भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ८ ]

सूत्रस्थानम्

२९

बड़ा परथर), मुद्गर, पाँव का तलुवा- हाथ का तेलुवा, अंगुलि, जिह्वा, दांत, नख, मुख, बाल, घोड़े की काठी शाखा, छीवन—कफ आदि, प्रवाहण-वमन-विसेचन-अश्रु निकालने के लिये, हर्ष तुष्टि के लिये, अयस्कान्त (पापाण विशेष-आकर्षक, द्रावक, सुम्रक, भ्रामक भेद से), और क्षार, अग्नि, एवं औषधियाँ उपयन्त्र हैं। अष्टीलाश्रम—से अष्टीलालोहे का घन या अन्य ऐसी वस्तु और अश्रम से परथर दो वस्तुयें हैं।

वि० मन्तव्य—उपयन्त्र अर्थात् यन्त्रण आदि में उपयोगी उपकरण। चर्म-चमड़ा की अनेक प्रकार की पट्टियाँ, वद्वियाँ यथा अन्त्रवृद्धि में बाँधने की पेट्टी आदि। अन्तर्वलकल-बुछों की कोमल, लम्बी वे छालें जो बन्धन के योग्य हों। जिह्वा-जीम-दन्तों में लगे धँसे पदार्थ को हिला २ कर निकाल देती है। दन्त से पकड़कर शल्य निकाला जा सकता है और नखों से भी। मुख से चूसकर दुग्ध, विष तथा रक्त निकाला जाता है। एतदर्थ रवङ्ग के गेन्द सा आचूक यन्त्र भी होता है। लाल—केशों की गुही बना उससे कण्ठ वात शल्य को फँसाकर निकालने का विधान है। कूची आदि बनाकर घोने, साफ करने आदि के उपकरण बनाये जाते हैं। अश्वकटक—के लिये देखिये अ० २७ का पञ्चाङ्गयाँ...उद्दरति सू० १४। झाखा का वर्णन भी वही देखिये। छीवन—थूककर या खाँसकर कफ निकाला जाता है। प्रवाहण—काँखकर, बल लगाकर पुरीष एवं मूत्र निकाला जाता है और गर्भ को निकालने में गर्भिणी प्रवाहण करती है, उससे एतदर्थ कहा जाता है कि—प्रवाहस्व सुभगे। हर्ष या हर्षण—इसके द्वारा मन-आवाधकर शोक-शल्य निकाला जाता है। शेष देखिये इसी स्थान का अध्याय २७ और सम्पूर्ण सुश्रुत ॥१५॥

एतानि देहे सर्वस्मिन् देहस्यावयवे तथा । संधौ कोष्ठे धमन्यां च यथायोगं प्रयोजयेत् ॥१६॥

इन यन्त्रों का उपयोग देह के सम्पूर्ण अवयवों में, संधि में कोष्ठ को धमनी में यथास्थान उचित रीति से उपयोग करना चाहिये ॥१६॥

यन्त्रकर्मणि तु—निर्घातनपूर्णबन्धनव्यह्वनवर्तन-चालनविवर्तनविवरणपीडनमार्गविशोधनविकर्षणाहरणा-बुछनोन्नमनविनमनभञ्जनोन्मथनाचूषणेषणदारणजूरकरणप्रक्षालनप्रधमनप्रमार्जनानि चतुर्विंशतिः ॥१७॥

यन्त्रों के कर्म—चौबीस प्रकार के हैं। यथा—निर्घातन (इधर-उधर चलाकर निकालना), पूर्ण (बस्ति-नेत्र आदि को तैल से भरना), बन्धन (रज्जु आदि से बाँधना), व्यह्वन (ऊपर को उठाकर काटकर शेष भाग को निकालना), वर्चन (गोल करना), चालन (एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले चलना),

विवर्चन (पराङ्मुख हुई अस्थि आदि का अपवर्चन), विवरण (अंगुलि आदि से दबाकर शल्य को बाहर करना), पीडन (अंगुलि आदि से मलना-दबाना), मार्ग विशेषन (उत्तर बस्ति से मूत्रमार्ग का शोधन), विकर्षण (पकड़कर बाहर निकालना), आहरण (अन्दर स्थित शल्य का बाहर लाना), आच्छन (आय-मन-ऊपर उठाना), उन्नमन (ऊपर करना), विनमन (नीचे करना), भञ्जन (तोड़ना), उन्मथन (मथना-बिलोड़ना), आचूषण (चूसना), ऐषण (हूँदना), दारण (दो करना-फाड़ना), क्रूरकरण (सीधा कराना), प्रक्षालन (घोना), प्रधमन (नासिका आदि में फूलकार से औषध भरना), प्रमार्जन (बल्ल आदि से साफ करना), ये चौबीस कार्य यन्त्रों के हैं।

वि० मन्तव्य—उपयन्त्रों के कर्मों—कार्यों पर ध्यान देने से उपयन्त्रों के आकार-प्रकार तथा उनके उपयोग का पर्याप्त ज्ञान हो सकता है। हमारा विश्वास है कि इन से अधिक न यन्त्र हो सकते हैं और न यन्त्र कर्म ही हो सकते हैं। तथापि—सूत्र १८ देखिये ॥१७॥

स्वबुद्ध्या चापि विभजेद्यन्त्रकर्मणि बुद्धिमान् ।

असंख्येयविकल्पस्वाच्छल्यानामिति निश्चयः ॥१८॥

उपसंहार—शल्यों के असंख्य भेद होने के कारण बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपनी बुद्धि से ही यन्त्र कर्मों का विभाग कर ले। जिस प्रकार बने उस प्रकार से शल्य बाहर निकालना चाहिये ॥१८॥

तत्र अतिस्थूलम्, असारम्, अतिदोर्घम्, अतिह-स्वम्, अग्राहि, विषमग्राहि, वक्रं, शिथिलम्, अत्युन्नतम्, मृदुकीलं, मृदुमुखं, मृदुपाशम् इति द्वादश यन्त्रदोषाः ॥

यन्त्र दोषों को कहते हैं—अतिस्थूल (बहुत मोटा), असार (अशुद्ध लोहादिसे बने), बहुत लम्बा और बहुत छोटा, अग्राही (विकृत मुख), विषमग्राही (एक देश पकड़े और दूसरा न पकड़े), वक्र (टेढ़ा), शिथिल (दबाव न आये), अत्युन्नत (कील आदि उठी हो), मृदुकील (संधि बन्धन ठीला हो), मृदुमुखं (शल्य पीडन के दबाव को न सह सके), मृदुपाश (तनु पाश)—ये बारह यन्त्र के दोष हैं।

वि० मन्तव्य—असारका अर्थ है साररहित, दुर्बल जो कार्य करते समय टूट सकता हो जिसके टूटने का भय हो। यथा—कमजोर रस्सी या पट्टी और संदंश, शलाका आदि भी वैसे जो टूट जायें। मृदुपाश—ढोले रुचक (छल्लेवाला) देखो मुछण्डी का वर्णन ॥१९॥

एतैर्दोषैर्विनिर्मुक्तं यन्त्रमष्टादशङ्कुलम् । प्रशस्तं भिषजा ज्ञेयं तद्धि कर्मसु योजयेत् ॥२०॥