सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
[ अ० ८ ]
इन उपयुक्त १२ दोषों से रहित १८ अंगुल लम्बा यन्त्र वैद्य को प्रशस्त समझना चाहिये। इसी प्रकार के यन्त्र को शल्य-कर्म में बरतना चाहिए ॥२०॥
हरयं सिंहमुखवाघैस्तु गृहं कङ्कमुखदिभिः। निर्हरेत शनैः शल्यं शाखयुक्तिः श्यपेक्षया ॥२१॥
हरय शल्यको सिंहमुख आदि यन्त्रों से निकालना चाहिये, और जो शल्य छिपा हो—आँख से दिखाई न दे उसको कंक-मुख आदि से निकालना चाहिए। शस्त्र एवं युक्ति की अपेक्षा से शल्य को धीरे से बाहर करना चाहिए ॥२१॥
नि (वि) वर्तते साधवग्राहते च शल्यं निगृह्योद्भूते च यस्मात्। यन्त्रेष्वतः कङ्कमुखं प्रधानं स्थानेषु सर्वेष्वधि- (वि) कारि चैव ॥२२॥
सब यन्त्रों में कङ्कमुख यन्त्र प्रधान है। क्योंकि—यह कङ्कमुख जल्दी ही बाहर निकल आता है और भली प्रकार से जल्दी ही अन्दर घुस जाता है। शल्य को पकड़कर बाहर खींच लेता है। (विवर्त्तते—पाठ में—अन्दर घूम सकता है)। संधि-धमनी आदि सब स्थानों में इस कङ्कमुख की ही प्रधानता है—यही अधिकारी है। इसलिए सब यन्त्रों में कङ्कमुख ही प्रधान है।
वि० मन्तव्य—शल्य को पकड़कर बाहर निकालने में भले ही प्रधान हो, वैसे तो अपने कार्य के लिये यन्त्र ही नहीं उप-यन्त्र रज्जू आदि भी प्रधान हैं, उपयोगी हैं अति-उपयोगी हैं ॥
इति मुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने यन्त्रविधिनिर्णाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
अष्टमोऽध्यायः
अथातः शस्त्रावचारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे 'शस्त्रावचारणीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने मुश्रुत के लिए कहा था।
वि० मन्तव्य—शस्त्र-छेदन, भेदन, आदि अर्थात् चीरने, फाड़ने, काटने, छीलने आदि कार्यों में प्रयुक्त होते हैं जैसे यंत्र बाँधने आदि कार्यों में। देखिए अ० ५ का सू० ५ ॥१, २॥
विशतिः शस्त्राणि, तद्यथा—मण्डलाप्रकरपत्रवृद्धिपत्रनखशस्त्रमुद्रिकोत्पलपत्रकार्धधारसूचिकुशपात्राटोमुखशरारिमुखान्तर्मुखत्रिकूर्चककुठारिकाब्रीहिमुखारावेतसपत्रबडिशदन्तरशङ्कुवेषण्य इति ॥३॥
शस्त्रों की संख्या बीस है—इनका आकार इनके नाम से ही प्रायः स्पष्ट है। मण्डलाप्र (Circular Knife या Round-head Knife), करपत्र (Saw आरी), वृद्धिपत्र (अब्धि-ताप्र—Scalpel—प्रयताप्र—Abscess knife), नखशस्त्र (Nail—pairs), मुद्रिका (दो अंगुल लम्बा—उत्तरे की बनावट के Finger-knife), कमलपत्र के समान तेज धार वाला उत्तर्मुख (Lancel), अर्धधार (Single Ebged Knife), सूची—सूई कुश के समान कम चौड़ा परन्तु तीक्ष्ण-धार कुशपत्र (Bistoury), आरिमुख (आरी—जलवर्धनी नामक पक्षी के समान मुख जैसा), शरारिमुख (दोही चोंच वाला—सफेद स्कुन्धोवाले पक्षी के मुख के समान—कैंची—लोक में), अन्तर्मुख (मध्य में मुखवाला मध्य मुख Curved Bistoury), त्रिकूर्चक (तीन छोटी-छोटी छुरियोंवाला), कुठारिका (हथोड़ी-Ave-shaped), ब्रीहिमुख (Trocar) आरा (Owl-like-knife), वेतसपत्र (पतली धार का चाकू Narrow-Bladed knife), बडिश (मछली पकड़ने का काँटा—Hooks), दन्तरशङ्कु (दांतखुरदने का चाकू Tooth-pilk), एषणी (Sharp-proves)—इस प्रकार से बीस शस्त्र हैं।
वि० मन्तव्य—कुठारिका-कुल्हाड़ी के आकार का परन्तु छोटा वह शस्त्र जिसके द्वारा खिरावेध किया जाता है। देखिए सु० शा० अ० सू० ६ ॥३॥
तत्र मण्डलाप्रकरपत्रे स्यातां छेदने लेखने च, वृद्धिपत्रनखशस्त्रमुद्रिकोत्पलपत्रकार्धधारणि छेदने भेदने च, सूचीकुशपत्राटो (टा) मुखशरारिमुखान्तर्मुखत्रिकूर्चकानि विस्वाषणे, कुठारिकाब्रीहिमुखारावेतसपत्रकाणि व्यधने सूची च, बडिशं दन्तरशङ्कुआहरणे, एषण्येषणे आनुलोम्ये च, सूच्यः सोवने, इत्यष्टविधे कर्मण्युपयोगः शस्त्राणां व्याख्यातः ॥४॥
इनका उपयोग—
इन शस्त्रों में मण्डलाप्र और करपत्र छेदन एवं लेखन कार्यों में; वृद्धिपत्र, नखशस्त्र, मुद्रिका, उत्पलपत्र, अर्धधार ये छेदन एवं भेदनकार्यों में; सूची, कुशपत्र, आटीमुख, शरारिमुख, अन्तर्मुख और त्रिकूर्चक-विस्वाषण्यकार्यमें; कुठारिका, ब्रीहिमुख,
१ शस्त्रों का ज्ञान-प्रत्यक्ष में भली प्रकार होता है। ज्ञान के लिये कविराज हाराणचन्द्रजी की या उल्लेख की टीकासे सहायता ली जा सकती है। वामभट्ट ने सर्ववत्र, शलाका, कर्तरि, सूची-कूर्च, खज एवं कर्णव्यधन ये छे शस्त्र अधिक कहे हैं। इनके तथा अन्य लक्षण अष्टांगसंग्रह में देखिये।