सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १० ]
सर्पूणं शास्त्र पदे हुए शिष्य को भी योग्या (कर्मभ्यास) करवाना चाहिये। स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन आदि, तथा लेंध, भेद्य, - वेध आदि शास्त्र कार्यों में कर्म करने की विधि वतानी चाहिये। क्योंकि बहुत अच्छी प्रकार शास्त्र पढ़ लेने पर भी, कर्माभ्यास किये बिना कार्यों में अयोग्य होता है ॥
तत्र, पुष्पफलालाबूकालिन्दकत्रपुसै (सो) वारूकककर्करुप्रभृतिषु छेद्यविशेषान् दर्शयेत्, उत्कर्तनापकर्तनानि चोपदिशेत्, दृतिवस्तिप्रसेवकप्रभृतिष्वृदकपङ्कपूर्णेषु भेद्ययोग्यां, सरोणि चर्मण्यतते लेख्यस्य, मृतपशुसिरामृतपलनालेषु च वेध्यस्य, घुणोपहतकाष्ठवेणुनलनालीशुष्कालाबूमुखेवेध्यस्य, पनसविम्बोबिल्वफलमञ्जमृतपशुदन्तेष्वहायस्य, मधुच्छिष्टोपलिप्तै गालमलोफलके विस्त्राण्यस्य, सूक्ष्मघनवखान्तयोर्भृदुवर्मान्तयोश्च सौन्यस्य, पुस्तमयपुरुषाङ्गप्रत्यङ्गविशेषेषु बन्धनयोग्यां, मृदुषु मांसखण्डेष्वनिक्षारयोग्यां, मृदुचर्ममांसपेशीपूष्यलनालेषु च कर्णसन्धिबन्धयोग्याम्, उदकपूर्णघटपाश्चस्त्रोत्स्यलाबूमुखदिषु च नेत्रप्रणिधानवस्तिव्रणवस्तिपीडनयोग्यामिति ॥४॥
पुष्पफल (कूष्माण्ड), अलाबु (वियाकद्वृद) कालिन्दक (तरबूजा), त्रपुस (खीरा), एवार्क (ककड़ी), कर्कार (ककड़ी भेद), आदि वस्तुओं में छेदन के सब भेदों को दिखाना चाहिये। उत्कर्तन (ऊपर को काटना), अपकर्तन (नीचे की ओर काटना) ये भी कार्य इन्हीं पर दिखाये। दृति (मशक), वस्ति (मूत्र से भरी) प्रसेवक (चर्म निर्मित भाण्ड), आदि पानी एवं कीचड़ से भरी वस्तुओं में भेदन योग्य कार्यों को, लोमयुक्त चर्म को फैलाकर उस पर लेखन कार्यों को, मृत पशुओं की खिराओं में तथा कमल नाली में वेधन कार्यों को, घुण से खाई लकड़ी आदि में, वेणु, नल, नाली एवं शुष्क अलाबु के मुखों में एषणी कार्यों को; पनस (कटहल), कन्दूरी, बिल्वफल की मजा, मृतपशुओं के दांतों में आहरण कार्यों को, सिम्बल के तस्ते को मोम से लिप्त करके इस पर विस्त्रावण कार्यों को, वस्त्रादि से या मिट्टी से बनी पुरुष प्रतिमाओं के अंग-प्रत्यङ्ग विशेषों में बन्धनयोग्य कार्यों को, कोमल चर्म, मांस-पेशी तथा कमल नालों में कर्णसन्धि-बांधने योग्य कार्यों को, पानी से भरे घड़े में पार्श्व में छेद करके और अलाबु मुख आदि में नेत्र प्रवेशन बस्ति पीडन कार्यों को दिखाना चाहिये।
१ पुस्त का लक्षण--
“मृदा वा दारुणा-वाय वस्त्रेणाप्यथ चर्ममणा।
लोहरन्तैः कृतं वापि पुस्तमित्यभिधीयते ॥
पुस्तो दान्यादिमय्यास्याद्याक्रुतरेषादानकारणं यद् वस्तु तदुच्यते ॥ अरण्यदत्त०
वि० मन्तव्य—पनसविम्बो, बिल्वफल की मज्जा अर्थात् बीज। मधुच्छिष्ट (मोम) से उपलिप्त तखती पर विस्त्रावण के स्थान में लेखन पाठ अधिक उपयुक्त है ॥४॥
भवतश्चात्र—
एवमादिषु मेधावी योग्याह्वेषु यथाविधि। द्रव्येषु योग्यां कुर्वाणो न प्रमुह्यति कर्मसु ॥५॥
उपसंहार, कहा भी है—
इस प्रकार से मेधावी शिष्य पुष्प-फलादि द्रव्यों में यथाविधि कर्मभ्यास करनेवाला कार्यों में मोहित नहीं होता ॥५॥
तस्मात् कौशलमन्विच्छन् शस्त्रक्षारानिकर्मसु। यस्य यत्रह साधर्म्यं तत्र योग्यां समाचरेत् ॥६॥
इसलिये शस्त्र, क्षार, अग्नि आदि कार्यों में कुशलता चाहने की इच्छा से, जिस कार्य की जिस द्रव्य में समानता देखे, उस द्रव्य में उसी कर्मभ्यास को करना चाहिये ॥६॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने योग्यासूत्रयो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
दशमोऽध्यायः
अथातो विशिखानुप्रवेशनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१॥
इसके आगे ‘विशिखानुप्रवेशनीय’ अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था। विशिखा—वैद्यक व्यवसाय का कर्म मार्ग यह अर्थ है। है। हाराणचन्द्र जी ने विशिखा का अर्थ रोगी के घर का मार्ग किया है ॥१,२॥
अधिगततन्त्रेणोपासिततन्त्रार्थेन हृष्टकर्मणा कृतयो- भ्येन शास्त्रं निगदता राजानुज्ञातेन नीचनखरोम्णा शुचिना शुक्लवस्त्रपरिहितेन छत्रवता दण्डहस्तेन सोपानत्केनातुदः तवेशेन सुमनसा कल्याणाभिग्याहारेणाकुहकेन बन्धुभू- तेन भूतानां सुसहायवता वैद्येन विशिखास्तुप्रवेष्टव्या ॥३॥
गुरु के मुख से शास्त्र को पढ़कर, गुरु के समीप तन्त्रार्थ का अभ्यास करके, कर्मों को देखकर, कर्मभ्यासस्वयं करके, शास्त्र को वदूा सकनेवाला, राजा की आज्ञा से (सरकार की आज्ञा प्राप्त करके)
१ जैन-ग्रन्थों में वैशिखा या विशिखा शब्द आया है। इसका अर्थ यह है कि मल्ल लोग कुस्ती से थककर जहाँ खड़े होकर विश्राम लेते हैं, उसे विशिखा कहते हैं। इसके लिये उत्तराध्ययन सूत्र में उज्जैन के अट्टेन मल्ल का उपाख्यात दिया है, वह देखना चाहिये।