भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ८ ]

नाम इषु है, जो शब्द होता है और जिस ( ईष-गतिहिंसन-दर्शनेषु धातु भ्वादिगणीय ) से इषु शब्द निष्पन्न होता है। उसी से एषणी शब्द भी निष्पन्न होता है। इस उपकरण से भेदन रूपी हिंसन और नासूर की गति का दर्शन भी होता है। अतएव अग्रिम ११ वें सूत्र में-तीक्ष्ण कांटे तथा जो के प्रथम पत्र के सहस्र तीखे मुखवाली एषणी कही गई है ॥ ५ ॥

तेषां नामभिरैवाकृतयः प्रायेण व्याख्याताः ॥ ६ ॥

इन शब्दों के आकार प्रायः नाम संकीर्तन से ही कह दिये हैं ॥ ६ ॥

तत्र नखशब्देष्वण्यवाष्टाङ्गुले, सूर्यो वक्ष्यन्ते, ( प्रदे-शिन्यप्रपर्वप्रदेशप्रमाणं सुद्रिका, दशाङ्गुला शरारिसुखी सा च ( या सा ) कर्तरीति कथ्यते ), शेषाणि तु षडङ्गुलानि ॥ ७ ॥

इनमें नख शब्द तथा एषणी आठ अंगुल के होते हैं। सूत्रों का वर्णन-अष्टकर्माध्याय में करेंगे। सुद्रिका-प्रदेशिनी ( तर्जनी ) के प्रमाण का होता है। शरारिसुख शब्द दश अंगुल लम्बा है, उसे कैंची भी कहते हैं। नख शब्द, एषणी और सूई को छोड़कर शेष सब शब्द छै अंगुल हैं ॥ ७ ॥

तानि सुप्रहाणि, सुलोहानि, सुधाराणि, सुरूपाणि, सुसमाहितमुखप्राणि, अकरालानि, चेति शब्दसम्पत् ॥ ८ ॥

शब्दसम्पत्—सुप्रहाणि ( पकड़ने में सुन्दर ), सुलोहानि ( उत्तम लोहे के बने ), सुधाराणि ( तीक्ष्ण धारवाले ), सुरूपाणि ( देखने में सुन्दर रूपवाले ), सुसमाहितमुखप्राणि ( सुन्दर मुखवाले ) अकरालानि ( दांत रहित-देखने में भयानक नहीं ) होने चाहिये। ये शब्दों के गुण हैं ॥ ८ ॥

तत्र वक्रं, कुण्ठं, खण्डं खरधारम्, अतिसू्यूलम्, अत्यल्पम्, अतिदीर्घम्, अतिहृस्वम्, इत्यष्टौ शब्दोषाः। अतो विपरीतगुणमाददीत, अन्यत्र करपत्रात्, तद्विखरधारमस्थिच्छेदनार्थम् ॥ ९ ॥

शब्दों के दोष—वक्र ( टेढ़ा ), कुण्ठ ( खुण्डा-मोटी धार ), खण्ड ( टूटा हुआ ) खरधार ( कर्कश धारवाला ), अतिसू्यूल, अतिउर्च्छ, अति दीर्घ, अति हृस्व—ये आठ शब्द के दोष हैं। इनसे विपरीत गुणोंवाले शब्द को ग्रहण करना चाहिये। परन्तु यह करपत्र के लिये नहीं है। क्योंकि इसकी धार दांतोंवाली होती है, यह अस्थि 'छेदन के कार्य में होता है ॥ ९ ॥

तत्र धारा भेदनानां मासूरी, लेखनानामर्धमासूरी, न्यधनानां विस्त्रावणानां च कैशिकी, छेदनानामर्धकैशिकीति ॥ १० ॥

अष्टविध कार्य में धार का निश्चय—

भेदन कार्य में आनेवाले शब्दों की धार मसूर पत्र की धार के समान मोटी, मण्डलाग्र आदि लेखन शब्दों की धार मसूर दल की धार से आधी, कुटारिका सूची कुशपत्र आदि न्यधन कार्य में आनेवाले शब्दों की धार केश के समान पतली, वृद्धिपत्र आदि छेदन शब्दों की धार केश से आधी पतली होनी चाहिये ॥ १० ॥

बद्धिशं दन्तशङ्कुश्रान्ताग्रे। तीक्ष्णकण्टकप्रथमयव-पत्रमुख्येषणी ( गण्डूपदाकारमुखी च ) ॥ ११ ॥

बद्धिश आगे से कुछ झुका होना चाहिये, दन्तशंकु भी कुछ टेढ़ा होना चाहिये। एषणी तीन प्रकार की है। यथा—१—तीक्ष्णकण्टक, २—प्रथमयवपत्रमुखी ( जो के प्रथम पत्र के समान ), ३—गण्डूपदाकारमुखी ( गेंडुवे मुख के समान ) ॥ ११ ॥

तेषां पायना त्रिविधा क्षारोदकतैलेषु। तत्र क्षारपायितं शरशल्यास्थिच्छेदनेषु, उदकपायितं मांसच्छेदनभेदनपाटनेषु, तैलपायितं सिराण्यधनस्नानयुच्छेदनेषु ॥ १२ ॥

पायना—शब्दों में तीक्ष्ण आदि गुण सौष्ठव उत्पन्न करने के लिये इनको भिन्न २ वस्तुओं में बुझाया जाता है, इसी को पायना कहते हैं। यह पायना तीन प्रकार की है। यथा—क्षार जल और तैल में। इनमें जो शब्द क्षार द्वारा भावित हों, उनका उपयोग शर, शल्य-अस्थि के छेदन में; उदक में भावित शब्दों का उपयोग—मांस के छेदन भेदन पाटनकार्य में; तैल में भावित शब्दों का उपयोग-सिरा के वीथने में और स्नानु छेदने में करना चाहिये। पायना—पानी चढ़ाना। विवृत्तानां शस्त्राणां तत्क्षणान् द्रवद्रव्येषु पायना ।

वि० मन्तव्य—पायनानिर्माण के पश्चात् अथवा शाणु पर चढ़ाने के पश्चात् शब्दों को पान चढ़ाई जाती है इसी का नाम "पायना" है। शस्त्र के फल को तपाकर जल में अथवा आवश्यकतानुसार क्षारोदक तैल में बुझा दिया जाता है इस क्रिया से धार दृढ़ एवं चिरस्थायी हो जाती है। और विषद्रव में बुझाने से विषैली भी हो जाती है। चाकू आदि को शान पर चढ़ाकर जो जल में डुबोया जाता है वह "पायना" ही है ॥ १२ ॥

तेषां निशानार्थं शल्यशिला माषवर्णा धारासंस्थापनार्थं शालमळीफलकमिति ॥ १३ ॥

शब्दों को तेज करने के लिए उद्भव के समान काली चिकनी पत्थरी का उपयोग करना चाहिए। धार की तीक्ष्णता की रक्षा के लिए सिम्बल का फलक रखना

१ पायना के लिये—लेखक का शल्य तन्त्र देखिये।