सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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नख और बाल कटाकर, पवित्र होकर (स्नान करके), सफेद ब्रह्म पहिनकर, छत्र लेकर, दण्ड धारण करके, जूता पहिनकर, सुन्दर-सभ्य वेष के साथ, शान्त मन से, मंगल भाणी-व्यवहार से, विना कपटाचरण के, प्राणियों का बन्धु होकर, सहायक के साथ वैद्य को विशिखा-कर्म-मार्ग में (घर में) प्रविष्ट होना चाहिये।
वि० मन्तव्य—शास्त्राध्ययन के अनन्तर-'विशिखा' में प्रवेश किया जाता है। औषधालय खोलकर बैठा जाता है। विशिखा-विपणि (जहाँ लेन देन आदि व्यवहार होता हो), रथ्या (रथ आदि सवारियों चलती हों-सुलभ हों), प्रतौली (तोलने-बेचने-खरीदने नापने आदि का कार्य होता हो), पण्य-वीथिका (पैसा-धन के लिये हित-लामदायक बीथी) बाजार का नाम है और विशिखा का अर्थ है जहाँ विशेषरूप से-शयन किया जाय। तात्पर्यार्थ जमकर बैठ जाया जाय। वैद्य को प्रारम्भ में ही लाभ नहीं होने लगता है। वैद्य पुराना ही मान्य होता है। इस विशिखा में अनुकूल-सरल-साधु होकर प्रवेश करना चाहिये और वहाँ इस सूत्र के उपदेशानुसार बोलना, बैठना, चलना तथा रहना चाहिये ॥३॥
ततो दूतनिमित्तशकुनमङ्गलातुलोभ्येनातुरगृहमभिगम्य, उपविश्य, आतुरमभिपश्येत् सृष्टोत्तु पृच्छेच्छ च त्रिभिरेतेविज्ञानोपायै रोगाः प्रायशो वेदितव्या इत्येके तत्तु न सम्यक्, षड्विधो हि रोगाणां विज्ञानोपायः, तद्यथा पञ्चभिः श्रोत्रादिभिः प्रश्नेन चैति ॥ ४ ॥
इसके अनन्तर दूत, निमित्त-सुगन्धित वायु आदि, शकुन (पक्षि विशेष, के प्रशस्त वाक्य आदि), मंगल (भरे हुए घड़े, स्वस्तिक आदि), इनकी अनुकूलता (प्रशस्त होने) से, रोगी के घर में पहुँचकर, बैठकर, रोगी को मली प्रकार देखें, स्पर्श करे और पूछे। कई आचार्यों का मत है कि इन तीन ही विज्ञानोपाय (दर्शन, स्पर्श और प्रश्न) से प्रायः करके सब रोग जानने चाहिये। यह ठीक नहीं है। क्योंकि रोगों को जानने की विधि छे प्रकार की है। यथा श्रोत्र, आंख, त्वचा, रसना और नासिका ये पाँच तथा प्रश्न ये छे हैं। चरक ने जिह्वा को ज्ञान का साधन नहीं माना१ है।
वि० मन्तव्य—जब रोगी देखने जाना हो तो तिथि आदि का विचार करके जाना चाहिये। 'तत्तु न सम्यक् का तात्पर्य
१ रसं तु खलु आतुरशरीरगतम् इन्द्रियवैषयिकमपि अनुमानादवगच्छेत् । न ह्यस्य प्रत्यक्षप्रहृणमुपपद्यते । तस्मादातुरपरिप्रश्नेनैव आतुरमुखसर्सं विद्यात् । युकापसर्पणं त्वस्य शरीरवैरस्यम् । मक्षिकोपसर्पणं शरीरमाधुर्यम् ॥ चरक वि० अ० ४ ॥
है कि वह समीचीन अर्थात् बहुत ठीक नहीं है (ठीक तो है परन्तु बहुत ठीक नहीं) ॥ ४ ॥
तत्र श्रोत्रेन्द्रियविज्ञेया विशेषा रोमेषु व्रणस्त्रावविज्ञानोयादिषु बद्ध्यन्ते—'तत्र सफेन रक्तमीरयन्ननिलः सशब्दो निर्गच्छति' (सू. अ. २६) इत्येवमादयः, स्पर्शनेन्द्रियविज्ञेयाः शीतोष्णशुल्ककर्कशमृदुकठितत्वादयः शरीरोपचयापचयायुर्लक्षणबलवर्णविकारादयः । रसनेन्द्रियविज्ञेया अरिष्टलिङ्गादिषु व्रणानामव्रणानां च गन्धविशेषाः प्रश्नेन च विज्ञानीयादेशं कालं जातिं सात्त्व्यमातङ्कसमुत्पत्तिं वेदनासमुच्छ्रयं बलमन्तरगतिं वातमूत्रपुरीषाणां प्रवृत्ति-मप्रवृत्तिं कालप्रकर्षादींश्च विशेषान् । आत्मसदृशेषु विज्ञानाभ्युपायेषु तत्स्थानीयैर्जीनीयात् ॥ ५ ॥
इनमें श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा जानने योग्य विषयों का वर्णन 'व्रणस्त्राव विज्ञानीय' आदि रोगों में करेंगे। यथा—'सफेन रक्तमीरयन्ननिलः सशब्दो गच्छति'—इत्यादि। स्पर्शनेन्द्रिय द्वारा ज्ञातव्य शीत, उष्ण, शुल्क, कर्कश, मृदु, कठितत्व आदि स्पर्श विशेषों का वर्णन, ज्वर शोक आदि में करेंगे। चक्षु द्वारा जानने योग्य विषय—शरीर की स्थूलता, कृशता, आयु के लक्षण, बल, वर्ण विकार आदि हैं। रसनेन्द्रिय से जानने योग्य विषय—प्रमेह आदि में मधुर रस आदि हैं (पिपीलिका के उपसर्पण से मधुर रस का ज्ञान होता है)। प्राणेन्द्रिय से जानने योग्य विषय—अरिष्टलिङ्ग आदि में, अव्रण तथा व्रणों में जो गन्ध विशेष है ये नासिका द्वारा जाने जाते हैं। प्रश्न द्वारा देश, काल, जाति, सात्त्व्य (चेष्टा जन्म, आहार जन्म), रोगोत्पत्ति वात आदि वेदनाओं की उत्पत्ति, बल, जाटरागन, वातमूत्र मल की प्रवृत्ति या अप्रवृत्ति, कितने समय से यह रोग है—इत्यादि बातों को प्रश्न द्वारा जानना चाहिये। वैद्य यदि रोगी श्रोत्रादि किसी इन्द्रिय से हीन हो तो जानने योग्य बातों को रोगी के पास में स्थित पुरुष से पूछकर जाने१। (उपर्युक्त रोग विज्ञान के उपाय यदि स्वयं प्रत्यक्ष करने योग्य हों तो उन उपायों के (इन्द्रियों के) इन अधिष्ठानों द्वारा इन्द्रिय विक्षेप विषयों का ज्ञान कर लेना चाहिये—यह अर्थ श्री वाणेकर जी ने किया है) ॥
१ आत्मसदृशेषु—इस पाठ में उल्लेखार्थ ने अर्थ श्रोत्र किया है। उसका कहना है कि रोग ज्ञान के जो छे उपाय बताये हैं, उनमें से वातादि दोषों का स्वरूप जानने के लिये जो उपाय उपयोगी हों उनकी सहायता से रोगों का ज्ञान करना चाहिये। कबि-राज हाराणचन्द्र जी ने 'आत्मा सदृशेषु'—यह पाठ रखा है। यह संगत लगता है। आत्मसदृशेषु—पाठ में दोषसदृशेषु विज्ञानाभ्युपायेषु—'षड्विधेषु—श्रोत्रत्वं चक्षुरसनाज्याग्रहणं च' इत्यादि