भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ११]

सूत्रस्थानम्

३६

आग पर उतारकर लोहे के घड़े में डालकर—मुख बन्द करके लूह छिपाकर रख देना चाहिये। यह मध्यम स्तर है।

वि० मन्तव्य—यदि पाक के पश्चात् कड़ी धूप में सुखा दिया जाय तो सूखा "स्तर" बन जाता है, जैसा—जौखार, नौसादर एवं सजी खार आदि बाजार में मिलते हैं। मुश्क कृष्ण को मोखा भी कहते हैं। गिरिसानुज—पर्वत की चोटी पर उत्पन्न। संक्षेपतः—मोखा आदि किसी एक अथवा कुटज पलाश आदि अनेक खारीय काष्ठों या अपामार्ग आदि के पद्माक्ष को जलाकर भस्म बना लें, भस्म को ६-८ गुने जल में भिगो दें या घोल दें—८-१२ ग्रह में भस्म का स्तर घुल जाता है (भस्म नीचे रह जाती है जो फेंक दी जाती है इस में कुछ नहीं रहता) और नितारकर जल को पृथक् कर लिया जाता है। स्तर मिट्टी के पात्र को खार देता है, अतः लोहपात्र लगे अन्यथा स्तर पसीज जाता है, भाण्ड में मोर्चा लग जाता है, वर्ण एवं रस विकृत हो जाते हैं। इससे भी उत्तम काच भाण्ड (बोतल) होता है ॥११॥

एष चैदाप्रतीवापः पक्वः संयुद्धिमो मृदुः ॥१२॥

इसी मध्यम स्तर में यदि प्रतिवाप्य द्रव्यों का प्रक्षेप न करके पाक कर लिया जाये, तो यही मृदुस्तर बन जाता है। (प्रतिवाप्यद्रव्य—शंखनाभि आदि है) ॥१२॥

प्रतिवापे यथालाभं दन्तीद्रवन्तीचित्रकलाङ्गलीपूती-कप्रवालतालपत्रीविडसुवर्चिकाकनकक्षीरीहिङ्कुवचातिविषाः समाश्लक्षणचूर्णाः शुक्तिप्रमाणः प्रतीवापः। स एव सप्रतीवापः पक्वः पाक्यस्तीक्ष्णः ॥१३॥

तीक्ष्णस्तर—कट शर्करा आदि प्रक्षेप दिये (मध्यम) स्तर में यथायोग्य दन्ती (जमाल-गोटा), द्रवन्ती (मोगलई एरण्ड), चित्रक, लांगली (कलि हारिका), पूतीक पल्लव (नाटा करञ्ज के पत्ते), तालपत्री (मूसली), विडनमक, हुलहुल, कनकक्षीरी (स्वर्ण पुष्पी चोक), हींग, वच, अतीस ये सब शुक्ति प्रमाण में लेकर—बारीक चूर्ण करके मिला देना चाहिये। इन प्रतिवाप्य द्रव्यों के साथ पकाया हुआ स्तरपाक नामक तीक्ष्ण होता है। प्रतिवाप का लक्षण—द्रवद्रव्ये द्रव्यान्तरं श्लक्षणपिष्टं दीयते स प्रतिवाप उच्यते ॥१३॥

१ स्तर में गुणाधिक्य के लिये—दक्ष शक्नुत आदि भी डालते हैं। यथा—

श्लक्षणं शक्नुदक्षशिखिगुधकंककपोतजम् ।

चतुष्पातपक्षि पिताल मनोह्ला लवणानि च ॥

(२) लोहे के पात्र में रखने से गुणाधिक्य है।

(३) मुष्कादवहामानांचु रसः प्रच्यवते यदा।

भस्मना सह संयुक्तं काठिन्यमधिगच्छति ॥

तेषां यथाव्याधिवलमुपयोगः ॥१४॥

इन मृदु मध्य-तीक्ष्ण-स्तरों का व्याधि के अनुसार उपभोग करना चाहिये ॥१४॥

क्षीणबले तु स्तारोदकमावपेद्रुलकरणार्थम् ॥१५॥

यदि काल के कारण अथवा हीनोपधि के कारण स्तर मृदु हो जाये, तब स्तर में पूर्व विधि से बनाया स्तारोदक मिलाकर फिर पाक करना चाहिये, जिससे कि तीक्ष्णता-बल उत्पन्न हो जाये ॥१५॥

भवतश्चात्र—

नैवातितीक्ष्णो न मृदुः शुक्लः श्लक्ष्णोऽथ पिच्छलः।

अविष्यन्दी शिवः शीघ्रः स्तारो ह्यष्टगुणः स्मृतः ॥१६॥

कहा भी है— स्तर के गुण दोष—स्तर का अति तीक्ष्ण (१०० तक गिनने से पूर्व यदि स्तर एरण्ड नाल को जला देता है—तो अति तीक्ष्ण) न होना, न मृदु होना, शुक्ल—सफेद, श्लक्ष्ण—(कर्कश न होना), पिच्छल, अविष्यन्दी (न फैलनेवाला), शिवः (सौम्य), शीघ्र (शीघ्रकारी)—ये स्तर के आठ गुण हैं।

वि० मन्तव्य—अविष्यन्दी—पसीजा हुआ न हो ॥१६॥

अतिमाद्वर्चश्रेत्सौषण्यतैक्ष्णयपेच्छित्यसर्पिताः।

सान्द्रताऽपक्वता हीनद्रव्यता दोष उच्यते ॥१७॥

स्तर के दोष—अति कोमल, बहुत ठण्डा, अति उष्ण, अति तीक्ष्ण, अति पिच्छल, बहुत फैलनेवाला, बहुत घना, कच्चा पका हुआ (अपक), हीन द्रव्यों से बना ये स्तर के दोष हैं। वाग्भट ने अतितु यह एक दोष स्तर का अधिक दिया है ॥१७॥

तत्र स्तारसाध्यव्याधिव्याधितमुपवेश्य निवातातपे देशेऽसंबाधेऽग्नौपहरणीयोक्तेन विधानेनोपसंभूतसंभारं, ततोऽस्य तमवकाशं निरीक्ष्यावृष्ट्यावलिष्य प्रच्छयित्वा, गलाकया स्तारं प्रतिसारयेत्, दक्खा वाक्शतमात्रमुपेतोत् ॥

स्तर प्रतिसारण विधि—

स्तर द्वारा साध्य रोग से पीड़ित मनुष्य को वायु रहित, सूर्य के प्रकाश में, खुले स्थान में बिठाना चाहिये। अग्नोपहरणीय अध्याय में कहे प्रशस्त तिथि करण नक्षत्र मुहूर्त आदि की विधि से स्तरकर्म के लिये सब समान तैयार करके (यन्त्र-शस्त्र स्तर-अग्नि आदि पास में रखकर) इस रोगी के रुग्ण

१ संव्यूहं हिमस्तथा पाक्यो द्विविधः चार इष्यते।

पाक्यस्तु सप्रतिवापः तीक्ष्णोऽन्यस्तु भवेत् पुनः ॥

सुधादिवर्गं पिष्ट्वा तु सिचेत् स्तारोदकैः शनैः।

तेनैव तं पुनः पिष्ट्वा त्वपः पात्रे निधापयेत् ॥

एष संव्यूह हिमस्तारो मृदुः।