भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ७ ]

नाड़ीयंत्र—भगन्दर, अर्श, व्रणयंत्र१, बस्ति, उत्तरबस्ति, मूत्रवृद्धि, दकोदर, धूमनेत्र निरुद्धप्रकश, सन्निरुद्धगुद, अलाबु यंत्र२ हैं। इनको विस्तार से आगे कहेंगे३।

वि० मन्तव्य—नाड़ी यन्त्र-सुषिर अर्थात् खोलले होते हैं नाली या नलिका के आकार के ॥१३॥

शलाकायन्त्राण्यपि नानाप्रकाराणि, नानाप्रयोजनानि, यथायोगपरिणाहदोषाणि च, तेषां गण्डूपदसर्पफणशरपुच्छबडिशमुखे द्वे द्वे, एषण्यूहूनचालनाहरणार्थमुपदिश्येते, मसूरदलमात्रमुखे किंचिदानताग्रे खोतोमतरल्योद्धारणार्थं, षट् कार्पासकृतोष्णीषाणि प्रमाज्जनक्रियासु, त्रीणि दव्याकृतौनि खल्लमुखानि, क्षारोषधप्रणिधानार्थं त्रीण्यन्यानि जाम्बवदनानि, त्रीण्यङ्कुशवदनानि, षडेवानिकर्मसंस्वभिप्रेतानि, नासाबुंदहरणार्थमेकं कोलास्थिदलमात्रमुखं खल्लतीक्ष्णौष्ठं, अञ्जनार्थमेकं कलायपरिमण्डलमुभयतो तुकुलाम्, मूत्रमार्गविगोधनार्थमेकं माल्तीपुष्पवृन्ताग्रप्रमाणपरिमण्डलमिति ॥१४॥

शलाका यंत्र भी नाना प्रकार के होते हैं। इनके प्रयोजन भी नाना प्रकार के हैं, इनकी लम्बाई और मोटाई प्रयोजन के यथायोग्य होती है। इन शलाका यंत्रों में—गण्डूपद, सर्पफण, शरपुंख और बडिशमुख—दो दो, (सुगल से ही कार्य होता है) इनका कार्य एषण टुँढने के लिये (गम्भीरपाक में पूय आदि टुँढने के लिये), व्युहन्—ऊपर को उठाकर बाहर निकालना, चाल्न करने के लिये, आहरण—खीचकर बाहर निकालने के लिये, दो शलाका यंत्र—विदलित मसूर के समान, आगे से कुछ मुड़े (एक आठ अंगुल और दूसरा ६ अंगुल), इनका उपयोग खोतों में फँसे शल्य को निकालने में है। छै शलाकायें—जिनके खिरे पर रूई लिपटी रहती है, इनका उपयोग

१ व्रणयन्त्र—“नाड़ीवृणप्रशालनाम्यञ्जनयन्त्रे पडंगुले बस्ति-यन्त्राकारे मुखतोऽकर्णिके—मलमुखयोर्गुण्डप्रकलायप्रवेशखोतसी मूले निवदमुर्दुर्गणिः” ॥ वृ० वाग्भट्ट ७॥

२ दो भगन्दर यन्त्र, दो अर्श यन्त्र, वृणयन्त्र एक, बस्तिनेत्र-चार प्रकार, उत्तर बस्तिनेत्र दो—मूत्र वृद्धि १, दकोदर १, धूमनेत्र ३, निरुद्धप्रकश १, सन्निरुद्धगुद १, अलाबु यन्त्र १, इस प्रकार से वीस हैं।

३ वृद्ध वाग्भट ने नाड़ी यन्त्र अधिक कहे हैं। यथा—‘कण्ठशल्यदर्शनार्थं नाड़ीदशाङ्गुलायतां पञ्चाङ्गुलपरिणाहाम्। द्विकण्ठस्य तु वारङ्गस्य संप्रहार्यं द्विच्छिद्रमुखाम्। शल्यनियतिनी तु पद्मकर्णिकाकारस्त्रीर्पा द्वादशांगुला श्यंगुलसुषिरा। तथाऽङ्गुलित्राणकं। योनिव्रणदर्शने यंत्रम्—Vagihalspecilum।

आजकल ब्रेस्ट पम्प (Breast-Pump) एक यन्त्र और है—जो कि स्तनों से दूध निकालने के कार्य में आता है।

प्रमाज्जन क्रिया में होता है। तीन शलाका यन्त्र—कड़छी के मुख के समान, नीचे की ओर मुख किये, इनका उपयोग क्षार औषध लगाने में होता है। अन्य तीन यन्त्र—जामुन के समान मुखवाले, तीन अंकुश के समान मुखवाले होते हैं। ये छै शलाकायन्त्र अग्नि कर्म—जलाने के कार्य में आते हैं। नासा के अर्बुद को निकालने के लिये एक—बेर की आधी गुठली के समान मुखवाली बीच से गहरी और किनारों पर तेज, एक शलाका यन्त्र—मटर के बराबर मोटी और दोनों खिरो पर मुकुलाकार, एक शलाका मूत्र मार्ग के संशोधन के लिये—माल्ती पुष्प के वृन्त के अग्रभाग के समान मोटी होती है१।

वि० मन्तव्य—अञ्जनार्थमेकं““मुकुलाग्रम्—यह नेत्र में अञ्जन लगाने की सलाई है पञ्चाय में इसे “सुरमचू” कहते हैं। शलाका ठोस होती है, उनके मुख के आकार लम्बाई, मोटाई तथा कार्य भिन्न रहते हैं।

गण्डूपद—केतुवा के सहस्र गोल, लम्बी तथा लचकीली, यथा—रवड की बत्ती जो मूत्रमार्ग आदि में जाती है।

सर्पफण मुखी—जिसका अग्रभाग सर्प के मुख के सहस्र नोकिला तथा फणा के सहस्र चौड़ा हो, मन्त, फन फैलाए सर्प को देखिये।

शरपुंख मुखी शलाका—जिनके अग्रभाग पर शर-बाण के समान पुंख (फर) हों, ऐसे बाण भी होते हैं जो पुंखोंवाले होते हैं। बाण जब वेग से जाकर शरीर में धँसता है तब ये पुंख भीतर फेल जाते हैं और निकलते समय बड़ा ब्रण करके निकलते हैं। अस्तु, यह पुंखोंवाली शलाका शल्य को हिलाने-चलाने में प्रयुक्त होती है।

बडिशमुखी शलाका—वह मछली पकड़ने के कांठा के सहस्र होती है और गर्भशल्य के आहरण में काम आती है, अपत्य पथ से भीतर गर्भाशय में डालकर गर्भ के हनु आदि में फँसाकर खींच ली जाती है इसे वाग्भट में “गर्भशंकु” कहा है, यथा—आहोयं बडिशक्रुतिः। नतोऽग्रे शङ्कुना तुष्यो गर्भशङ्कुरिति स्मृतः। वा० सू० अ० २५ ॥२४॥

उपयन्त्राण्यपि—रञ्जुवेणिकापट्टचर्मोन्तर्वल्लकलता-वच्छाष्ठीलाश्रममुद्गरपाणिपादतलाङ्गुलिजिह्वादन्तनख-मुखवालाश्रवकटकशाखाष्ठीवनप्रवाहणहर्पायस्कान्तमया-नि क्षारानिभेषजानि चेति ॥१५॥

उपयन्त्र—रस्सी, वेणिका (तीन लड़ी वेणी), पट्ट (दूत की बनी पट्टी), चर्म (चमड़ा), अन्तर्वल्लक टाँके, गूल आदि की छाल लता (बेल), वस्त्र (कर्पट), अष्टीलाश्रम (गोल-

१ वाग्भट्ट में कर्णशोधन और गर्भशंकु, ये दो शलाका यन्त्र अधिक हैं। यन्त्रों के लिये वाग्भट्ट एवं लेखक का शल्यतंत्र देखिये।