भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ६ ] ४

सूत्रस्थानम्

२५

सिद्धविद्याधरवधूचरणालक्तकाङ्क्षिते । मलये चन्दनलतापरिध्वज्जाधिवासिते ॥२५॥ वाति कामिजनानन्दजननोऽनङ्गदीपनः । दम्पत्योर्मानभिदुरो वसन्ते दक्षिणोऽनिलः ॥२६॥ दिशो वसन्ते विमलाः काननैरुपशोभिताः । किशुकाभ्योजबकुलचूताशोकादिपुष्पितैः ॥२७॥ कोकिलाषट्पदगणैरुपगीता मनोहराः ।

दक्षिणानिलसंवीताः सुमुखाः पल्लवोज्ज्वलाः ॥२८॥ वसन्त ऋतु में—सिद्ध एवं विद्याधरों की स्त्रियों के चरणों में लगे आलक से चिह्नित, चन्दनलता के आलिंगन से सुवासित; कामिजनों को आनन्द देनेवाली तथा कामवर्धक, दम्पतियों के मान को तोड़नेवाली मलयाचल की दक्षिण वायु बहती है। वसन्त में दिशायें निर्मल, जंगलों से शोभित, ढाक, कमल, बकुल, आम, अशोक आदि के फूलों से शोभित होती हैं। कोकिल-भ्रमर आदि के मनोहर गीतों से मिली शोभन अवकाशवाली तथा पल्लव-कोमल पत्तों से भुंगार की हुई और दक्षिण वायु बहती है ॥२५-२८॥

ग्रीष्मे तीक्ष्णांशुरादित्यो मारुतो नैऋतोऽसुखः । भूस्तप्ता सुरितस्तन्व्यो दिशः प्रवृत्तित्वा इव ॥२९॥ आन्तचक्राह्युगलाः पयःपानाकुला सुगाः । ध्वस्तवीरुत्तृणलता विपर्णाङ्कितपादपाः ॥३०॥

ग्रीष्मऋतु में—सूर्य की किरणें तीक्ष्ण रहती हैं। नैऋत की वायु बहती है, यह वायु सुखकारक नहीं होती। जमीन जलती रहती है, नदियों का प्रवाह मन्द पड़ जाता है, दिशायें मानों आग उगलती रहती हैं। घवराये चक्रवाक युगल पानी की फिकर में मंडराते रहते हैं। मृग पानी पीने के लिये व्यग्र होते हैं। वृक्ष, तृण, लतायें नष्ट होती हैं—जमीन पर गिर जाती हैं। वृक्षपत्तों-रहित रुण्ड-मुण्ड हो जाते हैं ॥२९,३०॥

प्रावृष्यम्बरमानन्दं पश्चिमानिलकपितैः । अम्बुदैविद्युदुद्योतप्रस्तुतेस्तुम्लस्वनेः ॥३१॥ कोमलश्यामशष्पाख्या शक्रगोपोज्ज्वला सही । कदम्बनीपकुटजसजंकेतकिभूषिता ॥३२॥

प्रावृद्ध ऋतु—पश्चिम दिशा की वायु (मोनसून) से लाये हुए बादलों से आकाश प्रावृद्ध ऋतु में घिरा रहता है। बिजली की चमक के साथ वरसनेवाले प्रचंड गर्जनोंवाले बादल घिरे रहते हैं। भूमि कोमल-श्याम दूब से भरी रहती है। भूमि पर वीरवृहटियाँ फैली रहती हैं। कदम्ब, नीम, कुटज, राल, केतकी से भूमि अलंकृत रहती है। जैसा कि रामायण में कहा है—‘बालेन्दुगोपान्तरचित्तिनेन विभाति भूमिर्नवशादलेन’ ॥

तत्र वर्षासु नद्योऽम्भश्छन्नोत्खाततटदृमाः । वाप्यः प्रोत्फुल्लकुमुदनीलोत्पलविराजिताः ॥३३॥

भूरण्यक्तस्थलद्वयभा बहुसस्योपशोभिता । नातिभर्जस्तवन्मेघनिरुद्धार्कग्रहं नभः ॥३४॥ वर्षाऋतु—वर्षाऋतु में नदियाँ पानी से भरी रहती हैं, जिससे कि किनारे के वृक्ष टूटते हैं। बावडियों में कुमुदिनी और नीले कमल खिल रहे होते हैं। भूमि पर गडदे और जमीन में भेद नजर नहीं पड़ता, शस्यश्यामला भूमि होती है। बहुत गर्जना न करनेवाले बादलों से नभ और सूर्य तथा तारे छिपे रहते हैं ॥३३,३४॥

बधुरुणः शरद्यर्कः श्वेताश्रविसमलं नभः । तथा सरांस्यम्बुरुहेर्भान्ति हंसांसघट्टितैः ॥३५॥ पङ्कशुष्कदुमाकीर्णा निम्नोन्नतसमेपु भूः । बाणसप्ताह्वबन्धूकशासनविराजिता ॥३६॥ शरद ऋतु—शरद ऋतु में सूर्य कपिल-पिंगल एवं उष्ण होता है। आकाश श्वेत बादलों से व्याप्त एवं विमल होता है। हंसों के द्वारा आलोडित कमलों से तलाब सुशोभित होते हैं। नीचे ऊँचे स्थानों में भूमि समान हो जाती है कीचड़ शुष्क हो जाता है तथा—चिउँटी आदि से व्याप्त होती है। बाण (झिंटी), सप्तर्ण, दुपहरिया, काश, असन से भूमि शोभित होती है। (बाण का अर्थ—कुण्ट किया है)।

वि० मन्तव्य—पङ्कशुष्कदुमाकीर्णा निम्नोन्नतसमेपु भूः—का अर्थ है कि शरद ऋतु में—भूमि-निम्न भागों में पङ्क (कीचड़) से आकीर्ण (व्याप्त) रहती है, उन्नत भागों में सूखी रहती है और समतल भागों में दुमों (गोदों) से व्याप्त रहती है ॥३५,३६॥

स्वगुणैरित्युक्तेषु विपरीतेषु वा पुनः । विषमेष्वपि वा दोषाः कुप्यन्त्यतुषु देहिनाम् ॥३७॥ उपसंहार—ऋतुओं के जो स्वाभाविक गुण हैं, उन गुणों में अत्यधिकता होने से, अथवा स्वाभाविक गुणों में विपरीत गुण आने से (वर्षाऋतु में वर्षा न होने से), या ऋतुओं के स्वाभाविक गुणों में विषमता (शीत में गरमी, गरमी में शीत) होने से (इस प्रकार से १८ प्रकार की ऋतु-व्यापत्तियाँ हैं) प्राणियों के वात आदि दोष कुपित होते हैं। (कालार्थ-कर्मणां योगो हीनमिथ्यातिमात्रकाः) ॥३७॥

हरेद् वसन्ते श्लेष्माणं पित्रं शरदि निर्हरेत् । वर्षासु शमयेद् वायुं प्राणिकारसमुच्छयात् ॥३८॥ रोगोत्पत्ति से पूर्व ही दोषों का शमन करना चाहिये। यथा—वसन्त ऋतु में कफ का, शरद ऋतु में पित्त का, वर्षाऋतु में वायु का शमन करना चाहिये। जिस ऋतु में जो दोष कुपित होता है, उसकी उसी में शान्ति करनी चाहिये। चरक में कहा है—

हैमन्तिकं दोषचयं वसन्ते प्रवाह्यन् ग्रेष्मिकमभ्रकाले ।