भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ६ ] ५

सूत्रस्थानम्

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चाहिये'। धारा संस्थापनार्थ—का अर्थ श्रीघाणेकर जी ने स्ट्रोपिंग (Stropping) किया है। इससे धार स्पष्ट और मृदु हो जाती है।

वि० मन्तव्य—धार को तीक्ष्ण करने के लिये—चमड़े का टुकड़ा तथा कपड़े का खण्ड भी उपयुक्त होता है ॥१३॥ भवति चात्र—

यदा सुनिशितं शस्त्रं रोमच्छेदि सुसंस्थितम् ॥ सुगृहीतं प्रमाणेन तदा कर्मसु योजयेत् ॥१४॥ कहा भी है—

धार की पहिचान—जिस समय शस्त्र रोम का छेदन करने लगे (बाल को साफ करनेलगे), तब उसे भली प्रकार तेज समझना चाहिये। शोभन आकारवाला पूर्वोक्त विधि से भली प्रकार पकड़ा हो, पूर्वोक्त प्रमाण में बना हो, तब शस्त्र को छेदन आदि कार्य में प्रयोग करना चाहिये। वामभट्ट में रोमच्छेदि के स्थान पर रोमवाही—बाल मड़नेवाला है।

वि० मन्तव्य—धार की उत्तम कोटि की तीक्ष्णता का लक्षण है सरलता से रोमों—बालों का छेदन—काट डालना ॥१४॥

अनुशस्त्राणि तु स्वक्सारस्फटिककाचकुशविन्दजलो- रिन्क्षारुनखगोजीशेफालिकाशकपत्रकरीरबालाकुल्य इति॥

शिशु—छी आदि में अथवा शस्त्र के अभाव में अनुशस्त्रों का उपयोग करना चाहिये। अनुशस्त्र—यथा—स्वक्सार—(बाँस की छाल), स्फटिक, काच, कुशविन्द—(लोहितशमरत्न प्रधान), जलौका, अग्नि, क्षार, नख, गोर्जो (गाजवा), शेफालिका (हरसिंगार), शकपत्र (सागौन का पत्ता), बाल अंगुलि—ये अनुशस्त्र हैं।

वि० मन्तव्य—अनुशस्त्र वे कहे जाते हैं जो लोह के शस्त्र नहीं होते, परन्तु उनसे शस्त्र का काम लिया जाता है। जैसे—फफोला आदि के भेदन का काम काच की नोक से ले लिया जाता है, लेखन का काम गाजवों के पत्र से जो खरदरा होता है ले लिया जाता है आदि २। शेष निचले श्लोकों में देखिये ॥

शिशूनां शस्त्रभीरूणां शस्त्राभावे च योजयेत्। स्वक्सारादिचतुर्वर्गं छेद्यं भेद्यं च बुद्धिमान् ॥१६॥

१ वामभट्ट ने धार की रक्षा के लिये शस्त्र कोषों का वर्णन किया है। यथा—

स्याच्चवांगुलविस्तारः सुघनो द्वादशांगुलः।

चौमपत्रोर्णकोशेयदुकूलमृदुचर्मजः ॥

विन्यस्तपाशः सुरयुतः सान्तरोर्णात् शस्त्रकः।

शलाकापिहितास्पृश्च शस्त्रकोपः सुसंचयः ॥

वामभट्ट०

शस्त्र कोषों का वर्णन अन्यत्र भी है।

आहार्यच्छेद्यभेद्येषु नखं जक्येषु योजयेत्।

विधिः प्रवक्ष्यते पश्चात् क्षारवहिजलौकसाम् ॥१७॥

ये स्मृसुखगता रोगा नेत्रवस्संगताश्च ये।

गोजीशेफालिकाशकपत्रैर्विद्यावयेत्तु तान् ॥१८॥

एष्येवेषण्यलाभे तु बालाकुल्यकुरा हिताः।

इन अनुशस्त्रों का विषय—

शिशुओं में, शस्त्र से डरनेवाले पुरुषों में अथवा शस्त्र के अभाव में छेदन-भेदन कार्य में स्वक्सार आदि चार (वंश, स्फटिका, काच, कुशविन्द) का प्रयोग करना चाहिये। आहरण, छेदन, भेदन जी कार्य नख से शक्य हों उनसे नख का प्रयोग करना चाहिये। क्षार वहि और जौक की विधि आगे कहेंगे। मुख रोगों में तथा नेत्र वर्त्म के रोगों में—गोजी, शेफालिका, शक—इनके पत्रों का उपयोग करना चाहिये। एष्य कार्य में एषणी के अभाव में बाल, अंगुलि-अंकुर हितकारी हैं। ॥१६-१८॥

शस्त्राण्येतानि मतिमान् शुद्धैक्यायसानि तु।

कारयेत् करणप्रामं कर्मारं कर्मकोविदम् ॥१९॥

बुद्धिमान् वैद्य—अपने कर्म में निपुण, कर्मपण्डित—कर्म को जाननेवाले लुहार से, शुद्ध मलरहित, तीक्ष्ण लोहे से शस्त्रों को बनवावे ॥१९॥

प्रयोगज्ञस्य वैद्यस्य सिद्धिर्भवति नित्यशः।

तस्मात् परिचयं कुर्याच्छस्त्राणां ग्रहणे सदा ॥२०॥

प्रयोग को जाननेवाले वैद्य को आरोग्य संपादन कार्य में सदा सफलता मिलती है। इसलिये सब से प्रथम शस्त्रों का परिचय (ज्ञान) बार-बार प्राप्त करना चाहिये।

वि० मन्तव्य—शस्त्रों के ग्रहण (पकड़ने तथा उपयोग)—प्रयोग में परिचय-ज्ञानकारी का अभ्यास सदा करते रहना चाहिये ॥२०॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने शस्त्रावचारणीयो

नामाष्टमोऽध्यायः ॥८॥

नवमोऽध्यायः

अथातो योग्यासूत्रीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे योग्यासूत्रीय (सम्यक् कर्माभ्यास रूपी) नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥

अधिगतसर्वशस्त्रार्थमपि शिष्यं योग्यां कारयेत्।

स्नेहादिषु छेद्यादिषु च कर्मपथमुपदिशेत्। सुबहुश्रुतोऽप्य- कृतयोग्यो भवति ॥३॥

१ योग्या को Operative surgery ऑपरेटिव सर्जरी कहते हैं। आजकल यह कार्य मृतशरीर पर सिखाते हैं।