भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सूत्रस्थानम्

२७

कौलेरवबद्धानि, मूलेऽकुशवदावृत्तचारुज्जाणि, अस्थिविदग्ध- ग्रत्योद्धारणार्थमुपदिश्यन्ते ॥१०॥

स्वस्तिक यन्त्रों का प्रमाण एवं आकार—

स्वस्तिक यन्त्रों का प्रमाण १८ अंगुल होता है। इनके मुख सिंह, मेडिया, व्याघ्र (चीता) तरलु, मालु, चीता, बिल्ली, गीदड़, हिरण, एर्वाह (हरिणभेद)—इन हिंसक पशुओं के मुख के समान तथा—कौवे, कंक (दीर्घ चोंच का), कुरर, चाप, भास, शशघाति (शशारि), उल्लु, चिल्ली (चील), श्येन, गीष, कौंच, भुङ्गराज—फिगा, अङ्गुलिर्ण अवभञ्जन, नन्दी-मुख—इन पक्षियों के मुख के समान मुखवाले, सिर पर मसूर के समान फलदार कील से जुड़े, जड़ में अंकुश के समान घिरे हुए पकड़ने के स्थानवाले, अस्थि में घुसे शल्य को निकालने के लिये काम में आते हैं।

वि० मन्तव्य—इन पशु-पक्षियों को हिंस ही मानना आवश्यक नहीं है, केवल मुख साहस्य के लिये कुछ पशु-पक्षियों का नामोल्लेख कर दिया गया है, अवभञ्जन पक्षी को पञ्चाव में “ठोक ठेया” तथा उत्तर प्रदेश में ‘लोहार’ कहते हैं, यह वृक्ष के टहनों में अपनी चोंच से बिल बना लेता है। स्वस्तिक यन्त्र—स्वस्तिक (x) के सदृश होते हैं। इसके २ खण्ड होते हैं और दोनों को मुख-भाग से थोड़ा ऊपर कील से जोड़ा रहता है, परन्तु वह कील दोनों खण्डों के छिद्रों में डीला रहता है कसा नहीं, ताकि यन्त्र में गति हो सके, कील के दोनों छोर मसूर के समान फूलदार हों, जिससे दोनों खण्ड अलग न हों। वारङ्ग—मूठ का या उस भाग का नाम है, जहाँ पर यन्त्र को हाथ से पकड़ा जाता है, मुख उस भाग का नाम है जिससे शल्य पकड़ा जाता है। इसके उदाहरण हैं दन्त निकालने का जमूर तथा गर्म लोहा पकड़ने की लोहारों की सानी या सन्नी। वाग्भट के शब्दों में—कण्ठे मसुराकार-पर्यन्तैः कीलकैः बद्धानि, मूले अंकुशवत् नतानि स्वस्तिकयन्त्राणि विद्यात्। वा० सू० अ० २५ ॥१०॥

सनिग्रहोऽनिग्रहश्च संदर्शो बोडयाङ्गुलौ भवतः, त्वङ्गमांससिरास्नानुगतशल्योद्धारणार्थमुपदिश्येते ॥११॥

संदर्शयन्त्र—दो प्रकार के हैं। यथा—सनिग्रह (सनिबन्ध-संज्ञायी) और अनिग्रह (अनिबन्ध चिमटा) इनकी लम्बाई १६ अंगुल होती है। ये त्वचा, मांस, सिरा, स्नायु में लगे हुए शल्य को निकालने में काम आते हैं।

वि० मन्तव्य—संदर्श—चिमटा या चिमटी का नाम है, इस पर एक छल्ला चढ़ाया रहता है उसका नाम है “निग्रह”। जिस पर छल्ला चढ़ा होता है वह “सनिग्रह” कहलाता है। यह छल्ला के दबाव से ही शल्य को पकड़े रहता है, हाथ का दबाव डालने की आवश्यकता नहीं होती और जिस पर छल्ला नहीं रहता वह “अनिग्रह” संदर्श कहलाता है, इस पर हाथ

का दबाव देकर शल्य पकड़ा जा सकता है। इसमें हाथ का दूना बल लगता है दवाने और खींचने में। इसके छोटे रूप का नाम “मुमुण्डी” है और छल्ला का नाम रुचक है। क्योंकि रुचक का नाम “कटक” है और कटक का नाम वलय है (भेदनीकोश)। सर्वसाधारण की बोली में मुमुण्डी संदर्श को “नचकुण्डी” (पञ्जाब) तथा मुमुण्डी-मुचकुंडी कहते हैं। यह काँटा निकालने के लिये घर २ रखी जाती है। इसका लक्षण—षडङ्गुलोऽन्यो हरणे सूक्ष्मशल्योपपद्मणाम्। मुचण्डी सूक्ष्मदन्ता ऋजुः मूले पचकभूषणा। गम्भीरव्रणमांसा नामर्मणः शेषितस्य च। वा० सू० अ० २५। अर्थात् उक्त दो बड़े (१६-१६ अङ्गुल के) सन्दर्शों के अतिरिक्त एक अन्य ६ अंगुल का संदर्श होता है जिसका नाम “मुमुण्डी” है। इसके दन्त सूक्ष्म (बारीक) तीखे (नोकदार) नहीं होते हैं, यह आकारतः सीधी होती है, रुचक का भूषण होता है यह सूक्ष्म शल्य, उपपद्म (परवाल), गम्भीर व्रण के दूषित मांस तथा अर्म को निकालने के काम आती है। इसे “मोचना” भी कहते हैं ॥११॥

तालयन्त्रे—द्व्वादशंगुले मत्स्यतालव्यदेकतालद्वितालके, कर्णनासानाडीशल्यानामाहरणार्थम् ॥१२॥

तालयन्त्र भी दो प्रकार के हैं। इनकी लम्बाई १२ अंगुल होती है। इनका मुख मछली के ताल के समान पतला होता है। कइयों में एक प्रदेश होता है, और कइयों में दो प्रदेश होते हैं। इनका उपयोग कान, नासा एवं नाड़ी शल्यों के निकालने में होता है। आंगल भाषा में इनको स्कूप (SCOOP) कहते हैं।

वि० मन्तव्य—ताल यन्त्र—चम्मच के आकार के होते हैं। इनसे कान की मैल निकालने आदि का काम लिया जाता है ॥

नाडीयन्त्राणि—अनेकप्रकाराणि, अनेकप्रयोजनानि, एकतोमुखान्युभयतोमुखानि च, तानि क्षोतोगतशल्योद्धारणार्थं, रोगदर्शनार्थम्, आचूषणार्थं क्रियासौकर्यार्थं चेति तानि क्षोतोद्धारपरिणाहानि, यथायोगदीर्घाणि च। तत्र भगन्दराशोव्रणबस्त्युत्तरबस्तिमूत्रवृद्धिकोदरधूमनिरुद्धप्रकससन्निरुद्धगुदयन्त्रणयलावुशुङ्गयन्त्राणां चोपारध्वाद्वत्त्यामः ॥१३॥

नाडीयन्त्र—भी अनेक प्रकार के तथा अनेक प्रयोजन के लिये बनते हैं। इनमें कुछ यंत्रों में मुख एक ओर होता है, और कुछों में दोनों ओर होता है। इनका उपयोग—कण्ठ आदि खोलों में फँसे शल्य को निकालने के लिये, भगन्दर आदि रोग को देखने के लिये, रक्त आदि चूषण के लिये, अर्श आदि में क्रिया को सुगमता के लिये व्यवहार होता है। इसकी मोटाई क्षोतोद्धार के समान होती है और इनकी लम्बाई आवश्यकतानुसार होती है।