सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ११ ]
स्थान को देखकर, पित्त दुष्ट स्थान का घर्षण करके, वात दुष्ट स्थान का लेखन करके, कफ दुष्ट स्थान पर पाछने—लगाकर शलाका द्वारा क्षार लगाना चाहिये। क्षार लगाकर सौ अक्षर के बोलने के समय तक प्रतीक्षा करनी चाहिये। इतने समय में जो क्षार जला देता है, वह क्षार उत्तम है।
वि० मन्तव्य—वाक् शत या १०० मात्रा (१ मिण्ट)। १८८
यस्मिन्निपतिते व्याधौ कृष्णता दग्धलक्षणम्।
तत्राम्लवर्गः शमनः सर्पिर्मधुकसंयुतः ॥१६॥
अथ चेतु स्थिरमूलत्वात् क्षारदग्धं न शीर्यते।
इदमालेपनं तत्र समग्रमवचारयेत् ॥२०॥
✓रुग्ण स्थान में जलने से यदि कृष्णमा उत्पन्न हो जाये तो भली प्रकार से दग्ध समझना चाहिये।
सम्यग् दग्ध होने के पीछे—सौवीरक, तुषोदक, धान्याम्ल आदि अम्लवर्ग को धी एवं मुल्हड्डी से मिलाकर लगाना चाहिये। यह पीड़ा शामक है। यदि जड़ के टूटने होने से क्षार से जला हुआ भाग विशीर्ण नहीं होता, तो आगे कहे सम्पूर्ण लेप को लगाना चाहिये।
वि० मन्तव्य—क्षार के प्रभाव को अम्ल रस मन्द तथा शान्त कर देता है, फलतः क्षार से उत्पन्न दाह आदि बेदना शान्त हो जाती है और सूर्य की तीक्ष्ण किरणें भी क्षारीय होती हैं, अतएव 'लू', या 'उष्णोपधात' (शा० सं० प्र० खं अ० ७) में आम का पन्ना या इसली आलू बुलारा का पन्ना (घोल-पानक) पीने से लाभ होता है और चूना से मुखगक (निनामा-सर्वस्वर नामक मुख रोग) हो जाने पर कांजी के कुरले करने से लाभ होता है। माधुर्य का तात्पर्य है मृदु या मन्द हो जाना। क्षारदग्ध पर अम्लरस को मृदु बनाकर लगाना चाहिये, यथा कांजी। तीव्र अम्ल हानिकारक होता है। गन्धकाम्ल आदि अम्ल दाहक होते हैं। क्षार के समान अम्ल भी दाहक होता है परन्तु मृदु कर लेने पर दोनों ही दाह शामक हो जाते हैं।
अम्लकाञ्चिकबीजानि तिलान् मधुकमेव च।
प्रपेक्ष्य समभागाणि तेनैनमनुलेपयेत् ॥११॥
तिलकल्कः समधुको घृताको त्रणरोपणः।
लेप—अम्ल काञ्चिक के नीचे स्थित द्रव्य (किण्व), तिल, मुल्हड्डी, इनको समान भाग में पीसकर क्षारदग्ध स्थान पर लेप करना चाहिये। क्षारदग्ध भाग के विशीर्ण होने के पश्चात् उत्पन्न वृण में वृण को भरने के लिये मुल्हड्डी के साथ तिल कल्क को धी में मिलाकर लगाने से क्षार जन्म वृण भर जाता है। (संग्रह में—माखती वृषाकोलनिम्यास्फोतपटोलीकरवीरपत्र-क्वाथेन वृणप्रक्षालनम्। एषामेव च कल्कक्वाये सिद्धं सर्पि-स्तैलं वा रोपणम्) ॥२१॥
रसेनाम्लेन तीक्ष्णेन बीर्याण्णेन च योजितः ॥२२॥
आग्नेयेनाग्निना तुल्यः कथं क्षारः प्रशाम्यति।
एवं चेन्मन्यसे वत्स ! प्रोन्मयमानं निबोध मे ॥२३॥
अम्लवर्जान् रसान् क्षारे सर्वानेव विभावयेत्।
कटुकस्तत्र भूयिष्ठो लवणोऽनुरसस्तथा।
अम्लेन सह संयुक्तः स तीक्ष्णलवणो रसे ॥२४॥
माधुर्य भजतेऽत्यर्थं तीक्ष्णभावं विमुञ्चति।
माधुर्याच्छममाप्नोति बहिर्माद्विरिवाप्लुतः ॥२५॥
✓है वत्स ! यदि तुम यह समझो कि तीक्ष्ण गुण युक्त, उष्ण वीर्य, आग्नेय गुणी अम्लरस से मिलकर अग्नि के समान गुणी क्षार किस प्रकार शान्त होता है—तो इसको सुनो—क्षार में अम्ल को छोड़कर और सब रस होते हैं। क्षार में कटु रस की प्रधानता रहती है और लवण रस अनुरस हैं। (कड़ियों का विचार है कि लवण रस प्रधान रहता है और कटुरस अनुरस होता है, क्योंकि अम्ल खाने पर, लवण रस ही खाते हैं)। तीक्ष्णलवणरस अम्लरस के साथ मिलकर बहुत अधिक मधुर हो जाता है। अपनी तीक्ष्णता को छोड़ देता है। माधुर्य के कारण शान्त हो जाता है, जिस प्रकार की आग पानी से शान्त हो जाती है। (चरक में कहा है—'क्षारो हि याति माधुर्यं शीघ्रमम्लोपसंहितः')। *चरक चि० अ० २४ ॥२२-२५॥
तत्र सम्यग्दग्धे विकारोपशमो लाघवमनास्त्रावश्व।
हीनदग्धे तोदकण्डुजाड्यानि व्याधिबुद्धिश्च।
अतिदग्धे दाहपाकरागस्त्रावाङ्गमर्दकलमपिपासामू-
च्छोः स्मुरंरणं वा ॥२६॥
सम्यक प्रकार से जलने पर—अङ्गों में लघुता आ जाती है, रोग की शान्ति और किसी प्रकार का स्त्राव नहीं होता।
हीन दग्ध—(कम जलने पर) होने पर—तोद (पीड़ा), कण्डू एवं जड़ता तथा रोग की बुद्धि होती है।
अति दग्ध होने पर—दाह (जलन), पार्क (पकना), रोंग (लुलिया), स्राव, अङ्गमर्द (अङ्गों का टूटना), कलम (रुलानि), पिपासा, मूच्छा अथवा मूल्य होती है ॥२६॥
क्षारदग्धव्रणं तु यथादोषं यथान्याधि चोपक्रमेत् ॥२७॥
क्षार से जले वृण की—दोषानुसार—तथा रोग की अपेक्षा से चिकित्सा करनी चाहिये ॥२७॥
अथ नैते क्षारकृत्याः--तद्यथा--दुर्बलबालस्थविरभीरु-सर्वाङ्गशूनोदरिरुपित्तगभिष्ययुत्तमतीप्रवृद्धस्वविरप्रमेहिरुक्ष-
१ अम्लो हि शीतः स्पृशेन क्षारस्तनोपसंहितः।
यात्याशु स्वादुता तस्माद्विनावापयेत्तन्नाम् ॥
(२) यत्तश्चोण्णतमः क्षारः शैत्यं चाऽम्लरसेऽधिकम्।
तस्मात् सेकप्रदेहाभ्यामम्लं क्षारं तिबर्त्तयेत् ॥वाग्भट्ट॥