भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ८ ]

सूत्रस्थानम्

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आरा, वेतसपत्र, और सूरै ( कुशपत्र-उत्पलपत्र ), भी व्यथन कार्य में; बडिश् और दन्तशंकु-आहरण कार्य में; एषणी एषण और अनुलोमन कार्य में; सूरै-लीवन कार्य में; इस प्रकार से आठ प्रकार के कार्यों में इन शास्त्रों का उपयोग होता है । ( डल्हण ने अनुलोमन का अर्थ विस्वावण किया है ) ॥ ४ ॥

तेषामथ यथायोगं ग्रहणसमासोपायः कर्मसु वदत्यते । तत्र वृद्धिपत्रं वृन्तफलसाधारणे भागे गृह्णीयात्, भेदना- न्येवं सर्वाणि, वृद्धिपत्रं मण्डलाग्रं च किंचिदुत्तानेन पाणिना लेखने बहुशोऽवचार्य, वृन्ताग्रे विस्वावणानि, विशेषेण तु बालवृद्धसुकुमारभीरुनारीणां राज्ञां राजपुत्राणां च त्रिकूर्चकेन विस्वावयेत्, तलप्रच्छादितवृन्तमङ्गुष्ठप्रदे- शिनीभ्यां व्रीहिमुखं, कुठारिकां वामहस्तन्यस्तामितरहस्त- मध्यमाङ्गुल्याङ्गुष्ठविष्टव्याऽभिहन्त्यात् आराकरपत्रैषण्यो मूले, शेषाणि तु यथायोगं गृह्णीयात् ॥ ५ ॥

इन शास्त्रों को पकड़ने को विधि संक्षेप में कहते हैं— इनमें वृद्धिपत्र को वृन्त और फल के संयोगस्थान में पकड़ना चाहिये । इसी प्रकार सब भेदन शास्त्रों को पकड़ना चाहिये । वृद्धिपत्र और मण्डलाग्र शास्त्र को हाथ को कुछ ऊँचा करके लेखन कार्य में, बहुत बार प्रयोग करना चाहिये । विस्वावण कार्य में आनेवाले शास्त्रों को वृन्त के अगले भाग में पकड़ना चाहिये । बालक, बृद्ध, सुकुमार, भीरु स्त्रियों का, राजा एवं राजपुत्रों का त्रिकूर्चक शास्त्र से रक्त विस्वावण करना चाहिये । व्रीहिमुख के वृन्त को हाथ के तलुवे में ढाँपकर अंगुष्ठ तथा प्रवेशिनी अंगुलियों से पकड़ना चाहिये । वाम हस्त से पकड़कर दक्षिण हाथ की मध्य अंगुली से अंगूठे का सहारा लेकर इसके माथे पर चोट करने चाहिए । आरा, करपत्र और एषणी को मूल से पकड़ें । शेष शास्त्रों को यथारीति से पकड़ना चाहिये । जैसे उनका कार्य ठीक हो, वैसे पकड़ें ।

वि० मन्तव्य—वृन्त-शास्त्र की मूठ या वीण्डा का नाम है, जहाँ से पकड़कर शास्त्र चलाया जाता है । फल-शास्त्र के उस भाग का नाम है जिससे छेदन भेदन आदि कर्म किया जाता है । “वृन्तफलसाधारण” भाग वह है जहाँ दोनों का सन्धान जोड़ होता है । त्रिकूर्चक—वह कूची है जिसमें दो से अधिक सूइयाँ एक साथ बंधी रहती हैं, जैसा गोदने या खुनने के लिये प्रयुक्त होता है । वृद्धिपत्र—यहाँ पर बृद्धि शब्द “वृधु- छेदने” धातु ( भ्वादि आत्मनेपदी ) से निष्पन्न हुआ है । इसका अर्थ है—वृद्धये ( छेदनाय ) पत्रं ( चतुर्थीतत्पुरुष ) अर्थात् छेदन के लिये पत्र है । पत्र का अर्थ है पत्र = पत्ती-

लोह की तीखी पत्ती । बृद्धिपत्रं लुराकारं छेदभेदनपाटने । वा० सू० अ० २६ रलो० ७ । बृद्धिपत्र लुरा या उत्सुरा का या चाक्र का नाम है । करपत्र—छेदोऽस्थनां करपत्रं तु खरधारं दशाङ्गुलम् । विस्तारे द्रध्गुलं सूक्ष्मदन्तं सुस्वरुन्धनम् ॥ अर्थात्—अस्थि काटने के लिये—करपत्र नामक शास्त्र होता है । उसकी धार खरदरी सूक्ष्म २ दन्तों—दन्तों वाली, लम्बाई १० अंगुल, चौड़ाई २ अंगुल । सुन्दर मूठ में बँधी दो कीलों से कही पत्ती होती है । इसका नाम “आरी” है । मण्डलाग्र—इसका फल तर्जनी अंगुली के नख के आकार का होता है । नखशास्त्र—नख काटने के शास्त्र का नाम है । मुद्रिका—इसे अंगुली पर चढ़ाकर कार्य किया जाता है । इसके अग्रभाग में उत्सुरा अथवा मण्डलाग्र शास्त्र का सा तीखा शास्त्र लगा रहता है । उत्पलपत्रक—कमल की पंखुरी के सहस्र आकृति- वाला शास्त्र । अर्द्धधार—इसके फल के आधे अथवा आधे से कुछ अधिक भाग की धार तीखी रहती है । सूची—सूरै का नाम है । कुशपत्र—कुश के पत्र के सहस्र फलवाला । आटी- मुख—आटी या आड़ी नामक पक्षी की चींच के आकार का शास्त्र । यह पक्षी जल के आसपास रहता है । शरारिमुख—शरारि आटी पक्षी सा कोई पक्षी है । उसकी चींच सा । अन्तर्मुख—इसका फल अर्द्धचन्द्र ( द्वितीया तृतीया का चन्द्र ) के सहस्र आकृतिवाला और ११ अंगुल का होता है । इसके अन्तर्भाग में धार होती है । व्रीहिमुख—जो के सहस्र मुख- वाला या फलवाला ।

आरा—यह वह शास्त्र है जिसके द्वारा नाथ सम्प्रदाय में कान फाड़े जाते हैं । इसका मुख आधा अंगुल चौड़ा होता है और सब घुसा दिया जाता है । वेतसपत्र—वेत के पत्र के सहस्र आकारवाला । इसके दोनों ओर वेत के पत्र के समान दन्त या दाँते होते हैं । करपत्र में एक ही और होते हैं । बडिश्—मछली पकड़ने के काँटे जैसा, द्वितीया के चन्द्र के सहस्र टेढ़ा और एक ओर तीखा । दन्तशंकु—दन्त छीलने के योग्य, इसे पञ्जाब में “छिंग” कहते हैं । इससे दन्तशर्करा, दन्तकपालिका उतारी जाती है और दन्त या दाढ़ के खड़े के सड़े गले या जीर्ण भाग को खुरचा जाता है । एषणी—नासूर के वृण का पता लगाने में उपयोगी, यह केंचुवा के समान गोल लम्बी एवं लचकीली होती है, परन्तु यह शास्त्र नहीं—यन्त्र कही जा सकती है । भेदन के लिये जो सूरै के सहस्र तीखे मुखवाली और जिसके मूल में धागा डालने का छिद्र होता है वह भी एषणी कही जाती है । यही शास्त्र गणना में गिनी गई है । अनुलोमन करना ही एषणी यन्त्र का काम है और भेदनोपयोगी सूची का नाम भी एषणी है । बाण का