सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
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घनात्यये वार्षिकमाशु सम्यक्
प्राप्नोति रोगान् श्रुतुजात्र जातु ॥
वि० मन्तव्य—वसन्त श्रुतु में कफ को (वमन द्वारा) और शरद् श्रुतु में पित्त को (विरेचन द्वारा) निकालना चाहिये और वर्षा में वात को शान्त करना चाहिये, परन्तु यह सब कार्य—रोगोत्पत्ति के पूर्व ही कर डालना या करना चाहिये अर्थात् स्वस्थ भी उक्त श्रुतुओं में वमन, विरेचन तथा वात शमनोपाय करता रहे, इससे लाभ यह होता है कि उसको श्रुतु जनित विकार कभी नहीं होते। शोधन द्वारा दोषों का सख्ख निकल जाता है, फलतः प्रकोप का अवसर ही नहीं आता।
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने श्रुतुचर्या
नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
—:o:—
सप्तमोऽध्यायः
अथातो यन्त्रविधिमध्येयार्थं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे शल्यों को निकालने के साधनों को बताने के लिये 'यंत्रविधि' नामक अध्याय को कहते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥
यन्त्रशतमेकोत्तरम; अग्र हस्तमेव प्रधानतमं यन्त्राणामवगच्छ, ( कि कारणं ? यस्माद्भ्रष्टाहते यन्त्राणामप्रवृत्तिरेव ) तदधीतत्वाद्यन्त्रकर्मणाम् ॥३॥
यन्त्रों की संख्या साधारणतः एक सौ एक है, (वैसे असंख्य हैं१))। इन सब यंत्रों में सब से प्रधान यंत्र हाथ को ही समझना चाहिये। क्योंकि—हाथ के बिना यंत्रों का चलना असम्भव है। सब यंत्र-कर्म इसी हाथ के आधीन हैं—
वि० मन्तव्य—यन्त्र-नियन्त्रण या पकड़ने के साधनों—उपकरणों का नाम है। इन से पकड़कर कण्टक एवं दन्त आदि तथा मृतयार्म कभी २ जीवित गर्भ आदि २ भी निकाले जाते हैं। इन से शल्य को हिलाने-डुलाने या शिथिलमूल करने का काम भी लिया जाता है। गुद, भग तथा मुख आदि को चौड़ा करके (तान करके) भीतर देखने का, औषध लगाने का तथा शस्त्र कर्म करने का काम भी लिया जाता है। मूत्राशय एवं जलोदर आदि में लमाकर सावण का तथा आचूषण का भी काम लिया जाता है ॥३॥
तत्र, मनःशरीरावाधकराणि शल्यानि, तेषामाहरणोपायो यन्त्राणि ॥४॥
१ वामभट्ट में यन्त्रों की संख्या असंख्य मानी है। यथा—“अतः कर्मवाश्लेषामियताऽवधारणमशक्यम्” वा० ग० सू० स्था० अ० २५।
शल्यविनिश्चय में—मन एवं शरीर को पीड़ित करनेवाली वस्तु को 'शल्य' कहते हैं। इस शल्य को निकालनेवाले साधनों को 'यंत्र' कहते हैं ॥४॥
तानि षट्प्रकाराणि तद्यथा—स्वस्तिकयन्त्राणि, संदंशयन्त्राणि, तालयन्त्राणि, नाड़ीयन्त्राणि, शलाकार्यन्त्राणि उपयन्त्राणि, चैति ॥५॥
यंत्रों के भेद—
ये यंत्र आकृति भेद से छै प्रकार के हैं। यथा—स्वस्तिक यंत्र, संदंशयंत्र, तालयंत्र, नाड़ीयंत्र, शलाकार्यत्र और उपयंत्र१ ॥५॥
तत्र चतुर्विंशतिः स्वस्तिकयन्त्राणि, द्वे संदंशयन्त्रे, द्वे एव तालयन्त्रे, विंशतिर्नाड्यः, अष्टाविंशतिः शलाकाः, पञ्चविंशतिरुपयन्त्राणि ॥६॥
इनमें स्वस्तिकयंत्र—२४, संदंशयंत्र—२ तालयंत्र—२, नाड़ीयंत्र—२०, शलाकार्यत्र—२८, उपयंत्र—२५—इस प्रकार से १०१ यंत्र हैं ॥६॥
तानि प्रायशो लोहानि भवन्ति, तत्प्रतिरूपकाणि वा तदलाभे ॥७॥
ये यंत्र प्रधानतः लोहे के (स्वर्ण-रजत, ताम्र-वंग लोहा) होते हैं। लोहादि के अभाव में दांत बांस आदि लोहे के समान दृढ़ वस्तुओं से बनाये जाते हैं ॥७॥
तत्र, नानाप्रकाराणां व्याख्यानं मृगपक्षिणां मुखैर्मुखानि यन्त्राणां प्रायशः सहशानि, तस्मात्तत्सारुप्यादागमादुपदेशादन्ययन्त्रदर्शनाद्युक्तिश्च कारयेत् ॥८॥
यंत्रों की बनावट—
यंत्रों के मुख प्रायः भिन्न २ हिंसक पशुओं के तथा पक्षियों के मुख के सहज होते हैं। इस लिये हिंसक पशु-पक्षियों के मुख के समान, शास्त्र उपदेश से, विदितवेदितव्य वैद्यों के आदेश से, युक्ति से तथा प्रयोजन वश से यन्त्रों की रचना करनी चाहिये ॥८॥
समाहितानि यन्त्राणि खरश्लदण्मुखानि च।
सुदृढानि सुरुपाणि सुप्रहाणि च कारयेत् ॥९॥
उपसंहार—
उचित (न अधिक और न कम) परिभाषा के बने, खर चिकने मुखवाले, दृढ़, देखने में सुन्दर, पकड़ने में सरल बनावटवाले यन्त्र बनाने चाहिये ॥९॥
तत्र स्वस्तिकयन्त्राणि—अष्टादशाङ्गुलप्रमाणानि सिंहन्याग्रवृत्तरद्व्युच्छेदोपिमाजारश्मगालमुगैर्वास्ककाकंकङ्कुररचापमासशशवात्युलूकचिल्लियेनगुध्रकौञ्चभृङ्गराजाञ्जलिकर्णोवभञ्जननन्दीमुखमुखानि, मसूराकृतिभिः
१ विस्तार के लिये—लेखक का 'शल्ययन्त्र' देखिये।