सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुमुक्षुस्थानम्
[ ३० ]
तत्र, अद्यापन्नेषु ऋतुष्वन्यापन्ना ओषधयो भवन्त्याप्यत्र, ता उपयुज्यमानाः प्राणायुर्बलवीर्यौजस्कयो भवन्ति ॥ १५ ॥
अव्यापन्न—आदृषित ऋतुओं में गेहूँ-चने आदि वनस्पतियाँ तथा पानी निर्दोष होते हैं। इन वनस्पति तथा पानी के उपयोग से—अग्निसोमीय रूपी प्राण शरीर-इन्द्रिय-सत्त्व-आत्मा के संयोग रूपी आयु, उत्साह रूपी बल, शक्ति, सप्त धातुओं का स्नेह रूपी हृदयाश्रित ओज बढ़ता है ॥ १५ ॥
तेषां पुनर्न्यपदोऽष्टककारिता, शीतोष्णवातवर्षाणि खलु विपरीतान्योषधीन्यांपादयन्त्यप्यत्र ॥ १६ ॥
इन ऋतुओं में विपरीतता का कारण अधर्म है। शीत, उष्ण, वायु और वर्षा के विपरीत (हीन, मिथ्या, अतियोग) होने से ओषधियाँ एवं जल भी दूषित बन जाते हैं—अपने स्वाभाविक गुण-धर्म को छोड़ बैठते हैं। (सर्वेषामप्यग्निवेश यद् वैगुण्यमुत्पद्यते तस्य मूलमधर्मः। तन्मूलं वाऽसत्कर्म पूर्वकृतं, तयोः योनिः प्रज्ञापराध एव। चरक) ॥ १६ ॥
तासां सुपयोगाद्विषधरोगप्रादुर्भावो मरको वा भवेदिति ॥
इस प्रकार के दूषित अन्न-पान के सेवन से नाना प्रकार के रोग होते हैं अथवा-महामारी फैलती है१ ॥१७॥
तत्र, अद्यापन्तानां सोषधीनामपां चोपयोगः ॥ १८ ॥
इस अवस्था में (ऋतु के विपरीत होने पर) अधूषित वनस्पतियों का तथा पानी का उपयोग करना चाहिये। पुराना अन्न एवं अव्यापन्न पानी का उपयोग करना चाहिये। इस लिये कहा है—“तस्मात् प्रागुद्वर्षसात् प्राक् च भूमैः विरसीभावाद् उद्वरश्च भेषज्यानि”—इत्यादि ॥१८॥
कदाचिदव्यापन्नेष्वपि ऋतुषु कृत्याभिशापरक्षः क्रोधाधर्मरूपध्वस्यन्ते जनपदाः, विषोषधिपुष्पगन्धेन वा वायुनोपनोतेनाकन्यते यो देशस्तत्र दोषप्रकृत्यविशेषेण कासश्वासवमथुप्रतिशयाशिरोरुह्वरैरुपतप्यन्ते, ग्रहनक्षत्रचरितैर्वा, गृह्वाशयनासनयानवाहनमणिरत्नोपकरणगहि-तलक्षणनिमित्तप्रादुर्भावैर्वा ॥ १९ ॥
ऋतु व्यापत्ति के बिना भी कई बार (सदा नहीं) कृत्या (मन्त्रों द्वारा की हुई राक्षसी क्रिया), अभिचारी, अभिशाप (गुरु-सिद्ध आदि द्वारा दिया शाप) हिसक प्रवृत्तिवाले राक्षसों के क्रोध से, काय, वाणी एवं मन के अधर्म से जनपद नष्ट हो जाते हैं। विष युक्त औषधि, या विषैले फूल की गन्ध वायु द्वारा जिन देशों के समीप पहुँचती है, वहाँ पर दोष, प्रकृति की अभिन्नता से कास, श्वास, वमन, प्रतिशयाय, शिर-वेदना, ज्वर
१ देखिये विस्तार के लिये-चरक-वि-अ-३।
होते हैं। अथवा-आदित्य आदि ग्रहों के तथा अश्विनी आदि नक्षत्रों के गति विशेष से, या घर, भार्या, पलंग, आसन, यान, सवारी, मणि, रत्न आदि उपकरणों के निन्दित लक्षणों के होने से (अकस्मात् घर के गिरने से, बार बार कम्पन होने से) जनपद नष्ट होते हैं१। (तथाऽभिशापप्रभवस्याप्यधर्म एव हेतुर्भवति। ये लुप्तधर्माणिः धर्मादपेतास्ते गुरुहृद्वसिद्धिपूज्यानवसत्याहितानि आचरन्ति, ततस्ताः प्रजा गुर्वादिभिरभिशाता भस्मतामुपयान्ति, प्रागेवानेककुलविनाशाय, नित्यप्रत्ययोपलम्भाद् अनियताश्चापरे) ॥१९॥
तत्र स्थानपरित्यागशान्तिकर्मप्रायश्चित्तमङ्गलजपहो-सोपहारैरज्याञ्जलिनभस्कारतपोनियमदयादानदीक्षाभ्युपगमदेवताब्राह्मणगुरुपदैर्भवितन्यम, एवं साधु भवति ॥
सामान्यचिकित्सा—अधर्म के कारण ऋतु व्यापत्ति होने से दैव व्यपाश्रय औषध कहते हैं—स्थान का परित्याग, शान्तिकर्म, वेदोक्तमंत्रों से यजन, प्रायश्चित्त-तप, प्रशस्त मणि आदि मंगल वस्तु का धारण, जप, होम, उपहार, देवता बलि, इज्या (याग), अञ्जलि-भक्ति से हाथों को जोड़ना, नमस्कार-प्रणाम, तप, नियम-मौन, दया, दान, दीक्षा, अभ्युपगम गुरुवाक्य आदि को स्वीकार करना देवता-ब्राह्मण, गुरु की सेवा करनी चाहिये। इस प्रकार करने से कुशल होता है। (येषां न मृत्युसामान्यं सामान्यं न च कर्मणाम्। कर्म पंचविधं तेषां भेषजं परमुच्यते। हितं जनपदानां च शिवानामुपसेवनम् ॥ इत्यादि) ॥ २० ॥
अत ऊर्ध्वमन्यापन्तभूतूनां लक्षणान्युपदेक्ष्यामः ॥२१॥
वायुवार्त्त्युत्तरः शीतो रजोधूमाम्कुला दिशः।
छन्तस्तुषारैः सविता हिमान्द्रा जलाशयाः ॥२२॥
दपिता ध्वाङ्खुखड्गगृह्महिपोरभ्रकुञ्जराः।
रोद्रप्रियङ्कुपुनगाः पुषिता हिमसाहृये ॥२३॥
इसके आगे अव्यापन्न ऋतुओं के लक्षण कहते हैं।
हेमन्तऋतु में—उत्तर दिशा की वायु चलती है। दिशायैर्धूलि-धूम कोहरे से व्याप्त होती है। सूर्य तुषार से चिरा होता है, जलाशय-वर्ष से ढपे होते हैं। कौवे, गैंडा, मैसा, मेढ़ा एवं हाथी प्रसन्न रहते हैं। लोषप्रियगु—तथा पद्मकेशर खड्गखिलता है ॥ २१-२३ ॥
गिरिशिरे शीतमधिकं वातवृष्ट्याकुला दिशः।
शेषं हेमन्तवत् सर्वं विज्ञेयं लक्षणं वृष्टेः ॥ २४ ॥
शिशिरे ऋतु में शीत अधिक रहता है, दिशायैर्वात से मिश्रित वृष्टि से व्याप्त रहती है। शेष सब लक्षण विद्वानों की हेमन्त के समान समझना चाहिये ॥ २४ ॥
देखिये-महाभारत-शान्तिपर्व में—‘गोवत्सं बडवा सूते, स्वाशुगालं महीपते।’