सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें३८
मुञ्चतसंहिता
[ ३० ११ ]
इस पानीय स्नान को प्रतिस्नानार्थीय स्नान की भांति जलाकर तय्यार कर लेना चाहिये । इसका विस्तार अन्यत्र गुल्म अध्याय में है । पानीय स्नान की मात्रा—उत्तमा मात्रा—एक पल, मध्यमा तीन कर्ष, अधमा—आधा पल ।
वि० मन्तव्य—पलाश, अपामार्ग आदि स्नानार्थीय द्रव्यों को जलाकर जैसे प्रतिस्नानार्थीय—स्नान स्नान बनाया जाता है वैसे ही पानीय स्नान भी बनाया जाता है, परन्तु उसे जल में घोलकर पीने योग्य बना लिया जाता है । इसके निर्माण तथा उपयोग का विस्तार से वर्णन—गुल्म आदि रोगों की चिकित्सा में देखिये ॥ १० ॥
अथेतस्त्रविधौ मृदुमध्यस्तीक्ष्णश्च । तं चिकीर्षुः शरदि गिरिसानुजं शुचिरुपोष्य प्रशस्तैऽहनि प्रशस्तदेशजातमनुपहतं मध्यमवयसं महान्तमसितमुष्कमधिव्यास्थापरेषुः पाटयित्वा खण्डशः प्रकल्प्यावपाटय निवाते देशे निचिति कृत्वा सुधाशर्कराश्च प्रक्षिप्य तिलनलैरारोपयेत् । अथोपशान्तेऽन्यौ तद्भस्म पृथग्गृह्णीयाद्भस्मशर्कराश्च । अथानेतैव विधानेन कुटजपलाशश्चकर्णपारिभद्रकविभीतकारवधमिल्वकाकर्स्तुहपासार्गपाटलान्तमालवृषकदलीचित्रकपूतौकेन्द्रवृक्षारुकोताश्चमारकसप्तच्छदगनिमन्थगुञ्जाश्चतस्रश्च कोशातकीः समूलफलपत्रशाखा दहेत् । ततः स्नानद्रोणमुदकद्रोणैः षड्भिरालोड्यमूर्त्रैर्वा यथोक्तैरकविशतिकृत्वः परिस्राण्य, महति कटाहे शनैर्दुर्ग्याऽवघट्टयन् विपचेत् । स यदा भवत्यच्छो रक्तस्तीक्ष्णः पिच्छिलश्च, तमादाय महति वस्त्रे परिस्राण्येतं विभज्य पुनरन्नावधिश्येत् । तत एव स्नानोदकात् कुडवसमध्यं वाऽपनयेत् । ततः कटशर्करामशर्कराक्षीरपाकशंखनाभीरनिवर्णाः कृत्वाऽऽयसे पात्रे तस्मिन्नेव स्नानोदके निषिच्य पिषु तेनैव द्विद्रोणैऽष्टपलसमितं शंखनाभ्यादीनां प्रमाणं प्रतिवाप्य, सततमप्रमत्तश्चैनमवघट्टयन् विपचेत् । स यथा नातिसान्द्रो नातिद्रवश्च भवति तथा प्रयतेत् । अथैनमागतपाकमवतार्यानुगुणमायसे कुम्भे संवृतमुखे निद्ध्यादप मध्यमः ॥ ११ ॥
प्रतिस्नानार्थीय स्नान तीन प्रकार का है । मृदु, मध्य और तीक्ष्ण । इस स्नान को बनाने की इच्छा से शरद ऋतु में पवित्र एवं उपवास करके पर्वत के समीप प्रशस्त दिन में उत्तम देश में उत्पन्न, अग्नि आदि से न जले, मध्यम आयुवाले, बहुत बड़े काले फूल के मुष्क (घण्टा पाखलि) वृक्ष के पास जाकर मन्त्र के समान बलि कर्म करे । (मूर्तों को दूर करने के लिये वृक्ष को बलि कर्म देना चाहिये) * इसके दूसरे दिन निम्नमंत्र से—हे
१ भोज ने भी कहा है—
निवसन्तीह भूतानि यायस्मिन् कानिचित् द्रुमै ।
अपक्रामन्त्व स्वेद्यः परार्थं स्वो ह्यगं द्रुमः ॥
अग्नि के समान महावीर्य ! तेरी शक्ति नष्ट न हो । कल्प्याण स्वरूप ! यहाँ रहो—मेरे कार्य को करोगे । मेरा कार्य करने के पीछे स्वर्गलोक में जाओगे । श्वेत एवं लाल फूलों से हवन करे—आहुति देनी चाहिये । इस वृक्ष को काटकर—टुकड़े करके, इन टुकड़ों को और छोटा करके, वायु रहित प्रदेश में एकत्रित करके चूने के पत्थर डालकर तिल नालों से जलाये । अग्नि शान्त होने पर तिल नालों की भस्म और भस्म शर्करा पृथक् पृथक् एकत्रित कर लेनी चाहिये । इसी मुष्क की विधि से कुटज (कूड़ा), पलाश (डाक), अश्वकर्ण (शाल भेद), फरहद, विभीतक, आरुवध (अमलतास), तिल्वक, अर्क (आक), स्नेही (थोर), अपामार्ग (चिरचिटा), पाटला, नक्तमाल (करञ्ज), वृष (वासा), कंदली, चित्रक, पूतीक (नाटा करञ्ज), इन्द्र वृक्ष (कुटज भेद), आस्कोत (शारिवा), अश्वमार (कनेर), सप्तर्ण (सतवन), अग्निमन्थ (अरणी) गुञ्जा, कोशातकी—चार प्रकार की (बृहत्फल, श्वेतपुष्प, पीतपुष्प, अल्पफल)—इन वृक्षों की मूल-पत्र, फल-शाखा समेत जलाना चाहिये । (वाग्मट्ट में काकजंवा और यवशूकनाल अधिक है) ।
स्नान दहन करने के पश्चात्—दो भाग मुष्क भस्म, एक भाग कुटजादि भस्म (अथवा दोनों परस्पर सम भाग) मिलित एक द्रोण भस्म लेकर छेः द्रोण पानी में मिला देना चाहिये । अथवा 'दुन्दुभि स्वनीय कल्प' में कहीं विधि से मूर्तों द्वारा २१ बार छान कर—बड़े भारी कड़ाहें में कछड़ी से धीरे धीरे हिलाते हुए पकाना चाहिये । जिस समय यह पकता हुआ स्नान निर्मल, उग्र गन्धवाला, चिपचिपा हो जाय—तब बड़े वस्त्र में इसको छानकर इसके दो भाग कर लेने चाहिये । एक स्नानोदक (नितरा पानी) दूसरा भस्म किह भूत स्नान (नीचे का भाग) । इस स्नानोदक को फिर आग पर रख देना चाहिये—और इस स्नानोदक से एक कुडव था डेढ़ कुडव निकाल लेना चाहिये । इसके आगे—कट शर्करा (गंगेछी अमाव में खटिका—खडिया मिट्टी), भस्म शर्करा (पहिले कही), क्षीरपाक (जलशुक्ति), शंखनाभि (शंखप्रस्थ), इनको लाल अंगारों के समान बनाकर लोहे के पात्र में रक्खे, स्नानोदक में मिलाकर (कट शर्करा) आदि की मात्रा प्रत्येक आठ पल; (कई आचार्य—दो-दो पल प्रत्येक मानते हैं) निर्वापण के लिए बचे स्नानोदक के साथ शंखनाभि आदि की पीसकर (स्नान में गुणोत्पादन के लिए मिलाकर) निरन्तर बिना आलस्य के स्नान को कछड़ी से हिलाते हुए पाक करना चाहिए । यह स्नान न बहुत घना (ठोस) और न बहुत पतला रहे ऐसा यत्न करना चाहिए । जिस समय यह स्नान पाक हो चुके (पाक के समीप पहुँच जाये) तब इसको
१ मुष्क वृक्ष-श्वेतपुष्पः कालपुष्पो रक्तपुष्पस्तथैव च । पीतपुष्पोवरस्तेषु कालपुष्पः प्रकीर्तितः ।