तन्त्रों को समझना चाहिये उनको व्याज से कहते हैं। औपधेनव, औरश्च, सुश्रुत, पौष्कल, करवीर्य, गोपुररक्षित आदि शेष शल्य तन्त्रों में यही तन्त्र प्रधान है ॥९॥
इति सुश्रुतसंहितायां स्वस्थाने प्रभाषणीयो नाम
चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
१ ये तु शास्त्रविदो दक्षाः शुचयः कर्मकोविदाः ।
जितहस्ता जितात्मानस्तेभ्यो नित्यं कृतं नमः ॥ चरक ।
पञ्चमोऽध्यायः
अथातोऽग्नोपहरणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे यन्त्रादि के सम्भार को बताने के लिये 'अग्नी-पहरणीय' नामक अध्याय कहते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिए कहा था ॥१,२॥
त्रिविधं कर्म—पूर्वकर्म, प्रधानकर्म, पश्चात्कर्मतिः तद्व्याधिं प्रति उपदेक्ष्यामः ॥३॥
कर्म तीन प्रकार का है—पूर्व कर्म (शस्त्रावचरण से पूर्व), प्रधान कर्म (शस्त्र कर्म) और पश्चात्कर्म (शस्त्रावचरण के पीछे का कर्म), इन कर्मों का उपदेश प्रत्येक व्याधि में करेंगे, यहाँ पर विस्तारमय से नहीं कहा१ ।
वि० मन्तव्य—कर्म-छेदन आदि शस्त्रकर्म तथा वमन-विरेचन आदि काय-चिकित्सा का नाम है। प्रधान कर्म के पूर्व जो उपचार किये जाते हैं ये 'पूर्वकर्म' तथा पश्चात् (पीछे) जो उपचार किये जाते हैं वे 'पश्चात्कर्म' कहे जाते हैं।
सम्भार (सामग्री) अर्थात् चिकित्सा कर्म में उपयोगी या आवश्यक सहायक वस्तुएँ। परिकर्मी—चिकित्सक के सहायक, इधर उधर का सब काम करनेवाले, कर्मचारी ॥३॥
अस्मिन्तु शास्त्रे शस्त्रकर्मंप्राधान्याच्छस्त्रकर्मैव तावत् पूर्वमुपदेक्ष्यामस्तत्सम्भाराश्च ॥४॥
इस शास्त्र में शस्त्र कर्म की प्रधानता है। इसलिये सबसे प्रथम शस्त्र कर्म को तथा इसके द्रव्य सम्भारों कहते हैं ॥४॥
तच्च शस्त्रकर्मोष्ट्रविधः, तद्यथा—छेद्यं, भेद्यं, लेख्यं, वेध्यम्, एष्यम्, आहार्यं, विज्ञाव्यं, सौव्यमिति ॥५॥
यह शस्त्र कर्म आठ प्रकार का है। यथा—छेद्य (भगन्दर आदि का दो करना), भेद्य (विद्रधि आदि का विदारना), लेख्य (उपजिहिका आदि का लेखन), वेध्य (छोटे मुखवाले शस्त्रों से वेंचना-शिरा आदि में छेद करना), एष्य (शलाका आदि से नाड़ी व्रण आदि का दूँटना), आहार्य (दन्त आदि का निकालना), विज्ञाव्य (विद्रधि आदि में जलौका आदि से खून बहाना), सौव्य (पद्मकोप आदि में सीना)। वामट ने—उत्पाटन, कुष्ठन, मन्थन, ग्रहण और दाहन कर्म
१ कई आचार्य इसका यह अर्थ करते हैं—
'लंघनादि विरेकान्तं पूर्वकर्म व्रणस्य च । पाचनं रोपणं यच्च प्रधानं कर्म तत्समूतम् । बलवर्णनिकार्यं तु पश्चात्कर्म समादिशेत् ॥
अ० ५ ]
सूत्रस्थानम्
१७
अधिक माने हैं। चरक ने शस्त्र कर्म छे प्रकार का माना है। यथा—पाटनं व्यधनं चैव छेदनं लेखनं तथा। प्रच्छनं सीवनं चैव षड्विधं शस्त्रकर्म तत् ॥५॥
अतोऽन्यतमं कर्म चिकीर्षता वैद्येन पूर्वमेवोपकल्पयितव्यानि भवन्ति। तद्यथा—यन्त्रशस्त्रक्षारान्निशलाकाशुङ्गजलोकालावृजाश्वबौष्टपिचुप्रो( सो )तसूत्रपत्रपट्टमधुघृतवसापयस्तेलतर्पणकषायालेपनकल्कन्यजनशोतोष्णोदक्कटहिदीनि,परिकर्माणश्च स्निग्धाःस्थिरा बलवन्तश्च । पुनः इन आठों में से कोई एक भी कार्य करने से पूर्व वैद्य की निम्न वस्तुएँ तैयार कर लेनी चाहिये। यथा—यन्त्र, शस्त्र, क्षार, अग्नि, शलाका, शुङ्ग, जाँक, अलावू, जाम्बवौष्ट (जामुन के समान मुखवाला लौह से बना यन्त्र जलाने के लिये), पिचु (रूई का पोया), प्रोत (कपड़े का टुकड़ा), सूत्र (धागे) पत्र (केले-एरण्ड आदि के), पट्ट (रेशमी वस्त्र-पट्टियाँ), शहद, घी, वसा, दूध, तैल, तर्पण (वृत्तिकारक अन्न सक्तू दूध), कषाय (व्रण शोधनादि द्रव्य कृत कषाय) आलेपन (प्रलेप), कल्क (क्षत में लगाने लायक लेप), पंखा, ठण्डा-गरम पानी, कड़ाही आदि लोहे के बने पात्र, सब कर्मों को करनेवाले स्निग्ध-अनुरक्त, दृढ़ एवं बलवान् परिचारक तैयार कर लेने चाहिये। (चरक में भी उपकल्पनीय अध्याय में समारम्भ एकत्रित करने का विधान है) ॥६॥
ततः प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रेषु दध्यक्षतात्र-पानरत्नैरग्नि विप्रान् भिषजश्चाचर्यित्वा, कृतबलिमङ्गलस्वस्तिवाचनोलघु मुक्तवन्तं प्राङ्मुखमातुरमुपवेश्य, यंत्रयित्वा, प्राङ्मुखो वैद्यो मर्म्मसिरास्नायुसन्ध्यस्थिधमनीः परिहरन्, अनुलोमं गच्छ निदध्यादाप्यदर्शनात्, सकृदेवापहरेच्छस्त्रमाशु च, महत्स्वपि च पाकेषु दध्यगुलान्तरं व्यङ्गुलान्तरं वा शस्त्रपदमुक्तम् ॥७॥
प्रधानकर्म —इसके पश्चात् श्रेष्ठ तिथि, करण, मुहूर्त, नक्षत्र में दधि, अक्षत, खान-पान, रत्नों से अग्नि, ब्राह्मणों और वैद्यों की पूजा करके, बलि (पूजोपहार), मंगल (गीतादि), स्वस्ति-वाचन (आशीर्वाद उच्चारण) करके, रोगी को थोड़ा सा अन्न खिलाकर, रोगी का मुख पूर्व दिशा में रखते हुए बिठाये। रोगी को मली प्रकार बाँध दे जिससे हिले नहीं। फिर वैद्य भक्षिम की ओर मुख करके—सिरा, स्नायु, सन्धि, अस्थि और धमनी को बचाकर लोगों के अनुकूल यथायोग्य शस्त्र को पूय (पीब) के निकलने तक गहरा चलाये। शस्त्र को एक बार ही और शीघ्रता से चलाना चाहिये। बहुत बड़े पाक में भी दो अंगुल या तीन अंगुल तक परिमित लम्बा शस्त्र का घाव करना चाहिये। घाव की गम्भीरता व्रण की अपेक्षा से है। अरुणदत्त
का कहना है कि दो या तीन अंगुल के बीच में दूसरा व्रण नहीं करना चाहिये।
वि० मन्तव्य—यन्त्रयित्वा—रोगी को बाँधकर या आत जनों से पकड़ाकर शस्त्रकर्म करने का विधान क्रियासौकर्य के लिये है, परन्तु आजकल—यह कार्य—क्लोरोफॉर्म सुधाकर कर लिया जाता है। व्रण का अर्थ है घाव—चौरा। उत्सङ्ग-व्रण के भीतर का कोटर जिसको पूय बना लेता है—जहाँतक उत्सङ्ग होता है व्रण किया जाता है या करना चाहिये। बड़े-बड़े पाकों में २ अथवा ३ अंगुल के अन्तर अर्थात् दूरी पर एक से अधिक व्रण भी किये जाते हैं। यह व्रण-शोथों में चौरा लगाने की विधि है ॥७॥
तत्रायतो विशालः समः सुविभक्तो।
निराश्रय इति व्रणगुणाः ॥८॥
व्रणकर्म में व्रण की प्रशस्त आकृति—आयत (दीर्घ) त्रिभुज (विस्तीर्ण), सम (विषम नहीं बराबर), सुविभक्त मली प्रकार से सब अवयव प्रथक हो गये हों, निराश्रय—ये व्रण के गुण हैं। निराश्रय का अर्थ—पूय के लिये कोई कोटर न रह जाय।
वि० मन्तव्य—व्रण-शोथ में ऐसा व्रण अर्थात् घाव करे जो आयत अर्थात् चौड़ा हो जिससे भीतरी समस्त दोष-विकार पूय निकल जा सके। विशाल अर्थात् लम्बा व्रण करे अर्थात् जहाँतक उत्सङ्ग-कोटर हो, जिससे वहाँतक लेपौषध एवं कव-लिका लगायी-पहुँचायी जा सके। सुविभक्त-जिसमें चौरा लगाते ही या शस्त्र निकालने पर मुखरोध न हो जाय। निराश्रय-व्रण शोथोत्पादक दोष के आश्रय को समूल निकाल देना चाहिये। यह व्रण के गुण (सदगुण) हैं अर्थात् इस प्रकार से व्रण करना चाहिये। अन्यथा बार-बार व्रण करने की आवश्यकता पड़ सकती है। पड़ जाती है ॥८॥
भवतश्चात्र—
आयतश्च विशालश्च सुविभक्तो निराश्रयः।
प्राप्तकालकृतश्चापि व्रणः कर्मणि शस्यते ॥९॥
कहा भी है—
आयत, दीर्घ, विशाल, निम्नोन्नतरहित, मलीप्रकार अलग हुआ, अंगुली द्वारा सम्पूर्ण पूय निकल जाने से निराश्रय; प्राप्त काल (ठीक समय पर-कच्चे व्रण में न किया) हुआ व्रण शस्त्र-कर्म में प्रशस्त होता है।
१ यहाँ पर अन्तर शब्द विचारणीय है, इसका अर्थ यदि चौड़ाई में किया जाय तो ठीक है। दो या तीन अंगुल चौड़ा व्रण करे, क्योंकि लम्बा व्रण देर में भरता है यह मान्यता ठीक नहीं। पेट के शल्यकर्मों में आठ अंगुल लम्बा शस्त्रकर्म करना होता है।
१८
मुश्रतस्थानम्
[ अ० ५ ]
वि० मन्तव्य—‘प्राप्तकालकृतः’ अर्थात् व्रण करने—चीरा लगाने का काल—समय प्राप्त होनेपर किया गया व्रण प्रशस्त होता है, पूर्व अथवा पश्चात् नहीं। तात्पर्य यह है कि आम शोफ में व्रण करना भी बुरा है और पक्व शोफ में व्रण न करना भी बुरा है ॥६॥
शौर्यमाशुक्रिया शस्त्रतैक्ष्ण्यमस्वेदवेपथू ।
अमंमोहश्च वैद्यस्य शस्त्रकर्मणि जस्यते ॥१०॥
वैद्य के गुण—
शौर्य ( उत्साह, निडरपन ) आशुक्रिया ( लघुहस्तता ) रोगी को अधिक देर नहीं लगती; शस्त्रतैक्ष्ण्य ( शस्त्र का तेज एवं धार उत्तम होना ), पसीने का न आना, और न काँपना, असंमूढता—ये वैद्य के गुण शस्त्रकर्म में प्रशस्त हैं। कायचिकित्सा में इन गुणों की इतनी जरूरत नहीं ॥१०॥
एकेन वा व्रणेनाशुध्यमानेनाऽन्तरा बुद्ध्याऽवेद्या- परान् व्रणान् कुर्यात् ॥११॥
यदि एक व्रणसे घाव पूर्णरूप में साफ न हो तो मनुष्य को चाहिये कि बुद्धि से विचारकर दूसरे व्रणों को बीच में बना दे ॥११॥
भवति चात्र—
यतो यतो गतिं विद्यादुत्सङ्को यत्र यत्र च ।
तत्र तत्र व्रणं कुर्याद्यथा दोषो न तिष्ठति ॥१२॥
कहा भी है—
व्रण में जिस स्थान पर पूय की गति को देखे, और जहाँ-पूय के संचित होने से उन्नत प्रदेश दिखाई दे, उन उन स्थानों पर व्रण कर देना चाहिये, जिससे कि व्रण में पूय दोष संचित न रहने पाये, बाहर आ जाये। ( यहाँ पर दोष शब्द पूय के लिये है ) ॥१२॥
तत्र भ्रूणण्डगङ्गललाटाक्षिपुटौष्ठदन्तवेष्टकक्षाकुक्षिव- ङ्गुष्णेषु तिर्यक् छेद उक्तः ॥१३॥
भ्रू, गण्डस्थल, शंख प्रदेश, ललाट, अक्षिवर्त्म ( पलक), दन्तवेष्ट ( मसूड़े ), कक्षा ( बाहुमूल ), कुक्षि ( उदर ), वंक्षण ( ऊरुरसिध ) इन स्थानों में तिरछा छेदन करना चाहिये १३ चन्द्रमण्डलवच्छेदान् पाणिपादेषु कारयेत् ।
अर्धचन्द्राकृतीश्चापि गुदे मेद्वे च बुद्धिमान् ॥१४॥
पाँव एवं हाथ के तन्तुओं में चन्द्रमण्डल के समान ( चन्द्राकार ) गोल छेदन करना चाहिये ( अंगुलियों की जड़ों में धमनियों का चक्र बनता है ) बुद्धिमान् मनुष्य गुद और मेद्व प्रदेश में भी अर्धचन्द्राकार छेदन करे। शेष स्थानों में सीधा छेदन करना चाहिये ॥१४॥
अन्यथा तु सिरास्तानुच्छेदनम् , अतिमात्रं वेदना, चिराद् व्रणसंरोहो, मांसकन्द्रीप्रादुर्भावश्चेति ॥१५॥
उपर्युक्त विधि के अनुसार छेदन न करने से सिरास्तानु धमनी आदि कट जाती है, बहुत पीड़ा होती है, और व्रण भी देर में भरता है ॥१५॥
मूढगर्भोद्वागोऽश्मरीभगन्दरमुखरोगेष्वभुक्तवतः
कर्म कुर्वीत ॥१६॥
निम्न रोगों में रोगी को बिना खिलाये शस्त्रकर्म करना चाहिए—
मूढगर्भ, उदररोग, अर्श, अश्मरी, भगन्दर, रोग में बिना खिलाये शस्त्रकर्म करना चाहिये। क्योंकि खिलाकर कर्म करने से वायु का कोप तथा यन्त्र आदि के चलाने में कठिनता होती है। मुख रोग में भी बिना खिलाये शस्त्रकर्म करना चाहिये। खिलाकर करने से वमन आदि होता है। कोई कोई अर्श, अश्मरी, और भगन्दर इनका पाठ यहाँ ठीक नहीं मानते क्योंकि इनमें भोजन कराकर शस्त्रकर्म किया जाता है ॥१६॥
ततः शस्त्रमवचार्य, शीताभिरद्भिःशतुरमाश्वत्थसम- न्नात् परिपीड्याङ्गुल्या, व्रणसभिसृद्य ( ड्य ), प्रक्षाल्य कृपायेण, प्रो( सो ) तेनोदकमादाय, तिलकलकमधुसर्पिः प्रगाढामौषधयुक्तां नातिस्निग्धां नातिरूक्षां वर्त्ति प्रणि- दध्यात् ; ततः कल्केनाच्छ्राद्य, घनां कवलिंकां दत्त्वा, वस्त्रपट्टेन बधनीयात् , वेदनारक्षोन्मैथुनैर्धूपैर्धूपयेत्, रक्षो- दन्तैश्च मन्त्रै रक्षां कुर्वीत ॥१७॥
पुश्चात्कर्म—शस्त्रकर्म के पश्चात् शस्त्र को निकालकर शीतल जल से रोगी का स्वेद आदि दूर करके उसे सान्त्वना देते हुए चारों ओर से व्रण को अङ्गुलि द्वारा भली प्रकार दबा- कर ( पूय निकालकर ) क्वाथ से व्रण को धोये। फिर प्लोत द्वारा व्रण का पानी सुखाकर तिलपिष्ट, शहद, घी, एवं मिश्रक अध्यायोक अजशृङ्गी आदि औषधियों से लिप्त, न बहुत स्निग्ध एवं न बहुत रूक्ष वर्त्ति व्रण में रखकर कल्क से व्रणको ढापकर मोटी ( सान्द्र-जिसमें हवा न जा सके ), कवलिंका ( गही ) रखकर पट्टी बाँध देनी चाहिए। वेदना नाशक, रक्षोन्मैथुनैर्धूपैर्धूपयेत् व्रण का धूपन करना चाहिए, तथा रक्षोन्मैथुनैर्धूपैर्धूपयेत् व्रण की रक्षा करनी चाहिए। व्रण संक्रमित न हो इस बात का ध्यान रखना चाहिए२। ( तिलकलकमधुसर्पिः प्रगाढां वर्त्ति प्रणिधाय पत्रेणाच्छ्राद्य कवलिंकां दत्त्वा बन्धनेनोपपादयेत्-यह भी पाठ है )
१ स्निग्धमृण्णम्, अल्पम् अर्धं द्रवप्रायं भुक्तवर्त्तं इति अर्थात् धिकारे त्वनिलप्रशमनार्थवर्त्तनं तु तथा भोजनं दर्शयतीति च विरोधः ।
२ पट्टी कवलिंका आदि सबको धूपन द्वारा संक्रमण रहित कर लेना चाहिये। जैसा कि वाग्भट्ट में कहा है— श्वित्ररूक्षमा दृढाः पट्टाः कवलाः सविकेशिकाः । धूपिता मूढवः श्लक्षणाः निर्वलीका व्रणे हिताः ॥
अ० ५ ]
सूत्रस्थानम्
१९
भानुमतीवाली निषेध सागर की पुस्तक में—पत्रेणाच्छाद्य के स्थान पर कल्केनाच्छाद्य पाठ है ॥१७॥
ततो गुग्गुल्यगुरुसजंरसवचागौरसर्पपचूर्णैर्लवणनिम्बपत्रविमिश्रैरज्ययुक्तैर्घृष्येत, आज्यशेषेण चास्य प्राणान् समालभेत ॥१८॥
उदकुम्भाच्छापो गृहीत्वा प्रोक्षयन् रक्षाकर्म कुर्यात्, तद्वदयामः—॥१९॥
धूपन द्रव्य—इसके अनन्तर, गुग्गुलु, अगर, राल, बच, श्वेत सरसों, सैन्धानमक, नीम के पत्ते इनको मिलाकर घी के साथ धूपन करना चाहिये। धूपन कार्य से बच्चे घी आदि द्रव्य से रोगी के मर्म स्थानों को मलना चाहिये, इससे रोगी में जान आती है। बड़े में से हाथ में पानी लेकर रोगी का परिमार्जन करते रक्षा कर्म१ करना चाहिये ॥१८, १९॥
कृत्यानां प्रतिघातार्थं तथा रक्षोभयस्य च । रक्षाकर्म करिष्यामि ब्रह्मा तदनुमन्यताम् ॥२०॥ नागाः पिशाचा गन्धर्वाः पितरो यक्षराक्षसाः । अभिद्रवन्ति ये ये त्वां ब्रह्माद्या घ्नन्तु तान् सदा ॥२१॥ पृथिव्यासन्तरिक्षे च ये चरन्ति निशाचराः । दिक्षु वास्तुनिवासान्श्च पान्तु त्वां ते नमस्कृताः ॥२२॥ पान्तु त्वां मुनयो ब्राह्म्या दिव्या राजर्षयस्तथा । पर्वतारुचैव नद्यश्च सर्वाः सर्वे च सागराः ॥२३॥ अग्नी रक्षतु ते जिह्वां प्राणान् वायुस्तथैव च । सोमो न्यानमपानं ते पर्जन्यः परिरक्षतु ॥२४॥ उदानं विद्युतः पान्तु समानं स्तनयित्वनवः । बलमिन्द्रो बलपतिर्मनुमन्ये मतिं तथा ॥२५॥ कामांस्तै पान्तु गन्धर्वाः सत्त्वमिन्द्रोऽभिरक्षतु । प्रज्ञां ते वरुणा राजा समुद्रा नाभिमण्डलम् ॥२६॥ चक्षुः सूर्यां दग्धः श्रोत्रे चन्द्रमाः पान्तु ते मनः । नक्षत्राणि सदा रूपं छायां पान्तु निशास्तव ॥२७॥ रेतस्त्वाण्याययन्त्वापो रोमाण्याषधयस्तथा । आकाशं खानि ते पान्तु देहं तव वसुन्धरा ॥२८॥ वैश्वानरः शिरः पातु विष्णुस्तव पराक्रमम् । पौरुषं पुरुषश्रेष्ठो ब्रह्माऽऽत्मानं ध्रुवो ध्रुवौ ॥२९॥
१ रक्षाकर्म—धूपन कार्य से जहाँ ब्रण की दुर्निधि मिटती है, वहाँ पर कृमि आदि का भी सम्बन्ध नहीं होता ! आर्य ग्रन्थों में कृमि, राक्षस, निशाचर आदि प्रायः वर्त्तमान कालीन germs को ही कहते हैं। क्योंकि इन दोनों के कार्य-भोजन, रहने का स्थान, एवं चिकित्सा एक ही है। अपवित्र वस्तुओं से इनको स्नेह है, पवित्र कार्यों से दूष है। इसी से Sterilization या Aseptic कार्य को 'रक्षा कर्म' वास्तव में कहा है।
एता देहे विशेषेण तव नित्या हि देवताः । एतास्त्वां सततं पान्तु दीर्घमायुरवाप्नुहि ॥३०॥ स्वस्ति ते भगवान् ब्रह्मा स्वस्ति देवाश्च कूर्वताम् । (स्वस्ति ते चन्द्रसूर्यौ च स्वस्ति नारदपर्वतो ॥) स्वस्थगिनश्चैव वायुश्च स्वस्ति देवाः सहन्द्रगाः ॥३१॥ पितामहकृता रक्षा स्वस्यायुवधंतां तव । ईतयस्ते प्रशाम्यन्तु सदा भव गतव्यथः ॥३२॥ इति स्वाहा ॥ रक्षा कर्म को कहते हैं—
कृत्या (अभिचार जनित राक्षसी कर्म) के निवारण के लिये, तथा राक्षसों के भय को दूर करने के लिये रक्षाकर्म कर्त्तव्य,— ब्रह्मा इस कर्म का अनुमोदन करें, (सहायता करें)।
जो जो बासुकि आदि नाग, पिशाच (मांस खानेवाले), गन्धर्व, कुबेरादि यक्ष, रावण आदि राक्षस जो जो दुष्ट वृणी को पीड़ित करते हैं, उन सबों को ब्रह्मा आदि देवता नष्ट करें।
पृथ्वी में, अन्तरिक्ष में, दिशाओं में जो जो राक्षस विचरते हैं या घर में रहते हैं, वे सब नमस्कार ग्रहण करके, दुष्ट वृणी की रक्षा करें, सब पर्वत, सब नदियाँ और सब सागर तेरी रक्षा करें। अग्नि तेरी जिह्वा की रक्षा करे, वायु तेरे प्राणों की; चन्द्रमा ध्यान की, बादल तेरे अपान की रक्षा करें। विद्युत् तेरे उदान की, बादल तेरे समान—वायु की रक्षा करे। बलपति इन्द्र तेरे बल की, मनु-प्रजापति तेरी बुद्धि तथा मन्यों (श्रीवा के पिछे की दो शिराओं) की रक्षा करे। तेरी इच्छाओं की रक्षा गन्धर्व करें। तेरे सत्त्व (मन) की रक्षा इन्द्र करें; वरुण राजा तेरी प्रज्ञा की; समुद्र नाभिमण्डल की; सूर्य-आँख की; दिशायें कानों की; चन्द्रमा मन की; नक्षत्र तेरे रूप लावण्य की; रात्रियाँ तेरी छाया (समीप से देखनेवाली छाया) की; जल तेरे शुक्र की; ओषधियाँ लोमों की, आकाश इन्द्रियों की और पृथ्वी शरीर की रक्षा करे। वैश्वानर अग्नि तेरे शिर की; विष्णु तेरे पराक्रम (उत्साह) की; पुरुषोत्तम-नारायण तेरे पौरुष की; ब्रह्मा जीवन की, ध्रुव तारा ध्रुवों की रक्षा करें। ये उपर्युक्त देवता तेरे शरीर में सदा स्थित हैं। ये देवता सदा तेरी रक्षा करें और तुम को दीर्घायु प्रदान करें। भगवान्१-विशिष्ट ज्ञानवान् ब्रह्मा तेरे लिये मंगल करे; देवता लोग मंगल करें; चन्द्रमा—सूर्य मंगल करें, नारद एवं पर्वत, अग्नि-वायु कल्याणकारी हों; इन्द्रानुयायी देवता मंगल कारक हों। पितामह—ब्रह्मा द्वारा की हुई रक्षा तेरे लिये मंगलकारी हो एवं आयु को बढ़ाये। ईतिर्था
१ भगवान् का लक्षण—
उत्पत्तिं च विनाशञ्च भूतानामागतिं गतिम् । वैत्ति विद्यमानविद्याञ्च स वाच्यो भगवानिति ॥
२०
सुश्रुतस्थानम्
[ ७० ]
(सब प्रकार के कष्ट) संदां शान्त हो, तू पीड़ा रहित हो जाये। इति स्वाहा—इस प्रकार से उपरोक्त मंत्रों द्वारा आहुति देनी चाहिये ॥२०-३२॥
एतैर्वेदात्मकैर्मन्त्रैः कृत्यानाधिविनाशनैः । मयैवं क्रुतरक्षस्त्वं दीर्घमायुरवाप्नुहि ॥३३॥
इन सब उपयुक्त कृत्यानाशक वेद मन्त्रों से मुझ द्वारा रक्षा किया हुआ तू दीर्घायु को प्राप्त कर ॥३३॥
ततः क्रुतरक्षमातुरमागारं प्रवेश्य, आचारिकमादिशेत् ॥
✓ ब्रण रोगी को इस उपरोक्त विधि से रक्षा करके रोगी को घर में प्रविष्ट कराके आचारिक कर्म (आहार विहार रूपी ब्रणि-तोपासनीय अध्याय में कहे) का उपदेश कर देना चाहिये ॥
ततस्तृतीयेऽह्नि विमुच्यैवमेव बन्नीयाद् बन्धपट्टनः । न चैनं त्वरमाणोऽपरेद्युमांक्षयेत्, द्वितीयदिवसे परिमोक्ष- णाद्विप्रथितो ब्रणशिचरादुपसंरोहति, तीव्ररुजश्च भवति ॥
✓ इसके पश्चात् तीसरे दिन इस ब्रण को खोलकर कषाय से धोकर पूर्व की भांति फिर पट्टी से बाँध देना चाहिये। जल्दी की दृष्टि से इस ब्रण को दूसरे दिन नहीं खोलना चाहिये। क्योंकि दूसरे दिन ब्रण के खोलने से ब्रण अंकुरित नहीं होता, गांठ पड़ जाती है, देर में रुजता है और बहुत पीड़ा होती है ॥
अत ऊर्ध्वं दोषकालबलादीनवेद्य कषायालेपनबन्धा- हाराचारान् विदध्यात् ॥३६॥
तीसरे दिन के पश्चात् आगे दोष (वात आदि), काल (हेमन्त आदि), बल (हीन-मध्यम, उत्तम)--वयःसाल्य आदि को देखकर कषाय, लेपन, बन्धन, आहार, आचार (विहार) करना चाहिये ॥३६॥
न चैनं त्वरमाणः सान्तद्वीर्षं रोपयेत्, स ह्यल्पेनाप्य- पचारिणाभ्यन्तरमुत्सङ्गं कृत्वा भूयोऽपि विकरोति ॥३७॥
जल्दी के कारण से दोष सहित (पूय को अन्दर रखकर) ब्रण का रोपण नहीं करना चाहिये। क्योंकि इस प्रकार के ब्रण में थोड़ा सा भी विरुद्ध कर्म होने पर यह ब्रण अन्दर ही कोटर बनाकर विकार को करता है। मुनि ने शुद्ध ब्रण का लक्षण—
नातिरक्तो नातिपाण्डुनातिशयावो न चातिरक्तः ।
न चोत्सन्नो न चोत्संगी शुद्धो रोप्यः परं वणः ॥
यह किया है ॥३७॥
भवन्ति चात्र—
तस्मादन्तर्बहिश्चैव सुमुद्गं रोपयेद् ब्रणम् ।
रूढेऽप्यजीर्णव्यायामव्यायादीन् विवर्जयेत् ।
हर्षं क्रोधं भयं चापि यावत् स्थैर्योपसंभवात् ॥३८॥
कहा भी है—
इस लिये अन्दर और बाहर से शुद्ध हुए ब्रण का ही रोपण करना चाहिये। ब्रण के भर जाने पर भी जब तक ब्रण में
हृदता न आये तब तक अजीर्ण, व्यायाम, मैथुन, हर्ष, क्रोध, भय आदि का परित्याग करना चाहिये। अर्थात् संग्रह में—रूढेऽप्यजीर्णव्यायामव्यायादीन् विवर्जयेत् ।
मासान् षट् सप्त वा नूणां विधिरेष प्रशस्यते ॥३९॥
हेमन्ते शिशिरे चैव वसन्ते चापि मोक्षयेत् ।
ऽयहात् द्रव्यहात्करद्रुग्रीष्मवर्षास्त्वपि च बुद्धिमान् ॥३९॥
✓ हेमन्त और शिशिर ऋतु में तथा वसन्त में तीसरे दिन पट्टी करनी चाहिये। शरद्, ग्रीष्म और वर्षा में दूसरे दिन, पट्टी करनी चाहिये। क्योंकि हेमन्त आदि में शीघ्र पाक का भय नहीं, ग्रीष्म आदि में भी पैतिक ब्रण की अवस्था में दूसरे दिन पट्टी बदलनी चाहिये। शरद् ऋतु में पैतिक ब्रण की अवस्था में दिन में दो बार पट्टी बदलनी चाहिये ॥३९॥
अतिपातिषु रोगेषु नेच्छेद्विघिसंमं भिषक् ।
प्रदीप्तमागारवच्छोघ्रं तत्र कुर्यात् प्रतिक्रियाम् ॥४०॥
अपवाद-जिन आत्ययिक रोगों में जल्दी का काम हो (पूयसाव आदि उपद्रव अधिक हों) उन में वैद्य को चाहिये कि वह उपयुक्त विधि का खूँटा पकड़कर न बैठ जाये। ऐसी अवस्था में जलते हुए घर के समान जल्दी की चिकित्सा करनी चाहिये ॥४०॥
या वेदना शस्त्रनिपातजाता तीव्रा शरीरं प्रदुनोति जनतोः । घृतेन सा शान्तिमुपैति सित्ता कोष्णेन यद्योमधुकान्वितेना ॥
शस्त्रावचरण के कारण उत्पन्न हुई जो तीव्र वेदना रोगी को कष्ट देती रहती है, वह वेदना मुलहटी के चूर्ण को घी में मिलाकर-थोड़ा गरम करके लगाने से शीघ्र शान्त हो जाती है।
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽग्नोपहरणीयो
नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥
पञ्चोऽध्यायः ।
अथात ऋतुचर्यमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
हेमन्त आदि ऋतुओं में जिस प्रकार का आचरण करना चाहिये, वह कहते हैं; जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१;२॥
कालो हि नाम(भगवान्) स्वयम्भुरनादिमध्यनिधनः । अत्ररसव्यापत्संपत्ती जीवितमरणे च मनुष्याणामायत्ते । स सूदमामपि कलां न लीयत इति कालः, संकलयति कालयति वा भूतानीति कालः ॥३॥
जिस वस्तु के ऋतुर्प अंगभूत हैं, उस काल को कहते हैं—यह प्रसिद्ध काल-भगवान्-स्वयं उत्पन्न हुआ है, किसी ने इसको उत्पन्न नहीं किया; आदि मध्य निधन-विनाश से रहित
अ० ६ ]
सूत्रस्थानम्
२१
है। इस काल के अधीन ही द्रव्यों के रस को समत्त् या व्यापत् है। मनुष्यों का जीवन एवं मरण भी इसी काल के वश में है। यह थोड़े काल के लिये भी नहीं रुकता, सर्वदा गतिशील रहता है। इसी से इस को काल कहते हैं। अथवा-सब प्राणियों का संहार कर इकट्ठा करता है—इस लिये, अथवा सब भूतों को सुख-दुःख के साथ युक्त करता है, इसलिये इसका काल कहते हैं। अथवा—सब का संक्षेप करता है, सब प्राणियों को मृत्यु के समीप लाता है, इसलिये काल है।
वि० मन्तव्य—यहाँ काल समय का नाम है। वह स्वयम्भू है, स्वभाव सम्भूत है, और अनादि तथा अनन्त है, अतः उसका कोई मध्य भी नहीं हो सकता है। काल के ही प्रभाव से इच्छु, इमली एवं मरिच आदि में मधुर आदि रसों की व्यापत्ति (विकृति) होती है, जैसे जनपदोर्वस आदि के पूर्व औषधियों के रस, वीर्य, गुण, विपाक तथा प्रभाव विकृत हो जाते हैं। और सम्पत्ति (उचित सम्पादन) होती है जैसे सुकाल में। और मनुष्यों के ही नहीं प्राणिमात्र के जीवन मरण अर्थात् उत्पत्ति विनाश का कारण वही काल है, इतना ही नहीं पार्थिव द्रव्यों के निर्माण का कारण भी काल है। उसका सूक्ष्मातिसूक्ष्म काल के लिये व्यवधान-उच्छेद नहीं होता, वह भूतों-प्राणियों तथा पृथिवी आदि भूतों का संकलन = संयोग या निर्माण तथा कलन विकलन वियोग या नाश करता है अर्थात् प्राणियों तथा विश्व के उत्पादन एवं विनाश का कारण काल है। सच यह है कि जैसे ईश्वरवादी उक्त सब का कारण ईश्वर को मानते हैं तथा अन्य सम्प्रदायवाले, शिव, विष्णु, शक्ति आदि को मानते हैं वैसे ही कालवादी काल को मानते हैं ॥३॥
तस्य संवत्सरान्तमनो भगवानादित्यो गतिविशेषेणाक्षिनिमेषकाष्टाकलामुहूर्ताहोरात्रपक्षमांसर्त्तयनसंवत्सरयुगप्र-विभागं करोति ॥४॥
इस संवत्सर रूप काल के भगवान् आदित्य (चन्द्रमा भी) अपनी गति विशेष से निमेष, काष्टा, काल, मुहूर्त, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर, युग का विभाग कर देता है ॥
वि० मन्तव्य—यद्यपि कला का कोई विभाग नहीं हो सकता और न होता ही है, तथापि भगवान् सूर्य की गति (उदय अस्त तथा उत्तरायण एवं दक्षिणायन और मेघादि
१ वृहदारण्यकोपनिषद् में भी कहा है “निह पुरा ततः संवत्सर आस” आनन्दगिरिव्याख्यायाम् पूर्वमिति प्रजापतेरादित्यात्मकत्वाद् तदधीनत्वाच्च संवत्सरव्यवहारस्य, आदित्यात् पूर्व तद्व्यवहारो नासीद् इत्यर्थः ॥
राशियों पर संक्रमण आदि) के भेद से काल के निमेष, काष्टा आदि) विभाग मान लिये जाते हैं ॥४॥
तत्र लब्धवक्षोचाराणमात्रोऽक्षिनिमेषः, पञ्चदशाक्षिनिमेषाः काष्टा, त्रिजग्लाष्टाः कला, विशतिकलो मुहूर्तः, कला-दशाभागश्च त्रिंशमुहूर्तमहोरात्रं, पञ्चदशाहोरात्राणि पक्षः, स च द्विविधः—शुक्लः कृष्णश्च, तौ मासः ॥५॥
इनमें आकारादि लघु अक्षर के उच्चारण में जितना समय लगता है, उसका नाम निमेष है। पन्द्रह निमेषों की एक काष्टा; तीस काष्टा की एक कला; बीस कला और कला का दसवाँ भाग—अर्थात् तीन काष्टा का—एक मुहूर्त; तीस मुहूर्त का एक रात दिन, पन्द्रह रात दिन का एक पक्ष; यह पक्ष दो प्रकार के हैं। शुक्ल और कृष्ण—इन दो पक्षों का मास होता है।
वि० मन्व्यय—यह समय-विभाग श्री धन्वन्तरि के मतानुसार है, भले ही ज्योतिःशास्त्र, धर्म शास्त्र तथा अर्थ शास्त्र के मतानुसार इसमें कुछ भेद क्यों न हों। आयुर्वेद में औषधि के संग्रह, निर्माण तथा सेवन में और वमन विरेचन आदि के विधि निषेध में स्वस्थ वृत्त के नियमपालन आदि में काल-समय का विचार आवश्यक है, अतः इसका ज्ञान भी आवश्यक है।
तत्र माघादयो द्वादश मासाः, द्विमासिकभृतु कृत्वा षड्वतवो भवन्ति; ते शिखिरवसन्तग्रीष्मवर्षाशरद्देमन्ताः, तेषां तपस्तपस्यो शिखिरः, मधुमाघवो वसन्तः, शुचिशुक्रो ग्रीष्मः, नभोनभस्यौ वर्षाः, इषोजौ गरत्, सहःसहस्यौ हेमन्त इति ॥६॥
इन मासों में माघ आदि बारह मास हैं। दो-दो मास के मिलने से छे ऋतुयें बनती हैं। यथा—शिखिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त। इन में—तप (माघ,) तपस्य (फाल्गुन) से शिखिर; मधु—(चैत्र), माघव (वैशाख) से वसन्त; शुचि (ज्येष्ठ) शुक्र (आषाढ़) से ग्रीष्म; नभः (श्रावण) नभस्य (भाद्रपद) से वर्षा; इष (आश्विन) ऊर्ज (कार्तिक) से शरद; सह (मार्गशीर्ष) सहस्य (पौष) से हेमन्त ऋतु होती है ॥
वि० मन्तव्य—सम्भव है शुभ्रतसंहिता के अर्थना काल में माघ मास से १२ मास गिने जाते हों; जैसे वैदिक काल में शरद ऋतु से गिने जाते थे। और आज का ज्योतिःशास्त्र वैशाखमास से गिनता है ॥६॥
त एते शीतोष्णवर्षलक्षणान्द्रादित्ययोः कालविभाग-करत्वादयने द्वे भवतो दक्षिणमुत्तरं च। तयोर्दक्षिणं वर्षाशरद्देमन्ताः, तेषु भगवानाप्यायते सोमः, अरुल्लवणमधुराश्च रसा बलवन्तो भवन्ति, उत्तरोत्तरं च सर्वप्राणिनां बलमभिवर्धते। उत्तरं च शिखिरवसन्तग्रीष्माः, तेषु भग-
१ देखिये चरक संहिता सूत्रस्थान अ० ६ सूत्र ४-८ ॥
२२
सुश्रुतस्थानम्
[ अ० ६ ]
वानाप्यायतेऽर्कः, तित्कृष्णायकटुकाश्च रसा बलवन्तो भवन्ति, उत्तरोत्तरं च सर्वंप्राणिनां बलमपहीयते ॥७॥
ये शीत उष्ण, वर्षा रूपी छे ऋतुयें, चन्द्रमा और सूर्य के द्वारा काल का विभाग होने से दो अयनों में विभक्त हो जाते हैं। यथा-दक्षिणायन और उत्तरायण, इनमें दक्षिणायन वर्षा, शरद, हेमन्त, इन तीन ऋतुओं से उपलक्षित है। इन वर्षादि ऋतुओं से भगवान् चन्द्रमा उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। अम्ल, लवण और मधुर रस बलवान् होते हैं। सब प्राणियों का बल उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। उत्तरायण-शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म से उत्तरायण बनता है। इन ऋतुओं में सूर्य का बल उत्तरोत्तर बढ़ता है, तित्क, कृष्ण और कटु रस बलवान् होते हैं, सब प्राणियों का बल उत्तरोत्तर घटता जाता है। जैसा चरक में कहा है-यूनां दौर्बल्यमावहन्ति—चरक, सू. अ.।
वि० मन्तव्य—स्थूलरूप से-शीत, उष्ण तथा वर्षा प्रधान-मोटे लक्षण या चिह्न हैं उन ६ ऋतुओं के। यूनानी चिकित्सा-शास्त्र के अनुसार-१-मौसिमे सरदी २-मौसिमे गर्मी तथा मौसिमे वरसात। यह च० वि० अ० ८ के सूत्र १२७ के हेमन्तो ग्रीष्मो, वर्षाश्चेति।—
चरकसंहिता में दक्षिणायन का नाम “विसर्ग” तथा उत्तरायण का नाम “आदान” है।
भारतवर्ष में उक्त दोनों अयनों का तथा तीनों मौसिमों का प्रभाव अन्य देशों की अपेक्षा अधिक व्यक्त होता है, क्योंकि मृण्डल पर ऐसे ही देश हैं जहाँ सवेंदा (वर्ष भर या अधिक मासों तक) एक एक मौसिम का प्रभाव रहता है, यथा-शीत कटिबन्ध के रूस आदि देशों में शीत का, उष्ण कटिबन्ध के अफ्रीका आदि देशों में उष्ण का तथा ब्रह्मा, जावा, सुमात्रा आदि देशों में वर्षा का प्रभाव या आधिक्य रहता है। यद्यपि महत्तर भारत में भी ऐसे तीन प्रकार के प्रदेश (प्रान्त) विद्यमान हैं। और यह क्रम पूर्ण रूप से कहीं भी नहीं घटता, तथापि भौगोलिक दृष्टि से सन्तोष जनक आवश्यक है ॥७॥
भवति चात्र—
शीतांशुः क्लेदयत्यूर्वा विवस्वान् शोषयत्यपि।
तावुभावपि संश्रित्य वायुः पालयति प्रजाः ॥८॥
शीतांशु—चन्द्रमा पृथ्वी को गीला-करता है, विवस्वान्-सूर्य पृथ्वी को सुखाता है। चन्द्रमा और सूर्य दोनों का आश्रय करके वायु प्रजा का पालन करती है। चन्द्रमा का आश्रय करके वायु जगत् में वृद्धि करता है, सूर्य का आश्रय करके
जगत् का शोषण करती है, इस से यथासमय रसोत्पत्ति होती है, जिससे कि प्रजा का पालन होता है।
वि० मन्तव्य—जहाँ पर चन्द्र, सूर्य तथा वायु की उक्त क्रिया जितनी ही व्यक्तरूप से होती रहती है वहाँ पर उतनी ही प्रजा (जनसंख्या) बढ़ती है ॥८॥
अथ खल्वयने द्वे युगपत् संवत्सरो भवति। ते तु पञ्च युगमिति संज्ञां लभन्ते। स एष निमेषादियुगपर्यन्तः काल-श्रकवत् परिवर्तमानः कालचक्रमित्युच्यत इत्येके ॥९॥
इन दोनों अयनों के एक साथ मिलने से संवत्सर बनता है। पाँच संवत्सरो के मिलने से एक युग बनता है। यह काल निमेष से लेकर युग पर्यन्त चक्र के समान घूमता हुआ—‘काल-चक्र’—नाम से कहा जाता है—ऐसा कई आचार्यों का मत है। “पाँचयुग=संवत्सरः, परिवत्सरः, इन्द्रावत्सरः, इद्वत्सरः वत्सरः-इत्येवं पञ्च वत्सराणि—ते पंचयुगमिति संज्ञा लभन्ते ॥” कौटिल्य ने भी पाँच वत्सर को युग कहा है।
वि० मन्तव्य—आयुर्वेदीय शल्यतन्त्र में ५ वर्ष का युग माना जाता है। कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी ५ वर्ष का ही युग माना गया है, यथा—‘पञ्चसम्बत्सरो युगमिति’ कौ० अ० शा० ४१। पुराणों में सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग का वर्णन भिन्न प्रकार से माना जाता है और स्मृतियों में भिन्न प्रकार से।
इह तु वर्षाभरद्वे मन्तवसन्तग्रीष्मप्रावृषः षड् ऋतुवो भवन्ति द्वाषोपचयप्रकोपशयनिमित्तं, ते तु भाद्रपदाद्येन द्विमासिकेन व्याख्याताः। तद्यथा—भाद्रपदाश्वयुजौ वर्षाः; कार्तिकमागशीर्षौ शरत्, पौषमाघौ हेमन्तः; फाल्गुनचैत्रौ वसन्तः, वैशाखज्येष्ठौ ग्रीष्मः, आषाढ़श्रावणौ प्रावृष्टि ॥
इस अध्याय में वर्षा, शरद, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म और प्रावृष्ट (वर्षा का प्रथम समय प्रावृष्ट कहाता है) ये छे ऋतुएँ वातादि दोषों के संचय, प्रकोप, प्रशमन में कारण हैं। ये छे ऋतुएँ भाद्रपद आदि दो दो मासों में उपलक्षित हैं। यथा—भाद्रपद-आश्विन में वर्षा; कार्तिक-मागशीर्ष में शरद; पौष-माघ में हेमन्त; फाल्गुन चैत्र में वसन्त; वैशाख-ज्येष्ठ में ग्रीष्म; आषाढ़-श्रावण में प्रावृष्ट ऋतु होती है।
वि० मन्तव्य—आयुर्वेद शल्यशास्त्र में वात, पित्त एवं कफ के संचय, प्रकोप तथा प्रशम को ध्यान में रखकर उक्त
१ सोम्याः खलु आपः अन्तरिक्षप्रभवाः प्रकृतिशीता लब्ध्याः अन्यत्तरस्राश्च। तास्तु अन्तरिक्षाद् भ्रश्यमाना भ्रष्टाश्च पंचमहा-भूतगुणसमन्विता जंगमस्थावराणां भूतानां मूर्तीरभिप्रीणमस्ति।
चरक० सू० अ० २६
अ० ६ ]
सूत्रस्थानम्
२३
६ ऋतु माने गये हैं। कायचिकित्सा के चरक ग्रन्थ में प्रावृत् को न मानकर, उधर शिशिर ऋतु माना है। सू० अ० ६। अस्तु, परन्तु च० वि० अ० ८ सू० १२७ में संशोधन को ध्यान में रखकर शिशिर न मानकर प्रावृत् ऋतु मान लिया गया है। विचार-विधि भेद से यह सब समीचीन है ॥ १० ॥
तत्र, वर्षास्रवोषधयस्तृणयोऽल्पवीर्या आपश्चाप्राशन्ताः क्षितिमलप्राया, ता उपयुज्यमाना नभसि मेघावतते जल प्रकिलञ्चायां भूमौ किलञ्चदेहानां प्राणिनां शीतवातविष्ट-भ्रितागन्तीनां विदहन्ते, विदाहात् पित्तसंचयमापाद-यन्ति; स संचयः शरदि प्रविरलमेवे विद्यत्युपशुष्यति पङ्कैऽर्ककिरणप्रबिलायितः पैत्तिकान् व्याधीञ्जनयति। ता एवोषधयः कालपरिणामात् परिणतवीर्या बलवत्यो हेमन्ते भवन्त्यापश्च प्राशन्ताः स्निग्धा अत्यर्थं गुर्ण्यश्च, ता उप-युज्यमाना मन्दकिरणत्वाद्वाहानोः सतुषारपवनोपस्तम्भित-देहानां देहिनामविदग्धाः स्नेहाच्छैत्याद् गौरवादुपलेपाच्च श्लेष्मसंचयमापादयन्ति; स संचयो वसन्तेऽर्करश्मिप्रवि-लायित ईषस्तन्धदेहानां देहिनां श्लेष्मिकान् व्याधीञ्-जनयति। ता एवोषधयो निदाये निःसारा रुक्षा अतिमात्रं लक्ष्यो भवन्त्यापश्च, ता उपयुज्यमाना सूर्यप्रतापोपशोषित-देहानां देहिनां रौक्ष्याल्लघुत्वोच्च वायोः संचयमापाद-यन्ति; स संचयः प्रावृषि चतयर्थं जलोपकिलञ्चायां भूमौ किलञ्चदेहानां देहिनां शीतवातवर्षेरितो वातिकान् व्याधी-ञ्जनयति। एवमेव दोषाणां संचयप्रकोपहेतुरुक्तः ॥
इन ऋतुओं में वर्षा ऋतु के अन्दर वनस्पतियाँ तरुण--(सार रहित कमजोर) अल्पशक्ति हो जाती हैं। पानी भी अस्वच्छ हो जाता है; भूमि भी मल-मूत्र आदि से दूषित होती है। वनस्पतियाँ और जल आकाश के मेघों से व्याप्त होने तथा जल द्वारा भूमि के गीली होने से; शीत एवं वायु से मन्द की हुई अग्निवाले, तथा किलञ्च शरीरवाले प्राणियों में अम्लता को प्राप्त हो जाते हैं। अम्लपाक होने से शरीर में पित्त का संचय करते हैं। यह संचय ऋतु के शीत के कारण उस समय कुपित न होकर शरद् ऋतु में, आकाश में मेघों के साफ हो जाने से, भूमि के कीचड़ के सूखने से, सूर्य की किरणों से पिघलकर पित्तजन्य रोगों को उत्पन्न करता है। और यही औषधियाँ हेमन्त ऋतु में काल के परिपाक से शक्तिशाली परि-पक्व वीर्यवाली हो जाती हैं। और पानी भी निर्मल, स्निग्ध और अत्यन्त भारी हो जाते हैं। इस ऋतु में सूर्य की किरणों के मन्द होने से, वर्षा से मिली गीली वायु के कारण स्तम्भित बने पुरुषों में इन वनस्पति तथा जल के उपयोग से, मधुरपाक होने के कारण, स्नेह से, शीतलता से, भारीपन तथा चिकने-
पन से कफ का संचय हो जाता है। यह संचय वसन्त ऋतु में थोड़े आलसी बने शरीरवाले पुरुषों में-सूर्य की किरणों से पिघलकर (अन्न द्रव्य आदि) कफ जन्य रोगों को उत्पन्न करता है। और ये ही औषधियाँ एवं पानी ग्रीष्म ऋतु में सार रहित, निर्बल रुक्ष और बहुत अधिक हल्की हो जाती हैं। इन वनस्प-तियों के साथ पानी के सेवन से, सूर्य की गरमी से शुष्क शरीर-वाले पुरुषों में—रुक्ष (स्नेह के अभाव) लघु और विशदगुण के कारण वायु का संचय इस ऋतु में होता है। यह वायु-संचय प्रावृत् ऋतु में पानी के कारण भूमि के बहुत अधिक तर होने से; आर्द्र शरीरवाले पुरुषों में-शीतल-वायु-वर्षा के कारण वात-जन्य रोगों को उत्पन्न करता है। इस प्रकार वात आदि दोषों के संचय एवं प्रकोप के कारण कह दिये हैं ॥ ११ ॥
तत्र वर्षाहेमन्तग्रीष्मेषु संचितानां दोषाणां शरद्-व-सन्तप्रावृट्सु च प्रकृपितानां निर्हरणं कर्तव्यम् ॥ १२ ॥
वर्षा, हेमन्त और ग्रीष्म ऋतु में संचित वात आदि दोषों को, तथा शरद् वसन्त और प्रावृट् काल में कुपित पित्तादि दोषों को वमन आदि द्वारा निकालना चाहिये। यह निःसारण ऋतु के पिछले मास में करना चाहिये, यथा-पित्त का संशोधन मार्गशीर्ष में, कफ का निर्हरण-चैत्र में, वात का श्रावण मास में संशोधन करना चाहिये ॥ १२ ॥
तत्र पैंत्तिकानां व्याधीतामुपशमो हेमन्ते, श्लैष्मिकाणां निदाये, वातिकानां शरदि, स्वभावत एव, त एते संचय-प्रकोपोपशमा व्याख्याताः ॥ १३ ॥
उपशम कहते हैं—
कालस्वभाव के कारण ही पित्तजन्य रोगों की शान्ति हेमन्त में, कफजन्य रोगों की ग्रीष्म में और वातजन्य रोगों की शान्ति शरद् ऋतु में होती है। इस प्रकार से दोषों का संचय, प्रकोप और प्रशम कह दिये हैं ॥ १३ ॥
तत्र, पूर्वान्नि वसन्तस्य लिङ्गं, मध्याह्नि ग्रीष्मस्य, अप-राह्नि प्रावृषः, प्रदोषे वार्षिकं, शारदमर्धरात्रे, प्रत्युषसि हेमन्तमुपलक्षयेत्; एवमहोरात्रमपि वर्षमिव शीतोष्णव-र्षलक्षणं दोषोपचयप्रकोपोपशमैर्जीनीयात् ॥ १४ ॥
सांवत्सरिक विधि को दिन रात में कहते हैं—
दिन के पूर्वार्ध में वसन्त ऋतु के लक्षण (कफ प्रकोप) होते हैं मध्याह्न में ग्रीष्म के लक्षण (वात संचय), अपराह्न में प्रावृट् के (वात प्रकोप); प्रदोष-रात्रि के पूर्व भाग में वर्षा के (पित्त संचय), आधीरात में शरद् ऋतु के (पित्त प्रकोप), रात्रि के अन्तिम भाग में—उषःकाल में हेमन्त के (कफसंचय) लक्षण होते हैं। इस प्रकार से दिन रात में भी वर्ष भर की, शीत, उष्णिमा, और वर्षा (वर्षा हेमन्त ग्रीष्म ऋतु) की भाँति दोषों का संचय, प्रकोप एवं प्रशम होता है ॥ १४ ॥
२४
मुमुक्षुस्थानम्
[ ३० ]
तत्र, अद्यापन्नेषु ऋतुष्वन्यापन्ना ओषधयो भवन्त्याप्यत्र, ता उपयुज्यमानाः प्राणायुर्बलवीर्यौजस्कयो भवन्ति ॥ १५ ॥
अव्यापन्न—आदृषित ऋतुओं में गेहूँ-चने आदि वनस्पतियाँ तथा पानी निर्दोष होते हैं। इन वनस्पति तथा पानी के उपयोग से—अग्निसोमीय रूपी प्राण शरीर-इन्द्रिय-सत्त्व-आत्मा के संयोग रूपी आयु, उत्साह रूपी बल, शक्ति, सप्त धातुओं का स्नेह रूपी हृदयाश्रित ओज बढ़ता है ॥ १५ ॥
तेषां पुनर्न्यपदोऽष्टककारिता, शीतोष्णवातवर्षाणि खलु विपरीतान्योषधीन्यांपादयन्त्यप्यत्र ॥ १६ ॥
इन ऋतुओं में विपरीतता का कारण अधर्म है। शीत, उष्ण, वायु और वर्षा के विपरीत (हीन, मिथ्या, अतियोग) होने से ओषधियाँ एवं जल भी दूषित बन जाते हैं—अपने स्वाभाविक गुण-धर्म को छोड़ बैठते हैं। (सर्वेषामप्यग्निवेश यद् वैगुण्यमुत्पद्यते तस्य मूलमधर्मः। तन्मूलं वाऽसत्कर्म पूर्वकृतं, तयोः योनिः प्रज्ञापराध एव। चरक) ॥ १६ ॥
तासां सुपयोगाद्विषधरोगप्रादुर्भावो मरको वा भवेदिति ॥
इस प्रकार के दूषित अन्न-पान के सेवन से नाना प्रकार के रोग होते हैं अथवा-महामारी फैलती है१ ॥१७॥
तत्र, अद्यापन्तानां सोषधीनामपां चोपयोगः ॥ १८ ॥
इस अवस्था में (ऋतु के विपरीत होने पर) अधूषित वनस्पतियों का तथा पानी का उपयोग करना चाहिये। पुराना अन्न एवं अव्यापन्न पानी का उपयोग करना चाहिये। इस लिये कहा है—“तस्मात् प्रागुद्वर्षसात् प्राक् च भूमैः विरसीभावाद् उद्वरश्च भेषज्यानि”—इत्यादि ॥१८॥
कदाचिदव्यापन्नेष्वपि ऋतुषु कृत्याभिशापरक्षः क्रोधाधर्मरूपध्वस्यन्ते जनपदाः, विषोषधिपुष्पगन्धेन वा वायुनोपनोतेनाकन्यते यो देशस्तत्र दोषप्रकृत्यविशेषेण कासश्वासवमथुप्रतिशयाशिरोरुह्वरैरुपतप्यन्ते, ग्रहनक्षत्रचरितैर्वा, गृह्वाशयनासनयानवाहनमणिरत्नोपकरणगहि-तलक्षणनिमित्तप्रादुर्भावैर्वा ॥ १९ ॥
ऋतु व्यापत्ति के बिना भी कई बार (सदा नहीं) कृत्या (मन्त्रों द्वारा की हुई राक्षसी क्रिया), अभिचारी, अभिशाप (गुरु-सिद्ध आदि द्वारा दिया शाप) हिसक प्रवृत्तिवाले राक्षसों के क्रोध से, काय, वाणी एवं मन के अधर्म से जनपद नष्ट हो जाते हैं। विष युक्त औषधि, या विषैले फूल की गन्ध वायु द्वारा जिन देशों के समीप पहुँचती है, वहाँ पर दोष, प्रकृति की अभिन्नता से कास, श्वास, वमन, प्रतिशयाय, शिर-वेदना, ज्वर
१ देखिये विस्तार के लिये-चरक-वि-अ-३।
होते हैं। अथवा-आदित्य आदि ग्रहों के तथा अश्विनी आदि नक्षत्रों के गति विशेष से, या घर, भार्या, पलंग, आसन, यान, सवारी, मणि, रत्न आदि उपकरणों के निन्दित लक्षणों के होने से (अकस्मात् घर के गिरने से, बार बार कम्पन होने से) जनपद नष्ट होते हैं१। (तथाऽभिशापप्रभवस्याप्यधर्म एव हेतुर्भवति। ये लुप्तधर्माणिः धर्मादपेतास्ते गुरुहृद्वसिद्धिपूज्यानवसत्याहितानि आचरन्ति, ततस्ताः प्रजा गुर्वादिभिरभिशाता भस्मतामुपयान्ति, प्रागेवानेककुलविनाशाय, नित्यप्रत्ययोपलम्भाद् अनियताश्चापरे) ॥१९॥
तत्र स्थानपरित्यागशान्तिकर्मप्रायश्चित्तमङ्गलजपहो-सोपहारैरज्याञ्जलिनभस्कारतपोनियमदयादानदीक्षाभ्युपगमदेवताब्राह्मणगुरुपदैर्भवितन्यम, एवं साधु भवति ॥
सामान्यचिकित्सा—अधर्म के कारण ऋतु व्यापत्ति होने से दैव व्यपाश्रय औषध कहते हैं—स्थान का परित्याग, शान्तिकर्म, वेदोक्तमंत्रों से यजन, प्रायश्चित्त-तप, प्रशस्त मणि आदि मंगल वस्तु का धारण, जप, होम, उपहार, देवता बलि, इज्या (याग), अञ्जलि-भक्ति से हाथों को जोड़ना, नमस्कार-प्रणाम, तप, नियम-मौन, दया, दान, दीक्षा, अभ्युपगम गुरुवाक्य आदि को स्वीकार करना देवता-ब्राह्मण, गुरु की सेवा करनी चाहिये। इस प्रकार करने से कुशल होता है। (येषां न मृत्युसामान्यं सामान्यं न च कर्मणाम्। कर्म पंचविधं तेषां भेषजं परमुच्यते। हितं जनपदानां च शिवानामुपसेवनम् ॥ इत्यादि) ॥ २० ॥
अत ऊर्ध्वमन्यापन्तभूतूनां लक्षणान्युपदेक्ष्यामः ॥२१॥
वायुवार्त्त्युत्तरः शीतो रजोधूमाम्कुला दिशः।
छन्तस्तुषारैः सविता हिमान्द्रा जलाशयाः ॥२२॥
दपिता ध्वाङ्खुखड्गगृह्महिपोरभ्रकुञ्जराः।
रोद्रप्रियङ्कुपुनगाः पुषिता हिमसाहृये ॥२३॥
इसके आगे अव्यापन्न ऋतुओं के लक्षण कहते हैं।
हेमन्तऋतु में—उत्तर दिशा की वायु चलती है। दिशायैर्धूलि-धूम कोहरे से व्याप्त होती है। सूर्य तुषार से चिरा होता है, जलाशय-वर्ष से ढपे होते हैं। कौवे, गैंडा, मैसा, मेढ़ा एवं हाथी प्रसन्न रहते हैं। लोषप्रियगु—तथा पद्मकेशर खड्गखिलता है ॥ २१-२३ ॥
गिरिशिरे शीतमधिकं वातवृष्ट्याकुला दिशः।
शेषं हेमन्तवत् सर्वं विज्ञेयं लक्षणं वृष्टेः ॥ २४ ॥
शिशिरे ऋतु में शीत अधिक रहता है, दिशायैर्वात से मिश्रित वृष्टि से व्याप्त रहती है। शेष सब लक्षण विद्वानों की हेमन्त के समान समझना चाहिये ॥ २४ ॥
देखिये-महाभारत-शान्तिपर्व में—‘गोवत्सं बडवा सूते, स्वाशुगालं महीपते।’