सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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६ ऋतु माने गये हैं। कायचिकित्सा के चरक ग्रन्थ में प्रावृत् को न मानकर, उधर शिशिर ऋतु माना है। सू० अ० ६। अस्तु, परन्तु च० वि० अ० ८ सू० १२७ में संशोधन को ध्यान में रखकर शिशिर न मानकर प्रावृत् ऋतु मान लिया गया है। विचार-विधि भेद से यह सब समीचीन है ॥ १० ॥
तत्र, वर्षास्रवोषधयस्तृणयोऽल्पवीर्या आपश्चाप्राशन्ताः क्षितिमलप्राया, ता उपयुज्यमाना नभसि मेघावतते जल प्रकिलञ्चायां भूमौ किलञ्चदेहानां प्राणिनां शीतवातविष्ट-भ्रितागन्तीनां विदहन्ते, विदाहात् पित्तसंचयमापाद-यन्ति; स संचयः शरदि प्रविरलमेवे विद्यत्युपशुष्यति पङ्कैऽर्ककिरणप्रबिलायितः पैत्तिकान् व्याधीञ्जनयति। ता एवोषधयः कालपरिणामात् परिणतवीर्या बलवत्यो हेमन्ते भवन्त्यापश्च प्राशन्ताः स्निग्धा अत्यर्थं गुर्ण्यश्च, ता उप-युज्यमाना मन्दकिरणत्वाद्वाहानोः सतुषारपवनोपस्तम्भित-देहानां देहिनामविदग्धाः स्नेहाच्छैत्याद् गौरवादुपलेपाच्च श्लेष्मसंचयमापादयन्ति; स संचयो वसन्तेऽर्करश्मिप्रवि-लायित ईषस्तन्धदेहानां देहिनां श्लेष्मिकान् व्याधीञ्-जनयति। ता एवोषधयो निदाये निःसारा रुक्षा अतिमात्रं लक्ष्यो भवन्त्यापश्च, ता उपयुज्यमाना सूर्यप्रतापोपशोषित-देहानां देहिनां रौक्ष्याल्लघुत्वोच्च वायोः संचयमापाद-यन्ति; स संचयः प्रावृषि चतयर्थं जलोपकिलञ्चायां भूमौ किलञ्चदेहानां देहिनां शीतवातवर्षेरितो वातिकान् व्याधी-ञ्जनयति। एवमेव दोषाणां संचयप्रकोपहेतुरुक्तः ॥
इन ऋतुओं में वर्षा ऋतु के अन्दर वनस्पतियाँ तरुण--(सार रहित कमजोर) अल्पशक्ति हो जाती हैं। पानी भी अस्वच्छ हो जाता है; भूमि भी मल-मूत्र आदि से दूषित होती है। वनस्पतियाँ और जल आकाश के मेघों से व्याप्त होने तथा जल द्वारा भूमि के गीली होने से; शीत एवं वायु से मन्द की हुई अग्निवाले, तथा किलञ्च शरीरवाले प्राणियों में अम्लता को प्राप्त हो जाते हैं। अम्लपाक होने से शरीर में पित्त का संचय करते हैं। यह संचय ऋतु के शीत के कारण उस समय कुपित न होकर शरद् ऋतु में, आकाश में मेघों के साफ हो जाने से, भूमि के कीचड़ के सूखने से, सूर्य की किरणों से पिघलकर पित्तजन्य रोगों को उत्पन्न करता है। और यही औषधियाँ हेमन्त ऋतु में काल के परिपाक से शक्तिशाली परि-पक्व वीर्यवाली हो जाती हैं। और पानी भी निर्मल, स्निग्ध और अत्यन्त भारी हो जाते हैं। इस ऋतु में सूर्य की किरणों के मन्द होने से, वर्षा से मिली गीली वायु के कारण स्तम्भित बने पुरुषों में इन वनस्पति तथा जल के उपयोग से, मधुरपाक होने के कारण, स्नेह से, शीतलता से, भारीपन तथा चिकने-
पन से कफ का संचय हो जाता है। यह संचय वसन्त ऋतु में थोड़े आलसी बने शरीरवाले पुरुषों में-सूर्य की किरणों से पिघलकर (अन्न द्रव्य आदि) कफ जन्य रोगों को उत्पन्न करता है। और ये ही औषधियाँ एवं पानी ग्रीष्म ऋतु में सार रहित, निर्बल रुक्ष और बहुत अधिक हल्की हो जाती हैं। इन वनस्प-तियों के साथ पानी के सेवन से, सूर्य की गरमी से शुष्क शरीर-वाले पुरुषों में—रुक्ष (स्नेह के अभाव) लघु और विशदगुण के कारण वायु का संचय इस ऋतु में होता है। यह वायु-संचय प्रावृत् ऋतु में पानी के कारण भूमि के बहुत अधिक तर होने से; आर्द्र शरीरवाले पुरुषों में-शीतल-वायु-वर्षा के कारण वात-जन्य रोगों को उत्पन्न करता है। इस प्रकार वात आदि दोषों के संचय एवं प्रकोप के कारण कह दिये हैं ॥ ११ ॥
तत्र वर्षाहेमन्तग्रीष्मेषु संचितानां दोषाणां शरद्-व-सन्तप्रावृट्सु च प्रकृपितानां निर्हरणं कर्तव्यम् ॥ १२ ॥
वर्षा, हेमन्त और ग्रीष्म ऋतु में संचित वात आदि दोषों को, तथा शरद् वसन्त और प्रावृट् काल में कुपित पित्तादि दोषों को वमन आदि द्वारा निकालना चाहिये। यह निःसारण ऋतु के पिछले मास में करना चाहिये, यथा-पित्त का संशोधन मार्गशीर्ष में, कफ का निर्हरण-चैत्र में, वात का श्रावण मास में संशोधन करना चाहिये ॥ १२ ॥
तत्र पैंत्तिकानां व्याधीतामुपशमो हेमन्ते, श्लैष्मिकाणां निदाये, वातिकानां शरदि, स्वभावत एव, त एते संचय-प्रकोपोपशमा व्याख्याताः ॥ १३ ॥
उपशम कहते हैं—
कालस्वभाव के कारण ही पित्तजन्य रोगों की शान्ति हेमन्त में, कफजन्य रोगों की ग्रीष्म में और वातजन्य रोगों की शान्ति शरद् ऋतु में होती है। इस प्रकार से दोषों का संचय, प्रकोप और प्रशम कह दिये हैं ॥ १३ ॥
तत्र, पूर्वान्नि वसन्तस्य लिङ्गं, मध्याह्नि ग्रीष्मस्य, अप-राह्नि प्रावृषः, प्रदोषे वार्षिकं, शारदमर्धरात्रे, प्रत्युषसि हेमन्तमुपलक्षयेत्; एवमहोरात्रमपि वर्षमिव शीतोष्णव-र्षलक्षणं दोषोपचयप्रकोपोपशमैर्जीनीयात् ॥ १४ ॥
सांवत्सरिक विधि को दिन रात में कहते हैं—
दिन के पूर्वार्ध में वसन्त ऋतु के लक्षण (कफ प्रकोप) होते हैं मध्याह्न में ग्रीष्म के लक्षण (वात संचय), अपराह्न में प्रावृट् के (वात प्रकोप); प्रदोष-रात्रि के पूर्व भाग में वर्षा के (पित्त संचय), आधीरात में शरद् ऋतु के (पित्त प्रकोप), रात्रि के अन्तिम भाग में—उषःकाल में हेमन्त के (कफसंचय) लक्षण होते हैं। इस प्रकार से दिन रात में भी वर्ष भर की, शीत, उष्णिमा, और वर्षा (वर्षा हेमन्त ग्रीष्म ऋतु) की भाँति दोषों का संचय, प्रकोप एवं प्रशम होता है ॥ १४ ॥