सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
अ० ४ ]
सूत्रस्थानम्
१५
पदं पादं श्लोकं वा, ते च पदपादश्लोका भूयः क्रमेणानुसन्धेयाः, एवमेकैकशो घटयेदात्मना चानुपठेतु, अद्वृत्तमविलम्बितमविशङ्कितमननुनासिकं सुव्यक्ताक्षरमपीडितवर्णमक्षिध्रवौष्ठहस्तेरनभिनीतं सुसंस्कृतं नाण्युच्चैनीतिनीचैश्च स्वरेः पठेतु । न चान्तरेण कश्चिद् ब्रजेत तयोरधीयानयोः ॥१४॥
हे वत्स ! यह आयुर्वेद जिस प्रकार पढ़ना चाहिये वह सुझाये कहा हुआ सुनो । नैतिक कार्य करके पवित्र होने पर उत्तरीय वस्त्र धारण करके एकाग्रचित्त से अभिवादन करके अध्ययन काल के उपस्थित होने पर शिष्य के लिये गुरु यथाशक्ति ( शिष्य की उत्तम, मध्यम अवय बुद्धि से ) पद, (सुप्तिष्ठन्त) पाद ( श्लोक का एक चरण ) अथवा श्लोक का (चारों चरण) पढ़ाये और ये पद, पाद श्लोक फिर बार-बार क्रम से घटित करे शिष्य को समझाये ।
पाठ करने की विधि—नतो बहुत जल्दी, न बहुत रुक रुक कर, बिना भय के, बिना नासिका स्वर के, साफ अक्षर (उच्चारणों) से, वर्ण को बिना खाये (दवाये), आँख, भू, ओठ, हाथों को बिना चलाये-नचाये, साफ मधुर आवाज से, न बहुत ऊँचे न बहुत नीचे-मध्यम स्वर से पाठ करे । पढ़ते हुए गुरु शिष्य के बीच में कोई न आये ॥१५॥
(चरक में—यह विधि विस्तार से दी है१))
भवतश्चात्र —
शुचिर्गुरुपरो दक्षस्तन्द्रानिद्राविवर्जितः ।
पठन्नेतेन विधिना शिष्यः शास्त्रान्तमाप्नुयात् ॥१५॥
कहा भी है—
बाह्य और अन्दर की पवित्रता से, गुरु के कार्य में तत्पर चतुर, आलस्य रहित होकर इस विधि से जो शिष्य पढ़ता है, वह इस शास्त्र की समाप्ति तक पहुँचता है ॥१५॥
वाकसौष्ठवेऽर्थविज्ञाने प्रागहस्ये कसन्तिपुणे । तदभ्यासे च सिद्धौ च यतेयाध्ययनान्तगः ॥१६॥
अतिसुष्ठ वाणी के, अर्थज्ञान के, धृष्टता, उत्साह, कर्मनिपुणता, कर्म के अभ्यास में, तथा वाञ्छित अर्थ की सिद्धि में यत्न करता रहे ।
वि० मन्तव्य—पढ़ने के अन्त में प्रतिदिन वाणी की
१ यथा—अध्ययनविधिः—कल्पः कृतचणः प्रातस्छयायोपन्युपं वा कृत्वाऽऽवश्यकमुपास्य उपस्पृश्यादकं देवपिणोद्वाहणगुरुवृद्धिसिद्धाचार्यम्यो तमस्कृत्य समे शुचौ देशे सुखोपविष्टः मनःपुरःसराभिवर्गभिः सूत्रमनुक्रामन् पुनः पुनरावर्त्येदं बुद्ध्या सम्यग् अनुप्रविश्यार्थतत्त्वं स्वदोषपरिहारार्थं परदोषप्रमाणार्थं च । एवं मध्यदिनेऽपराह्ने रात्रौ च शस्वदं अपरिहापयन्मध्ययनमभ्यस्येतु ।
चरक वि० अ० ८ ।
सुष्ठुता = वाक्योच्चारण की सुन्दरता में, अर्थों को विशेषरूप से जानने में, प्रतिभा (नवीन र सूक्ष्म) की प्राप्ति में, चिकित्सा विषयक कार्य कौशल में, शास्त्राभ्यास में या उक्त कार्यों के अभ्यास ( बार र करने ) में तथा सिद्धि ( सफलता ) के पूर्ण करने में प्रयत्न करे—करता रहे ॥१५॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽध्ययनसंप्रदानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
चतुर्थोऽध्यायः
अथातः प्रभाषणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
पढ़े हुए शास्त्र को फिर अर्थ रूप में व्याख्यान करने का नाम 'प्रभाषण' है । उसी प्रभाषणीय अध्याय को कहते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिए कहा था ॥१,२॥
अधिगतमप्यध्ययनमप्रभाषितमर्थतः खरस्य चन्दनभार इव केवलं परिश्रमकरं भवति ॥३॥
पढ़ा हुआ शास्त्र यदि अर्थ पूर्वक जाना न जाये, तो वह गधे के चन्दन के बोझ के समान केवल निरर्थक (परिश्रम-कारक) होता है ॥३॥
भवति चात्र —
यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य चेत्ता न तु चन्दनस्य । एवं हि शास्त्राणि बहुन्यधीत्य चार्थेषु मृदाः खरवद्रहन्ति ॥
कहा भी है—
जिस प्रकार गधा केवल चन्दन बोझ को उठानेवाला होता है, वह चन्दन की सुगन्ध को नहीं जानता, इसी प्रकार जो शिष्य बहुत से शास्त्रों को केवल पढ़ लेते हैं, अर्थ को नहीं समझते, वे केवल बोझ को उठानेवाले होते हैं ॥४॥
तस्मात् सविज्ञमध्यायगतमनुपदपादश्लोकमनुवर्णयितव्यमनुश्रोतव्यं च, कस्मात् ? सूक्ष्मा हि द्रव्यरसगुणवीर्यविपाकदोषधातुमलाशयमर्मसिरास्नायुसन्ध्यस्थिगर्भसंभवद्रव्यसमूहविभागास्तथा प्रतृष्टश्लयोद्घरणत्रणविनिश्चयभग्नविकल्पाः साध्ययाप्यप्रत्याख्येयता च विकाराणासेवमादयश्चान्ये विशेषाः सहस्रशो ये विचिन्त्यमाना विमलविपुलबुद्धेरपि बुद्धिमाकुलीकुतुः किं पुनरल्पबुद्धेः ? तस्मादवश्यमनुपदपादश्लोकमनुवर्णयितव्यमनुश्रोतव्यं च ॥५॥
इसीलिए उत्तरतन्त्र के साथ एक सौ बीस अध्याय पद, पाद-पाद, श्लोक-श्लोक करके आचार्य को व्याख्यान करना चाहिये शिष्य को सुनना चाहिये । क्योंकि—द्रव्य (स्थावरादि), रस (मधुरादि), गुण (गुर्वादि), वीर्य (शीत-उष्ण), विपाक (मधुरादि), दोष (वातादि), धातु (रसादि), मल (स्वेदादि), आशय (कोष्ठादि), गर्भ, शिरा, स्नायु, सन्धि,
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ५ ]
अस्थि, गर्भोत्पत्ति के कारण द्रव्य ( शुक्र-शोणित ) समूहों का विभाग, इसी प्रकार-त्वचादि में छिपे शल्य का निकालना, वातादि के भेद से व्रण का निश्चय, भ्रम के भेद ( अनेक प्रकार के), रोगों का साध्य, याप्य, और असाम्य भेद आदि की दृष्टि से हजारों प्रकार के भेद बन जाते हैं। इन भेदों का चिन्तन ज्ञान बहुत विशाल बुद्धिवाले मनुष्य की बुद्धि को भी विचलित कर देता है, फिर अल्प बुद्धिवाले मनुष्य का क्या कहना ? इसलिये आचार्य को अवश्य ही एक-एक पद, पाद और श्लोक की व्याख्या भली प्रकार करनी चाहिये, और शिष्य को सुननी चाहिये ॥५॥
अन्यशास्त्रोपपन्नानां चार्थानामिहोपनीतानामर्थवशा तेषां तद्विधेभ्य एव व्याख्यानमनुश्रोतव्यं, कस्मात् ? न ह्येकस्मिन् शास्त्रे शक्यः सर्वशास्त्राणामवरोधः कर्तुम् ॥
प्रयोजन वश जो व्याकरण, सांख्य, न्याय, वैशेषिक, ज्योतिष शास्त्र आदि यहाँ इस शास्त्र में आये हैं—उन शास्त्रों को उन शास्त्रों के ज्ञाताओं से समझना और सुनना चाहिये। क्योंकि—एक ही शास्त्र में सब शास्त्रों का समावेश करना असम्भव है ॥६॥
भवति चात्र—
एकं शास्त्रमधीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम् ।
तस्माद्विदुह्रतः शास्त्रं विज्ञानीयाच्चिकित्सकः ॥७॥
कहा भी है—एक ही शास्त्र को पढ़नेवाला व्यक्ति शास्त्र के निश्चय को नहीं जान सकता। इसलिये जिसने बहुत से शास्त्र पढ़े हों वही चिकित्सक शास्त्र को समझ सकता है ॥७॥
शास्त्रं गुरुमुखोद्गीर्णसादायोपास्य चासक्तु ।
यः कर्म कुरुते वैद्यः स वैद्योऽन्ये तु तस्कराः ॥८॥
गुरु के मुख से उपदेश किये शास्त्र को ग्रहण करके, पाठ एवं अर्थ द्वारा बार-बार अभ्यास करके जो वैद्य कर्म करता है वह वैद्य है, शेष सब चोर हैं१ ॥८॥
औपधेनवमौरश्च सौश्रुतं पौष्कलावतम् ।
शेषाणां शल्यतन्त्राणां मूलान्येतानि निर्दिशेत् ॥९॥
गूढ़ार्थ को समझने के लिये जिन तन्त्रों को समझना चाहिये उनको व्याज से कहते हैं। औपधेनव, औरश्च, सुश्रुत, पौष्कल, करवीर्य, गोपुररक्षित आदि शेष शल्य तन्त्रों में यही तन्त्र प्रधान है ॥९॥
इति सुश्रुतसंहितायां स्वस्थाने प्रभाषणीयो नाम
चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
१ ये तु शास्त्रविदो दक्षाः शुचयः कर्मकोविदाः ।
जितहस्ता जितात्मानस्तेभ्यो नित्यं कृतं नमः ॥ चरक ।
पञ्चमोऽध्यायः
अथातोऽग्नोपहरणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे यन्त्रादि के सम्भार को बताने के लिये 'अग्नी-पहरणीय' नामक अध्याय कहते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिए कहा था ॥१,२॥
त्रिविधं कर्म—पूर्वकर्म, प्रधानकर्म, पश्चात्कर्मतिः तद्व्याधिं प्रति उपदेक्ष्यामः ॥३॥
कर्म तीन प्रकार का है—पूर्व कर्म (शस्त्रावचरण से पूर्व), प्रधान कर्म (शस्त्र कर्म) और पश्चात्कर्म (शस्त्रावचरण के पीछे का कर्म), इन कर्मों का उपदेश प्रत्येक व्याधि में करेंगे, यहाँ पर विस्तारमय से नहीं कहा१ ।
वि० मन्तव्य—कर्म-छेदन आदि शस्त्रकर्म तथा वमन-विरेचन आदि काय-चिकित्सा का नाम है। प्रधान कर्म के पूर्व जो उपचार किये जाते हैं ये 'पूर्वकर्म' तथा पश्चात् (पीछे) जो उपचार किये जाते हैं वे 'पश्चात्कर्म' कहे जाते हैं।
सम्भार (सामग्री) अर्थात् चिकित्सा कर्म में उपयोगी या आवश्यक सहायक वस्तुएँ। परिकर्मी—चिकित्सक के सहायक, इधर उधर का सब काम करनेवाले, कर्मचारी ॥३॥
अस्मिन्तु शास्त्रे शस्त्रकर्मंप्राधान्याच्छस्त्रकर्मैव तावत् पूर्वमुपदेक्ष्यामस्तत्सम्भाराश्च ॥४॥
इस शास्त्र में शस्त्र कर्म की प्रधानता है। इसलिये सबसे प्रथम शस्त्र कर्म को तथा इसके द्रव्य सम्भारों कहते हैं ॥४॥
तच्च शस्त्रकर्मोष्ट्रविधः, तद्यथा—छेद्यं, भेद्यं, लेख्यं, वेध्यम्, एष्यम्, आहार्यं, विज्ञाव्यं, सौव्यमिति ॥५॥
यह शस्त्र कर्म आठ प्रकार का है। यथा—छेद्य (भगन्दर आदि का दो करना), भेद्य (विद्रधि आदि का विदारना), लेख्य (उपजिहिका आदि का लेखन), वेध्य (छोटे मुखवाले शस्त्रों से वेंचना-शिरा आदि में छेद करना), एष्य (शलाका आदि से नाड़ी व्रण आदि का दूँटना), आहार्य (दन्त आदि का निकालना), विज्ञाव्य (विद्रधि आदि में जलौका आदि से खून बहाना), सौव्य (पद्मकोप आदि में सीना)। वामट ने—उत्पाटन, कुष्ठन, मन्थन, ग्रहण और दाहन कर्म
१ कई आचार्य इसका यह अर्थ करते हैं—
'लंघनादि विरेकान्तं पूर्वकर्म व्रणस्य च । पाचनं रोपणं यच्च प्रधानं कर्म तत्समूतम् । बलवर्णनिकार्यं तु पश्चात्कर्म समादिशेत् ॥
अ० ५ ]
सूत्रस्थानम्
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अधिक माने हैं। चरक ने शस्त्र कर्म छे प्रकार का माना है। यथा—पाटनं व्यधनं चैव छेदनं लेखनं तथा। प्रच्छनं सीवनं चैव षड्विधं शस्त्रकर्म तत् ॥५॥
अतोऽन्यतमं कर्म चिकीर्षता वैद्येन पूर्वमेवोपकल्पयितव्यानि भवन्ति। तद्यथा—यन्त्रशस्त्रक्षारान्निशलाकाशुङ्गजलोकालावृजाश्वबौष्टपिचुप्रो( सो )तसूत्रपत्रपट्टमधुघृतवसापयस्तेलतर्पणकषायालेपनकल्कन्यजनशोतोष्णोदक्कटहिदीनि,परिकर्माणश्च स्निग्धाःस्थिरा बलवन्तश्च । पुनः इन आठों में से कोई एक भी कार्य करने से पूर्व वैद्य की निम्न वस्तुएँ तैयार कर लेनी चाहिये। यथा—यन्त्र, शस्त्र, क्षार, अग्नि, शलाका, शुङ्ग, जाँक, अलावू, जाम्बवौष्ट (जामुन के समान मुखवाला लौह से बना यन्त्र जलाने के लिये), पिचु (रूई का पोया), प्रोत (कपड़े का टुकड़ा), सूत्र (धागे) पत्र (केले-एरण्ड आदि के), पट्ट (रेशमी वस्त्र-पट्टियाँ), शहद, घी, वसा, दूध, तैल, तर्पण (वृत्तिकारक अन्न सक्तू दूध), कषाय (व्रण शोधनादि द्रव्य कृत कषाय) आलेपन (प्रलेप), कल्क (क्षत में लगाने लायक लेप), पंखा, ठण्डा-गरम पानी, कड़ाही आदि लोहे के बने पात्र, सब कर्मों को करनेवाले स्निग्ध-अनुरक्त, दृढ़ एवं बलवान् परिचारक तैयार कर लेने चाहिये। (चरक में भी उपकल्पनीय अध्याय में समारम्भ एकत्रित करने का विधान है) ॥६॥
ततः प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रेषु दध्यक्षतात्र-पानरत्नैरग्नि विप्रान् भिषजश्चाचर्यित्वा, कृतबलिमङ्गलस्वस्तिवाचनोलघु मुक्तवन्तं प्राङ्मुखमातुरमुपवेश्य, यंत्रयित्वा, प्राङ्मुखो वैद्यो मर्म्मसिरास्नायुसन्ध्यस्थिधमनीः परिहरन्, अनुलोमं गच्छ निदध्यादाप्यदर्शनात्, सकृदेवापहरेच्छस्त्रमाशु च, महत्स्वपि च पाकेषु दध्यगुलान्तरं व्यङ्गुलान्तरं वा शस्त्रपदमुक्तम् ॥७॥
प्रधानकर्म —इसके पश्चात् श्रेष्ठ तिथि, करण, मुहूर्त, नक्षत्र में दधि, अक्षत, खान-पान, रत्नों से अग्नि, ब्राह्मणों और वैद्यों की पूजा करके, बलि (पूजोपहार), मंगल (गीतादि), स्वस्ति-वाचन (आशीर्वाद उच्चारण) करके, रोगी को थोड़ा सा अन्न खिलाकर, रोगी का मुख पूर्व दिशा में रखते हुए बिठाये। रोगी को मली प्रकार बाँध दे जिससे हिले नहीं। फिर वैद्य भक्षिम की ओर मुख करके—सिरा, स्नायु, सन्धि, अस्थि और धमनी को बचाकर लोगों के अनुकूल यथायोग्य शस्त्र को पूय (पीब) के निकलने तक गहरा चलाये। शस्त्र को एक बार ही और शीघ्रता से चलाना चाहिये। बहुत बड़े पाक में भी दो अंगुल या तीन अंगुल तक परिमित लम्बा शस्त्र का घाव करना चाहिये। घाव की गम्भीरता व्रण की अपेक्षा से है। अरुणदत्त
का कहना है कि दो या तीन अंगुल के बीच में दूसरा व्रण नहीं करना चाहिये।
वि० मन्तव्य—यन्त्रयित्वा—रोगी को बाँधकर या आत जनों से पकड़ाकर शस्त्रकर्म करने का विधान क्रियासौकर्य के लिये है, परन्तु आजकल—यह कार्य—क्लोरोफॉर्म सुधाकर कर लिया जाता है। व्रण का अर्थ है घाव—चौरा। उत्सङ्ग-व्रण के भीतर का कोटर जिसको पूय बना लेता है—जहाँतक उत्सङ्ग होता है व्रण किया जाता है या करना चाहिये। बड़े-बड़े पाकों में २ अथवा ३ अंगुल के अन्तर अर्थात् दूरी पर एक से अधिक व्रण भी किये जाते हैं। यह व्रण-शोथों में चौरा लगाने की विधि है ॥७॥
तत्रायतो विशालः समः सुविभक्तो।
निराश्रय इति व्रणगुणाः ॥८॥
व्रणकर्म में व्रण की प्रशस्त आकृति—आयत (दीर्घ) त्रिभुज (विस्तीर्ण), सम (विषम नहीं बराबर), सुविभक्त मली प्रकार से सब अवयव प्रथक हो गये हों, निराश्रय—ये व्रण के गुण हैं। निराश्रय का अर्थ—पूय के लिये कोई कोटर न रह जाय।
वि० मन्तव्य—व्रण-शोथ में ऐसा व्रण अर्थात् घाव करे जो आयत अर्थात् चौड़ा हो जिससे भीतरी समस्त दोष-विकार पूय निकल जा सके। विशाल अर्थात् लम्बा व्रण करे अर्थात् जहाँतक उत्सङ्ग-कोटर हो, जिससे वहाँतक लेपौषध एवं कव-लिका लगायी-पहुँचायी जा सके। सुविभक्त-जिसमें चौरा लगाते ही या शस्त्र निकालने पर मुखरोध न हो जाय। निराश्रय-व्रण शोथोत्पादक दोष के आश्रय को समूल निकाल देना चाहिये। यह व्रण के गुण (सदगुण) हैं अर्थात् इस प्रकार से व्रण करना चाहिये। अन्यथा बार-बार व्रण करने की आवश्यकता पड़ सकती है। पड़ जाती है ॥८॥
भवतश्चात्र—
आयतश्च विशालश्च सुविभक्तो निराश्रयः।
प्राप्तकालकृतश्चापि व्रणः कर्मणि शस्यते ॥९॥
कहा भी है—
आयत, दीर्घ, विशाल, निम्नोन्नतरहित, मलीप्रकार अलग हुआ, अंगुली द्वारा सम्पूर्ण पूय निकल जाने से निराश्रय; प्राप्त काल (ठीक समय पर-कच्चे व्रण में न किया) हुआ व्रण शस्त्र-कर्म में प्रशस्त होता है।
१ यहाँ पर अन्तर शब्द विचारणीय है, इसका अर्थ यदि चौड़ाई में किया जाय तो ठीक है। दो या तीन अंगुल चौड़ा व्रण करे, क्योंकि लम्बा व्रण देर में भरता है यह मान्यता ठीक नहीं। पेट के शल्यकर्मों में आठ अंगुल लम्बा शस्त्रकर्म करना होता है।
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मुश्रतस्थानम्
[ अ० ५ ]
वि० मन्तव्य—‘प्राप्तकालकृतः’ अर्थात् व्रण करने—चीरा लगाने का काल—समय प्राप्त होनेपर किया गया व्रण प्रशस्त होता है, पूर्व अथवा पश्चात् नहीं। तात्पर्य यह है कि आम शोफ में व्रण करना भी बुरा है और पक्व शोफ में व्रण न करना भी बुरा है ॥६॥
शौर्यमाशुक्रिया शस्त्रतैक्ष्ण्यमस्वेदवेपथू ।
अमंमोहश्च वैद्यस्य शस्त्रकर्मणि जस्यते ॥१०॥
वैद्य के गुण—
शौर्य ( उत्साह, निडरपन ) आशुक्रिया ( लघुहस्तता ) रोगी को अधिक देर नहीं लगती; शस्त्रतैक्ष्ण्य ( शस्त्र का तेज एवं धार उत्तम होना ), पसीने का न आना, और न काँपना, असंमूढता—ये वैद्य के गुण शस्त्रकर्म में प्रशस्त हैं। कायचिकित्सा में इन गुणों की इतनी जरूरत नहीं ॥१०॥
एकेन वा व्रणेनाशुध्यमानेनाऽन्तरा बुद्ध्याऽवेद्या- परान् व्रणान् कुर्यात् ॥११॥
यदि एक व्रणसे घाव पूर्णरूप में साफ न हो तो मनुष्य को चाहिये कि बुद्धि से विचारकर दूसरे व्रणों को बीच में बना दे ॥११॥
भवति चात्र—
यतो यतो गतिं विद्यादुत्सङ्को यत्र यत्र च ।
तत्र तत्र व्रणं कुर्याद्यथा दोषो न तिष्ठति ॥१२॥
कहा भी है—
व्रण में जिस स्थान पर पूय की गति को देखे, और जहाँ-पूय के संचित होने से उन्नत प्रदेश दिखाई दे, उन उन स्थानों पर व्रण कर देना चाहिये, जिससे कि व्रण में पूय दोष संचित न रहने पाये, बाहर आ जाये। ( यहाँ पर दोष शब्द पूय के लिये है ) ॥१२॥
तत्र भ्रूणण्डगङ्गललाटाक्षिपुटौष्ठदन्तवेष्टकक्षाकुक्षिव- ङ्गुष्णेषु तिर्यक् छेद उक्तः ॥१३॥
भ्रू, गण्डस्थल, शंख प्रदेश, ललाट, अक्षिवर्त्म ( पलक), दन्तवेष्ट ( मसूड़े ), कक्षा ( बाहुमूल ), कुक्षि ( उदर ), वंक्षण ( ऊरुरसिध ) इन स्थानों में तिरछा छेदन करना चाहिये १३ चन्द्रमण्डलवच्छेदान् पाणिपादेषु कारयेत् ।
अर्धचन्द्राकृतीश्चापि गुदे मेद्वे च बुद्धिमान् ॥१४॥
पाँव एवं हाथ के तन्तुओं में चन्द्रमण्डल के समान ( चन्द्राकार ) गोल छेदन करना चाहिये ( अंगुलियों की जड़ों में धमनियों का चक्र बनता है ) बुद्धिमान् मनुष्य गुद और मेद्व प्रदेश में भी अर्धचन्द्राकार छेदन करे। शेष स्थानों में सीधा छेदन करना चाहिये ॥१४॥
अन्यथा तु सिरास्तानुच्छेदनम् , अतिमात्रं वेदना, चिराद् व्रणसंरोहो, मांसकन्द्रीप्रादुर्भावश्चेति ॥१५॥
उपर्युक्त विधि के अनुसार छेदन न करने से सिरास्तानु धमनी आदि कट जाती है, बहुत पीड़ा होती है, और व्रण भी देर में भरता है ॥१५॥
मूढगर्भोद्वागोऽश्मरीभगन्दरमुखरोगेष्वभुक्तवतः
कर्म कुर्वीत ॥१६॥
निम्न रोगों में रोगी को बिना खिलाये शस्त्रकर्म करना चाहिए—
मूढगर्भ, उदररोग, अर्श, अश्मरी, भगन्दर, रोग में बिना खिलाये शस्त्रकर्म करना चाहिये। क्योंकि खिलाकर कर्म करने से वायु का कोप तथा यन्त्र आदि के चलाने में कठिनता होती है। मुख रोग में भी बिना खिलाये शस्त्रकर्म करना चाहिये। खिलाकर करने से वमन आदि होता है। कोई कोई अर्श, अश्मरी, और भगन्दर इनका पाठ यहाँ ठीक नहीं मानते क्योंकि इनमें भोजन कराकर शस्त्रकर्म किया जाता है ॥१६॥
ततः शस्त्रमवचार्य, शीताभिरद्भिःशतुरमाश्वत्थसम- न्नात् परिपीड्याङ्गुल्या, व्रणसभिसृद्य ( ड्य ), प्रक्षाल्य कृपायेण, प्रो( सो ) तेनोदकमादाय, तिलकलकमधुसर्पिः प्रगाढामौषधयुक्तां नातिस्निग्धां नातिरूक्षां वर्त्ति प्रणि- दध्यात् ; ततः कल्केनाच्छ्राद्य, घनां कवलिंकां दत्त्वा, वस्त्रपट्टेन बधनीयात् , वेदनारक्षोन्मैथुनैर्धूपैर्धूपयेत्, रक्षो- दन्तैश्च मन्त्रै रक्षां कुर्वीत ॥१७॥
पुश्चात्कर्म—शस्त्रकर्म के पश्चात् शस्त्र को निकालकर शीतल जल से रोगी का स्वेद आदि दूर करके उसे सान्त्वना देते हुए चारों ओर से व्रण को अङ्गुलि द्वारा भली प्रकार दबा- कर ( पूय निकालकर ) क्वाथ से व्रण को धोये। फिर प्लोत द्वारा व्रण का पानी सुखाकर तिलपिष्ट, शहद, घी, एवं मिश्रक अध्यायोक अजशृङ्गी आदि औषधियों से लिप्त, न बहुत स्निग्ध एवं न बहुत रूक्ष वर्त्ति व्रण में रखकर कल्क से व्रणको ढापकर मोटी ( सान्द्र-जिसमें हवा न जा सके ), कवलिंका ( गही ) रखकर पट्टी बाँध देनी चाहिए। वेदना नाशक, रक्षोन्मैथुनैर्धूपैर्धूपयेत् व्रण का धूपन करना चाहिए, तथा रक्षोन्मैथुनैर्धूपैर्धूपयेत् व्रण की रक्षा करनी चाहिए। व्रण संक्रमित न हो इस बात का ध्यान रखना चाहिए२। ( तिलकलकमधुसर्पिः प्रगाढां वर्त्ति प्रणिधाय पत्रेणाच्छ्राद्य कवलिंकां दत्त्वा बन्धनेनोपपादयेत्-यह भी पाठ है )
१ स्निग्धमृण्णम्, अल्पम् अर्धं द्रवप्रायं भुक्तवर्त्तं इति अर्थात् धिकारे त्वनिलप्रशमनार्थवर्त्तनं तु तथा भोजनं दर्शयतीति च विरोधः ।
२ पट्टी कवलिंका आदि सबको धूपन द्वारा संक्रमण रहित कर लेना चाहिये। जैसा कि वाग्भट्ट में कहा है— श्वित्ररूक्षमा दृढाः पट्टाः कवलाः सविकेशिकाः । धूपिता मूढवः श्लक्षणाः निर्वलीका व्रणे हिताः ॥
अ० ५ ]
सूत्रस्थानम्
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भानुमतीवाली निषेध सागर की पुस्तक में—पत्रेणाच्छाद्य के स्थान पर कल्केनाच्छाद्य पाठ है ॥१७॥
ततो गुग्गुल्यगुरुसजंरसवचागौरसर्पपचूर्णैर्लवणनिम्बपत्रविमिश्रैरज्ययुक्तैर्घृष्येत, आज्यशेषेण चास्य प्राणान् समालभेत ॥१८॥
उदकुम्भाच्छापो गृहीत्वा प्रोक्षयन् रक्षाकर्म कुर्यात्, तद्वदयामः—॥१९॥
धूपन द्रव्य—इसके अनन्तर, गुग्गुलु, अगर, राल, बच, श्वेत सरसों, सैन्धानमक, नीम के पत्ते इनको मिलाकर घी के साथ धूपन करना चाहिये। धूपन कार्य से बच्चे घी आदि द्रव्य से रोगी के मर्म स्थानों को मलना चाहिये, इससे रोगी में जान आती है। बड़े में से हाथ में पानी लेकर रोगी का परिमार्जन करते रक्षा कर्म१ करना चाहिये ॥१८, १९॥
कृत्यानां प्रतिघातार्थं तथा रक्षोभयस्य च । रक्षाकर्म करिष्यामि ब्रह्मा तदनुमन्यताम् ॥२०॥ नागाः पिशाचा गन्धर्वाः पितरो यक्षराक्षसाः । अभिद्रवन्ति ये ये त्वां ब्रह्माद्या घ्नन्तु तान् सदा ॥२१॥ पृथिव्यासन्तरिक्षे च ये चरन्ति निशाचराः । दिक्षु वास्तुनिवासान्श्च पान्तु त्वां ते नमस्कृताः ॥२२॥ पान्तु त्वां मुनयो ब्राह्म्या दिव्या राजर्षयस्तथा । पर्वतारुचैव नद्यश्च सर्वाः सर्वे च सागराः ॥२३॥ अग्नी रक्षतु ते जिह्वां प्राणान् वायुस्तथैव च । सोमो न्यानमपानं ते पर्जन्यः परिरक्षतु ॥२४॥ उदानं विद्युतः पान्तु समानं स्तनयित्वनवः । बलमिन्द्रो बलपतिर्मनुमन्ये मतिं तथा ॥२५॥ कामांस्तै पान्तु गन्धर्वाः सत्त्वमिन्द्रोऽभिरक्षतु । प्रज्ञां ते वरुणा राजा समुद्रा नाभिमण्डलम् ॥२६॥ चक्षुः सूर्यां दग्धः श्रोत्रे चन्द्रमाः पान्तु ते मनः । नक्षत्राणि सदा रूपं छायां पान्तु निशास्तव ॥२७॥ रेतस्त्वाण्याययन्त्वापो रोमाण्याषधयस्तथा । आकाशं खानि ते पान्तु देहं तव वसुन्धरा ॥२८॥ वैश्वानरः शिरः पातु विष्णुस्तव पराक्रमम् । पौरुषं पुरुषश्रेष्ठो ब्रह्माऽऽत्मानं ध्रुवो ध्रुवौ ॥२९॥
१ रक्षाकर्म—धूपन कार्य से जहाँ ब्रण की दुर्निधि मिटती है, वहाँ पर कृमि आदि का भी सम्बन्ध नहीं होता ! आर्य ग्रन्थों में कृमि, राक्षस, निशाचर आदि प्रायः वर्त्तमान कालीन germs को ही कहते हैं। क्योंकि इन दोनों के कार्य-भोजन, रहने का स्थान, एवं चिकित्सा एक ही है। अपवित्र वस्तुओं से इनको स्नेह है, पवित्र कार्यों से दूष है। इसी से Sterilization या Aseptic कार्य को 'रक्षा कर्म' वास्तव में कहा है।
एता देहे विशेषेण तव नित्या हि देवताः । एतास्त्वां सततं पान्तु दीर्घमायुरवाप्नुहि ॥३०॥ स्वस्ति ते भगवान् ब्रह्मा स्वस्ति देवाश्च कूर्वताम् । (स्वस्ति ते चन्द्रसूर्यौ च स्वस्ति नारदपर्वतो ॥) स्वस्थगिनश्चैव वायुश्च स्वस्ति देवाः सहन्द्रगाः ॥३१॥ पितामहकृता रक्षा स्वस्यायुवधंतां तव । ईतयस्ते प्रशाम्यन्तु सदा भव गतव्यथः ॥३२॥ इति स्वाहा ॥ रक्षा कर्म को कहते हैं—
कृत्या (अभिचार जनित राक्षसी कर्म) के निवारण के लिये, तथा राक्षसों के भय को दूर करने के लिये रक्षाकर्म कर्त्तव्य,— ब्रह्मा इस कर्म का अनुमोदन करें, (सहायता करें)।
जो जो बासुकि आदि नाग, पिशाच (मांस खानेवाले), गन्धर्व, कुबेरादि यक्ष, रावण आदि राक्षस जो जो दुष्ट वृणी को पीड़ित करते हैं, उन सबों को ब्रह्मा आदि देवता नष्ट करें।
पृथ्वी में, अन्तरिक्ष में, दिशाओं में जो जो राक्षस विचरते हैं या घर में रहते हैं, वे सब नमस्कार ग्रहण करके, दुष्ट वृणी की रक्षा करें, सब पर्वत, सब नदियाँ और सब सागर तेरी रक्षा करें। अग्नि तेरी जिह्वा की रक्षा करे, वायु तेरे प्राणों की; चन्द्रमा ध्यान की, बादल तेरे अपान की रक्षा करें। विद्युत् तेरे उदान की, बादल तेरे समान—वायु की रक्षा करे। बलपति इन्द्र तेरे बल की, मनु-प्रजापति तेरी बुद्धि तथा मन्यों (श्रीवा के पिछे की दो शिराओं) की रक्षा करे। तेरी इच्छाओं की रक्षा गन्धर्व करें। तेरे सत्त्व (मन) की रक्षा इन्द्र करें; वरुण राजा तेरी प्रज्ञा की; समुद्र नाभिमण्डल की; सूर्य-आँख की; दिशायें कानों की; चन्द्रमा मन की; नक्षत्र तेरे रूप लावण्य की; रात्रियाँ तेरी छाया (समीप से देखनेवाली छाया) की; जल तेरे शुक्र की; ओषधियाँ लोमों की, आकाश इन्द्रियों की और पृथ्वी शरीर की रक्षा करे। वैश्वानर अग्नि तेरे शिर की; विष्णु तेरे पराक्रम (उत्साह) की; पुरुषोत्तम-नारायण तेरे पौरुष की; ब्रह्मा जीवन की, ध्रुव तारा ध्रुवों की रक्षा करें। ये उपर्युक्त देवता तेरे शरीर में सदा स्थित हैं। ये देवता सदा तेरी रक्षा करें और तुम को दीर्घायु प्रदान करें। भगवान्१-विशिष्ट ज्ञानवान् ब्रह्मा तेरे लिये मंगल करे; देवता लोग मंगल करें; चन्द्रमा—सूर्य मंगल करें, नारद एवं पर्वत, अग्नि-वायु कल्याणकारी हों; इन्द्रानुयायी देवता मंगल कारक हों। पितामह—ब्रह्मा द्वारा की हुई रक्षा तेरे लिये मंगलकारी हो एवं आयु को बढ़ाये। ईतिर्था
१ भगवान् का लक्षण—
उत्पत्तिं च विनाशञ्च भूतानामागतिं गतिम् । वैत्ति विद्यमानविद्याञ्च स वाच्यो भगवानिति ॥
२०
सुश्रुतस्थानम्
[ ७० ]
(सब प्रकार के कष्ट) संदां शान्त हो, तू पीड़ा रहित हो जाये। इति स्वाहा—इस प्रकार से उपरोक्त मंत्रों द्वारा आहुति देनी चाहिये ॥२०-३२॥
एतैर्वेदात्मकैर्मन्त्रैः कृत्यानाधिविनाशनैः । मयैवं क्रुतरक्षस्त्वं दीर्घमायुरवाप्नुहि ॥३३॥
इन सब उपयुक्त कृत्यानाशक वेद मन्त्रों से मुझ द्वारा रक्षा किया हुआ तू दीर्घायु को प्राप्त कर ॥३३॥
ततः क्रुतरक्षमातुरमागारं प्रवेश्य, आचारिकमादिशेत् ॥
✓ ब्रण रोगी को इस उपरोक्त विधि से रक्षा करके रोगी को घर में प्रविष्ट कराके आचारिक कर्म (आहार विहार रूपी ब्रणि-तोपासनीय अध्याय में कहे) का उपदेश कर देना चाहिये ॥
ततस्तृतीयेऽह्नि विमुच्यैवमेव बन्नीयाद् बन्धपट्टनः । न चैनं त्वरमाणोऽपरेद्युमांक्षयेत्, द्वितीयदिवसे परिमोक्ष- णाद्विप्रथितो ब्रणशिचरादुपसंरोहति, तीव्ररुजश्च भवति ॥
✓ इसके पश्चात् तीसरे दिन इस ब्रण को खोलकर कषाय से धोकर पूर्व की भांति फिर पट्टी से बाँध देना चाहिये। जल्दी की दृष्टि से इस ब्रण को दूसरे दिन नहीं खोलना चाहिये। क्योंकि दूसरे दिन ब्रण के खोलने से ब्रण अंकुरित नहीं होता, गांठ पड़ जाती है, देर में रुजता है और बहुत पीड़ा होती है ॥
अत ऊर्ध्वं दोषकालबलादीनवेद्य कषायालेपनबन्धा- हाराचारान् विदध्यात् ॥३६॥
तीसरे दिन के पश्चात् आगे दोष (वात आदि), काल (हेमन्त आदि), बल (हीन-मध्यम, उत्तम)--वयःसाल्य आदि को देखकर कषाय, लेपन, बन्धन, आहार, आचार (विहार) करना चाहिये ॥३६॥
न चैनं त्वरमाणः सान्तद्वीर्षं रोपयेत्, स ह्यल्पेनाप्य- पचारिणाभ्यन्तरमुत्सङ्गं कृत्वा भूयोऽपि विकरोति ॥३७॥
जल्दी के कारण से दोष सहित (पूय को अन्दर रखकर) ब्रण का रोपण नहीं करना चाहिये। क्योंकि इस प्रकार के ब्रण में थोड़ा सा भी विरुद्ध कर्म होने पर यह ब्रण अन्दर ही कोटर बनाकर विकार को करता है। मुनि ने शुद्ध ब्रण का लक्षण—
नातिरक्तो नातिपाण्डुनातिशयावो न चातिरक्तः ।
न चोत्सन्नो न चोत्संगी शुद्धो रोप्यः परं वणः ॥
यह किया है ॥३७॥
भवन्ति चात्र—
तस्मादन्तर्बहिश्चैव सुमुद्गं रोपयेद् ब्रणम् ।
रूढेऽप्यजीर्णव्यायामव्यायादीन् विवर्जयेत् ।
हर्षं क्रोधं भयं चापि यावत् स्थैर्योपसंभवात् ॥३८॥
कहा भी है—
इस लिये अन्दर और बाहर से शुद्ध हुए ब्रण का ही रोपण करना चाहिये। ब्रण के भर जाने पर भी जब तक ब्रण में
हृदता न आये तब तक अजीर्ण, व्यायाम, मैथुन, हर्ष, क्रोध, भय आदि का परित्याग करना चाहिये। अर्थात् संग्रह में—रूढेऽप्यजीर्णव्यायामव्यायादीन् विवर्जयेत् ।
मासान् षट् सप्त वा नूणां विधिरेष प्रशस्यते ॥३९॥
हेमन्ते शिशिरे चैव वसन्ते चापि मोक्षयेत् ।
ऽयहात् द्रव्यहात्करद्रुग्रीष्मवर्षास्त्वपि च बुद्धिमान् ॥३९॥
✓ हेमन्त और शिशिर ऋतु में तथा वसन्त में तीसरे दिन पट्टी करनी चाहिये। शरद्, ग्रीष्म और वर्षा में दूसरे दिन, पट्टी करनी चाहिये। क्योंकि हेमन्त आदि में शीघ्र पाक का भय नहीं, ग्रीष्म आदि में भी पैतिक ब्रण की अवस्था में दूसरे दिन पट्टी बदलनी चाहिये। शरद् ऋतु में पैतिक ब्रण की अवस्था में दिन में दो बार पट्टी बदलनी चाहिये ॥३९॥
अतिपातिषु रोगेषु नेच्छेद्विघिसंमं भिषक् ।
प्रदीप्तमागारवच्छोघ्रं तत्र कुर्यात् प्रतिक्रियाम् ॥४०॥
अपवाद-जिन आत्ययिक रोगों में जल्दी का काम हो (पूयसाव आदि उपद्रव अधिक हों) उन में वैद्य को चाहिये कि वह उपयुक्त विधि का खूँटा पकड़कर न बैठ जाये। ऐसी अवस्था में जलते हुए घर के समान जल्दी की चिकित्सा करनी चाहिये ॥४०॥
या वेदना शस्त्रनिपातजाता तीव्रा शरीरं प्रदुनोति जनतोः । घृतेन सा शान्तिमुपैति सित्ता कोष्णेन यद्योमधुकान्वितेना ॥
शस्त्रावचरण के कारण उत्पन्न हुई जो तीव्र वेदना रोगी को कष्ट देती रहती है, वह वेदना मुलहटी के चूर्ण को घी में मिलाकर-थोड़ा गरम करके लगाने से शीघ्र शान्त हो जाती है।
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽग्नोपहरणीयो
नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥
पञ्चोऽध्यायः ।
अथात ऋतुचर्यमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
हेमन्त आदि ऋतुओं में जिस प्रकार का आचरण करना चाहिये, वह कहते हैं; जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१;२॥
कालो हि नाम(भगवान्) स्वयम्भुरनादिमध्यनिधनः । अत्ररसव्यापत्संपत्ती जीवितमरणे च मनुष्याणामायत्ते । स सूदमामपि कलां न लीयत इति कालः, संकलयति कालयति वा भूतानीति कालः ॥३॥
जिस वस्तु के ऋतुर्प अंगभूत हैं, उस काल को कहते हैं—यह प्रसिद्ध काल-भगवान्-स्वयं उत्पन्न हुआ है, किसी ने इसको उत्पन्न नहीं किया; आदि मध्य निधन-विनाश से रहित
अ० ६ ]
सूत्रस्थानम्
२१
है। इस काल के अधीन ही द्रव्यों के रस को समत्त् या व्यापत् है। मनुष्यों का जीवन एवं मरण भी इसी काल के वश में है। यह थोड़े काल के लिये भी नहीं रुकता, सर्वदा गतिशील रहता है। इसी से इस को काल कहते हैं। अथवा-सब प्राणियों का संहार कर इकट्ठा करता है—इस लिये, अथवा सब भूतों को सुख-दुःख के साथ युक्त करता है, इसलिये इसका काल कहते हैं। अथवा—सब का संक्षेप करता है, सब प्राणियों को मृत्यु के समीप लाता है, इसलिये काल है।
वि० मन्तव्य—यहाँ काल समय का नाम है। वह स्वयम्भू है, स्वभाव सम्भूत है, और अनादि तथा अनन्त है, अतः उसका कोई मध्य भी नहीं हो सकता है। काल के ही प्रभाव से इच्छु, इमली एवं मरिच आदि में मधुर आदि रसों की व्यापत्ति (विकृति) होती है, जैसे जनपदोर्वस आदि के पूर्व औषधियों के रस, वीर्य, गुण, विपाक तथा प्रभाव विकृत हो जाते हैं। और सम्पत्ति (उचित सम्पादन) होती है जैसे सुकाल में। और मनुष्यों के ही नहीं प्राणिमात्र के जीवन मरण अर्थात् उत्पत्ति विनाश का कारण वही काल है, इतना ही नहीं पार्थिव द्रव्यों के निर्माण का कारण भी काल है। उसका सूक्ष्मातिसूक्ष्म काल के लिये व्यवधान-उच्छेद नहीं होता, वह भूतों-प्राणियों तथा पृथिवी आदि भूतों का संकलन = संयोग या निर्माण तथा कलन विकलन वियोग या नाश करता है अर्थात् प्राणियों तथा विश्व के उत्पादन एवं विनाश का कारण काल है। सच यह है कि जैसे ईश्वरवादी उक्त सब का कारण ईश्वर को मानते हैं तथा अन्य सम्प्रदायवाले, शिव, विष्णु, शक्ति आदि को मानते हैं वैसे ही कालवादी काल को मानते हैं ॥३॥
तस्य संवत्सरान्तमनो भगवानादित्यो गतिविशेषेणाक्षिनिमेषकाष्टाकलामुहूर्ताहोरात्रपक्षमांसर्त्तयनसंवत्सरयुगप्र-विभागं करोति ॥४॥
इस संवत्सर रूप काल के भगवान् आदित्य (चन्द्रमा भी) अपनी गति विशेष से निमेष, काष्टा, काल, मुहूर्त, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर, युग का विभाग कर देता है ॥
वि० मन्तव्य—यद्यपि कला का कोई विभाग नहीं हो सकता और न होता ही है, तथापि भगवान् सूर्य की गति (उदय अस्त तथा उत्तरायण एवं दक्षिणायन और मेघादि
१ वृहदारण्यकोपनिषद् में भी कहा है “निह पुरा ततः संवत्सर आस” आनन्दगिरिव्याख्यायाम् पूर्वमिति प्रजापतेरादित्यात्मकत्वाद् तदधीनत्वाच्च संवत्सरव्यवहारस्य, आदित्यात् पूर्व तद्व्यवहारो नासीद् इत्यर्थः ॥
राशियों पर संक्रमण आदि) के भेद से काल के निमेष, काष्टा आदि) विभाग मान लिये जाते हैं ॥४॥
तत्र लब्धवक्षोचाराणमात्रोऽक्षिनिमेषः, पञ्चदशाक्षिनिमेषाः काष्टा, त्रिजग्लाष्टाः कला, विशतिकलो मुहूर्तः, कला-दशाभागश्च त्रिंशमुहूर्तमहोरात्रं, पञ्चदशाहोरात्राणि पक्षः, स च द्विविधः—शुक्लः कृष्णश्च, तौ मासः ॥५॥
इनमें आकारादि लघु अक्षर के उच्चारण में जितना समय लगता है, उसका नाम निमेष है। पन्द्रह निमेषों की एक काष्टा; तीस काष्टा की एक कला; बीस कला और कला का दसवाँ भाग—अर्थात् तीन काष्टा का—एक मुहूर्त; तीस मुहूर्त का एक रात दिन, पन्द्रह रात दिन का एक पक्ष; यह पक्ष दो प्रकार के हैं। शुक्ल और कृष्ण—इन दो पक्षों का मास होता है।
वि० मन्व्यय—यह समय-विभाग श्री धन्वन्तरि के मतानुसार है, भले ही ज्योतिःशास्त्र, धर्म शास्त्र तथा अर्थ शास्त्र के मतानुसार इसमें कुछ भेद क्यों न हों। आयुर्वेद में औषधि के संग्रह, निर्माण तथा सेवन में और वमन विरेचन आदि के विधि निषेध में स्वस्थ वृत्त के नियमपालन आदि में काल-समय का विचार आवश्यक है, अतः इसका ज्ञान भी आवश्यक है।
तत्र माघादयो द्वादश मासाः, द्विमासिकभृतु कृत्वा षड्वतवो भवन्ति; ते शिखिरवसन्तग्रीष्मवर्षाशरद्देमन्ताः, तेषां तपस्तपस्यो शिखिरः, मधुमाघवो वसन्तः, शुचिशुक्रो ग्रीष्मः, नभोनभस्यौ वर्षाः, इषोजौ गरत्, सहःसहस्यौ हेमन्त इति ॥६॥
इन मासों में माघ आदि बारह मास हैं। दो-दो मास के मिलने से छे ऋतुयें बनती हैं। यथा—शिखिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त। इन में—तप (माघ,) तपस्य (फाल्गुन) से शिखिर; मधु—(चैत्र), माघव (वैशाख) से वसन्त; शुचि (ज्येष्ठ) शुक्र (आषाढ़) से ग्रीष्म; नभः (श्रावण) नभस्य (भाद्रपद) से वर्षा; इष (आश्विन) ऊर्ज (कार्तिक) से शरद; सह (मार्गशीर्ष) सहस्य (पौष) से हेमन्त ऋतु होती है ॥
वि० मन्तव्य—सम्भव है शुभ्रतसंहिता के अर्थना काल में माघ मास से १२ मास गिने जाते हों; जैसे वैदिक काल में शरद ऋतु से गिने जाते थे। और आज का ज्योतिःशास्त्र वैशाखमास से गिनता है ॥६॥
त एते शीतोष्णवर्षलक्षणान्द्रादित्ययोः कालविभाग-करत्वादयने द्वे भवतो दक्षिणमुत्तरं च। तयोर्दक्षिणं वर्षाशरद्देमन्ताः, तेषु भगवानाप्यायते सोमः, अरुल्लवणमधुराश्च रसा बलवन्तो भवन्ति, उत्तरोत्तरं च सर्वप्राणिनां बलमभिवर्धते। उत्तरं च शिखिरवसन्तग्रीष्माः, तेषु भग-
१ देखिये चरक संहिता सूत्रस्थान अ० ६ सूत्र ४-८ ॥
२२
सुश्रुतस्थानम्
[ अ० ६ ]
वानाप्यायतेऽर्कः, तित्कृष्णायकटुकाश्च रसा बलवन्तो भवन्ति, उत्तरोत्तरं च सर्वंप्राणिनां बलमपहीयते ॥७॥
ये शीत उष्ण, वर्षा रूपी छे ऋतुयें, चन्द्रमा और सूर्य के द्वारा काल का विभाग होने से दो अयनों में विभक्त हो जाते हैं। यथा-दक्षिणायन और उत्तरायण, इनमें दक्षिणायन वर्षा, शरद, हेमन्त, इन तीन ऋतुओं से उपलक्षित है। इन वर्षादि ऋतुओं से भगवान् चन्द्रमा उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। अम्ल, लवण और मधुर रस बलवान् होते हैं। सब प्राणियों का बल उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। उत्तरायण-शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म से उत्तरायण बनता है। इन ऋतुओं में सूर्य का बल उत्तरोत्तर बढ़ता है, तित्क, कृष्ण और कटु रस बलवान् होते हैं, सब प्राणियों का बल उत्तरोत्तर घटता जाता है। जैसा चरक में कहा है-यूनां दौर्बल्यमावहन्ति—चरक, सू. अ.।
वि० मन्तव्य—स्थूलरूप से-शीत, उष्ण तथा वर्षा प्रधान-मोटे लक्षण या चिह्न हैं उन ६ ऋतुओं के। यूनानी चिकित्सा-शास्त्र के अनुसार-१-मौसिमे सरदी २-मौसिमे गर्मी तथा मौसिमे वरसात। यह च० वि० अ० ८ के सूत्र १२७ के हेमन्तो ग्रीष्मो, वर्षाश्चेति।—
चरकसंहिता में दक्षिणायन का नाम “विसर्ग” तथा उत्तरायण का नाम “आदान” है।
भारतवर्ष में उक्त दोनों अयनों का तथा तीनों मौसिमों का प्रभाव अन्य देशों की अपेक्षा अधिक व्यक्त होता है, क्योंकि मृण्डल पर ऐसे ही देश हैं जहाँ सवेंदा (वर्ष भर या अधिक मासों तक) एक एक मौसिम का प्रभाव रहता है, यथा-शीत कटिबन्ध के रूस आदि देशों में शीत का, उष्ण कटिबन्ध के अफ्रीका आदि देशों में उष्ण का तथा ब्रह्मा, जावा, सुमात्रा आदि देशों में वर्षा का प्रभाव या आधिक्य रहता है। यद्यपि महत्तर भारत में भी ऐसे तीन प्रकार के प्रदेश (प्रान्त) विद्यमान हैं। और यह क्रम पूर्ण रूप से कहीं भी नहीं घटता, तथापि भौगोलिक दृष्टि से सन्तोष जनक आवश्यक है ॥७॥
भवति चात्र—
शीतांशुः क्लेदयत्यूर्वा विवस्वान् शोषयत्यपि।
तावुभावपि संश्रित्य वायुः पालयति प्रजाः ॥८॥
शीतांशु—चन्द्रमा पृथ्वी को गीला-करता है, विवस्वान्-सूर्य पृथ्वी को सुखाता है। चन्द्रमा और सूर्य दोनों का आश्रय करके वायु प्रजा का पालन करती है। चन्द्रमा का आश्रय करके वायु जगत् में वृद्धि करता है, सूर्य का आश्रय करके
जगत् का शोषण करती है, इस से यथासमय रसोत्पत्ति होती है, जिससे कि प्रजा का पालन होता है।
वि० मन्तव्य—जहाँ पर चन्द्र, सूर्य तथा वायु की उक्त क्रिया जितनी ही व्यक्तरूप से होती रहती है वहाँ पर उतनी ही प्रजा (जनसंख्या) बढ़ती है ॥८॥
अथ खल्वयने द्वे युगपत् संवत्सरो भवति। ते तु पञ्च युगमिति संज्ञां लभन्ते। स एष निमेषादियुगपर्यन्तः काल-श्रकवत् परिवर्तमानः कालचक्रमित्युच्यत इत्येके ॥९॥
इन दोनों अयनों के एक साथ मिलने से संवत्सर बनता है। पाँच संवत्सरो के मिलने से एक युग बनता है। यह काल निमेष से लेकर युग पर्यन्त चक्र के समान घूमता हुआ—‘काल-चक्र’—नाम से कहा जाता है—ऐसा कई आचार्यों का मत है। “पाँचयुग=संवत्सरः, परिवत्सरः, इन्द्रावत्सरः, इद्वत्सरः वत्सरः-इत्येवं पञ्च वत्सराणि—ते पंचयुगमिति संज्ञा लभन्ते ॥” कौटिल्य ने भी पाँच वत्सर को युग कहा है।
वि० मन्तव्य—आयुर्वेदीय शल्यतन्त्र में ५ वर्ष का युग माना जाता है। कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी ५ वर्ष का ही युग माना गया है, यथा—‘पञ्चसम्बत्सरो युगमिति’ कौ० अ० शा० ४१। पुराणों में सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग का वर्णन भिन्न प्रकार से माना जाता है और स्मृतियों में भिन्न प्रकार से।
इह तु वर्षाभरद्वे मन्तवसन्तग्रीष्मप्रावृषः षड् ऋतुवो भवन्ति द्वाषोपचयप्रकोपशयनिमित्तं, ते तु भाद्रपदाद्येन द्विमासिकेन व्याख्याताः। तद्यथा—भाद्रपदाश्वयुजौ वर्षाः; कार्तिकमागशीर्षौ शरत्, पौषमाघौ हेमन्तः; फाल्गुनचैत्रौ वसन्तः, वैशाखज्येष्ठौ ग्रीष्मः, आषाढ़श्रावणौ प्रावृष्टि ॥
इस अध्याय में वर्षा, शरद, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म और प्रावृष्ट (वर्षा का प्रथम समय प्रावृष्ट कहाता है) ये छे ऋतुएँ वातादि दोषों के संचय, प्रकोप, प्रशमन में कारण हैं। ये छे ऋतुएँ भाद्रपद आदि दो दो मासों में उपलक्षित हैं। यथा—भाद्रपद-आश्विन में वर्षा; कार्तिक-मागशीर्ष में शरद; पौष-माघ में हेमन्त; फाल्गुन चैत्र में वसन्त; वैशाख-ज्येष्ठ में ग्रीष्म; आषाढ़-श्रावण में प्रावृष्ट ऋतु होती है।
वि० मन्तव्य—आयुर्वेद शल्यशास्त्र में वात, पित्त एवं कफ के संचय, प्रकोप तथा प्रशम को ध्यान में रखकर उक्त
१ सोम्याः खलु आपः अन्तरिक्षप्रभवाः प्रकृतिशीता लब्ध्याः अन्यत्तरस्राश्च। तास्तु अन्तरिक्षाद् भ्रश्यमाना भ्रष्टाश्च पंचमहा-भूतगुणसमन्विता जंगमस्थावराणां भूतानां मूर्तीरभिप्रीणमस्ति।
चरक० सू० अ० २६
अ० ६ ]
सूत्रस्थानम्
२३
६ ऋतु माने गये हैं। कायचिकित्सा के चरक ग्रन्थ में प्रावृत् को न मानकर, उधर शिशिर ऋतु माना है। सू० अ० ६। अस्तु, परन्तु च० वि० अ० ८ सू० १२७ में संशोधन को ध्यान में रखकर शिशिर न मानकर प्रावृत् ऋतु मान लिया गया है। विचार-विधि भेद से यह सब समीचीन है ॥ १० ॥
तत्र, वर्षास्रवोषधयस्तृणयोऽल्पवीर्या आपश्चाप्राशन्ताः क्षितिमलप्राया, ता उपयुज्यमाना नभसि मेघावतते जल प्रकिलञ्चायां भूमौ किलञ्चदेहानां प्राणिनां शीतवातविष्ट-भ्रितागन्तीनां विदहन्ते, विदाहात् पित्तसंचयमापाद-यन्ति; स संचयः शरदि प्रविरलमेवे विद्यत्युपशुष्यति पङ्कैऽर्ककिरणप्रबिलायितः पैत्तिकान् व्याधीञ्जनयति। ता एवोषधयः कालपरिणामात् परिणतवीर्या बलवत्यो हेमन्ते भवन्त्यापश्च प्राशन्ताः स्निग्धा अत्यर्थं गुर्ण्यश्च, ता उप-युज्यमाना मन्दकिरणत्वाद्वाहानोः सतुषारपवनोपस्तम्भित-देहानां देहिनामविदग्धाः स्नेहाच्छैत्याद् गौरवादुपलेपाच्च श्लेष्मसंचयमापादयन्ति; स संचयो वसन्तेऽर्करश्मिप्रवि-लायित ईषस्तन्धदेहानां देहिनां श्लेष्मिकान् व्याधीञ्-जनयति। ता एवोषधयो निदाये निःसारा रुक्षा अतिमात्रं लक्ष्यो भवन्त्यापश्च, ता उपयुज्यमाना सूर्यप्रतापोपशोषित-देहानां देहिनां रौक्ष्याल्लघुत्वोच्च वायोः संचयमापाद-यन्ति; स संचयः प्रावृषि चतयर्थं जलोपकिलञ्चायां भूमौ किलञ्चदेहानां देहिनां शीतवातवर्षेरितो वातिकान् व्याधी-ञ्जनयति। एवमेव दोषाणां संचयप्रकोपहेतुरुक्तः ॥
इन ऋतुओं में वर्षा ऋतु के अन्दर वनस्पतियाँ तरुण--(सार रहित कमजोर) अल्पशक्ति हो जाती हैं। पानी भी अस्वच्छ हो जाता है; भूमि भी मल-मूत्र आदि से दूषित होती है। वनस्पतियाँ और जल आकाश के मेघों से व्याप्त होने तथा जल द्वारा भूमि के गीली होने से; शीत एवं वायु से मन्द की हुई अग्निवाले, तथा किलञ्च शरीरवाले प्राणियों में अम्लता को प्राप्त हो जाते हैं। अम्लपाक होने से शरीर में पित्त का संचय करते हैं। यह संचय ऋतु के शीत के कारण उस समय कुपित न होकर शरद् ऋतु में, आकाश में मेघों के साफ हो जाने से, भूमि के कीचड़ के सूखने से, सूर्य की किरणों से पिघलकर पित्तजन्य रोगों को उत्पन्न करता है। और यही औषधियाँ हेमन्त ऋतु में काल के परिपाक से शक्तिशाली परि-पक्व वीर्यवाली हो जाती हैं। और पानी भी निर्मल, स्निग्ध और अत्यन्त भारी हो जाते हैं। इस ऋतु में सूर्य की किरणों के मन्द होने से, वर्षा से मिली गीली वायु के कारण स्तम्भित बने पुरुषों में इन वनस्पति तथा जल के उपयोग से, मधुरपाक होने के कारण, स्नेह से, शीतलता से, भारीपन तथा चिकने-
पन से कफ का संचय हो जाता है। यह संचय वसन्त ऋतु में थोड़े आलसी बने शरीरवाले पुरुषों में-सूर्य की किरणों से पिघलकर (अन्न द्रव्य आदि) कफ जन्य रोगों को उत्पन्न करता है। और ये ही औषधियाँ एवं पानी ग्रीष्म ऋतु में सार रहित, निर्बल रुक्ष और बहुत अधिक हल्की हो जाती हैं। इन वनस्प-तियों के साथ पानी के सेवन से, सूर्य की गरमी से शुष्क शरीर-वाले पुरुषों में—रुक्ष (स्नेह के अभाव) लघु और विशदगुण के कारण वायु का संचय इस ऋतु में होता है। यह वायु-संचय प्रावृत् ऋतु में पानी के कारण भूमि के बहुत अधिक तर होने से; आर्द्र शरीरवाले पुरुषों में-शीतल-वायु-वर्षा के कारण वात-जन्य रोगों को उत्पन्न करता है। इस प्रकार वात आदि दोषों के संचय एवं प्रकोप के कारण कह दिये हैं ॥ ११ ॥
तत्र वर्षाहेमन्तग्रीष्मेषु संचितानां दोषाणां शरद्-व-सन्तप्रावृट्सु च प्रकृपितानां निर्हरणं कर्तव्यम् ॥ १२ ॥
वर्षा, हेमन्त और ग्रीष्म ऋतु में संचित वात आदि दोषों को, तथा शरद् वसन्त और प्रावृट् काल में कुपित पित्तादि दोषों को वमन आदि द्वारा निकालना चाहिये। यह निःसारण ऋतु के पिछले मास में करना चाहिये, यथा-पित्त का संशोधन मार्गशीर्ष में, कफ का निर्हरण-चैत्र में, वात का श्रावण मास में संशोधन करना चाहिये ॥ १२ ॥
तत्र पैंत्तिकानां व्याधीतामुपशमो हेमन्ते, श्लैष्मिकाणां निदाये, वातिकानां शरदि, स्वभावत एव, त एते संचय-प्रकोपोपशमा व्याख्याताः ॥ १३ ॥
उपशम कहते हैं—
कालस्वभाव के कारण ही पित्तजन्य रोगों की शान्ति हेमन्त में, कफजन्य रोगों की ग्रीष्म में और वातजन्य रोगों की शान्ति शरद् ऋतु में होती है। इस प्रकार से दोषों का संचय, प्रकोप और प्रशम कह दिये हैं ॥ १३ ॥
तत्र, पूर्वान्नि वसन्तस्य लिङ्गं, मध्याह्नि ग्रीष्मस्य, अप-राह्नि प्रावृषः, प्रदोषे वार्षिकं, शारदमर्धरात्रे, प्रत्युषसि हेमन्तमुपलक्षयेत्; एवमहोरात्रमपि वर्षमिव शीतोष्णव-र्षलक्षणं दोषोपचयप्रकोपोपशमैर्जीनीयात् ॥ १४ ॥
सांवत्सरिक विधि को दिन रात में कहते हैं—
दिन के पूर्वार्ध में वसन्त ऋतु के लक्षण (कफ प्रकोप) होते हैं मध्याह्न में ग्रीष्म के लक्षण (वात संचय), अपराह्न में प्रावृट् के (वात प्रकोप); प्रदोष-रात्रि के पूर्व भाग में वर्षा के (पित्त संचय), आधीरात में शरद् ऋतु के (पित्त प्रकोप), रात्रि के अन्तिम भाग में—उषःकाल में हेमन्त के (कफसंचय) लक्षण होते हैं। इस प्रकार से दिन रात में भी वर्ष भर की, शीत, उष्णिमा, और वर्षा (वर्षा हेमन्त ग्रीष्म ऋतु) की भाँति दोषों का संचय, प्रकोप एवं प्रशम होता है ॥ १४ ॥
२४
मुमुक्षुस्थानम्
[ ३० ]
तत्र, अद्यापन्नेषु ऋतुष्वन्यापन्ना ओषधयो भवन्त्याप्यत्र, ता उपयुज्यमानाः प्राणायुर्बलवीर्यौजस्कयो भवन्ति ॥ १५ ॥
अव्यापन्न—आदृषित ऋतुओं में गेहूँ-चने आदि वनस्पतियाँ तथा पानी निर्दोष होते हैं। इन वनस्पति तथा पानी के उपयोग से—अग्निसोमीय रूपी प्राण शरीर-इन्द्रिय-सत्त्व-आत्मा के संयोग रूपी आयु, उत्साह रूपी बल, शक्ति, सप्त धातुओं का स्नेह रूपी हृदयाश्रित ओज बढ़ता है ॥ १५ ॥
तेषां पुनर्न्यपदोऽष्टककारिता, शीतोष्णवातवर्षाणि खलु विपरीतान्योषधीन्यांपादयन्त्यप्यत्र ॥ १६ ॥
इन ऋतुओं में विपरीतता का कारण अधर्म है। शीत, उष्ण, वायु और वर्षा के विपरीत (हीन, मिथ्या, अतियोग) होने से ओषधियाँ एवं जल भी दूषित बन जाते हैं—अपने स्वाभाविक गुण-धर्म को छोड़ बैठते हैं। (सर्वेषामप्यग्निवेश यद् वैगुण्यमुत्पद्यते तस्य मूलमधर्मः। तन्मूलं वाऽसत्कर्म पूर्वकृतं, तयोः योनिः प्रज्ञापराध एव। चरक) ॥ १६ ॥
तासां सुपयोगाद्विषधरोगप्रादुर्भावो मरको वा भवेदिति ॥
इस प्रकार के दूषित अन्न-पान के सेवन से नाना प्रकार के रोग होते हैं अथवा-महामारी फैलती है१ ॥१७॥
तत्र, अद्यापन्तानां सोषधीनामपां चोपयोगः ॥ १८ ॥
इस अवस्था में (ऋतु के विपरीत होने पर) अधूषित वनस्पतियों का तथा पानी का उपयोग करना चाहिये। पुराना अन्न एवं अव्यापन्न पानी का उपयोग करना चाहिये। इस लिये कहा है—“तस्मात् प्रागुद्वर्षसात् प्राक् च भूमैः विरसीभावाद् उद्वरश्च भेषज्यानि”—इत्यादि ॥१८॥
कदाचिदव्यापन्नेष्वपि ऋतुषु कृत्याभिशापरक्षः क्रोधाधर्मरूपध्वस्यन्ते जनपदाः, विषोषधिपुष्पगन्धेन वा वायुनोपनोतेनाकन्यते यो देशस्तत्र दोषप्रकृत्यविशेषेण कासश्वासवमथुप्रतिशयाशिरोरुह्वरैरुपतप्यन्ते, ग्रहनक्षत्रचरितैर्वा, गृह्वाशयनासनयानवाहनमणिरत्नोपकरणगहि-तलक्षणनिमित्तप्रादुर्भावैर्वा ॥ १९ ॥
ऋतु व्यापत्ति के बिना भी कई बार (सदा नहीं) कृत्या (मन्त्रों द्वारा की हुई राक्षसी क्रिया), अभिचारी, अभिशाप (गुरु-सिद्ध आदि द्वारा दिया शाप) हिसक प्रवृत्तिवाले राक्षसों के क्रोध से, काय, वाणी एवं मन के अधर्म से जनपद नष्ट हो जाते हैं। विष युक्त औषधि, या विषैले फूल की गन्ध वायु द्वारा जिन देशों के समीप पहुँचती है, वहाँ पर दोष, प्रकृति की अभिन्नता से कास, श्वास, वमन, प्रतिशयाय, शिर-वेदना, ज्वर
१ देखिये विस्तार के लिये-चरक-वि-अ-३।
होते हैं। अथवा-आदित्य आदि ग्रहों के तथा अश्विनी आदि नक्षत्रों के गति विशेष से, या घर, भार्या, पलंग, आसन, यान, सवारी, मणि, रत्न आदि उपकरणों के निन्दित लक्षणों के होने से (अकस्मात् घर के गिरने से, बार बार कम्पन होने से) जनपद नष्ट होते हैं१। (तथाऽभिशापप्रभवस्याप्यधर्म एव हेतुर्भवति। ये लुप्तधर्माणिः धर्मादपेतास्ते गुरुहृद्वसिद्धिपूज्यानवसत्याहितानि आचरन्ति, ततस्ताः प्रजा गुर्वादिभिरभिशाता भस्मतामुपयान्ति, प्रागेवानेककुलविनाशाय, नित्यप्रत्ययोपलम्भाद् अनियताश्चापरे) ॥१९॥
तत्र स्थानपरित्यागशान्तिकर्मप्रायश्चित्तमङ्गलजपहो-सोपहारैरज्याञ्जलिनभस्कारतपोनियमदयादानदीक्षाभ्युपगमदेवताब्राह्मणगुरुपदैर्भवितन्यम, एवं साधु भवति ॥
सामान्यचिकित्सा—अधर्म के कारण ऋतु व्यापत्ति होने से दैव व्यपाश्रय औषध कहते हैं—स्थान का परित्याग, शान्तिकर्म, वेदोक्तमंत्रों से यजन, प्रायश्चित्त-तप, प्रशस्त मणि आदि मंगल वस्तु का धारण, जप, होम, उपहार, देवता बलि, इज्या (याग), अञ्जलि-भक्ति से हाथों को जोड़ना, नमस्कार-प्रणाम, तप, नियम-मौन, दया, दान, दीक्षा, अभ्युपगम गुरुवाक्य आदि को स्वीकार करना देवता-ब्राह्मण, गुरु की सेवा करनी चाहिये। इस प्रकार करने से कुशल होता है। (येषां न मृत्युसामान्यं सामान्यं न च कर्मणाम्। कर्म पंचविधं तेषां भेषजं परमुच्यते। हितं जनपदानां च शिवानामुपसेवनम् ॥ इत्यादि) ॥ २० ॥
अत ऊर्ध्वमन्यापन्तभूतूनां लक्षणान्युपदेक्ष्यामः ॥२१॥
वायुवार्त्त्युत्तरः शीतो रजोधूमाम्कुला दिशः।
छन्तस्तुषारैः सविता हिमान्द्रा जलाशयाः ॥२२॥
दपिता ध्वाङ्खुखड्गगृह्महिपोरभ्रकुञ्जराः।
रोद्रप्रियङ्कुपुनगाः पुषिता हिमसाहृये ॥२३॥
इसके आगे अव्यापन्न ऋतुओं के लक्षण कहते हैं।
हेमन्तऋतु में—उत्तर दिशा की वायु चलती है। दिशायैर्धूलि-धूम कोहरे से व्याप्त होती है। सूर्य तुषार से चिरा होता है, जलाशय-वर्ष से ढपे होते हैं। कौवे, गैंडा, मैसा, मेढ़ा एवं हाथी प्रसन्न रहते हैं। लोषप्रियगु—तथा पद्मकेशर खड्गखिलता है ॥ २१-२३ ॥
गिरिशिरे शीतमधिकं वातवृष्ट्याकुला दिशः।
शेषं हेमन्तवत् सर्वं विज्ञेयं लक्षणं वृष्टेः ॥ २४ ॥
शिशिरे ऋतु में शीत अधिक रहता है, दिशायैर्वात से मिश्रित वृष्टि से व्याप्त रहती है। शेष सब लक्षण विद्वानों की हेमन्त के समान समझना चाहिये ॥ २४ ॥
देखिये-महाभारत-शान्तिपर्व में—‘गोवत्सं बडवा सूते, स्वाशुगालं महीपते।’
अ० ६ ] ४
सूत्रस्थानम्
२५
सिद्धविद्याधरवधूचरणालक्तकाङ्क्षिते । मलये चन्दनलतापरिध्वज्जाधिवासिते ॥२५॥ वाति कामिजनानन्दजननोऽनङ्गदीपनः । दम्पत्योर्मानभिदुरो वसन्ते दक्षिणोऽनिलः ॥२६॥ दिशो वसन्ते विमलाः काननैरुपशोभिताः । किशुकाभ्योजबकुलचूताशोकादिपुष्पितैः ॥२७॥ कोकिलाषट्पदगणैरुपगीता मनोहराः ।
दक्षिणानिलसंवीताः सुमुखाः पल्लवोज्ज्वलाः ॥२८॥ वसन्त ऋतु में—सिद्ध एवं विद्याधरों की स्त्रियों के चरणों में लगे आलक से चिह्नित, चन्दनलता के आलिंगन से सुवासित; कामिजनों को आनन्द देनेवाली तथा कामवर्धक, दम्पतियों के मान को तोड़नेवाली मलयाचल की दक्षिण वायु बहती है। वसन्त में दिशायें निर्मल, जंगलों से शोभित, ढाक, कमल, बकुल, आम, अशोक आदि के फूलों से शोभित होती हैं। कोकिल-भ्रमर आदि के मनोहर गीतों से मिली शोभन अवकाशवाली तथा पल्लव-कोमल पत्तों से भुंगार की हुई और दक्षिण वायु बहती है ॥२५-२८॥
ग्रीष्मे तीक्ष्णांशुरादित्यो मारुतो नैऋतोऽसुखः । भूस्तप्ता सुरितस्तन्व्यो दिशः प्रवृत्तित्वा इव ॥२९॥ आन्तचक्राह्युगलाः पयःपानाकुला सुगाः । ध्वस्तवीरुत्तृणलता विपर्णाङ्कितपादपाः ॥३०॥
ग्रीष्मऋतु में—सूर्य की किरणें तीक्ष्ण रहती हैं। नैऋत की वायु बहती है, यह वायु सुखकारक नहीं होती। जमीन जलती रहती है, नदियों का प्रवाह मन्द पड़ जाता है, दिशायें मानों आग उगलती रहती हैं। घवराये चक्रवाक युगल पानी की फिकर में मंडराते रहते हैं। मृग पानी पीने के लिये व्यग्र होते हैं। वृक्ष, तृण, लतायें नष्ट होती हैं—जमीन पर गिर जाती हैं। वृक्षपत्तों-रहित रुण्ड-मुण्ड हो जाते हैं ॥२९,३०॥
प्रावृष्यम्बरमानन्दं पश्चिमानिलकपितैः । अम्बुदैविद्युदुद्योतप्रस्तुतेस्तुम्लस्वनेः ॥३१॥ कोमलश्यामशष्पाख्या शक्रगोपोज्ज्वला सही । कदम्बनीपकुटजसजंकेतकिभूषिता ॥३२॥
प्रावृद्ध ऋतु—पश्चिम दिशा की वायु (मोनसून) से लाये हुए बादलों से आकाश प्रावृद्ध ऋतु में घिरा रहता है। बिजली की चमक के साथ वरसनेवाले प्रचंड गर्जनोंवाले बादल घिरे रहते हैं। भूमि कोमल-श्याम दूब से भरी रहती है। भूमि पर वीरवृहटियाँ फैली रहती हैं। कदम्ब, नीम, कुटज, राल, केतकी से भूमि अलंकृत रहती है। जैसा कि रामायण में कहा है—‘बालेन्दुगोपान्तरचित्तिनेन विभाति भूमिर्नवशादलेन’ ॥
तत्र वर्षासु नद्योऽम्भश्छन्नोत्खाततटदृमाः । वाप्यः प्रोत्फुल्लकुमुदनीलोत्पलविराजिताः ॥३३॥
भूरण्यक्तस्थलद्वयभा बहुसस्योपशोभिता । नातिभर्जस्तवन्मेघनिरुद्धार्कग्रहं नभः ॥३४॥ वर्षाऋतु—वर्षाऋतु में नदियाँ पानी से भरी रहती हैं, जिससे कि किनारे के वृक्ष टूटते हैं। बावडियों में कुमुदिनी और नीले कमल खिल रहे होते हैं। भूमि पर गडदे और जमीन में भेद नजर नहीं पड़ता, शस्यश्यामला भूमि होती है। बहुत गर्जना न करनेवाले बादलों से नभ और सूर्य तथा तारे छिपे रहते हैं ॥३३,३४॥
बधुरुणः शरद्यर्कः श्वेताश्रविसमलं नभः । तथा सरांस्यम्बुरुहेर्भान्ति हंसांसघट्टितैः ॥३५॥ पङ्कशुष्कदुमाकीर्णा निम्नोन्नतसमेपु भूः । बाणसप्ताह्वबन्धूकशासनविराजिता ॥३६॥ शरद ऋतु—शरद ऋतु में सूर्य कपिल-पिंगल एवं उष्ण होता है। आकाश श्वेत बादलों से व्याप्त एवं विमल होता है। हंसों के द्वारा आलोडित कमलों से तलाब सुशोभित होते हैं। नीचे ऊँचे स्थानों में भूमि समान हो जाती है कीचड़ शुष्क हो जाता है तथा—चिउँटी आदि से व्याप्त होती है। बाण (झिंटी), सप्तर्ण, दुपहरिया, काश, असन से भूमि शोभित होती है। (बाण का अर्थ—कुण्ट किया है)।
वि० मन्तव्य—पङ्कशुष्कदुमाकीर्णा निम्नोन्नतसमेपु भूः—का अर्थ है कि शरद ऋतु में—भूमि-निम्न भागों में पङ्क (कीचड़) से आकीर्ण (व्याप्त) रहती है, उन्नत भागों में सूखी रहती है और समतल भागों में दुमों (गोदों) से व्याप्त रहती है ॥३५,३६॥
स्वगुणैरित्युक्तेषु विपरीतेषु वा पुनः । विषमेष्वपि वा दोषाः कुप्यन्त्यतुषु देहिनाम् ॥३७॥ उपसंहार—ऋतुओं के जो स्वाभाविक गुण हैं, उन गुणों में अत्यधिकता होने से, अथवा स्वाभाविक गुणों में विपरीत गुण आने से (वर्षाऋतु में वर्षा न होने से), या ऋतुओं के स्वाभाविक गुणों में विषमता (शीत में गरमी, गरमी में शीत) होने से (इस प्रकार से १८ प्रकार की ऋतु-व्यापत्तियाँ हैं) प्राणियों के वात आदि दोष कुपित होते हैं। (कालार्थ-कर्मणां योगो हीनमिथ्यातिमात्रकाः) ॥३७॥
हरेद् वसन्ते श्लेष्माणं पित्रं शरदि निर्हरेत् । वर्षासु शमयेद् वायुं प्राणिकारसमुच्छयात् ॥३८॥ रोगोत्पत्ति से पूर्व ही दोषों का शमन करना चाहिये। यथा—वसन्त ऋतु में कफ का, शरद ऋतु में पित्त का, वर्षाऋतु में वायु का शमन करना चाहिये। जिस ऋतु में जो दोष कुपित होता है, उसकी उसी में शान्ति करनी चाहिये। चरक में कहा है—
हैमन्तिकं दोषचयं वसन्ते प्रवाह्यन् ग्रेष्मिकमभ्रकाले ।
२६
सुश्रुतसंहिता
[ २०७ ]
घनात्यये वार्षिकमाशु सम्यक्
प्राप्नोति रोगान् श्रुतुजात्र जातु ॥
वि० मन्तव्य—वसन्त श्रुतु में कफ को (वमन द्वारा) और शरद् श्रुतु में पित्त को (विरेचन द्वारा) निकालना चाहिये और वर्षा में वात को शान्त करना चाहिये, परन्तु यह सब कार्य—रोगोत्पत्ति के पूर्व ही कर डालना या करना चाहिये अर्थात् स्वस्थ भी उक्त श्रुतुओं में वमन, विरेचन तथा वात शमनोपाय करता रहे, इससे लाभ यह होता है कि उसको श्रुतु जनित विकार कभी नहीं होते। शोधन द्वारा दोषों का सख्ख निकल जाता है, फलतः प्रकोप का अवसर ही नहीं आता।
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने श्रुतुचर्या
नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
—:o:—
सप्तमोऽध्यायः
अथातो यन्त्रविधिमध्येयार्थं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे शल्यों को निकालने के साधनों को बताने के लिये 'यंत्रविधि' नामक अध्याय को कहते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥
यन्त्रशतमेकोत्तरम; अग्र हस्तमेव प्रधानतमं यन्त्राणामवगच्छ, ( कि कारणं ? यस्माद्भ्रष्टाहते यन्त्राणामप्रवृत्तिरेव ) तदधीतत्वाद्यन्त्रकर्मणाम् ॥३॥
यन्त्रों की संख्या साधारणतः एक सौ एक है, (वैसे असंख्य हैं१))। इन सब यंत्रों में सब से प्रधान यंत्र हाथ को ही समझना चाहिये। क्योंकि—हाथ के बिना यंत्रों का चलना असम्भव है। सब यंत्र-कर्म इसी हाथ के आधीन हैं—
वि० मन्तव्य—यन्त्र-नियन्त्रण या पकड़ने के साधनों—उपकरणों का नाम है। इन से पकड़कर कण्टक एवं दन्त आदि तथा मृतयार्म कभी २ जीवित गर्भ आदि २ भी निकाले जाते हैं। इन से शल्य को हिलाने-डुलाने या शिथिलमूल करने का काम भी लिया जाता है। गुद, भग तथा मुख आदि को चौड़ा करके (तान करके) भीतर देखने का, औषध लगाने का तथा शस्त्र कर्म करने का काम भी लिया जाता है। मूत्राशय एवं जलोदर आदि में लमाकर सावण का तथा आचूषण का भी काम लिया जाता है ॥३॥
तत्र, मनःशरीरावाधकराणि शल्यानि, तेषामाहरणोपायो यन्त्राणि ॥४॥
१ वामभट्ट में यन्त्रों की संख्या असंख्य मानी है। यथा—“अतः कर्मवाश्लेषामियताऽवधारणमशक्यम्” वा० ग० सू० स्था० अ० २५।
शल्यविनिश्चय में—मन एवं शरीर को पीड़ित करनेवाली वस्तु को 'शल्य' कहते हैं। इस शल्य को निकालनेवाले साधनों को 'यंत्र' कहते हैं ॥४॥
तानि षट्प्रकाराणि तद्यथा—स्वस्तिकयन्त्राणि, संदंशयन्त्राणि, तालयन्त्राणि, नाड़ीयन्त्राणि, शलाकार्यन्त्राणि उपयन्त्राणि, चैति ॥५॥
यंत्रों के भेद—
ये यंत्र आकृति भेद से छै प्रकार के हैं। यथा—स्वस्तिक यंत्र, संदंशयंत्र, तालयंत्र, नाड़ीयंत्र, शलाकार्यत्र और उपयंत्र१ ॥५॥
तत्र चतुर्विंशतिः स्वस्तिकयन्त्राणि, द्वे संदंशयन्त्रे, द्वे एव तालयन्त्रे, विंशतिर्नाड्यः, अष्टाविंशतिः शलाकाः, पञ्चविंशतिरुपयन्त्राणि ॥६॥
इनमें स्वस्तिकयंत्र—२४, संदंशयंत्र—२ तालयंत्र—२, नाड़ीयंत्र—२०, शलाकार्यत्र—२८, उपयंत्र—२५—इस प्रकार से १०१ यंत्र हैं ॥६॥
तानि प्रायशो लोहानि भवन्ति, तत्प्रतिरूपकाणि वा तदलाभे ॥७॥
ये यंत्र प्रधानतः लोहे के (स्वर्ण-रजत, ताम्र-वंग लोहा) होते हैं। लोहादि के अभाव में दांत बांस आदि लोहे के समान दृढ़ वस्तुओं से बनाये जाते हैं ॥७॥
तत्र, नानाप्रकाराणां व्याख्यानं मृगपक्षिणां मुखैर्मुखानि यन्त्राणां प्रायशः सहशानि, तस्मात्तत्सारुप्यादागमादुपदेशादन्ययन्त्रदर्शनाद्युक्तिश्च कारयेत् ॥८॥
यंत्रों की बनावट—
यंत्रों के मुख प्रायः भिन्न २ हिंसक पशुओं के तथा पक्षियों के मुख के सहज होते हैं। इस लिये हिंसक पशु-पक्षियों के मुख के समान, शास्त्र उपदेश से, विदितवेदितव्य वैद्यों के आदेश से, युक्ति से तथा प्रयोजन वश से यन्त्रों की रचना करनी चाहिये ॥८॥
समाहितानि यन्त्राणि खरश्लदण्मुखानि च।
सुदृढानि सुरुपाणि सुप्रहाणि च कारयेत् ॥९॥
उपसंहार—
उचित (न अधिक और न कम) परिभाषा के बने, खर चिकने मुखवाले, दृढ़, देखने में सुन्दर, पकड़ने में सरल बनावटवाले यन्त्र बनाने चाहिये ॥९॥
तत्र स्वस्तिकयन्त्राणि—अष्टादशाङ्गुलप्रमाणानि सिंहन्याग्रवृत्तरद्व्युच्छेदोपिमाजारश्मगालमुगैर्वास्ककाकंकङ्कुररचापमासशशवात्युलूकचिल्लियेनगुध्रकौञ्चभृङ्गराजाञ्जलिकर्णोवभञ्जननन्दीमुखमुखानि, मसूराकृतिभिः
१ विस्तार के लिये—लेखक का 'शल्ययन्त्र' देखिये।
७०७ ]
सूत्रस्थानम्
२७
कौलेरवबद्धानि, मूलेऽकुशवदावृत्तचारुज्जाणि, अस्थिविदग्ध- ग्रत्योद्धारणार्थमुपदिश्यन्ते ॥१०॥
स्वस्तिक यन्त्रों का प्रमाण एवं आकार—
स्वस्तिक यन्त्रों का प्रमाण १८ अंगुल होता है। इनके मुख सिंह, मेडिया, व्याघ्र (चीता) तरलु, मालु, चीता, बिल्ली, गीदड़, हिरण, एर्वाह (हरिणभेद)—इन हिंसक पशुओं के मुख के समान तथा—कौवे, कंक (दीर्घ चोंच का), कुरर, चाप, भास, शशघाति (शशारि), उल्लु, चिल्ली (चील), श्येन, गीष, कौंच, भुङ्गराज—फिगा, अङ्गुलिर्ण अवभञ्जन, नन्दी-मुख—इन पक्षियों के मुख के समान मुखवाले, सिर पर मसूर के समान फलदार कील से जुड़े, जड़ में अंकुश के समान घिरे हुए पकड़ने के स्थानवाले, अस्थि में घुसे शल्य को निकालने के लिये काम में आते हैं।
वि० मन्तव्य—इन पशु-पक्षियों को हिंस ही मानना आवश्यक नहीं है, केवल मुख साहस्य के लिये कुछ पशु-पक्षियों का नामोल्लेख कर दिया गया है, अवभञ्जन पक्षी को पञ्चाव में “ठोक ठेया” तथा उत्तर प्रदेश में ‘लोहार’ कहते हैं, यह वृक्ष के टहनों में अपनी चोंच से बिल बना लेता है। स्वस्तिक यन्त्र—स्वस्तिक (x) के सदृश होते हैं। इसके २ खण्ड होते हैं और दोनों को मुख-भाग से थोड़ा ऊपर कील से जोड़ा रहता है, परन्तु वह कील दोनों खण्डों के छिद्रों में डीला रहता है कसा नहीं, ताकि यन्त्र में गति हो सके, कील के दोनों छोर मसूर के समान फूलदार हों, जिससे दोनों खण्ड अलग न हों। वारङ्ग—मूठ का या उस भाग का नाम है, जहाँ पर यन्त्र को हाथ से पकड़ा जाता है, मुख उस भाग का नाम है जिससे शल्य पकड़ा जाता है। इसके उदाहरण हैं दन्त निकालने का जमूर तथा गर्म लोहा पकड़ने की लोहारों की सानी या सन्नी। वाग्भट के शब्दों में—कण्ठे मसुराकार-पर्यन्तैः कीलकैः बद्धानि, मूले अंकुशवत् नतानि स्वस्तिकयन्त्राणि विद्यात्। वा० सू० अ० २५ ॥१०॥
सनिग्रहोऽनिग्रहश्च संदर्शो बोडयाङ्गुलौ भवतः, त्वङ्गमांससिरास्नानुगतशल्योद्धारणार्थमुपदिश्येते ॥११॥
संदर्शयन्त्र—दो प्रकार के हैं। यथा—सनिग्रह (सनिबन्ध-संज्ञायी) और अनिग्रह (अनिबन्ध चिमटा) इनकी लम्बाई १६ अंगुल होती है। ये त्वचा, मांस, सिरा, स्नायु में लगे हुए शल्य को निकालने में काम आते हैं।
वि० मन्तव्य—संदर्श—चिमटा या चिमटी का नाम है, इस पर एक छल्ला चढ़ाया रहता है उसका नाम है “निग्रह”। जिस पर छल्ला चढ़ा होता है वह “सनिग्रह” कहलाता है। यह छल्ला के दबाव से ही शल्य को पकड़े रहता है, हाथ का दबाव डालने की आवश्यकता नहीं होती और जिस पर छल्ला नहीं रहता वह “अनिग्रह” संदर्श कहलाता है, इस पर हाथ
का दबाव देकर शल्य पकड़ा जा सकता है। इसमें हाथ का दूना बल लगता है दवाने और खींचने में। इसके छोटे रूप का नाम “मुमुण्डी” है और छल्ला का नाम रुचक है। क्योंकि रुचक का नाम “कटक” है और कटक का नाम वलय है (भेदनीकोश)। सर्वसाधारण की बोली में मुमुण्डी संदर्श को “नचकुण्डी” (पञ्जाब) तथा मुमुण्डी-मुचकुंडी कहते हैं। यह काँटा निकालने के लिये घर २ रखी जाती है। इसका लक्षण—षडङ्गुलोऽन्यो हरणे सूक्ष्मशल्योपपद्मणाम्। मुचण्डी सूक्ष्मदन्ता ऋजुः मूले पचकभूषणा। गम्भीरव्रणमांसा नामर्मणः शेषितस्य च। वा० सू० अ० २५। अर्थात् उक्त दो बड़े (१६-१६ अङ्गुल के) सन्दर्शों के अतिरिक्त एक अन्य ६ अंगुल का संदर्श होता है जिसका नाम “मुमुण्डी” है। इसके दन्त सूक्ष्म (बारीक) तीखे (नोकदार) नहीं होते हैं, यह आकारतः सीधी होती है, रुचक का भूषण होता है यह सूक्ष्म शल्य, उपपद्म (परवाल), गम्भीर व्रण के दूषित मांस तथा अर्म को निकालने के काम आती है। इसे “मोचना” भी कहते हैं ॥११॥
तालयन्त्रे—द्व्वादशंगुले मत्स्यतालव्यदेकतालद्वितालके, कर्णनासानाडीशल्यानामाहरणार्थम् ॥१२॥
तालयन्त्र भी दो प्रकार के हैं। इनकी लम्बाई १२ अंगुल होती है। इनका मुख मछली के ताल के समान पतला होता है। कइयों में एक प्रदेश होता है, और कइयों में दो प्रदेश होते हैं। इनका उपयोग कान, नासा एवं नाड़ी शल्यों के निकालने में होता है। आंगल भाषा में इनको स्कूप (SCOOP) कहते हैं।
वि० मन्तव्य—ताल यन्त्र—चम्मच के आकार के होते हैं। इनसे कान की मैल निकालने आदि का काम लिया जाता है ॥
नाडीयन्त्राणि—अनेकप्रकाराणि, अनेकप्रयोजनानि, एकतोमुखान्युभयतोमुखानि च, तानि क्षोतोगतशल्योद्धारणार्थं, रोगदर्शनार्थम्, आचूषणार्थं क्रियासौकर्यार्थं चेति तानि क्षोतोद्धारपरिणाहानि, यथायोगदीर्घाणि च। तत्र भगन्दराशोव्रणबस्त्युत्तरबस्तिमूत्रवृद्धिकोदरधूमनिरुद्धप्रकससन्निरुद्धगुदयन्त्रणयलावुशुङ्गयन्त्राणां चोपारध्वाद्वत्त्यामः ॥१३॥
नाडीयन्त्र—भी अनेक प्रकार के तथा अनेक प्रयोजन के लिये बनते हैं। इनमें कुछ यंत्रों में मुख एक ओर होता है, और कुछों में दोनों ओर होता है। इनका उपयोग—कण्ठ आदि खोलों में फँसे शल्य को निकालने के लिये, भगन्दर आदि रोग को देखने के लिये, रक्त आदि चूषण के लिये, अर्श आदि में क्रिया को सुगमता के लिये व्यवहार होता है। इसकी मोटाई क्षोतोद्धार के समान होती है और इनकी लम्बाई आवश्यकतानुसार होती है।
२८
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ७ ]
नाड़ीयंत्र—भगन्दर, अर्श, व्रणयंत्र१, बस्ति, उत्तरबस्ति, मूत्रवृद्धि, दकोदर, धूमनेत्र निरुद्धप्रकश, सन्निरुद्धगुद, अलाबु यंत्र२ हैं। इनको विस्तार से आगे कहेंगे३।
वि० मन्तव्य—नाड़ी यन्त्र-सुषिर अर्थात् खोलले होते हैं नाली या नलिका के आकार के ॥१३॥
शलाकायन्त्राण्यपि नानाप्रकाराणि, नानाप्रयोजनानि, यथायोगपरिणाहदोषाणि च, तेषां गण्डूपदसर्पफणशरपुच्छबडिशमुखे द्वे द्वे, एषण्यूहूनचालनाहरणार्थमुपदिश्येते, मसूरदलमात्रमुखे किंचिदानताग्रे खोतोमतरल्योद्धारणार्थं, षट् कार्पासकृतोष्णीषाणि प्रमाज्जनक्रियासु, त्रीणि दव्याकृतौनि खल्लमुखानि, क्षारोषधप्रणिधानार्थं त्रीण्यन्यानि जाम्बवदनानि, त्रीण्यङ्कुशवदनानि, षडेवानिकर्मसंस्वभिप्रेतानि, नासाबुंदहरणार्थमेकं कोलास्थिदलमात्रमुखं खल्लतीक्ष्णौष्ठं, अञ्जनार्थमेकं कलायपरिमण्डलमुभयतो तुकुलाम्, मूत्रमार्गविगोधनार्थमेकं माल्तीपुष्पवृन्ताग्रप्रमाणपरिमण्डलमिति ॥१४॥
शलाका यंत्र भी नाना प्रकार के होते हैं। इनके प्रयोजन भी नाना प्रकार के हैं, इनकी लम्बाई और मोटाई प्रयोजन के यथायोग्य होती है। इन शलाका यंत्रों में—गण्डूपद, सर्पफण, शरपुंख और बडिशमुख—दो दो, (सुगल से ही कार्य होता है) इनका कार्य एषण टुँढने के लिये (गम्भीरपाक में पूय आदि टुँढने के लिये), व्युहन्—ऊपर को उठाकर बाहर निकालना, चाल्न करने के लिये, आहरण—खीचकर बाहर निकालने के लिये, दो शलाका यंत्र—विदलित मसूर के समान, आगे से कुछ मुड़े (एक आठ अंगुल और दूसरा ६ अंगुल), इनका उपयोग खोतों में फँसे शल्य को निकालने में है। छै शलाकायें—जिनके खिरे पर रूई लिपटी रहती है, इनका उपयोग
१ व्रणयन्त्र—“नाड़ीवृणप्रशालनाम्यञ्जनयन्त्रे पडंगुले बस्ति-यन्त्राकारे मुखतोऽकर्णिके—मलमुखयोर्गुण्डप्रकलायप्रवेशखोतसी मूले निवदमुर्दुर्गणिः” ॥ वृ० वाग्भट्ट ७॥
२ दो भगन्दर यन्त्र, दो अर्श यन्त्र, वृणयन्त्र एक, बस्तिनेत्र-चार प्रकार, उत्तर बस्तिनेत्र दो—मूत्र वृद्धि १, दकोदर १, धूमनेत्र ३, निरुद्धप्रकश १, सन्निरुद्धगुद १, अलाबु यन्त्र १, इस प्रकार से वीस हैं।
३ वृद्ध वाग्भट ने नाड़ी यन्त्र अधिक कहे हैं। यथा—‘कण्ठशल्यदर्शनार्थं नाड़ीदशाङ्गुलायतां पञ्चाङ्गुलपरिणाहाम्। द्विकण्ठस्य तु वारङ्गस्य संप्रहार्यं द्विच्छिद्रमुखाम्। शल्यनियतिनी तु पद्मकर्णिकाकारस्त्रीर्पा द्वादशांगुला श्यंगुलसुषिरा। तथाऽङ्गुलित्राणकं। योनिव्रणदर्शने यंत्रम्—Vagihalspecilum।
आजकल ब्रेस्ट पम्प (Breast-Pump) एक यन्त्र और है—जो कि स्तनों से दूध निकालने के कार्य में आता है।
प्रमाज्जन क्रिया में होता है। तीन शलाका यन्त्र—कड़छी के मुख के समान, नीचे की ओर मुख किये, इनका उपयोग क्षार औषध लगाने में होता है। अन्य तीन यन्त्र—जामुन के समान मुखवाले, तीन अंकुश के समान मुखवाले होते हैं। ये छै शलाकायन्त्र अग्नि कर्म—जलाने के कार्य में आते हैं। नासा के अर्बुद को निकालने के लिये एक—बेर की आधी गुठली के समान मुखवाली बीच से गहरी और किनारों पर तेज, एक शलाका यन्त्र—मटर के बराबर मोटी और दोनों खिरो पर मुकुलाकार, एक शलाका मूत्र मार्ग के संशोधन के लिये—माल्ती पुष्प के वृन्त के अग्रभाग के समान मोटी होती है१।
वि० मन्तव्य—अञ्जनार्थमेकं““मुकुलाग्रम्—यह नेत्र में अञ्जन लगाने की सलाई है पञ्चाय में इसे “सुरमचू” कहते हैं। शलाका ठोस होती है, उनके मुख के आकार लम्बाई, मोटाई तथा कार्य भिन्न रहते हैं।
गण्डूपद—केतुवा के सहस्र गोल, लम्बी तथा लचकीली, यथा—रवड की बत्ती जो मूत्रमार्ग आदि में जाती है।
सर्पफण मुखी—जिसका अग्रभाग सर्प के मुख के सहस्र नोकिला तथा फणा के सहस्र चौड़ा हो, मन्त, फन फैलाए सर्प को देखिये।
शरपुंख मुखी शलाका—जिनके अग्रभाग पर शर-बाण के समान पुंख (फर) हों, ऐसे बाण भी होते हैं जो पुंखोंवाले होते हैं। बाण जब वेग से जाकर शरीर में धँसता है तब ये पुंख भीतर फेल जाते हैं और निकलते समय बड़ा ब्रण करके निकलते हैं। अस्तु, यह पुंखोंवाली शलाका शल्य को हिलाने-चलाने में प्रयुक्त होती है।
बडिशमुखी शलाका—वह मछली पकड़ने के कांठा के सहस्र होती है और गर्भशल्य के आहरण में काम आती है, अपत्य पथ से भीतर गर्भाशय में डालकर गर्भ के हनु आदि में फँसाकर खींच ली जाती है इसे वाग्भट में “गर्भशंकु” कहा है, यथा—आहोयं बडिशक्रुतिः। नतोऽग्रे शङ्कुना तुष्यो गर्भशङ्कुरिति स्मृतः। वा० सू० अ० २५ ॥२४॥
उपयन्त्राण्यपि—रञ्जुवेणिकापट्टचर्मोन्तर्वल्लकलता-वच्छाष्ठीलाश्रममुद्गरपाणिपादतलाङ्गुलिजिह्वादन्तनख-मुखवालाश्रवकटकशाखाष्ठीवनप्रवाहणहर्पायस्कान्तमया-नि क्षारानिभेषजानि चेति ॥१५॥
उपयन्त्र—रस्सी, वेणिका (तीन लड़ी वेणी), पट्ट (दूत की बनी पट्टी), चर्म (चमड़ा), अन्तर्वल्लक टाँके, गूल आदि की छाल लता (बेल), वस्त्र (कर्पट), अष्टीलाश्रम (गोल-
१ वाग्भट्ट में कर्णशोधन और गर्भशंकु, ये दो शलाका यन्त्र अधिक हैं। यन्त्रों के लिये वाग्भट्ट एवं लेखक का शल्यतंत्र देखिये।
अ० ८ ]
सूत्रस्थानम्
२९
बड़ा परथर), मुद्गर, पाँव का तलुवा- हाथ का तेलुवा, अंगुलि, जिह्वा, दांत, नख, मुख, बाल, घोड़े की काठी शाखा, छीवन—कफ आदि, प्रवाहण-वमन-विसेचन-अश्रु निकालने के लिये, हर्ष तुष्टि के लिये, अयस्कान्त (पापाण विशेष-आकर्षक, द्रावक, सुम्रक, भ्रामक भेद से), और क्षार, अग्नि, एवं औषधियाँ उपयन्त्र हैं। अष्टीलाश्रम—से अष्टीलालोहे का घन या अन्य ऐसी वस्तु और अश्रम से परथर दो वस्तुयें हैं।
वि० मन्तव्य—उपयन्त्र अर्थात् यन्त्रण आदि में उपयोगी उपकरण। चर्म-चमड़ा की अनेक प्रकार की पट्टियाँ, वद्वियाँ यथा अन्त्रवृद्धि में बाँधने की पेट्टी आदि। अन्तर्वलकल-बुछों की कोमल, लम्बी वे छालें जो बन्धन के योग्य हों। जिह्वा-जीम-दन्तों में लगे धँसे पदार्थ को हिला २ कर निकाल देती है। दन्त से पकड़कर शल्य निकाला जा सकता है और नखों से भी। मुख से चूसकर दुग्ध, विष तथा रक्त निकाला जाता है। एतदर्थ रवङ्ग के गेन्द सा आचूक यन्त्र भी होता है। लाल—केशों की गुही बना उससे कण्ठ वात शल्य को फँसाकर निकालने का विधान है। कूची आदि बनाकर घोने, साफ करने आदि के उपकरण बनाये जाते हैं। अश्वकटक—के लिये देखिये अ० २७ का पञ्चाङ्गयाँ...उद्दरति सू० १४। झाखा का वर्णन भी वही देखिये। छीवन—थूककर या खाँसकर कफ निकाला जाता है। प्रवाहण—काँखकर, बल लगाकर पुरीष एवं मूत्र निकाला जाता है और गर्भ को निकालने में गर्भिणी प्रवाहण करती है, उससे एतदर्थ कहा जाता है कि—प्रवाहस्व सुभगे। हर्ष या हर्षण—इसके द्वारा मन-आवाधकर शोक-शल्य निकाला जाता है। शेष देखिये इसी स्थान का अध्याय २७ और सम्पूर्ण सुश्रुत ॥१५॥
एतानि देहे सर्वस्मिन् देहस्यावयवे तथा । संधौ कोष्ठे धमन्यां च यथायोगं प्रयोजयेत् ॥१६॥
इन यन्त्रों का उपयोग देह के सम्पूर्ण अवयवों में, संधि में कोष्ठ को धमनी में यथास्थान उचित रीति से उपयोग करना चाहिये ॥१६॥
यन्त्रकर्मणि तु—निर्घातनपूर्णबन्धनव्यह्वनवर्तन-चालनविवर्तनविवरणपीडनमार्गविशोधनविकर्षणाहरणा-बुछनोन्नमनविनमनभञ्जनोन्मथनाचूषणेषणदारणजूरकरणप्रक्षालनप्रधमनप्रमार्जनानि चतुर्विंशतिः ॥१७॥
यन्त्रों के कर्म—चौबीस प्रकार के हैं। यथा—निर्घातन (इधर-उधर चलाकर निकालना), पूर्ण (बस्ति-नेत्र आदि को तैल से भरना), बन्धन (रज्जु आदि से बाँधना), व्यह्वन (ऊपर को उठाकर काटकर शेष भाग को निकालना), वर्चन (गोल करना), चालन (एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले चलना),
विवर्चन (पराङ्मुख हुई अस्थि आदि का अपवर्चन), विवरण (अंगुलि आदि से दबाकर शल्य को बाहर करना), पीडन (अंगुलि आदि से मलना-दबाना), मार्ग विशेषन (उत्तर बस्ति से मूत्रमार्ग का शोधन), विकर्षण (पकड़कर बाहर निकालना), आहरण (अन्दर स्थित शल्य का बाहर लाना), आच्छन (आय-मन-ऊपर उठाना), उन्नमन (ऊपर करना), विनमन (नीचे करना), भञ्जन (तोड़ना), उन्मथन (मथना-बिलोड़ना), आचूषण (चूसना), ऐषण (हूँदना), दारण (दो करना-फाड़ना), क्रूरकरण (सीधा कराना), प्रक्षालन (घोना), प्रधमन (नासिका आदि में फूलकार से औषध भरना), प्रमार्जन (बल्ल आदि से साफ करना), ये चौबीस कार्य यन्त्रों के हैं।
वि० मन्तव्य—उपयन्त्रों के कर्मों—कार्यों पर ध्यान देने से उपयन्त्रों के आकार-प्रकार तथा उनके उपयोग का पर्याप्त ज्ञान हो सकता है। हमारा विश्वास है कि इन से अधिक न यन्त्र हो सकते हैं और न यन्त्र कर्म ही हो सकते हैं। तथापि—सूत्र १८ देखिये ॥१७॥
स्वबुद्ध्या चापि विभजेद्यन्त्रकर्मणि बुद्धिमान् ।
असंख्येयविकल्पस्वाच्छल्यानामिति निश्चयः ॥१८॥
उपसंहार—शल्यों के असंख्य भेद होने के कारण बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपनी बुद्धि से ही यन्त्र कर्मों का विभाग कर ले। जिस प्रकार बने उस प्रकार से शल्य बाहर निकालना चाहिये ॥१८॥
तत्र अतिस्थूलम्, असारम्, अतिदोर्घम्, अतिह-स्वम्, अग्राहि, विषमग्राहि, वक्रं, शिथिलम्, अत्युन्नतम्, मृदुकीलं, मृदुमुखं, मृदुपाशम् इति द्वादश यन्त्रदोषाः ॥
यन्त्र दोषों को कहते हैं—अतिस्थूल (बहुत मोटा), असार (अशुद्ध लोहादिसे बने), बहुत लम्बा और बहुत छोटा, अग्राही (विकृत मुख), विषमग्राही (एक देश पकड़े और दूसरा न पकड़े), वक्र (टेढ़ा), शिथिल (दबाव न आये), अत्युन्नत (कील आदि उठी हो), मृदुकील (संधि बन्धन ठीला हो), मृदुमुखं (शल्य पीडन के दबाव को न सह सके), मृदुपाश (तनु पाश)—ये बारह यन्त्र के दोष हैं।
वि० मन्तव्य—असारका अर्थ है साररहित, दुर्बल जो कार्य करते समय टूट सकता हो जिसके टूटने का भय हो। यथा—कमजोर रस्सी या पट्टी और संदंश, शलाका आदि भी वैसे जो टूट जायें। मृदुपाश—ढोले रुचक (छल्लेवाला) देखो मुछण्डी का वर्णन ॥१९॥
एतैर्दोषैर्विनिर्मुक्तं यन्त्रमष्टादशङ्कुलम् । प्रशस्तं भिषजा ज्ञेयं तद्धि कर्मसु योजयेत् ॥२०॥
१०
मुश्रुतसंहिता
[ अ० ८ ]
इन उपयुक्त १२ दोषों से रहित १८ अंगुल लम्बा यन्त्र वैद्य को प्रशस्त समझना चाहिये। इसी प्रकार के यन्त्र को शल्य-कर्म में बरतना चाहिए ॥२०॥
हरयं सिंहमुखवाघैस्तु गृहं कङ्कमुखदिभिः। निर्हरेत शनैः शल्यं शाखयुक्तिः श्यपेक्षया ॥२१॥
हरय शल्यको सिंहमुख आदि यन्त्रों से निकालना चाहिये, और जो शल्य छिपा हो—आँख से दिखाई न दे उसको कंक-मुख आदि से निकालना चाहिए। शस्त्र एवं युक्ति की अपेक्षा से शल्य को धीरे से बाहर करना चाहिए ॥२१॥
नि (वि) वर्तते साधवग्राहते च शल्यं निगृह्योद्भूते च यस्मात्। यन्त्रेष्वतः कङ्कमुखं प्रधानं स्थानेषु सर्वेष्वधि- (वि) कारि चैव ॥२२॥
सब यन्त्रों में कङ्कमुख यन्त्र प्रधान है। क्योंकि—यह कङ्कमुख जल्दी ही बाहर निकल आता है और भली प्रकार से जल्दी ही अन्दर घुस जाता है। शल्य को पकड़कर बाहर खींच लेता है। (विवर्त्तते—पाठ में—अन्दर घूम सकता है)। संधि-धमनी आदि सब स्थानों में इस कङ्कमुख की ही प्रधानता है—यही अधिकारी है। इसलिए सब यन्त्रों में कङ्कमुख ही प्रधान है।
वि० मन्तव्य—शल्य को पकड़कर बाहर निकालने में भले ही प्रधान हो, वैसे तो अपने कार्य के लिये यन्त्र ही नहीं उप-यन्त्र रज्जू आदि भी प्रधान हैं, उपयोगी हैं अति-उपयोगी हैं ॥
इति मुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने यन्त्रविधिनिर्णाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
अष्टमोऽध्यायः
अथातः शस्त्रावचारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे 'शस्त्रावचारणीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने मुश्रुत के लिए कहा था।
वि० मन्तव्य—शस्त्र-छेदन, भेदन, आदि अर्थात् चीरने, फाड़ने, काटने, छीलने आदि कार्यों में प्रयुक्त होते हैं जैसे यंत्र बाँधने आदि कार्यों में। देखिए अ० ५ का सू० ५ ॥१, २॥
विशतिः शस्त्राणि, तद्यथा—मण्डलाप्रकरपत्रवृद्धिपत्रनखशस्त्रमुद्रिकोत्पलपत्रकार्धधारसूचिकुशपात्राटोमुखशरारिमुखान्तर्मुखत्रिकूर्चककुठारिकाब्रीहिमुखारावेतसपत्रबडिशदन्तरशङ्कुवेषण्य इति ॥३॥
शस्त्रों की संख्या बीस है—इनका आकार इनके नाम से ही प्रायः स्पष्ट है। मण्डलाप्र (Circular Knife या Round-head Knife), करपत्र (Saw आरी), वृद्धिपत्र (अब्धि-ताप्र—Scalpel—प्रयताप्र—Abscess knife), नखशस्त्र (Nail—pairs), मुद्रिका (दो अंगुल लम्बा—उत्तरे की बनावट के Finger-knife), कमलपत्र के समान तेज धार वाला उत्तर्मुख (Lancel), अर्धधार (Single Ebged Knife), सूची—सूई कुश के समान कम चौड़ा परन्तु तीक्ष्ण-धार कुशपत्र (Bistoury), आरिमुख (आरी—जलवर्धनी नामक पक्षी के समान मुख जैसा), शरारिमुख (दोही चोंच वाला—सफेद स्कुन्धोवाले पक्षी के मुख के समान—कैंची—लोक में), अन्तर्मुख (मध्य में मुखवाला मध्य मुख Curved Bistoury), त्रिकूर्चक (तीन छोटी-छोटी छुरियोंवाला), कुठारिका (हथोड़ी-Ave-shaped), ब्रीहिमुख (Trocar) आरा (Owl-like-knife), वेतसपत्र (पतली धार का चाकू Narrow-Bladed knife), बडिश (मछली पकड़ने का काँटा—Hooks), दन्तरशङ्कु (दांतखुरदने का चाकू Tooth-pilk), एषणी (Sharp-proves)—इस प्रकार से बीस शस्त्र हैं।
वि० मन्तव्य—कुठारिका-कुल्हाड़ी के आकार का परन्तु छोटा वह शस्त्र जिसके द्वारा खिरावेध किया जाता है। देखिए सु० शा० अ० सू० ६ ॥३॥
तत्र मण्डलाप्रकरपत्रे स्यातां छेदने लेखने च, वृद्धिपत्रनखशस्त्रमुद्रिकोत्पलपत्रकार्धधारणि छेदने भेदने च, सूचीकुशपत्राटो (टा) मुखशरारिमुखान्तर्मुखत्रिकूर्चकानि विस्वाषणे, कुठारिकाब्रीहिमुखारावेतसपत्रकाणि व्यधने सूची च, बडिशं दन्तरशङ्कुआहरणे, एषण्येषणे आनुलोम्ये च, सूच्यः सोवने, इत्यष्टविधे कर्मण्युपयोगः शस्त्राणां व्याख्यातः ॥४॥
इनका उपयोग—
इन शस्त्रों में मण्डलाप्र और करपत्र छेदन एवं लेखन कार्यों में; वृद्धिपत्र, नखशस्त्र, मुद्रिका, उत्पलपत्र, अर्धधार ये छेदन एवं भेदनकार्यों में; सूची, कुशपत्र, आटीमुख, शरारिमुख, अन्तर्मुख और त्रिकूर्चक-विस्वाषण्यकार्यमें; कुठारिका, ब्रीहिमुख,
१ शस्त्रों का ज्ञान-प्रत्यक्ष में भली प्रकार होता है। ज्ञान के लिये कविराज हाराणचन्द्रजी की या उल्लेख की टीकासे सहायता ली जा सकती है। वामभट्ट ने सर्ववत्र, शलाका, कर्तरि, सूची-कूर्च, खज एवं कर्णव्यधन ये छे शस्त्र अधिक कहे हैं। इनके तथा अन्य लक्षण अष्टांगसंग्रह में देखिये।
अ० ८ ]
सूत्रस्थानम्
३१
आरा, वेतसपत्र, और सूरै ( कुशपत्र-उत्पलपत्र ), भी व्यथन कार्य में; बडिश् और दन्तशंकु-आहरण कार्य में; एषणी एषण और अनुलोमन कार्य में; सूरै-लीवन कार्य में; इस प्रकार से आठ प्रकार के कार्यों में इन शास्त्रों का उपयोग होता है । ( डल्हण ने अनुलोमन का अर्थ विस्वावण किया है ) ॥ ४ ॥
तेषामथ यथायोगं ग्रहणसमासोपायः कर्मसु वदत्यते । तत्र वृद्धिपत्रं वृन्तफलसाधारणे भागे गृह्णीयात्, भेदना- न्येवं सर्वाणि, वृद्धिपत्रं मण्डलाग्रं च किंचिदुत्तानेन पाणिना लेखने बहुशोऽवचार्य, वृन्ताग्रे विस्वावणानि, विशेषेण तु बालवृद्धसुकुमारभीरुनारीणां राज्ञां राजपुत्राणां च त्रिकूर्चकेन विस्वावयेत्, तलप्रच्छादितवृन्तमङ्गुष्ठप्रदे- शिनीभ्यां व्रीहिमुखं, कुठारिकां वामहस्तन्यस्तामितरहस्त- मध्यमाङ्गुल्याङ्गुष्ठविष्टव्याऽभिहन्त्यात् आराकरपत्रैषण्यो मूले, शेषाणि तु यथायोगं गृह्णीयात् ॥ ५ ॥
इन शास्त्रों को पकड़ने को विधि संक्षेप में कहते हैं— इनमें वृद्धिपत्र को वृन्त और फल के संयोगस्थान में पकड़ना चाहिये । इसी प्रकार सब भेदन शास्त्रों को पकड़ना चाहिये । वृद्धिपत्र और मण्डलाग्र शास्त्र को हाथ को कुछ ऊँचा करके लेखन कार्य में, बहुत बार प्रयोग करना चाहिये । विस्वावण कार्य में आनेवाले शास्त्रों को वृन्त के अगले भाग में पकड़ना चाहिये । बालक, बृद्ध, सुकुमार, भीरु स्त्रियों का, राजा एवं राजपुत्रों का त्रिकूर्चक शास्त्र से रक्त विस्वावण करना चाहिये । व्रीहिमुख के वृन्त को हाथ के तलुवे में ढाँपकर अंगुष्ठ तथा प्रवेशिनी अंगुलियों से पकड़ना चाहिये । वाम हस्त से पकड़कर दक्षिण हाथ की मध्य अंगुली से अंगूठे का सहारा लेकर इसके माथे पर चोट करने चाहिए । आरा, करपत्र और एषणी को मूल से पकड़ें । शेष शास्त्रों को यथारीति से पकड़ना चाहिये । जैसे उनका कार्य ठीक हो, वैसे पकड़ें ।
वि० मन्तव्य—वृन्त-शास्त्र की मूठ या वीण्डा का नाम है, जहाँ से पकड़कर शास्त्र चलाया जाता है । फल-शास्त्र के उस भाग का नाम है जिससे छेदन भेदन आदि कर्म किया जाता है । “वृन्तफलसाधारण” भाग वह है जहाँ दोनों का सन्धान जोड़ होता है । त्रिकूर्चक—वह कूची है जिसमें दो से अधिक सूइयाँ एक साथ बंधी रहती हैं, जैसा गोदने या खुनने के लिये प्रयुक्त होता है । वृद्धिपत्र—यहाँ पर बृद्धि शब्द “वृधु- छेदने” धातु ( भ्वादि आत्मनेपदी ) से निष्पन्न हुआ है । इसका अर्थ है—वृद्धये ( छेदनाय ) पत्रं ( चतुर्थीतत्पुरुष ) अर्थात् छेदन के लिये पत्र है । पत्र का अर्थ है पत्र = पत्ती-
लोह की तीखी पत्ती । बृद्धिपत्रं लुराकारं छेदभेदनपाटने । वा० सू० अ० २६ रलो० ७ । बृद्धिपत्र लुरा या उत्सुरा का या चाक्र का नाम है । करपत्र—छेदोऽस्थनां करपत्रं तु खरधारं दशाङ्गुलम् । विस्तारे द्रध्गुलं सूक्ष्मदन्तं सुस्वरुन्धनम् ॥ अर्थात्—अस्थि काटने के लिये—करपत्र नामक शास्त्र होता है । उसकी धार खरदरी सूक्ष्म २ दन्तों—दन्तों वाली, लम्बाई १० अंगुल, चौड़ाई २ अंगुल । सुन्दर मूठ में बँधी दो कीलों से कही पत्ती होती है । इसका नाम “आरी” है । मण्डलाग्र—इसका फल तर्जनी अंगुली के नख के आकार का होता है । नखशास्त्र—नख काटने के शास्त्र का नाम है । मुद्रिका—इसे अंगुली पर चढ़ाकर कार्य किया जाता है । इसके अग्रभाग में उत्सुरा अथवा मण्डलाग्र शास्त्र का सा तीखा शास्त्र लगा रहता है । उत्पलपत्रक—कमल की पंखुरी के सहस्र आकृति- वाला शास्त्र । अर्द्धधार—इसके फल के आधे अथवा आधे से कुछ अधिक भाग की धार तीखी रहती है । सूची—सूरै का नाम है । कुशपत्र—कुश के पत्र के सहस्र फलवाला । आटी- मुख—आटी या आड़ी नामक पक्षी की चींच के आकार का शास्त्र । यह पक्षी जल के आसपास रहता है । शरारिमुख—शरारि आटी पक्षी सा कोई पक्षी है । उसकी चींच सा । अन्तर्मुख—इसका फल अर्द्धचन्द्र ( द्वितीया तृतीया का चन्द्र ) के सहस्र आकृतिवाला और ११ अंगुल का होता है । इसके अन्तर्भाग में धार होती है । व्रीहिमुख—जो के सहस्र मुख- वाला या फलवाला ।
आरा—यह वह शास्त्र है जिसके द्वारा नाथ सम्प्रदाय में कान फाड़े जाते हैं । इसका मुख आधा अंगुल चौड़ा होता है और सब घुसा दिया जाता है । वेतसपत्र—वेत के पत्र के सहस्र आकारवाला । इसके दोनों ओर वेत के पत्र के समान दन्त या दाँते होते हैं । करपत्र में एक ही और होते हैं । बडिश्—मछली पकड़ने के काँटे जैसा, द्वितीया के चन्द्र के सहस्र टेढ़ा और एक ओर तीखा । दन्तशंकु—दन्त छीलने के योग्य, इसे पञ्जाब में “छिंग” कहते हैं । इससे दन्तशर्करा, दन्तकपालिका उतारी जाती है और दन्त या दाढ़ के खड़े के सड़े गले या जीर्ण भाग को खुरचा जाता है । एषणी—नासूर के वृण का पता लगाने में उपयोगी, यह केंचुवा के समान गोल लम्बी एवं लचकीली होती है, परन्तु यह शास्त्र नहीं—यन्त्र कही जा सकती है । भेदन के लिये जो सूरै के सहस्र तीखे मुखवाली और जिसके मूल में धागा डालने का छिद्र होता है वह भी एषणी कही जाती है । यही शास्त्र गणना में गिनी गई है । अनुलोमन करना ही एषणी यन्त्र का काम है और भेदनोपयोगी सूची का नाम भी एषणी है । बाण का
३२
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ८ ]
नाम इषु है, जो शब्द होता है और जिस ( ईष-गतिहिंसन-दर्शनेषु धातु भ्वादिगणीय ) से इषु शब्द निष्पन्न होता है। उसी से एषणी शब्द भी निष्पन्न होता है। इस उपकरण से भेदन रूपी हिंसन और नासूर की गति का दर्शन भी होता है। अतएव अग्रिम ११ वें सूत्र में-तीक्ष्ण कांटे तथा जो के प्रथम पत्र के सहस्र तीखे मुखवाली एषणी कही गई है ॥ ५ ॥
तेषां नामभिरैवाकृतयः प्रायेण व्याख्याताः ॥ ६ ॥
इन शब्दों के आकार प्रायः नाम संकीर्तन से ही कह दिये हैं ॥ ६ ॥
तत्र नखशब्देष्वण्यवाष्टाङ्गुले, सूर्यो वक्ष्यन्ते, ( प्रदे-शिन्यप्रपर्वप्रदेशप्रमाणं सुद्रिका, दशाङ्गुला शरारिसुखी सा च ( या सा ) कर्तरीति कथ्यते ), शेषाणि तु षडङ्गुलानि ॥ ७ ॥
इनमें नख शब्द तथा एषणी आठ अंगुल के होते हैं। सूत्रों का वर्णन-अष्टकर्माध्याय में करेंगे। सुद्रिका-प्रदेशिनी ( तर्जनी ) के प्रमाण का होता है। शरारिसुख शब्द दश अंगुल लम्बा है, उसे कैंची भी कहते हैं। नख शब्द, एषणी और सूई को छोड़कर शेष सब शब्द छै अंगुल हैं ॥ ७ ॥
तानि सुप्रहाणि, सुलोहानि, सुधाराणि, सुरूपाणि, सुसमाहितमुखप्राणि, अकरालानि, चेति शब्दसम्पत् ॥ ८ ॥
शब्दसम्पत्—सुप्रहाणि ( पकड़ने में सुन्दर ), सुलोहानि ( उत्तम लोहे के बने ), सुधाराणि ( तीक्ष्ण धारवाले ), सुरूपाणि ( देखने में सुन्दर रूपवाले ), सुसमाहितमुखप्राणि ( सुन्दर मुखवाले ) अकरालानि ( दांत रहित-देखने में भयानक नहीं ) होने चाहिये। ये शब्दों के गुण हैं ॥ ८ ॥
तत्र वक्रं, कुण्ठं, खण्डं खरधारम्, अतिसू्यूलम्, अत्यल्पम्, अतिदीर्घम्, अतिहृस्वम्, इत्यष्टौ शब्दोषाः। अतो विपरीतगुणमाददीत, अन्यत्र करपत्रात्, तद्विखरधारमस्थिच्छेदनार्थम् ॥ ९ ॥
शब्दों के दोष—वक्र ( टेढ़ा ), कुण्ठ ( खुण्डा-मोटी धार ), खण्ड ( टूटा हुआ ) खरधार ( कर्कश धारवाला ), अतिसू्यूल, अतिउर्च्छ, अति दीर्घ, अति हृस्व—ये आठ शब्द के दोष हैं। इनसे विपरीत गुणोंवाले शब्द को ग्रहण करना चाहिये। परन्तु यह करपत्र के लिये नहीं है। क्योंकि इसकी धार दांतोंवाली होती है, यह अस्थि 'छेदन के कार्य में होता है ॥ ९ ॥
तत्र धारा भेदनानां मासूरी, लेखनानामर्धमासूरी, न्यधनानां विस्त्रावणानां च कैशिकी, छेदनानामर्धकैशिकीति ॥ १० ॥
अष्टविध कार्य में धार का निश्चय—
भेदन कार्य में आनेवाले शब्दों की धार मसूर पत्र की धार के समान मोटी, मण्डलाग्र आदि लेखन शब्दों की धार मसूर दल की धार से आधी, कुटारिका सूची कुशपत्र आदि न्यधन कार्य में आनेवाले शब्दों की धार केश के समान पतली, वृद्धिपत्र आदि छेदन शब्दों की धार केश से आधी पतली होनी चाहिये ॥ १० ॥
बद्धिशं दन्तशङ्कुश्रान्ताग्रे। तीक्ष्णकण्टकप्रथमयव-पत्रमुख्येषणी ( गण्डूपदाकारमुखी च ) ॥ ११ ॥
बद्धिश आगे से कुछ झुका होना चाहिये, दन्तशंकु भी कुछ टेढ़ा होना चाहिये। एषणी तीन प्रकार की है। यथा—१—तीक्ष्णकण्टक, २—प्रथमयवपत्रमुखी ( जो के प्रथम पत्र के समान ), ३—गण्डूपदाकारमुखी ( गेंडुवे मुख के समान ) ॥ ११ ॥
तेषां पायना त्रिविधा क्षारोदकतैलेषु। तत्र क्षारपायितं शरशल्यास्थिच्छेदनेषु, उदकपायितं मांसच्छेदनभेदनपाटनेषु, तैलपायितं सिराण्यधनस्नानयुच्छेदनेषु ॥ १२ ॥
पायना—शब्दों में तीक्ष्ण आदि गुण सौष्ठव उत्पन्न करने के लिये इनको भिन्न २ वस्तुओं में बुझाया जाता है, इसी को पायना कहते हैं। यह पायना तीन प्रकार की है। यथा—क्षार जल और तैल में। इनमें जो शब्द क्षार द्वारा भावित हों, उनका उपयोग शर, शल्य-अस्थि के छेदन में; उदक में भावित शब्दों का उपयोग—मांस के छेदन भेदन पाटनकार्य में; तैल में भावित शब्दों का उपयोग-सिरा के वीथने में और स्नानु छेदने में करना चाहिये। पायना—पानी चढ़ाना। विवृत्तानां शस्त्राणां तत्क्षणान् द्रवद्रव्येषु पायना ।
वि० मन्तव्य—पायनानिर्माण के पश्चात् अथवा शाणु पर चढ़ाने के पश्चात् शब्दों को पान चढ़ाई जाती है इसी का नाम "पायना" है। शस्त्र के फल को तपाकर जल में अथवा आवश्यकतानुसार क्षारोदक तैल में बुझा दिया जाता है इस क्रिया से धार दृढ़ एवं चिरस्थायी हो जाती है। और विषद्रव में बुझाने से विषैली भी हो जाती है। चाकू आदि को शान पर चढ़ाकर जो जल में डुबोया जाता है वह "पायना" ही है ॥ १२ ॥
तेषां निशानार्थं शल्यशिला माषवर्णा धारासंस्थापनार्थं शालमळीफलकमिति ॥ १३ ॥
शब्दों को तेज करने के लिए उद्भव के समान काली चिकनी पत्थरी का उपयोग करना चाहिए। धार की तीक्ष्णता की रक्षा के लिए सिम्बल का फलक रखना
१ पायना के लिये—लेखक का शल्य तन्त्र देखिये।
अ० ६ ] ५
सूत्रस्थानम्
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चाहिये'। धारा संस्थापनार्थ—का अर्थ श्रीघाणेकर जी ने स्ट्रोपिंग (Stropping) किया है। इससे धार स्पष्ट और मृदु हो जाती है।
वि० मन्तव्य—धार को तीक्ष्ण करने के लिये—चमड़े का टुकड़ा तथा कपड़े का खण्ड भी उपयुक्त होता है ॥१३॥ भवति चात्र—
यदा सुनिशितं शस्त्रं रोमच्छेदि सुसंस्थितम् ॥ सुगृहीतं प्रमाणेन तदा कर्मसु योजयेत् ॥१४॥ कहा भी है—
धार की पहिचान—जिस समय शस्त्र रोम का छेदन करने लगे (बाल को साफ करनेलगे), तब उसे भली प्रकार तेज समझना चाहिये। शोभन आकारवाला पूर्वोक्त विधि से भली प्रकार पकड़ा हो, पूर्वोक्त प्रमाण में बना हो, तब शस्त्र को छेदन आदि कार्य में प्रयोग करना चाहिये। वामभट्ट में रोमच्छेदि के स्थान पर रोमवाही—बाल मड़नेवाला है।
वि० मन्तव्य—धार की उत्तम कोटि की तीक्ष्णता का लक्षण है सरलता से रोमों—बालों का छेदन—काट डालना ॥१४॥
अनुशस्त्राणि तु स्वक्सारस्फटिककाचकुशविन्दजलो- रिन्क्षारुनखगोजीशेफालिकाशकपत्रकरीरबालाकुल्य इति॥
शिशु—छी आदि में अथवा शस्त्र के अभाव में अनुशस्त्रों का उपयोग करना चाहिये। अनुशस्त्र—यथा—स्वक्सार—(बाँस की छाल), स्फटिक, काच, कुशविन्द—(लोहितशमरत्न प्रधान), जलौका, अग्नि, क्षार, नख, गोर्जो (गाजवा), शेफालिका (हरसिंगार), शकपत्र (सागौन का पत्ता), बाल अंगुलि—ये अनुशस्त्र हैं।
वि० मन्तव्य—अनुशस्त्र वे कहे जाते हैं जो लोह के शस्त्र नहीं होते, परन्तु उनसे शस्त्र का काम लिया जाता है। जैसे—फफोला आदि के भेदन का काम काच की नोक से ले लिया जाता है, लेखन का काम गाजवों के पत्र से जो खरदरा होता है ले लिया जाता है आदि २। शेष निचले श्लोकों में देखिये ॥
शिशूनां शस्त्रभीरूणां शस्त्राभावे च योजयेत्। स्वक्सारादिचतुर्वर्गं छेद्यं भेद्यं च बुद्धिमान् ॥१६॥
१ वामभट्ट ने धार की रक्षा के लिये शस्त्र कोषों का वर्णन किया है। यथा—
स्याच्चवांगुलविस्तारः सुघनो द्वादशांगुलः।
चौमपत्रोर्णकोशेयदुकूलमृदुचर्मजः ॥
विन्यस्तपाशः सुरयुतः सान्तरोर्णात् शस्त्रकः।
शलाकापिहितास्पृश्च शस्त्रकोपः सुसंचयः ॥
वामभट्ट०
शस्त्र कोषों का वर्णन अन्यत्र भी है।
आहार्यच्छेद्यभेद्येषु नखं जक्येषु योजयेत्।
विधिः प्रवक्ष्यते पश्चात् क्षारवहिजलौकसाम् ॥१७॥
ये स्मृसुखगता रोगा नेत्रवस्संगताश्च ये।
गोजीशेफालिकाशकपत्रैर्विद्यावयेत्तु तान् ॥१८॥
एष्येवेषण्यलाभे तु बालाकुल्यकुरा हिताः।
इन अनुशस्त्रों का विषय—
शिशुओं में, शस्त्र से डरनेवाले पुरुषों में अथवा शस्त्र के अभाव में छेदन-भेदन कार्य में स्वक्सार आदि चार (वंश, स्फटिका, काच, कुशविन्द) का प्रयोग करना चाहिये। आहरण, छेदन, भेदन जी कार्य नख से शक्य हों उनसे नख का प्रयोग करना चाहिये। क्षार वहि और जौक की विधि आगे कहेंगे। मुख रोगों में तथा नेत्र वर्त्म के रोगों में—गोजी, शेफालिका, शक—इनके पत्रों का उपयोग करना चाहिये। एष्य कार्य में एषणी के अभाव में बाल, अंगुलि-अंकुर हितकारी हैं। ॥१६-१८॥
शस्त्राण्येतानि मतिमान् शुद्धैक्यायसानि तु।
कारयेत् करणप्रामं कर्मारं कर्मकोविदम् ॥१९॥
बुद्धिमान् वैद्य—अपने कर्म में निपुण, कर्मपण्डित—कर्म को जाननेवाले लुहार से, शुद्ध मलरहित, तीक्ष्ण लोहे से शस्त्रों को बनवावे ॥१९॥
प्रयोगज्ञस्य वैद्यस्य सिद्धिर्भवति नित्यशः।
तस्मात् परिचयं कुर्याच्छस्त्राणां ग्रहणे सदा ॥२०॥
प्रयोग को जाननेवाले वैद्य को आरोग्य संपादन कार्य में सदा सफलता मिलती है। इसलिये सब से प्रथम शस्त्रों का परिचय (ज्ञान) बार-बार प्राप्त करना चाहिये।
वि० मन्तव्य—शस्त्रों के ग्रहण (पकड़ने तथा उपयोग)—प्रयोग में परिचय-ज्ञानकारी का अभ्यास सदा करते रहना चाहिये ॥२०॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने शस्त्रावचारणीयो
नामाष्टमोऽध्यायः ॥८॥
नवमोऽध्यायः
अथातो योग्यासूत्रीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे योग्यासूत्रीय (सम्यक् कर्माभ्यास रूपी) नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥
अधिगतसर्वशस्त्रार्थमपि शिष्यं योग्यां कारयेत्।
स्नेहादिषु छेद्यादिषु च कर्मपथमुपदिशेत्। सुबहुश्रुतोऽप्य- कृतयोग्यो भवति ॥३॥
१ योग्या को Operative surgery ऑपरेटिव सर्जरी कहते हैं। आजकल यह कार्य मृतशरीर पर सिखाते हैं।
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १० ]
सर्पूणं शास्त्र पदे हुए शिष्य को भी योग्या (कर्मभ्यास) करवाना चाहिये। स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन आदि, तथा लेंध, भेद्य, - वेध आदि शास्त्र कार्यों में कर्म करने की विधि वतानी चाहिये। क्योंकि बहुत अच्छी प्रकार शास्त्र पढ़ लेने पर भी, कर्माभ्यास किये बिना कार्यों में अयोग्य होता है ॥
तत्र, पुष्पफलालाबूकालिन्दकत्रपुसै (सो) वारूकककर्करुप्रभृतिषु छेद्यविशेषान् दर्शयेत्, उत्कर्तनापकर्तनानि चोपदिशेत्, दृतिवस्तिप्रसेवकप्रभृतिष्वृदकपङ्कपूर्णेषु भेद्ययोग्यां, सरोणि चर्मण्यतते लेख्यस्य, मृतपशुसिरामृतपलनालेषु च वेध्यस्य, घुणोपहतकाष्ठवेणुनलनालीशुष्कालाबूमुखेवेध्यस्य, पनसविम्बोबिल्वफलमञ्जमृतपशुदन्तेष्वहायस्य, मधुच्छिष्टोपलिप्तै गालमलोफलके विस्त्राण्यस्य, सूक्ष्मघनवखान्तयोर्भृदुवर्मान्तयोश्च सौन्यस्य, पुस्तमयपुरुषाङ्गप्रत्यङ्गविशेषेषु बन्धनयोग्यां, मृदुषु मांसखण्डेष्वनिक्षारयोग्यां, मृदुचर्ममांसपेशीपूष्यलनालेषु च कर्णसन्धिबन्धयोग्याम्, उदकपूर्णघटपाश्चस्त्रोत्स्यलाबूमुखदिषु च नेत्रप्रणिधानवस्तिव्रणवस्तिपीडनयोग्यामिति ॥४॥
पुष्पफल (कूष्माण्ड), अलाबु (वियाकद्वृद) कालिन्दक (तरबूजा), त्रपुस (खीरा), एवार्क (ककड़ी), कर्कार (ककड़ी भेद), आदि वस्तुओं में छेदन के सब भेदों को दिखाना चाहिये। उत्कर्तन (ऊपर को काटना), अपकर्तन (नीचे की ओर काटना) ये भी कार्य इन्हीं पर दिखाये। दृति (मशक), वस्ति (मूत्र से भरी) प्रसेवक (चर्म निर्मित भाण्ड), आदि पानी एवं कीचड़ से भरी वस्तुओं में भेदन योग्य कार्यों को, लोमयुक्त चर्म को फैलाकर उस पर लेखन कार्यों को, मृत पशुओं की खिराओं में तथा कमल नाली में वेधन कार्यों को, घुण से खाई लकड़ी आदि में, वेणु, नल, नाली एवं शुष्क अलाबु के मुखों में एषणी कार्यों को; पनस (कटहल), कन्दूरी, बिल्वफल की मजा, मृतपशुओं के दांतों में आहरण कार्यों को, सिम्बल के तस्ते को मोम से लिप्त करके इस पर विस्त्रावण कार्यों को, वस्त्रादि से या मिट्टी से बनी पुरुष प्रतिमाओं के अंग-प्रत्यङ्ग विशेषों में बन्धनयोग्य कार्यों को, कोमल चर्म, मांस-पेशी तथा कमल नालों में कर्णसन्धि-बांधने योग्य कार्यों को, पानी से भरे घड़े में पार्श्व में छेद करके और अलाबु मुख आदि में नेत्र प्रवेशन बस्ति पीडन कार्यों को दिखाना चाहिये।
१ पुस्त का लक्षण--
“मृदा वा दारुणा-वाय वस्त्रेणाप्यथ चर्ममणा।
लोहरन्तैः कृतं वापि पुस्तमित्यभिधीयते ॥
पुस्तो दान्यादिमय्यास्याद्याक्रुतरेषादानकारणं यद् वस्तु तदुच्यते ॥ अरण्यदत्त०
वि० मन्तव्य—पनसविम्बो, बिल्वफल की मज्जा अर्थात् बीज। मधुच्छिष्ट (मोम) से उपलिप्त तखती पर विस्त्रावण के स्थान में लेखन पाठ अधिक उपयुक्त है ॥४॥
भवतश्चात्र—
एवमादिषु मेधावी योग्याह्वेषु यथाविधि। द्रव्येषु योग्यां कुर्वाणो न प्रमुह्यति कर्मसु ॥५॥
उपसंहार, कहा भी है—
इस प्रकार से मेधावी शिष्य पुष्प-फलादि द्रव्यों में यथाविधि कर्मभ्यास करनेवाला कार्यों में मोहित नहीं होता ॥५॥
तस्मात् कौशलमन्विच्छन् शस्त्रक्षारानिकर्मसु। यस्य यत्रह साधर्म्यं तत्र योग्यां समाचरेत् ॥६॥
इसलिये शस्त्र, क्षार, अग्नि आदि कार्यों में कुशलता चाहने की इच्छा से, जिस कार्य की जिस द्रव्य में समानता देखे, उस द्रव्य में उसी कर्मभ्यास को करना चाहिये ॥६॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने योग्यासूत्रयो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
दशमोऽध्यायः
अथातो विशिखानुप्रवेशनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१॥
इसके आगे ‘विशिखानुप्रवेशनीय’ अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था। विशिखा—वैद्यक व्यवसाय का कर्म मार्ग यह अर्थ है। है। हाराणचन्द्र जी ने विशिखा का अर्थ रोगी के घर का मार्ग किया है ॥१,२॥
अधिगततन्त्रेणोपासिततन्त्रार्थेन हृष्टकर्मणा कृतयो- भ्येन शास्त्रं निगदता राजानुज्ञातेन नीचनखरोम्णा शुचिना शुक्लवस्त्रपरिहितेन छत्रवता दण्डहस्तेन सोपानत्केनातुदः तवेशेन सुमनसा कल्याणाभिग्याहारेणाकुहकेन बन्धुभू- तेन भूतानां सुसहायवता वैद्येन विशिखास्तुप्रवेष्टव्या ॥३॥
गुरु के मुख से शास्त्र को पढ़कर, गुरु के समीप तन्त्रार्थ का अभ्यास करके, कर्मों को देखकर, कर्मभ्यासस्वयं करके, शास्त्र को वदूा सकनेवाला, राजा की आज्ञा से (सरकार की आज्ञा प्राप्त करके)
१ जैन-ग्रन्थों में वैशिखा या विशिखा शब्द आया है। इसका अर्थ यह है कि मल्ल लोग कुस्ती से थककर जहाँ खड़े होकर विश्राम लेते हैं, उसे विशिखा कहते हैं। इसके लिये उत्तराध्ययन सूत्र में उज्जैन के अट्टेन मल्ल का उपाख्यात दिया है, वह देखना चाहिये।