सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
१५
पदं पादं श्लोकं वा, ते च पदपादश्लोका भूयः क्रमेणानुसन्धेयाः, एवमेकैकशो घटयेदात्मना चानुपठेतु, अद्वृत्तमविलम्बितमविशङ्कितमननुनासिकं सुव्यक्ताक्षरमपीडितवर्णमक्षिध्रवौष्ठहस्तेरनभिनीतं सुसंस्कृतं नाण्युच्चैनीतिनीचैश्च स्वरेः पठेतु । न चान्तरेण कश्चिद् ब्रजेत तयोरधीयानयोः ॥१४॥
हे वत्स ! यह आयुर्वेद जिस प्रकार पढ़ना चाहिये वह सुझाये कहा हुआ सुनो । नैतिक कार्य करके पवित्र होने पर उत्तरीय वस्त्र धारण करके एकाग्रचित्त से अभिवादन करके अध्ययन काल के उपस्थित होने पर शिष्य के लिये गुरु यथाशक्ति ( शिष्य की उत्तम, मध्यम अवय बुद्धि से ) पद, (सुप्तिष्ठन्त) पाद ( श्लोक का एक चरण ) अथवा श्लोक का (चारों चरण) पढ़ाये और ये पद, पाद श्लोक फिर बार-बार क्रम से घटित करे शिष्य को समझाये ।
पाठ करने की विधि—नतो बहुत जल्दी, न बहुत रुक रुक कर, बिना भय के, बिना नासिका स्वर के, साफ अक्षर (उच्चारणों) से, वर्ण को बिना खाये (दवाये), आँख, भू, ओठ, हाथों को बिना चलाये-नचाये, साफ मधुर आवाज से, न बहुत ऊँचे न बहुत नीचे-मध्यम स्वर से पाठ करे । पढ़ते हुए गुरु शिष्य के बीच में कोई न आये ॥१५॥
(चरक में—यह विधि विस्तार से दी है१))
भवतश्चात्र —
शुचिर्गुरुपरो दक्षस्तन्द्रानिद्राविवर्जितः ।
पठन्नेतेन विधिना शिष्यः शास्त्रान्तमाप्नुयात् ॥१५॥
कहा भी है—
बाह्य और अन्दर की पवित्रता से, गुरु के कार्य में तत्पर चतुर, आलस्य रहित होकर इस विधि से जो शिष्य पढ़ता है, वह इस शास्त्र की समाप्ति तक पहुँचता है ॥१५॥
वाकसौष्ठवेऽर्थविज्ञाने प्रागहस्ये कसन्तिपुणे । तदभ्यासे च सिद्धौ च यतेयाध्ययनान्तगः ॥१६॥
अतिसुष्ठ वाणी के, अर्थज्ञान के, धृष्टता, उत्साह, कर्मनिपुणता, कर्म के अभ्यास में, तथा वाञ्छित अर्थ की सिद्धि में यत्न करता रहे ।
वि० मन्तव्य—पढ़ने के अन्त में प्रतिदिन वाणी की
१ यथा—अध्ययनविधिः—कल्पः कृतचणः प्रातस्छयायोपन्युपं वा कृत्वाऽऽवश्यकमुपास्य उपस्पृश्यादकं देवपिणोद्वाहणगुरुवृद्धिसिद्धाचार्यम्यो तमस्कृत्य समे शुचौ देशे सुखोपविष्टः मनःपुरःसराभिवर्गभिः सूत्रमनुक्रामन् पुनः पुनरावर्त्येदं बुद्ध्या सम्यग् अनुप्रविश्यार्थतत्त्वं स्वदोषपरिहारार्थं परदोषप्रमाणार्थं च । एवं मध्यदिनेऽपराह्ने रात्रौ च शस्वदं अपरिहापयन्मध्ययनमभ्यस्येतु ।
चरक वि० अ० ८ ।
सुष्ठुता = वाक्योच्चारण की सुन्दरता में, अर्थों को विशेषरूप से जानने में, प्रतिभा (नवीन र सूक्ष्म) की प्राप्ति में, चिकित्सा विषयक कार्य कौशल में, शास्त्राभ्यास में या उक्त कार्यों के अभ्यास ( बार र करने ) में तथा सिद्धि ( सफलता ) के पूर्ण करने में प्रयत्न करे—करता रहे ॥१५॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽध्ययनसंप्रदानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
चतुर्थोऽध्यायः
अथातः प्रभाषणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
पढ़े हुए शास्त्र को फिर अर्थ रूप में व्याख्यान करने का नाम 'प्रभाषण' है । उसी प्रभाषणीय अध्याय को कहते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिए कहा था ॥१,२॥
अधिगतमप्यध्ययनमप्रभाषितमर्थतः खरस्य चन्दनभार इव केवलं परिश्रमकरं भवति ॥३॥
पढ़ा हुआ शास्त्र यदि अर्थ पूर्वक जाना न जाये, तो वह गधे के चन्दन के बोझ के समान केवल निरर्थक (परिश्रम-कारक) होता है ॥३॥
भवति चात्र —
यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य चेत्ता न तु चन्दनस्य । एवं हि शास्त्राणि बहुन्यधीत्य चार्थेषु मृदाः खरवद्रहन्ति ॥
कहा भी है—
जिस प्रकार गधा केवल चन्दन बोझ को उठानेवाला होता है, वह चन्दन की सुगन्ध को नहीं जानता, इसी प्रकार जो शिष्य बहुत से शास्त्रों को केवल पढ़ लेते हैं, अर्थ को नहीं समझते, वे केवल बोझ को उठानेवाले होते हैं ॥४॥
तस्मात् सविज्ञमध्यायगतमनुपदपादश्लोकमनुवर्णयितव्यमनुश्रोतव्यं च, कस्मात् ? सूक्ष्मा हि द्रव्यरसगुणवीर्यविपाकदोषधातुमलाशयमर्मसिरास्नायुसन्ध्यस्थिगर्भसंभवद्रव्यसमूहविभागास्तथा प्रतृष्टश्लयोद्घरणत्रणविनिश्चयभग्नविकल्पाः साध्ययाप्यप्रत्याख्येयता च विकाराणासेवमादयश्चान्ये विशेषाः सहस्रशो ये विचिन्त्यमाना विमलविपुलबुद्धेरपि बुद्धिमाकुलीकुतुः किं पुनरल्पबुद्धेः ? तस्मादवश्यमनुपदपादश्लोकमनुवर्णयितव्यमनुश्रोतव्यं च ॥५॥
इसीलिए उत्तरतन्त्र के साथ एक सौ बीस अध्याय पद, पाद-पाद, श्लोक-श्लोक करके आचार्य को व्याख्यान करना चाहिये शिष्य को सुनना चाहिये । क्योंकि—द्रव्य (स्थावरादि), रस (मधुरादि), गुण (गुर्वादि), वीर्य (शीत-उष्ण), विपाक (मधुरादि), दोष (वातादि), धातु (रसादि), मल (स्वेदादि), आशय (कोष्ठादि), गर्भ, शिरा, स्नायु, सन्धि,