भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ११ ]

सूत्रस्थानम्

३७

नानीषधिसमवायात्त्रिदोषनः, शुक्लस्वात् सौम्यः, तस्य सौम्यस्यापिसतो दहनपचनदारणादिशक्तिरविरुद्धा, आग्नेयोषधिगुणभूयिष्ठत्वात् । कटुक उष्णस्तीक्ष्णः पाचनो विलयनः शोधनो रोपणः शोषणः स्तम्भनो लेखनः क्रुम्या-मकफकुष्ठविषमेदसासुपहन्ता पुंस्त्वस्य चातिसेवितः ॥४॥

वात पित्त-कफ हर औषधियों से बनने के कारण त्रिदोष-नाशक है । शुक्ल स्फेद होने से सौम्य है, क्षार के सौम्य होने पर भी इसमें दहन, पचन (पाक), दारण, आदि कार्यों की शक्ति अप्रतिहत रहती है, क्योंकि इस क्षार में अग्नि गुण की प्रधानता रहती है, इसलिये क्षार कटु रस, उष्ण वीर्य, तीक्ष्ण गुण, व्रण शोथ पाचक, गुल्म आदि का विलायक, दुष्टवृणादि का शोधक, शुद्धवृण का रोपक, व्रण क्लेद का शोधक, अति रक्तक्षय का स्तम्भक, कठिन उन्नत मांस का लेखन, क्रुमि, आम, कफ-कुष्ठ-विष एवं मेद का नाशक, अति मात्रा में सेवन करने से पुंस्त्व नाशक है१ । (रक्तपित्त में खासकर—गले के रक्तक्षय में, चरक ने२ 'क्षारस्य चैवोत्पलनालजस्य' में शीतल वस्तुओं का क्षार देने को कहा है ।

वि०—यदि क्षार को जल आदि के संयोग से मृदु कर लिया जाता है तो वह सौम्य (सोमगुण युक्त) या आह्लादक हो जाता है, यथा—चूना आदि किसी भी क्षार को जल में घोलकर वृक्षिक के दंश पर सेवन करने से विषवेदना-दाह की शान्ति हो जाती है, पौने से पित्तशूल-यकृतशूल शान्त हो जाता है, पित्त ज्वर में प्लोत रखने से दाह का शमन होता है आदि २ । और यदि तीक्ष्ण रहता है तो दाह पाक आदि करता ही है—यह सर्वविदित है । लेप रूप में व्रणशोथ को पकाता है, पक्ववृण का दारण करता है, चूर्णों आदि में खाने से पाचनआहार का पाचक है, मृदुक्षार वृण का रोपण करता है, तीक्ष्ण क्षार पूय अथच मांस वृद्धि का लेखन करता है, अधिक मात्रा में खाने से—वमन विरेचन रूपसे शोथन करता है और अल्पमात्रा में खानेसे वमन विरेचन आदि का स्तम्भन भी करता है । विलयन—चना उरद आदि को गलाता है । मीठा सोड़ा मृदुक्षार ही है । शोषण—जिन वृणों में से पन्छा बहता है उनका मृदुक्षार द्रव द्वारा सेवन करने से अथच मृदुक्षार बुरकने से पन्छा सूख जाता है । क्रुमिनाशन—साबुन सोड़ा क्षार ही तो है । वह आम को पचाता है, कफ को ढीला करता है, लेपन से दहू आदि कुष्ठों को नष्ट करता है, सर्पवृंश पुर लगाने से विषनाशक है । नौषादर दंशपर लगाया जाता है । मेदोनाशन—पुंस्त्वनाशन—अधिक सेवन करनेसे कुशता

तथा नपुंसकता को उत्पन्न करता है । चूना; कली पत्थर का क्षार है, कास्टिक सोडा लवण का क्षार है, सज्जी आदि रेह का क्षार है ॥ ५ ॥

स द्विविधः—प्रतिसारणीयः पानीयश्च ॥ ६ ॥

यह क्षार दो प्रकार है । प्रतिसारणीय (प्रतिसारण के योग्य) और पानीय (पीने के योग्य) है ।

वि० मन्तव्य—प्रतिसारणीय—लेपन, मलना, लमाना या रगड़ना, त्रिसना आदि बाह्यप्रयोग का नाम प्रतिसारण है, अञ्जन—दन्त मञ्जन आदि बाह्यप्रयोग ही है । प्रतिसारणके योग्य या उसमें उपयोगी क्षार का नाम "प्रतिसारणीय" है । और चूना का पानी जो यकृत विकार में तथा मन्दाग्नि में दिया जाता है वह "पानीयक्षार" ही है । किसी क्षार को द्रव में घोल पानीय बनाया जा सकता है—जैसा सोड़ा वाटर ॥६॥

तत्र प्रतिसारणीयः कुष्ठकटिभेददुष्पण्डलकिल्लासभगन्दरावृंदागौदुष्टव्रणनाडीचर्मकौलतिलकालकन्यच्छव्यङ्गमशकबाह्यविद्रधिक्रुमिषिषादिपूपादिज्यते समसु च मुखरोगेपूजहिाधिजिह्वाविजिह्वापोकुशदन्तवैदभंषु तिसृषु च रोहिणीषु, प्लेव्वेवानुशस्त्रप्रणिधानमुक्तम् ॥ ७ ॥

इनमें प्रतिसारणीय क्षार-कुष्ठ, कटिभेद, दहू, किलास, मण्डल, भगन्दर, अबुंद, दुष्टवृण, नाडीवृण, चर्मकौल, तिलकालक, न्यच्छ, व्यंग, मशक, बाह्य विद्रधि, क्रुमि, विष-जंतु मणि आदि में प्रयोग किया जाता है । उपजिह्वा आदि तीन रोहिणी आदि चार—इन सात मुख रोगों में, उपजिह्वा, अधिजिह्वा उपकुश दन्त विदर्भ, रक्तजन्म सन्निपात एवं असाध्य रोहिणी रोग में—क्षार का उपयोग होता है ।

हाराणचन्द्र जी का मत है कि प्रथम शास्त्रानुशस्त्र से काम करके पीछे क्षार का प्रयोग करना चाहिये ॥ ७ ॥

पानीयस्तु गरगुरुमोदराग्निसङ्काजीर्णोरोचकानाहश-कंराइर्मर्यभ्यन्तरविद्रधिक्रुमिषिषाशः सूपयुज्यते ॥ ८ ॥

पानीयक्षार-क्रुमि, विष, वृषि, गुल्म, उदर, जिन रोगों में अग्नि मन्द हो जाती है; (यथा विस्चिका, अलसक, विलम्बिका आदि) अजीर्ण, अरुचि, आनाह, शर्करा, अश्मरी, अभ्यन्तर विद्रधि, क्रुमि, विष, अर्श में उपयोग होता है ॥८॥

अहितस्तु रक्तपित्तज्वरितपित्तप्रकृतिबालवृद्धदुर्बलभ्रममदमूर्च्छातिमिरपरीतेभ्यांडन्येभ्यश्चैवविधेभ्यः ॥ ९ ॥

जिन रोगोंमें क्षार निषिद्ध है—रक्तपित्त, ज्वर, पित्तप्रकृति बाल, वृद्ध, दुर्बल, भ्रम, मद, मूर्च्छा, तिमिर—इन रोगों से आक्रान्त तथा अन्य इसी प्रकार के रोगों से आक्रान्त व्यक्तियों में क्षार का उपयोग नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥

तं चैतरक्षारवद् दग्ध्वा परिस्रावयेत, तस्य विस्तरोऽन्यत्र ॥ १० ॥

१ देखिये—चरक—विमान अ० १ में—क्षारं नात्यर्थमुपयुज्यते । २—क्षारः पुंस्त्वभ्रान्तां श्रेष्ठः, चरक सू० ।