सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[अ० ११]
एवमभिसमोदय साध्यान् साधयेत्, याप्यान् यापयेत्, असाध्यान्नेवोपक्रमेत्, परिसंवत्सरोत्थितांश्च विकारान् प्रायशो वर्जयेत् ॥ ६ ॥
इस प्रकार से रोगों की परीक्षा मली प्रकार से करके साध्य रोगों की चिकित्सा करे, याप्य रोगों को बढ़ने से रोके और असाध्य रोगों की चिकित्सा न करे। एक साल पुराने रोगों को प्रायः करके छोड़ देना चाहिये-क्योंकि ये प्रायः असाध्य होते हैं।
भवति चात्र—
मिथ्याहृष्टा विकारा हि दुराख्यातास्तथैव च।
तथा दुष्परिमृष्टाश्च मोहयेयुश्चिकित्सकम् ॥ ७ ॥
कहा भी है—
मिथ्याहृष्टा (ठीक प्रकार से न जाने हुए), दुराख्याता (रोगी द्वारा ठीक प्रकार से वर्णन न किये), दुष्परिमृष्टा (ठीक प्रकार से न पूछे या न विचारे हुए), रोग मिथक् को मोहित कर देते हैं—धोखा दे देते हैं ॥ ७ ॥
तत्र साध्या अपि व्याधयः प्रायेणैषां दुष्टिकित्त्यतमा भवन्ति। तद्यथा—श्रोत्रियनृपतिस्त्रीबालवृद्धभीरुराजसेवककितवदुर्बलवैद्यविदग्धन्याधिगोपकदारिद्रकृपणकोधनानामनात्मवतामनाथानां च, एवं निरूप्य चिकित्सां कुर्वन् धर्मार्थकाममयांसांसि प्राप्नोति ॥ ८ ॥
निम्न व्यक्तियों में साध्य रोग भी प्रायः करके (सर्वत्र नहीं) अति कष्टसाध्य होते हैं। यथा—श्रोत्रिय (नित्य वेदाध्यायी, स्नान पाठ करने से), राजा (स्वतन्त्र प्रवृत्ति से), स्त्री (सुकुमारता या लज्जावश), बालक-वृद्ध, भीरु (कोमल-डरप्रकोप होने से) राजसेवक (राजा के अधीन होने से), कितव (जुबारी-कोमल-प्रवृत्ति), दुर्बल, वैद्याभिमानी (वैद्य का तिरस्कार करनेवाला), व्याधि को छिपानेवाला, दरिद्र, कपटी, क्रोधी, अपथ्यसेवी, अजितेन्द्रिय, और अनाथ इन पुरुषों के साध्य रोग भी कष्टसाध्य होते हैं। इस प्रकार विचारकर चिकित्सा में प्रवृत्त होने से धर्म अर्थ काम और यश वैद्य को मिलता है। चरक में कहा है—
सदातुराः श्रोत्रियराजसेवकाः,
तयैव वेश्या सह पण्यजीविभिः ॥
द्विजो हि वेदाध्ययनव्रताह्निः
क्रियादिभिर्देहहितं न चेष्टते।
नृपोपसेवी नृपचित्तरक्षणत
परानुरोधात् बहुचिन्तनाद् भयम् ॥
इत्यादि चरक सि० अ० १२।
वि० मन्तव्य—वैद्यविदग्ध—जो अपने को वैद्य समझता हो और अतः चिकित्सा व्यवस्था में व्यर्थ ननु नच करता हो ॥
भवति चात्र—
स्त्रीभिः सहास्यां संवासं परिहासं च वर्जयेत्।
दत्तं च ताभ्यो नादेयमन्नादन्यद्विषग्वरैः ॥ ९ ॥
कहा भी है—
स्त्रियों के साथ एक आसन पर बैठना, एक साथ रहना और स्त्रियों के साथ परिहास, छोड़ देना चाहिये। अन्न आदि से भिन्न स्त्रियों से दी हुई कोई भी वस्तु हो तो ग्रहण नहीं करनी चाहिये। (यह नियम वहाँ के लिये है जहाँ पर चिकित्साव्यवसाय वैद्य करता हो—सर्वत्र नहीं)।
वि० मन्तव्य—यदि स्त्री स्वतन्त्र हो अथवा अपने संरक्षक की सम्मति से अन्न के अतिरिक्त धन आदि कोई द्रव्य देवे तो ले लेना चाहिये। स्त्री ही नहीं—कोई भी व्यक्ति जो देन-लेन में स्वतन्त्र न हो उससे कोई भी वस्तु नहीं लेनी चाहिये, अन्यथा वात का बतझड़ हो सकता है ॥ ९ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने विशिखानुप्रवेशानीयो नाम दशमोऽध्यायः ॥
एकादशोऽध्यायः
अथातः क्षारपाकविधिसध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
इसके आगे क्षारपाक विधि की व्याख्या करते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥
शास्त्रानुशस्त्रेभ्यः क्षारः प्रधानतमः, छेद्यभेद्यलेख्यकरणान्निदोषस्तत्वाद्विशेषक्रियावचरणात् ॥ ३ ॥
मण्डलाग्र आदि शब्दों में, त्वकसार आदि अनुशब्दों में क्षार ही सब से मुख्य है, (अग्नि एवं जौं के भी अधिक है) क्योंकि—क्षार से छेदन, भेदन तथा लेखन कार्य हो जाता है। नाना प्रकार की औषधियों से बनने के कारण त्विदोष नाशक है। विशेष क्रिया करने से—पीने में भी वरता जाने से, यह क्षार मुख्य है ॥ ३ ॥
तत्र क्षरणात् क्षणनाद्वा क्षारः ॥ ४ ॥
क्षरणात्—दुष्ट मांस आदि के काटने से, क्षणनात् त्वचामांस आदि के हिसन करने से इसे 'क्षार' कहते हैं। चरक ने "भित्त्वा भित्त्वाशयान् क्षारः, क्षरत्वात् क्षारयत्वधः" अर्थात् क्षरना अर्थ किया है ॥ ४ ॥
१ चरक में 'न कदाचित् स्त्रीदत्तमाभिषमावातव्यम्। अननुज्ञातश्च भर्त्राऽथवाऽप्यक्षेण। आभिष-भोग्यवस्तु।' अन्न-द्रव्य-वृत्ति-जीवनका कारण, होने से प्राप्नु है।