सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
अ० ६ ]
सूत्रस्थानम्
२३
६ ऋतु माने गये हैं। कायचिकित्सा के चरक ग्रन्थ में प्रावृत् को न मानकर, उधर शिशिर ऋतु माना है। सू० अ० ६। अस्तु, परन्तु च० वि० अ० ८ सू० १२७ में संशोधन को ध्यान में रखकर शिशिर न मानकर प्रावृत् ऋतु मान लिया गया है। विचार-विधि भेद से यह सब समीचीन है ॥ १० ॥
तत्र, वर्षास्रवोषधयस्तृणयोऽल्पवीर्या आपश्चाप्राशन्ताः क्षितिमलप्राया, ता उपयुज्यमाना नभसि मेघावतते जल प्रकिलञ्चायां भूमौ किलञ्चदेहानां प्राणिनां शीतवातविष्ट-भ्रितागन्तीनां विदहन्ते, विदाहात् पित्तसंचयमापाद-यन्ति; स संचयः शरदि प्रविरलमेवे विद्यत्युपशुष्यति पङ्कैऽर्ककिरणप्रबिलायितः पैत्तिकान् व्याधीञ्जनयति। ता एवोषधयः कालपरिणामात् परिणतवीर्या बलवत्यो हेमन्ते भवन्त्यापश्च प्राशन्ताः स्निग्धा अत्यर्थं गुर्ण्यश्च, ता उप-युज्यमाना मन्दकिरणत्वाद्वाहानोः सतुषारपवनोपस्तम्भित-देहानां देहिनामविदग्धाः स्नेहाच्छैत्याद् गौरवादुपलेपाच्च श्लेष्मसंचयमापादयन्ति; स संचयो वसन्तेऽर्करश्मिप्रवि-लायित ईषस्तन्धदेहानां देहिनां श्लेष्मिकान् व्याधीञ्-जनयति। ता एवोषधयो निदाये निःसारा रुक्षा अतिमात्रं लक्ष्यो भवन्त्यापश्च, ता उपयुज्यमाना सूर्यप्रतापोपशोषित-देहानां देहिनां रौक्ष्याल्लघुत्वोच्च वायोः संचयमापाद-यन्ति; स संचयः प्रावृषि चतयर्थं जलोपकिलञ्चायां भूमौ किलञ्चदेहानां देहिनां शीतवातवर्षेरितो वातिकान् व्याधी-ञ्जनयति। एवमेव दोषाणां संचयप्रकोपहेतुरुक्तः ॥
इन ऋतुओं में वर्षा ऋतु के अन्दर वनस्पतियाँ तरुण--(सार रहित कमजोर) अल्पशक्ति हो जाती हैं। पानी भी अस्वच्छ हो जाता है; भूमि भी मल-मूत्र आदि से दूषित होती है। वनस्पतियाँ और जल आकाश के मेघों से व्याप्त होने तथा जल द्वारा भूमि के गीली होने से; शीत एवं वायु से मन्द की हुई अग्निवाले, तथा किलञ्च शरीरवाले प्राणियों में अम्लता को प्राप्त हो जाते हैं। अम्लपाक होने से शरीर में पित्त का संचय करते हैं। यह संचय ऋतु के शीत के कारण उस समय कुपित न होकर शरद् ऋतु में, आकाश में मेघों के साफ हो जाने से, भूमि के कीचड़ के सूखने से, सूर्य की किरणों से पिघलकर पित्तजन्य रोगों को उत्पन्न करता है। और यही औषधियाँ हेमन्त ऋतु में काल के परिपाक से शक्तिशाली परि-पक्व वीर्यवाली हो जाती हैं। और पानी भी निर्मल, स्निग्ध और अत्यन्त भारी हो जाते हैं। इस ऋतु में सूर्य की किरणों के मन्द होने से, वर्षा से मिली गीली वायु के कारण स्तम्भित बने पुरुषों में इन वनस्पति तथा जल के उपयोग से, मधुरपाक होने के कारण, स्नेह से, शीतलता से, भारीपन तथा चिकने-
पन से कफ का संचय हो जाता है। यह संचय वसन्त ऋतु में थोड़े आलसी बने शरीरवाले पुरुषों में-सूर्य की किरणों से पिघलकर (अन्न द्रव्य आदि) कफ जन्य रोगों को उत्पन्न करता है। और ये ही औषधियाँ एवं पानी ग्रीष्म ऋतु में सार रहित, निर्बल रुक्ष और बहुत अधिक हल्की हो जाती हैं। इन वनस्प-तियों के साथ पानी के सेवन से, सूर्य की गरमी से शुष्क शरीर-वाले पुरुषों में—रुक्ष (स्नेह के अभाव) लघु और विशदगुण के कारण वायु का संचय इस ऋतु में होता है। यह वायु-संचय प्रावृत् ऋतु में पानी के कारण भूमि के बहुत अधिक तर होने से; आर्द्र शरीरवाले पुरुषों में-शीतल-वायु-वर्षा के कारण वात-जन्य रोगों को उत्पन्न करता है। इस प्रकार वात आदि दोषों के संचय एवं प्रकोप के कारण कह दिये हैं ॥ ११ ॥
तत्र वर्षाहेमन्तग्रीष्मेषु संचितानां दोषाणां शरद्-व-सन्तप्रावृट्सु च प्रकृपितानां निर्हरणं कर्तव्यम् ॥ १२ ॥
वर्षा, हेमन्त और ग्रीष्म ऋतु में संचित वात आदि दोषों को, तथा शरद् वसन्त और प्रावृट् काल में कुपित पित्तादि दोषों को वमन आदि द्वारा निकालना चाहिये। यह निःसारण ऋतु के पिछले मास में करना चाहिये, यथा-पित्त का संशोधन मार्गशीर्ष में, कफ का निर्हरण-चैत्र में, वात का श्रावण मास में संशोधन करना चाहिये ॥ १२ ॥
तत्र पैंत्तिकानां व्याधीतामुपशमो हेमन्ते, श्लैष्मिकाणां निदाये, वातिकानां शरदि, स्वभावत एव, त एते संचय-प्रकोपोपशमा व्याख्याताः ॥ १३ ॥
उपशम कहते हैं—
कालस्वभाव के कारण ही पित्तजन्य रोगों की शान्ति हेमन्त में, कफजन्य रोगों की ग्रीष्म में और वातजन्य रोगों की शान्ति शरद् ऋतु में होती है। इस प्रकार से दोषों का संचय, प्रकोप और प्रशम कह दिये हैं ॥ १३ ॥
तत्र, पूर्वान्नि वसन्तस्य लिङ्गं, मध्याह्नि ग्रीष्मस्य, अप-राह्नि प्रावृषः, प्रदोषे वार्षिकं, शारदमर्धरात्रे, प्रत्युषसि हेमन्तमुपलक्षयेत्; एवमहोरात्रमपि वर्षमिव शीतोष्णव-र्षलक्षणं दोषोपचयप्रकोपोपशमैर्जीनीयात् ॥ १४ ॥
सांवत्सरिक विधि को दिन रात में कहते हैं—
दिन के पूर्वार्ध में वसन्त ऋतु के लक्षण (कफ प्रकोप) होते हैं मध्याह्न में ग्रीष्म के लक्षण (वात संचय), अपराह्न में प्रावृट् के (वात प्रकोप); प्रदोष-रात्रि के पूर्व भाग में वर्षा के (पित्त संचय), आधीरात में शरद् ऋतु के (पित्त प्रकोप), रात्रि के अन्तिम भाग में—उषःकाल में हेमन्त के (कफसंचय) लक्षण होते हैं। इस प्रकार से दिन रात में भी वर्ष भर की, शीत, उष्णिमा, और वर्षा (वर्षा हेमन्त ग्रीष्म ऋतु) की भाँति दोषों का संचय, प्रकोप एवं प्रशम होता है ॥ १४ ॥
२४
मुमुक्षुस्थानम्
[ ३० ]
तत्र, अद्यापन्नेषु ऋतुष्वन्यापन्ना ओषधयो भवन्त्याप्यत्र, ता उपयुज्यमानाः प्राणायुर्बलवीर्यौजस्कयो भवन्ति ॥ १५ ॥
अव्यापन्न—आदृषित ऋतुओं में गेहूँ-चने आदि वनस्पतियाँ तथा पानी निर्दोष होते हैं। इन वनस्पति तथा पानी के उपयोग से—अग्निसोमीय रूपी प्राण शरीर-इन्द्रिय-सत्त्व-आत्मा के संयोग रूपी आयु, उत्साह रूपी बल, शक्ति, सप्त धातुओं का स्नेह रूपी हृदयाश्रित ओज बढ़ता है ॥ १५ ॥
तेषां पुनर्न्यपदोऽष्टककारिता, शीतोष्णवातवर्षाणि खलु विपरीतान्योषधीन्यांपादयन्त्यप्यत्र ॥ १६ ॥
इन ऋतुओं में विपरीतता का कारण अधर्म है। शीत, उष्ण, वायु और वर्षा के विपरीत (हीन, मिथ्या, अतियोग) होने से ओषधियाँ एवं जल भी दूषित बन जाते हैं—अपने स्वाभाविक गुण-धर्म को छोड़ बैठते हैं। (सर्वेषामप्यग्निवेश यद् वैगुण्यमुत्पद्यते तस्य मूलमधर्मः। तन्मूलं वाऽसत्कर्म पूर्वकृतं, तयोः योनिः प्रज्ञापराध एव। चरक) ॥ १६ ॥
तासां सुपयोगाद्विषधरोगप्रादुर्भावो मरको वा भवेदिति ॥
इस प्रकार के दूषित अन्न-पान के सेवन से नाना प्रकार के रोग होते हैं अथवा-महामारी फैलती है१ ॥१७॥
तत्र, अद्यापन्तानां सोषधीनामपां चोपयोगः ॥ १८ ॥
इस अवस्था में (ऋतु के विपरीत होने पर) अधूषित वनस्पतियों का तथा पानी का उपयोग करना चाहिये। पुराना अन्न एवं अव्यापन्न पानी का उपयोग करना चाहिये। इस लिये कहा है—“तस्मात् प्रागुद्वर्षसात् प्राक् च भूमैः विरसीभावाद् उद्वरश्च भेषज्यानि”—इत्यादि ॥१८॥
कदाचिदव्यापन्नेष्वपि ऋतुषु कृत्याभिशापरक्षः क्रोधाधर्मरूपध्वस्यन्ते जनपदाः, विषोषधिपुष्पगन्धेन वा वायुनोपनोतेनाकन्यते यो देशस्तत्र दोषप्रकृत्यविशेषेण कासश्वासवमथुप्रतिशयाशिरोरुह्वरैरुपतप्यन्ते, ग्रहनक्षत्रचरितैर्वा, गृह्वाशयनासनयानवाहनमणिरत्नोपकरणगहि-तलक्षणनिमित्तप्रादुर्भावैर्वा ॥ १९ ॥
ऋतु व्यापत्ति के बिना भी कई बार (सदा नहीं) कृत्या (मन्त्रों द्वारा की हुई राक्षसी क्रिया), अभिचारी, अभिशाप (गुरु-सिद्ध आदि द्वारा दिया शाप) हिसक प्रवृत्तिवाले राक्षसों के क्रोध से, काय, वाणी एवं मन के अधर्म से जनपद नष्ट हो जाते हैं। विष युक्त औषधि, या विषैले फूल की गन्ध वायु द्वारा जिन देशों के समीप पहुँचती है, वहाँ पर दोष, प्रकृति की अभिन्नता से कास, श्वास, वमन, प्रतिशयाय, शिर-वेदना, ज्वर
१ देखिये विस्तार के लिये-चरक-वि-अ-३।
होते हैं। अथवा-आदित्य आदि ग्रहों के तथा अश्विनी आदि नक्षत्रों के गति विशेष से, या घर, भार्या, पलंग, आसन, यान, सवारी, मणि, रत्न आदि उपकरणों के निन्दित लक्षणों के होने से (अकस्मात् घर के गिरने से, बार बार कम्पन होने से) जनपद नष्ट होते हैं१। (तथाऽभिशापप्रभवस्याप्यधर्म एव हेतुर्भवति। ये लुप्तधर्माणिः धर्मादपेतास्ते गुरुहृद्वसिद्धिपूज्यानवसत्याहितानि आचरन्ति, ततस्ताः प्रजा गुर्वादिभिरभिशाता भस्मतामुपयान्ति, प्रागेवानेककुलविनाशाय, नित्यप्रत्ययोपलम्भाद् अनियताश्चापरे) ॥१९॥
तत्र स्थानपरित्यागशान्तिकर्मप्रायश्चित्तमङ्गलजपहो-सोपहारैरज्याञ्जलिनभस्कारतपोनियमदयादानदीक्षाभ्युपगमदेवताब्राह्मणगुरुपदैर्भवितन्यम, एवं साधु भवति ॥
सामान्यचिकित्सा—अधर्म के कारण ऋतु व्यापत्ति होने से दैव व्यपाश्रय औषध कहते हैं—स्थान का परित्याग, शान्तिकर्म, वेदोक्तमंत्रों से यजन, प्रायश्चित्त-तप, प्रशस्त मणि आदि मंगल वस्तु का धारण, जप, होम, उपहार, देवता बलि, इज्या (याग), अञ्जलि-भक्ति से हाथों को जोड़ना, नमस्कार-प्रणाम, तप, नियम-मौन, दया, दान, दीक्षा, अभ्युपगम गुरुवाक्य आदि को स्वीकार करना देवता-ब्राह्मण, गुरु की सेवा करनी चाहिये। इस प्रकार करने से कुशल होता है। (येषां न मृत्युसामान्यं सामान्यं न च कर्मणाम्। कर्म पंचविधं तेषां भेषजं परमुच्यते। हितं जनपदानां च शिवानामुपसेवनम् ॥ इत्यादि) ॥ २० ॥
अत ऊर्ध्वमन्यापन्तभूतूनां लक्षणान्युपदेक्ष्यामः ॥२१॥
वायुवार्त्त्युत्तरः शीतो रजोधूमाम्कुला दिशः।
छन्तस्तुषारैः सविता हिमान्द्रा जलाशयाः ॥२२॥
दपिता ध्वाङ्खुखड्गगृह्महिपोरभ्रकुञ्जराः।
रोद्रप्रियङ्कुपुनगाः पुषिता हिमसाहृये ॥२३॥
इसके आगे अव्यापन्न ऋतुओं के लक्षण कहते हैं।
हेमन्तऋतु में—उत्तर दिशा की वायु चलती है। दिशायैर्धूलि-धूम कोहरे से व्याप्त होती है। सूर्य तुषार से चिरा होता है, जलाशय-वर्ष से ढपे होते हैं। कौवे, गैंडा, मैसा, मेढ़ा एवं हाथी प्रसन्न रहते हैं। लोषप्रियगु—तथा पद्मकेशर खड्गखिलता है ॥ २१-२३ ॥
गिरिशिरे शीतमधिकं वातवृष्ट्याकुला दिशः।
शेषं हेमन्तवत् सर्वं विज्ञेयं लक्षणं वृष्टेः ॥ २४ ॥
शिशिरे ऋतु में शीत अधिक रहता है, दिशायैर्वात से मिश्रित वृष्टि से व्याप्त रहती है। शेष सब लक्षण विद्वानों की हेमन्त के समान समझना चाहिये ॥ २४ ॥
देखिये-महाभारत-शान्तिपर्व में—‘गोवत्सं बडवा सूते, स्वाशुगालं महीपते।’
अ० ६ ] ४
सूत्रस्थानम्
२५
सिद्धविद्याधरवधूचरणालक्तकाङ्क्षिते । मलये चन्दनलतापरिध्वज्जाधिवासिते ॥२५॥ वाति कामिजनानन्दजननोऽनङ्गदीपनः । दम्पत्योर्मानभिदुरो वसन्ते दक्षिणोऽनिलः ॥२६॥ दिशो वसन्ते विमलाः काननैरुपशोभिताः । किशुकाभ्योजबकुलचूताशोकादिपुष्पितैः ॥२७॥ कोकिलाषट्पदगणैरुपगीता मनोहराः ।
दक्षिणानिलसंवीताः सुमुखाः पल्लवोज्ज्वलाः ॥२८॥ वसन्त ऋतु में—सिद्ध एवं विद्याधरों की स्त्रियों के चरणों में लगे आलक से चिह्नित, चन्दनलता के आलिंगन से सुवासित; कामिजनों को आनन्द देनेवाली तथा कामवर्धक, दम्पतियों के मान को तोड़नेवाली मलयाचल की दक्षिण वायु बहती है। वसन्त में दिशायें निर्मल, जंगलों से शोभित, ढाक, कमल, बकुल, आम, अशोक आदि के फूलों से शोभित होती हैं। कोकिल-भ्रमर आदि के मनोहर गीतों से मिली शोभन अवकाशवाली तथा पल्लव-कोमल पत्तों से भुंगार की हुई और दक्षिण वायु बहती है ॥२५-२८॥
ग्रीष्मे तीक्ष्णांशुरादित्यो मारुतो नैऋतोऽसुखः । भूस्तप्ता सुरितस्तन्व्यो दिशः प्रवृत्तित्वा इव ॥२९॥ आन्तचक्राह्युगलाः पयःपानाकुला सुगाः । ध्वस्तवीरुत्तृणलता विपर्णाङ्कितपादपाः ॥३०॥
ग्रीष्मऋतु में—सूर्य की किरणें तीक्ष्ण रहती हैं। नैऋत की वायु बहती है, यह वायु सुखकारक नहीं होती। जमीन जलती रहती है, नदियों का प्रवाह मन्द पड़ जाता है, दिशायें मानों आग उगलती रहती हैं। घवराये चक्रवाक युगल पानी की फिकर में मंडराते रहते हैं। मृग पानी पीने के लिये व्यग्र होते हैं। वृक्ष, तृण, लतायें नष्ट होती हैं—जमीन पर गिर जाती हैं। वृक्षपत्तों-रहित रुण्ड-मुण्ड हो जाते हैं ॥२९,३०॥
प्रावृष्यम्बरमानन्दं पश्चिमानिलकपितैः । अम्बुदैविद्युदुद्योतप्रस्तुतेस्तुम्लस्वनेः ॥३१॥ कोमलश्यामशष्पाख्या शक्रगोपोज्ज्वला सही । कदम्बनीपकुटजसजंकेतकिभूषिता ॥३२॥
प्रावृद्ध ऋतु—पश्चिम दिशा की वायु (मोनसून) से लाये हुए बादलों से आकाश प्रावृद्ध ऋतु में घिरा रहता है। बिजली की चमक के साथ वरसनेवाले प्रचंड गर्जनोंवाले बादल घिरे रहते हैं। भूमि कोमल-श्याम दूब से भरी रहती है। भूमि पर वीरवृहटियाँ फैली रहती हैं। कदम्ब, नीम, कुटज, राल, केतकी से भूमि अलंकृत रहती है। जैसा कि रामायण में कहा है—‘बालेन्दुगोपान्तरचित्तिनेन विभाति भूमिर्नवशादलेन’ ॥
तत्र वर्षासु नद्योऽम्भश्छन्नोत्खाततटदृमाः । वाप्यः प्रोत्फुल्लकुमुदनीलोत्पलविराजिताः ॥३३॥
भूरण्यक्तस्थलद्वयभा बहुसस्योपशोभिता । नातिभर्जस्तवन्मेघनिरुद्धार्कग्रहं नभः ॥३४॥ वर्षाऋतु—वर्षाऋतु में नदियाँ पानी से भरी रहती हैं, जिससे कि किनारे के वृक्ष टूटते हैं। बावडियों में कुमुदिनी और नीले कमल खिल रहे होते हैं। भूमि पर गडदे और जमीन में भेद नजर नहीं पड़ता, शस्यश्यामला भूमि होती है। बहुत गर्जना न करनेवाले बादलों से नभ और सूर्य तथा तारे छिपे रहते हैं ॥३३,३४॥
बधुरुणः शरद्यर्कः श्वेताश्रविसमलं नभः । तथा सरांस्यम्बुरुहेर्भान्ति हंसांसघट्टितैः ॥३५॥ पङ्कशुष्कदुमाकीर्णा निम्नोन्नतसमेपु भूः । बाणसप्ताह्वबन्धूकशासनविराजिता ॥३६॥ शरद ऋतु—शरद ऋतु में सूर्य कपिल-पिंगल एवं उष्ण होता है। आकाश श्वेत बादलों से व्याप्त एवं विमल होता है। हंसों के द्वारा आलोडित कमलों से तलाब सुशोभित होते हैं। नीचे ऊँचे स्थानों में भूमि समान हो जाती है कीचड़ शुष्क हो जाता है तथा—चिउँटी आदि से व्याप्त होती है। बाण (झिंटी), सप्तर्ण, दुपहरिया, काश, असन से भूमि शोभित होती है। (बाण का अर्थ—कुण्ट किया है)।
वि० मन्तव्य—पङ्कशुष्कदुमाकीर्णा निम्नोन्नतसमेपु भूः—का अर्थ है कि शरद ऋतु में—भूमि-निम्न भागों में पङ्क (कीचड़) से आकीर्ण (व्याप्त) रहती है, उन्नत भागों में सूखी रहती है और समतल भागों में दुमों (गोदों) से व्याप्त रहती है ॥३५,३६॥
स्वगुणैरित्युक्तेषु विपरीतेषु वा पुनः । विषमेष्वपि वा दोषाः कुप्यन्त्यतुषु देहिनाम् ॥३७॥ उपसंहार—ऋतुओं के जो स्वाभाविक गुण हैं, उन गुणों में अत्यधिकता होने से, अथवा स्वाभाविक गुणों में विपरीत गुण आने से (वर्षाऋतु में वर्षा न होने से), या ऋतुओं के स्वाभाविक गुणों में विषमता (शीत में गरमी, गरमी में शीत) होने से (इस प्रकार से १८ प्रकार की ऋतु-व्यापत्तियाँ हैं) प्राणियों के वात आदि दोष कुपित होते हैं। (कालार्थ-कर्मणां योगो हीनमिथ्यातिमात्रकाः) ॥३७॥
हरेद् वसन्ते श्लेष्माणं पित्रं शरदि निर्हरेत् । वर्षासु शमयेद् वायुं प्राणिकारसमुच्छयात् ॥३८॥ रोगोत्पत्ति से पूर्व ही दोषों का शमन करना चाहिये। यथा—वसन्त ऋतु में कफ का, शरद ऋतु में पित्त का, वर्षाऋतु में वायु का शमन करना चाहिये। जिस ऋतु में जो दोष कुपित होता है, उसकी उसी में शान्ति करनी चाहिये। चरक में कहा है—
हैमन्तिकं दोषचयं वसन्ते प्रवाह्यन् ग्रेष्मिकमभ्रकाले ।
२६
सुश्रुतसंहिता
[ २०७ ]
घनात्यये वार्षिकमाशु सम्यक्
प्राप्नोति रोगान् श्रुतुजात्र जातु ॥
वि० मन्तव्य—वसन्त श्रुतु में कफ को (वमन द्वारा) और शरद् श्रुतु में पित्त को (विरेचन द्वारा) निकालना चाहिये और वर्षा में वात को शान्त करना चाहिये, परन्तु यह सब कार्य—रोगोत्पत्ति के पूर्व ही कर डालना या करना चाहिये अर्थात् स्वस्थ भी उक्त श्रुतुओं में वमन, विरेचन तथा वात शमनोपाय करता रहे, इससे लाभ यह होता है कि उसको श्रुतु जनित विकार कभी नहीं होते। शोधन द्वारा दोषों का सख्ख निकल जाता है, फलतः प्रकोप का अवसर ही नहीं आता।
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने श्रुतुचर्या
नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
—:o:—
सप्तमोऽध्यायः
अथातो यन्त्रविधिमध्येयार्थं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे शल्यों को निकालने के साधनों को बताने के लिये 'यंत्रविधि' नामक अध्याय को कहते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥
यन्त्रशतमेकोत्तरम; अग्र हस्तमेव प्रधानतमं यन्त्राणामवगच्छ, ( कि कारणं ? यस्माद्भ्रष्टाहते यन्त्राणामप्रवृत्तिरेव ) तदधीतत्वाद्यन्त्रकर्मणाम् ॥३॥
यन्त्रों की संख्या साधारणतः एक सौ एक है, (वैसे असंख्य हैं१))। इन सब यंत्रों में सब से प्रधान यंत्र हाथ को ही समझना चाहिये। क्योंकि—हाथ के बिना यंत्रों का चलना असम्भव है। सब यंत्र-कर्म इसी हाथ के आधीन हैं—
वि० मन्तव्य—यन्त्र-नियन्त्रण या पकड़ने के साधनों—उपकरणों का नाम है। इन से पकड़कर कण्टक एवं दन्त आदि तथा मृतयार्म कभी २ जीवित गर्भ आदि २ भी निकाले जाते हैं। इन से शल्य को हिलाने-डुलाने या शिथिलमूल करने का काम भी लिया जाता है। गुद, भग तथा मुख आदि को चौड़ा करके (तान करके) भीतर देखने का, औषध लगाने का तथा शस्त्र कर्म करने का काम भी लिया जाता है। मूत्राशय एवं जलोदर आदि में लमाकर सावण का तथा आचूषण का भी काम लिया जाता है ॥३॥
तत्र, मनःशरीरावाधकराणि शल्यानि, तेषामाहरणोपायो यन्त्राणि ॥४॥
१ वामभट्ट में यन्त्रों की संख्या असंख्य मानी है। यथा—“अतः कर्मवाश्लेषामियताऽवधारणमशक्यम्” वा० ग० सू० स्था० अ० २५।
शल्यविनिश्चय में—मन एवं शरीर को पीड़ित करनेवाली वस्तु को 'शल्य' कहते हैं। इस शल्य को निकालनेवाले साधनों को 'यंत्र' कहते हैं ॥४॥
तानि षट्प्रकाराणि तद्यथा—स्वस्तिकयन्त्राणि, संदंशयन्त्राणि, तालयन्त्राणि, नाड़ीयन्त्राणि, शलाकार्यन्त्राणि उपयन्त्राणि, चैति ॥५॥
यंत्रों के भेद—
ये यंत्र आकृति भेद से छै प्रकार के हैं। यथा—स्वस्तिक यंत्र, संदंशयंत्र, तालयंत्र, नाड़ीयंत्र, शलाकार्यत्र और उपयंत्र१ ॥५॥
तत्र चतुर्विंशतिः स्वस्तिकयन्त्राणि, द्वे संदंशयन्त्रे, द्वे एव तालयन्त्रे, विंशतिर्नाड्यः, अष्टाविंशतिः शलाकाः, पञ्चविंशतिरुपयन्त्राणि ॥६॥
इनमें स्वस्तिकयंत्र—२४, संदंशयंत्र—२ तालयंत्र—२, नाड़ीयंत्र—२०, शलाकार्यत्र—२८, उपयंत्र—२५—इस प्रकार से १०१ यंत्र हैं ॥६॥
तानि प्रायशो लोहानि भवन्ति, तत्प्रतिरूपकाणि वा तदलाभे ॥७॥
ये यंत्र प्रधानतः लोहे के (स्वर्ण-रजत, ताम्र-वंग लोहा) होते हैं। लोहादि के अभाव में दांत बांस आदि लोहे के समान दृढ़ वस्तुओं से बनाये जाते हैं ॥७॥
तत्र, नानाप्रकाराणां व्याख्यानं मृगपक्षिणां मुखैर्मुखानि यन्त्राणां प्रायशः सहशानि, तस्मात्तत्सारुप्यादागमादुपदेशादन्ययन्त्रदर्शनाद्युक्तिश्च कारयेत् ॥८॥
यंत्रों की बनावट—
यंत्रों के मुख प्रायः भिन्न २ हिंसक पशुओं के तथा पक्षियों के मुख के सहज होते हैं। इस लिये हिंसक पशु-पक्षियों के मुख के समान, शास्त्र उपदेश से, विदितवेदितव्य वैद्यों के आदेश से, युक्ति से तथा प्रयोजन वश से यन्त्रों की रचना करनी चाहिये ॥८॥
समाहितानि यन्त्राणि खरश्लदण्मुखानि च।
सुदृढानि सुरुपाणि सुप्रहाणि च कारयेत् ॥९॥
उपसंहार—
उचित (न अधिक और न कम) परिभाषा के बने, खर चिकने मुखवाले, दृढ़, देखने में सुन्दर, पकड़ने में सरल बनावटवाले यन्त्र बनाने चाहिये ॥९॥
तत्र स्वस्तिकयन्त्राणि—अष्टादशाङ्गुलप्रमाणानि सिंहन्याग्रवृत्तरद्व्युच्छेदोपिमाजारश्मगालमुगैर्वास्ककाकंकङ्कुररचापमासशशवात्युलूकचिल्लियेनगुध्रकौञ्चभृङ्गराजाञ्जलिकर्णोवभञ्जननन्दीमुखमुखानि, मसूराकृतिभिः
१ विस्तार के लिये—लेखक का 'शल्ययन्त्र' देखिये।
७०७ ]
सूत्रस्थानम्
२७
कौलेरवबद्धानि, मूलेऽकुशवदावृत्तचारुज्जाणि, अस्थिविदग्ध- ग्रत्योद्धारणार्थमुपदिश्यन्ते ॥१०॥
स्वस्तिक यन्त्रों का प्रमाण एवं आकार—
स्वस्तिक यन्त्रों का प्रमाण १८ अंगुल होता है। इनके मुख सिंह, मेडिया, व्याघ्र (चीता) तरलु, मालु, चीता, बिल्ली, गीदड़, हिरण, एर्वाह (हरिणभेद)—इन हिंसक पशुओं के मुख के समान तथा—कौवे, कंक (दीर्घ चोंच का), कुरर, चाप, भास, शशघाति (शशारि), उल्लु, चिल्ली (चील), श्येन, गीष, कौंच, भुङ्गराज—फिगा, अङ्गुलिर्ण अवभञ्जन, नन्दी-मुख—इन पक्षियों के मुख के समान मुखवाले, सिर पर मसूर के समान फलदार कील से जुड़े, जड़ में अंकुश के समान घिरे हुए पकड़ने के स्थानवाले, अस्थि में घुसे शल्य को निकालने के लिये काम में आते हैं।
वि० मन्तव्य—इन पशु-पक्षियों को हिंस ही मानना आवश्यक नहीं है, केवल मुख साहस्य के लिये कुछ पशु-पक्षियों का नामोल्लेख कर दिया गया है, अवभञ्जन पक्षी को पञ्चाव में “ठोक ठेया” तथा उत्तर प्रदेश में ‘लोहार’ कहते हैं, यह वृक्ष के टहनों में अपनी चोंच से बिल बना लेता है। स्वस्तिक यन्त्र—स्वस्तिक (x) के सदृश होते हैं। इसके २ खण्ड होते हैं और दोनों को मुख-भाग से थोड़ा ऊपर कील से जोड़ा रहता है, परन्तु वह कील दोनों खण्डों के छिद्रों में डीला रहता है कसा नहीं, ताकि यन्त्र में गति हो सके, कील के दोनों छोर मसूर के समान फूलदार हों, जिससे दोनों खण्ड अलग न हों। वारङ्ग—मूठ का या उस भाग का नाम है, जहाँ पर यन्त्र को हाथ से पकड़ा जाता है, मुख उस भाग का नाम है जिससे शल्य पकड़ा जाता है। इसके उदाहरण हैं दन्त निकालने का जमूर तथा गर्म लोहा पकड़ने की लोहारों की सानी या सन्नी। वाग्भट के शब्दों में—कण्ठे मसुराकार-पर्यन्तैः कीलकैः बद्धानि, मूले अंकुशवत् नतानि स्वस्तिकयन्त्राणि विद्यात्। वा० सू० अ० २५ ॥१०॥
सनिग्रहोऽनिग्रहश्च संदर्शो बोडयाङ्गुलौ भवतः, त्वङ्गमांससिरास्नानुगतशल्योद्धारणार्थमुपदिश्येते ॥११॥
संदर्शयन्त्र—दो प्रकार के हैं। यथा—सनिग्रह (सनिबन्ध-संज्ञायी) और अनिग्रह (अनिबन्ध चिमटा) इनकी लम्बाई १६ अंगुल होती है। ये त्वचा, मांस, सिरा, स्नायु में लगे हुए शल्य को निकालने में काम आते हैं।
वि० मन्तव्य—संदर्श—चिमटा या चिमटी का नाम है, इस पर एक छल्ला चढ़ाया रहता है उसका नाम है “निग्रह”। जिस पर छल्ला चढ़ा होता है वह “सनिग्रह” कहलाता है। यह छल्ला के दबाव से ही शल्य को पकड़े रहता है, हाथ का दबाव डालने की आवश्यकता नहीं होती और जिस पर छल्ला नहीं रहता वह “अनिग्रह” संदर्श कहलाता है, इस पर हाथ
का दबाव देकर शल्य पकड़ा जा सकता है। इसमें हाथ का दूना बल लगता है दवाने और खींचने में। इसके छोटे रूप का नाम “मुमुण्डी” है और छल्ला का नाम रुचक है। क्योंकि रुचक का नाम “कटक” है और कटक का नाम वलय है (भेदनीकोश)। सर्वसाधारण की बोली में मुमुण्डी संदर्श को “नचकुण्डी” (पञ्जाब) तथा मुमुण्डी-मुचकुंडी कहते हैं। यह काँटा निकालने के लिये घर २ रखी जाती है। इसका लक्षण—षडङ्गुलोऽन्यो हरणे सूक्ष्मशल्योपपद्मणाम्। मुचण्डी सूक्ष्मदन्ता ऋजुः मूले पचकभूषणा। गम्भीरव्रणमांसा नामर्मणः शेषितस्य च। वा० सू० अ० २५। अर्थात् उक्त दो बड़े (१६-१६ अङ्गुल के) सन्दर्शों के अतिरिक्त एक अन्य ६ अंगुल का संदर्श होता है जिसका नाम “मुमुण्डी” है। इसके दन्त सूक्ष्म (बारीक) तीखे (नोकदार) नहीं होते हैं, यह आकारतः सीधी होती है, रुचक का भूषण होता है यह सूक्ष्म शल्य, उपपद्म (परवाल), गम्भीर व्रण के दूषित मांस तथा अर्म को निकालने के काम आती है। इसे “मोचना” भी कहते हैं ॥११॥
तालयन्त्रे—द्व्वादशंगुले मत्स्यतालव्यदेकतालद्वितालके, कर्णनासानाडीशल्यानामाहरणार्थम् ॥१२॥
तालयन्त्र भी दो प्रकार के हैं। इनकी लम्बाई १२ अंगुल होती है। इनका मुख मछली के ताल के समान पतला होता है। कइयों में एक प्रदेश होता है, और कइयों में दो प्रदेश होते हैं। इनका उपयोग कान, नासा एवं नाड़ी शल्यों के निकालने में होता है। आंगल भाषा में इनको स्कूप (SCOOP) कहते हैं।
वि० मन्तव्य—ताल यन्त्र—चम्मच के आकार के होते हैं। इनसे कान की मैल निकालने आदि का काम लिया जाता है ॥
नाडीयन्त्राणि—अनेकप्रकाराणि, अनेकप्रयोजनानि, एकतोमुखान्युभयतोमुखानि च, तानि क्षोतोगतशल्योद्धारणार्थं, रोगदर्शनार्थम्, आचूषणार्थं क्रियासौकर्यार्थं चेति तानि क्षोतोद्धारपरिणाहानि, यथायोगदीर्घाणि च। तत्र भगन्दराशोव्रणबस्त्युत्तरबस्तिमूत्रवृद्धिकोदरधूमनिरुद्धप्रकससन्निरुद्धगुदयन्त्रणयलावुशुङ्गयन्त्राणां चोपारध्वाद्वत्त्यामः ॥१३॥
नाडीयन्त्र—भी अनेक प्रकार के तथा अनेक प्रयोजन के लिये बनते हैं। इनमें कुछ यंत्रों में मुख एक ओर होता है, और कुछों में दोनों ओर होता है। इनका उपयोग—कण्ठ आदि खोलों में फँसे शल्य को निकालने के लिये, भगन्दर आदि रोग को देखने के लिये, रक्त आदि चूषण के लिये, अर्श आदि में क्रिया को सुगमता के लिये व्यवहार होता है। इसकी मोटाई क्षोतोद्धार के समान होती है और इनकी लम्बाई आवश्यकतानुसार होती है।
२८
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ७ ]
नाड़ीयंत्र—भगन्दर, अर्श, व्रणयंत्र१, बस्ति, उत्तरबस्ति, मूत्रवृद्धि, दकोदर, धूमनेत्र निरुद्धप्रकश, सन्निरुद्धगुद, अलाबु यंत्र२ हैं। इनको विस्तार से आगे कहेंगे३।
वि० मन्तव्य—नाड़ी यन्त्र-सुषिर अर्थात् खोलले होते हैं नाली या नलिका के आकार के ॥१३॥
शलाकायन्त्राण्यपि नानाप्रकाराणि, नानाप्रयोजनानि, यथायोगपरिणाहदोषाणि च, तेषां गण्डूपदसर्पफणशरपुच्छबडिशमुखे द्वे द्वे, एषण्यूहूनचालनाहरणार्थमुपदिश्येते, मसूरदलमात्रमुखे किंचिदानताग्रे खोतोमतरल्योद्धारणार्थं, षट् कार्पासकृतोष्णीषाणि प्रमाज्जनक्रियासु, त्रीणि दव्याकृतौनि खल्लमुखानि, क्षारोषधप्रणिधानार्थं त्रीण्यन्यानि जाम्बवदनानि, त्रीण्यङ्कुशवदनानि, षडेवानिकर्मसंस्वभिप्रेतानि, नासाबुंदहरणार्थमेकं कोलास्थिदलमात्रमुखं खल्लतीक्ष्णौष्ठं, अञ्जनार्थमेकं कलायपरिमण्डलमुभयतो तुकुलाम्, मूत्रमार्गविगोधनार्थमेकं माल्तीपुष्पवृन्ताग्रप्रमाणपरिमण्डलमिति ॥१४॥
शलाका यंत्र भी नाना प्रकार के होते हैं। इनके प्रयोजन भी नाना प्रकार के हैं, इनकी लम्बाई और मोटाई प्रयोजन के यथायोग्य होती है। इन शलाका यंत्रों में—गण्डूपद, सर्पफण, शरपुंख और बडिशमुख—दो दो, (सुगल से ही कार्य होता है) इनका कार्य एषण टुँढने के लिये (गम्भीरपाक में पूय आदि टुँढने के लिये), व्युहन्—ऊपर को उठाकर बाहर निकालना, चाल्न करने के लिये, आहरण—खीचकर बाहर निकालने के लिये, दो शलाका यंत्र—विदलित मसूर के समान, आगे से कुछ मुड़े (एक आठ अंगुल और दूसरा ६ अंगुल), इनका उपयोग खोतों में फँसे शल्य को निकालने में है। छै शलाकायें—जिनके खिरे पर रूई लिपटी रहती है, इनका उपयोग
१ व्रणयन्त्र—“नाड़ीवृणप्रशालनाम्यञ्जनयन्त्रे पडंगुले बस्ति-यन्त्राकारे मुखतोऽकर्णिके—मलमुखयोर्गुण्डप्रकलायप्रवेशखोतसी मूले निवदमुर्दुर्गणिः” ॥ वृ० वाग्भट्ट ७॥
२ दो भगन्दर यन्त्र, दो अर्श यन्त्र, वृणयन्त्र एक, बस्तिनेत्र-चार प्रकार, उत्तर बस्तिनेत्र दो—मूत्र वृद्धि १, दकोदर १, धूमनेत्र ३, निरुद्धप्रकश १, सन्निरुद्धगुद १, अलाबु यन्त्र १, इस प्रकार से वीस हैं।
३ वृद्ध वाग्भट ने नाड़ी यन्त्र अधिक कहे हैं। यथा—‘कण्ठशल्यदर्शनार्थं नाड़ीदशाङ्गुलायतां पञ्चाङ्गुलपरिणाहाम्। द्विकण्ठस्य तु वारङ्गस्य संप्रहार्यं द्विच्छिद्रमुखाम्। शल्यनियतिनी तु पद्मकर्णिकाकारस्त्रीर्पा द्वादशांगुला श्यंगुलसुषिरा। तथाऽङ्गुलित्राणकं। योनिव्रणदर्शने यंत्रम्—Vagihalspecilum।
आजकल ब्रेस्ट पम्प (Breast-Pump) एक यन्त्र और है—जो कि स्तनों से दूध निकालने के कार्य में आता है।
प्रमाज्जन क्रिया में होता है। तीन शलाका यन्त्र—कड़छी के मुख के समान, नीचे की ओर मुख किये, इनका उपयोग क्षार औषध लगाने में होता है। अन्य तीन यन्त्र—जामुन के समान मुखवाले, तीन अंकुश के समान मुखवाले होते हैं। ये छै शलाकायन्त्र अग्नि कर्म—जलाने के कार्य में आते हैं। नासा के अर्बुद को निकालने के लिये एक—बेर की आधी गुठली के समान मुखवाली बीच से गहरी और किनारों पर तेज, एक शलाका यन्त्र—मटर के बराबर मोटी और दोनों खिरो पर मुकुलाकार, एक शलाका मूत्र मार्ग के संशोधन के लिये—माल्ती पुष्प के वृन्त के अग्रभाग के समान मोटी होती है१।
वि० मन्तव्य—अञ्जनार्थमेकं““मुकुलाग्रम्—यह नेत्र में अञ्जन लगाने की सलाई है पञ्चाय में इसे “सुरमचू” कहते हैं। शलाका ठोस होती है, उनके मुख के आकार लम्बाई, मोटाई तथा कार्य भिन्न रहते हैं।
गण्डूपद—केतुवा के सहस्र गोल, लम्बी तथा लचकीली, यथा—रवड की बत्ती जो मूत्रमार्ग आदि में जाती है।
सर्पफण मुखी—जिसका अग्रभाग सर्प के मुख के सहस्र नोकिला तथा फणा के सहस्र चौड़ा हो, मन्त, फन फैलाए सर्प को देखिये।
शरपुंख मुखी शलाका—जिनके अग्रभाग पर शर-बाण के समान पुंख (फर) हों, ऐसे बाण भी होते हैं जो पुंखोंवाले होते हैं। बाण जब वेग से जाकर शरीर में धँसता है तब ये पुंख भीतर फेल जाते हैं और निकलते समय बड़ा ब्रण करके निकलते हैं। अस्तु, यह पुंखोंवाली शलाका शल्य को हिलाने-चलाने में प्रयुक्त होती है।
बडिशमुखी शलाका—वह मछली पकड़ने के कांठा के सहस्र होती है और गर्भशल्य के आहरण में काम आती है, अपत्य पथ से भीतर गर्भाशय में डालकर गर्भ के हनु आदि में फँसाकर खींच ली जाती है इसे वाग्भट में “गर्भशंकु” कहा है, यथा—आहोयं बडिशक्रुतिः। नतोऽग्रे शङ्कुना तुष्यो गर्भशङ्कुरिति स्मृतः। वा० सू० अ० २५ ॥२४॥
उपयन्त्राण्यपि—रञ्जुवेणिकापट्टचर्मोन्तर्वल्लकलता-वच्छाष्ठीलाश्रममुद्गरपाणिपादतलाङ्गुलिजिह्वादन्तनख-मुखवालाश्रवकटकशाखाष्ठीवनप्रवाहणहर्पायस्कान्तमया-नि क्षारानिभेषजानि चेति ॥१५॥
उपयन्त्र—रस्सी, वेणिका (तीन लड़ी वेणी), पट्ट (दूत की बनी पट्टी), चर्म (चमड़ा), अन्तर्वल्लक टाँके, गूल आदि की छाल लता (बेल), वस्त्र (कर्पट), अष्टीलाश्रम (गोल-
१ वाग्भट्ट में कर्णशोधन और गर्भशंकु, ये दो शलाका यन्त्र अधिक हैं। यन्त्रों के लिये वाग्भट्ट एवं लेखक का शल्यतंत्र देखिये।
अ० ८ ]
सूत्रस्थानम्
२९
बड़ा परथर), मुद्गर, पाँव का तलुवा- हाथ का तेलुवा, अंगुलि, जिह्वा, दांत, नख, मुख, बाल, घोड़े की काठी शाखा, छीवन—कफ आदि, प्रवाहण-वमन-विसेचन-अश्रु निकालने के लिये, हर्ष तुष्टि के लिये, अयस्कान्त (पापाण विशेष-आकर्षक, द्रावक, सुम्रक, भ्रामक भेद से), और क्षार, अग्नि, एवं औषधियाँ उपयन्त्र हैं। अष्टीलाश्रम—से अष्टीलालोहे का घन या अन्य ऐसी वस्तु और अश्रम से परथर दो वस्तुयें हैं।
वि० मन्तव्य—उपयन्त्र अर्थात् यन्त्रण आदि में उपयोगी उपकरण। चर्म-चमड़ा की अनेक प्रकार की पट्टियाँ, वद्वियाँ यथा अन्त्रवृद्धि में बाँधने की पेट्टी आदि। अन्तर्वलकल-बुछों की कोमल, लम्बी वे छालें जो बन्धन के योग्य हों। जिह्वा-जीम-दन्तों में लगे धँसे पदार्थ को हिला २ कर निकाल देती है। दन्त से पकड़कर शल्य निकाला जा सकता है और नखों से भी। मुख से चूसकर दुग्ध, विष तथा रक्त निकाला जाता है। एतदर्थ रवङ्ग के गेन्द सा आचूक यन्त्र भी होता है। लाल—केशों की गुही बना उससे कण्ठ वात शल्य को फँसाकर निकालने का विधान है। कूची आदि बनाकर घोने, साफ करने आदि के उपकरण बनाये जाते हैं। अश्वकटक—के लिये देखिये अ० २७ का पञ्चाङ्गयाँ...उद्दरति सू० १४। झाखा का वर्णन भी वही देखिये। छीवन—थूककर या खाँसकर कफ निकाला जाता है। प्रवाहण—काँखकर, बल लगाकर पुरीष एवं मूत्र निकाला जाता है और गर्भ को निकालने में गर्भिणी प्रवाहण करती है, उससे एतदर्थ कहा जाता है कि—प्रवाहस्व सुभगे। हर्ष या हर्षण—इसके द्वारा मन-आवाधकर शोक-शल्य निकाला जाता है। शेष देखिये इसी स्थान का अध्याय २७ और सम्पूर्ण सुश्रुत ॥१५॥
एतानि देहे सर्वस्मिन् देहस्यावयवे तथा । संधौ कोष्ठे धमन्यां च यथायोगं प्रयोजयेत् ॥१६॥
इन यन्त्रों का उपयोग देह के सम्पूर्ण अवयवों में, संधि में कोष्ठ को धमनी में यथास्थान उचित रीति से उपयोग करना चाहिये ॥१६॥
यन्त्रकर्मणि तु—निर्घातनपूर्णबन्धनव्यह्वनवर्तन-चालनविवर्तनविवरणपीडनमार्गविशोधनविकर्षणाहरणा-बुछनोन्नमनविनमनभञ्जनोन्मथनाचूषणेषणदारणजूरकरणप्रक्षालनप्रधमनप्रमार्जनानि चतुर्विंशतिः ॥१७॥
यन्त्रों के कर्म—चौबीस प्रकार के हैं। यथा—निर्घातन (इधर-उधर चलाकर निकालना), पूर्ण (बस्ति-नेत्र आदि को तैल से भरना), बन्धन (रज्जु आदि से बाँधना), व्यह्वन (ऊपर को उठाकर काटकर शेष भाग को निकालना), वर्चन (गोल करना), चालन (एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले चलना),
विवर्चन (पराङ्मुख हुई अस्थि आदि का अपवर्चन), विवरण (अंगुलि आदि से दबाकर शल्य को बाहर करना), पीडन (अंगुलि आदि से मलना-दबाना), मार्ग विशेषन (उत्तर बस्ति से मूत्रमार्ग का शोधन), विकर्षण (पकड़कर बाहर निकालना), आहरण (अन्दर स्थित शल्य का बाहर लाना), आच्छन (आय-मन-ऊपर उठाना), उन्नमन (ऊपर करना), विनमन (नीचे करना), भञ्जन (तोड़ना), उन्मथन (मथना-बिलोड़ना), आचूषण (चूसना), ऐषण (हूँदना), दारण (दो करना-फाड़ना), क्रूरकरण (सीधा कराना), प्रक्षालन (घोना), प्रधमन (नासिका आदि में फूलकार से औषध भरना), प्रमार्जन (बल्ल आदि से साफ करना), ये चौबीस कार्य यन्त्रों के हैं।
वि० मन्तव्य—उपयन्त्रों के कर्मों—कार्यों पर ध्यान देने से उपयन्त्रों के आकार-प्रकार तथा उनके उपयोग का पर्याप्त ज्ञान हो सकता है। हमारा विश्वास है कि इन से अधिक न यन्त्र हो सकते हैं और न यन्त्र कर्म ही हो सकते हैं। तथापि—सूत्र १८ देखिये ॥१७॥
स्वबुद्ध्या चापि विभजेद्यन्त्रकर्मणि बुद्धिमान् ।
असंख्येयविकल्पस्वाच्छल्यानामिति निश्चयः ॥१८॥
उपसंहार—शल्यों के असंख्य भेद होने के कारण बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपनी बुद्धि से ही यन्त्र कर्मों का विभाग कर ले। जिस प्रकार बने उस प्रकार से शल्य बाहर निकालना चाहिये ॥१८॥
तत्र अतिस्थूलम्, असारम्, अतिदोर्घम्, अतिह-स्वम्, अग्राहि, विषमग्राहि, वक्रं, शिथिलम्, अत्युन्नतम्, मृदुकीलं, मृदुमुखं, मृदुपाशम् इति द्वादश यन्त्रदोषाः ॥
यन्त्र दोषों को कहते हैं—अतिस्थूल (बहुत मोटा), असार (अशुद्ध लोहादिसे बने), बहुत लम्बा और बहुत छोटा, अग्राही (विकृत मुख), विषमग्राही (एक देश पकड़े और दूसरा न पकड़े), वक्र (टेढ़ा), शिथिल (दबाव न आये), अत्युन्नत (कील आदि उठी हो), मृदुकील (संधि बन्धन ठीला हो), मृदुमुखं (शल्य पीडन के दबाव को न सह सके), मृदुपाश (तनु पाश)—ये बारह यन्त्र के दोष हैं।
वि० मन्तव्य—असारका अर्थ है साररहित, दुर्बल जो कार्य करते समय टूट सकता हो जिसके टूटने का भय हो। यथा—कमजोर रस्सी या पट्टी और संदंश, शलाका आदि भी वैसे जो टूट जायें। मृदुपाश—ढोले रुचक (छल्लेवाला) देखो मुछण्डी का वर्णन ॥१९॥
एतैर्दोषैर्विनिर्मुक्तं यन्त्रमष्टादशङ्कुलम् । प्रशस्तं भिषजा ज्ञेयं तद्धि कर्मसु योजयेत् ॥२०॥
१०
मुश्रुतसंहिता
[ अ० ८ ]
इन उपयुक्त १२ दोषों से रहित १८ अंगुल लम्बा यन्त्र वैद्य को प्रशस्त समझना चाहिये। इसी प्रकार के यन्त्र को शल्य-कर्म में बरतना चाहिए ॥२०॥
हरयं सिंहमुखवाघैस्तु गृहं कङ्कमुखदिभिः। निर्हरेत शनैः शल्यं शाखयुक्तिः श्यपेक्षया ॥२१॥
हरय शल्यको सिंहमुख आदि यन्त्रों से निकालना चाहिये, और जो शल्य छिपा हो—आँख से दिखाई न दे उसको कंक-मुख आदि से निकालना चाहिए। शस्त्र एवं युक्ति की अपेक्षा से शल्य को धीरे से बाहर करना चाहिए ॥२१॥
नि (वि) वर्तते साधवग्राहते च शल्यं निगृह्योद्भूते च यस्मात्। यन्त्रेष्वतः कङ्कमुखं प्रधानं स्थानेषु सर्वेष्वधि- (वि) कारि चैव ॥२२॥
सब यन्त्रों में कङ्कमुख यन्त्र प्रधान है। क्योंकि—यह कङ्कमुख जल्दी ही बाहर निकल आता है और भली प्रकार से जल्दी ही अन्दर घुस जाता है। शल्य को पकड़कर बाहर खींच लेता है। (विवर्त्तते—पाठ में—अन्दर घूम सकता है)। संधि-धमनी आदि सब स्थानों में इस कङ्कमुख की ही प्रधानता है—यही अधिकारी है। इसलिए सब यन्त्रों में कङ्कमुख ही प्रधान है।
वि० मन्तव्य—शल्य को पकड़कर बाहर निकालने में भले ही प्रधान हो, वैसे तो अपने कार्य के लिये यन्त्र ही नहीं उप-यन्त्र रज्जू आदि भी प्रधान हैं, उपयोगी हैं अति-उपयोगी हैं ॥
इति मुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने यन्त्रविधिनिर्णाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
अष्टमोऽध्यायः
अथातः शस्त्रावचारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे 'शस्त्रावचारणीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने मुश्रुत के लिए कहा था।
वि० मन्तव्य—शस्त्र-छेदन, भेदन, आदि अर्थात् चीरने, फाड़ने, काटने, छीलने आदि कार्यों में प्रयुक्त होते हैं जैसे यंत्र बाँधने आदि कार्यों में। देखिए अ० ५ का सू० ५ ॥१, २॥
विशतिः शस्त्राणि, तद्यथा—मण्डलाप्रकरपत्रवृद्धिपत्रनखशस्त्रमुद्रिकोत्पलपत्रकार्धधारसूचिकुशपात्राटोमुखशरारिमुखान्तर्मुखत्रिकूर्चककुठारिकाब्रीहिमुखारावेतसपत्रबडिशदन्तरशङ्कुवेषण्य इति ॥३॥
शस्त्रों की संख्या बीस है—इनका आकार इनके नाम से ही प्रायः स्पष्ट है। मण्डलाप्र (Circular Knife या Round-head Knife), करपत्र (Saw आरी), वृद्धिपत्र (अब्धि-ताप्र—Scalpel—प्रयताप्र—Abscess knife), नखशस्त्र (Nail—pairs), मुद्रिका (दो अंगुल लम्बा—उत्तरे की बनावट के Finger-knife), कमलपत्र के समान तेज धार वाला उत्तर्मुख (Lancel), अर्धधार (Single Ebged Knife), सूची—सूई कुश के समान कम चौड़ा परन्तु तीक्ष्ण-धार कुशपत्र (Bistoury), आरिमुख (आरी—जलवर्धनी नामक पक्षी के समान मुख जैसा), शरारिमुख (दोही चोंच वाला—सफेद स्कुन्धोवाले पक्षी के मुख के समान—कैंची—लोक में), अन्तर्मुख (मध्य में मुखवाला मध्य मुख Curved Bistoury), त्रिकूर्चक (तीन छोटी-छोटी छुरियोंवाला), कुठारिका (हथोड़ी-Ave-shaped), ब्रीहिमुख (Trocar) आरा (Owl-like-knife), वेतसपत्र (पतली धार का चाकू Narrow-Bladed knife), बडिश (मछली पकड़ने का काँटा—Hooks), दन्तरशङ्कु (दांतखुरदने का चाकू Tooth-pilk), एषणी (Sharp-proves)—इस प्रकार से बीस शस्त्र हैं।
वि० मन्तव्य—कुठारिका-कुल्हाड़ी के आकार का परन्तु छोटा वह शस्त्र जिसके द्वारा खिरावेध किया जाता है। देखिए सु० शा० अ० सू० ६ ॥३॥
तत्र मण्डलाप्रकरपत्रे स्यातां छेदने लेखने च, वृद्धिपत्रनखशस्त्रमुद्रिकोत्पलपत्रकार्धधारणि छेदने भेदने च, सूचीकुशपत्राटो (टा) मुखशरारिमुखान्तर्मुखत्रिकूर्चकानि विस्वाषणे, कुठारिकाब्रीहिमुखारावेतसपत्रकाणि व्यधने सूची च, बडिशं दन्तरशङ्कुआहरणे, एषण्येषणे आनुलोम्ये च, सूच्यः सोवने, इत्यष्टविधे कर्मण्युपयोगः शस्त्राणां व्याख्यातः ॥४॥
इनका उपयोग—
इन शस्त्रों में मण्डलाप्र और करपत्र छेदन एवं लेखन कार्यों में; वृद्धिपत्र, नखशस्त्र, मुद्रिका, उत्पलपत्र, अर्धधार ये छेदन एवं भेदनकार्यों में; सूची, कुशपत्र, आटीमुख, शरारिमुख, अन्तर्मुख और त्रिकूर्चक-विस्वाषण्यकार्यमें; कुठारिका, ब्रीहिमुख,
१ शस्त्रों का ज्ञान-प्रत्यक्ष में भली प्रकार होता है। ज्ञान के लिये कविराज हाराणचन्द्रजी की या उल्लेख की टीकासे सहायता ली जा सकती है। वामभट्ट ने सर्ववत्र, शलाका, कर्तरि, सूची-कूर्च, खज एवं कर्णव्यधन ये छे शस्त्र अधिक कहे हैं। इनके तथा अन्य लक्षण अष्टांगसंग्रह में देखिये।
अ० ८ ]
सूत्रस्थानम्
३१
आरा, वेतसपत्र, और सूरै ( कुशपत्र-उत्पलपत्र ), भी व्यथन कार्य में; बडिश् और दन्तशंकु-आहरण कार्य में; एषणी एषण और अनुलोमन कार्य में; सूरै-लीवन कार्य में; इस प्रकार से आठ प्रकार के कार्यों में इन शास्त्रों का उपयोग होता है । ( डल्हण ने अनुलोमन का अर्थ विस्वावण किया है ) ॥ ४ ॥
तेषामथ यथायोगं ग्रहणसमासोपायः कर्मसु वदत्यते । तत्र वृद्धिपत्रं वृन्तफलसाधारणे भागे गृह्णीयात्, भेदना- न्येवं सर्वाणि, वृद्धिपत्रं मण्डलाग्रं च किंचिदुत्तानेन पाणिना लेखने बहुशोऽवचार्य, वृन्ताग्रे विस्वावणानि, विशेषेण तु बालवृद्धसुकुमारभीरुनारीणां राज्ञां राजपुत्राणां च त्रिकूर्चकेन विस्वावयेत्, तलप्रच्छादितवृन्तमङ्गुष्ठप्रदे- शिनीभ्यां व्रीहिमुखं, कुठारिकां वामहस्तन्यस्तामितरहस्त- मध्यमाङ्गुल्याङ्गुष्ठविष्टव्याऽभिहन्त्यात् आराकरपत्रैषण्यो मूले, शेषाणि तु यथायोगं गृह्णीयात् ॥ ५ ॥
इन शास्त्रों को पकड़ने को विधि संक्षेप में कहते हैं— इनमें वृद्धिपत्र को वृन्त और फल के संयोगस्थान में पकड़ना चाहिये । इसी प्रकार सब भेदन शास्त्रों को पकड़ना चाहिये । वृद्धिपत्र और मण्डलाग्र शास्त्र को हाथ को कुछ ऊँचा करके लेखन कार्य में, बहुत बार प्रयोग करना चाहिये । विस्वावण कार्य में आनेवाले शास्त्रों को वृन्त के अगले भाग में पकड़ना चाहिये । बालक, बृद्ध, सुकुमार, भीरु स्त्रियों का, राजा एवं राजपुत्रों का त्रिकूर्चक शास्त्र से रक्त विस्वावण करना चाहिये । व्रीहिमुख के वृन्त को हाथ के तलुवे में ढाँपकर अंगुष्ठ तथा प्रवेशिनी अंगुलियों से पकड़ना चाहिये । वाम हस्त से पकड़कर दक्षिण हाथ की मध्य अंगुली से अंगूठे का सहारा लेकर इसके माथे पर चोट करने चाहिए । आरा, करपत्र और एषणी को मूल से पकड़ें । शेष शास्त्रों को यथारीति से पकड़ना चाहिये । जैसे उनका कार्य ठीक हो, वैसे पकड़ें ।
वि० मन्तव्य—वृन्त-शास्त्र की मूठ या वीण्डा का नाम है, जहाँ से पकड़कर शास्त्र चलाया जाता है । फल-शास्त्र के उस भाग का नाम है जिससे छेदन भेदन आदि कर्म किया जाता है । “वृन्तफलसाधारण” भाग वह है जहाँ दोनों का सन्धान जोड़ होता है । त्रिकूर्चक—वह कूची है जिसमें दो से अधिक सूइयाँ एक साथ बंधी रहती हैं, जैसा गोदने या खुनने के लिये प्रयुक्त होता है । वृद्धिपत्र—यहाँ पर बृद्धि शब्द “वृधु- छेदने” धातु ( भ्वादि आत्मनेपदी ) से निष्पन्न हुआ है । इसका अर्थ है—वृद्धये ( छेदनाय ) पत्रं ( चतुर्थीतत्पुरुष ) अर्थात् छेदन के लिये पत्र है । पत्र का अर्थ है पत्र = पत्ती-
लोह की तीखी पत्ती । बृद्धिपत्रं लुराकारं छेदभेदनपाटने । वा० सू० अ० २६ रलो० ७ । बृद्धिपत्र लुरा या उत्सुरा का या चाक्र का नाम है । करपत्र—छेदोऽस्थनां करपत्रं तु खरधारं दशाङ्गुलम् । विस्तारे द्रध्गुलं सूक्ष्मदन्तं सुस्वरुन्धनम् ॥ अर्थात्—अस्थि काटने के लिये—करपत्र नामक शास्त्र होता है । उसकी धार खरदरी सूक्ष्म २ दन्तों—दन्तों वाली, लम्बाई १० अंगुल, चौड़ाई २ अंगुल । सुन्दर मूठ में बँधी दो कीलों से कही पत्ती होती है । इसका नाम “आरी” है । मण्डलाग्र—इसका फल तर्जनी अंगुली के नख के आकार का होता है । नखशास्त्र—नख काटने के शास्त्र का नाम है । मुद्रिका—इसे अंगुली पर चढ़ाकर कार्य किया जाता है । इसके अग्रभाग में उत्सुरा अथवा मण्डलाग्र शास्त्र का सा तीखा शास्त्र लगा रहता है । उत्पलपत्रक—कमल की पंखुरी के सहस्र आकृति- वाला शास्त्र । अर्द्धधार—इसके फल के आधे अथवा आधे से कुछ अधिक भाग की धार तीखी रहती है । सूची—सूरै का नाम है । कुशपत्र—कुश के पत्र के सहस्र फलवाला । आटी- मुख—आटी या आड़ी नामक पक्षी की चींच के आकार का शास्त्र । यह पक्षी जल के आसपास रहता है । शरारिमुख—शरारि आटी पक्षी सा कोई पक्षी है । उसकी चींच सा । अन्तर्मुख—इसका फल अर्द्धचन्द्र ( द्वितीया तृतीया का चन्द्र ) के सहस्र आकृतिवाला और ११ अंगुल का होता है । इसके अन्तर्भाग में धार होती है । व्रीहिमुख—जो के सहस्र मुख- वाला या फलवाला ।
आरा—यह वह शास्त्र है जिसके द्वारा नाथ सम्प्रदाय में कान फाड़े जाते हैं । इसका मुख आधा अंगुल चौड़ा होता है और सब घुसा दिया जाता है । वेतसपत्र—वेत के पत्र के सहस्र आकारवाला । इसके दोनों ओर वेत के पत्र के समान दन्त या दाँते होते हैं । करपत्र में एक ही और होते हैं । बडिश्—मछली पकड़ने के काँटे जैसा, द्वितीया के चन्द्र के सहस्र टेढ़ा और एक ओर तीखा । दन्तशंकु—दन्त छीलने के योग्य, इसे पञ्जाब में “छिंग” कहते हैं । इससे दन्तशर्करा, दन्तकपालिका उतारी जाती है और दन्त या दाढ़ के खड़े के सड़े गले या जीर्ण भाग को खुरचा जाता है । एषणी—नासूर के वृण का पता लगाने में उपयोगी, यह केंचुवा के समान गोल लम्बी एवं लचकीली होती है, परन्तु यह शास्त्र नहीं—यन्त्र कही जा सकती है । भेदन के लिये जो सूरै के सहस्र तीखे मुखवाली और जिसके मूल में धागा डालने का छिद्र होता है वह भी एषणी कही जाती है । यही शास्त्र गणना में गिनी गई है । अनुलोमन करना ही एषणी यन्त्र का काम है और भेदनोपयोगी सूची का नाम भी एषणी है । बाण का
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ८ ]
नाम इषु है, जो शब्द होता है और जिस ( ईष-गतिहिंसन-दर्शनेषु धातु भ्वादिगणीय ) से इषु शब्द निष्पन्न होता है। उसी से एषणी शब्द भी निष्पन्न होता है। इस उपकरण से भेदन रूपी हिंसन और नासूर की गति का दर्शन भी होता है। अतएव अग्रिम ११ वें सूत्र में-तीक्ष्ण कांटे तथा जो के प्रथम पत्र के सहस्र तीखे मुखवाली एषणी कही गई है ॥ ५ ॥
तेषां नामभिरैवाकृतयः प्रायेण व्याख्याताः ॥ ६ ॥
इन शब्दों के आकार प्रायः नाम संकीर्तन से ही कह दिये हैं ॥ ६ ॥
तत्र नखशब्देष्वण्यवाष्टाङ्गुले, सूर्यो वक्ष्यन्ते, ( प्रदे-शिन्यप्रपर्वप्रदेशप्रमाणं सुद्रिका, दशाङ्गुला शरारिसुखी सा च ( या सा ) कर्तरीति कथ्यते ), शेषाणि तु षडङ्गुलानि ॥ ७ ॥
इनमें नख शब्द तथा एषणी आठ अंगुल के होते हैं। सूत्रों का वर्णन-अष्टकर्माध्याय में करेंगे। सुद्रिका-प्रदेशिनी ( तर्जनी ) के प्रमाण का होता है। शरारिसुख शब्द दश अंगुल लम्बा है, उसे कैंची भी कहते हैं। नख शब्द, एषणी और सूई को छोड़कर शेष सब शब्द छै अंगुल हैं ॥ ७ ॥
तानि सुप्रहाणि, सुलोहानि, सुधाराणि, सुरूपाणि, सुसमाहितमुखप्राणि, अकरालानि, चेति शब्दसम्पत् ॥ ८ ॥
शब्दसम्पत्—सुप्रहाणि ( पकड़ने में सुन्दर ), सुलोहानि ( उत्तम लोहे के बने ), सुधाराणि ( तीक्ष्ण धारवाले ), सुरूपाणि ( देखने में सुन्दर रूपवाले ), सुसमाहितमुखप्राणि ( सुन्दर मुखवाले ) अकरालानि ( दांत रहित-देखने में भयानक नहीं ) होने चाहिये। ये शब्दों के गुण हैं ॥ ८ ॥
तत्र वक्रं, कुण्ठं, खण्डं खरधारम्, अतिसू्यूलम्, अत्यल्पम्, अतिदीर्घम्, अतिहृस्वम्, इत्यष्टौ शब्दोषाः। अतो विपरीतगुणमाददीत, अन्यत्र करपत्रात्, तद्विखरधारमस्थिच्छेदनार्थम् ॥ ९ ॥
शब्दों के दोष—वक्र ( टेढ़ा ), कुण्ठ ( खुण्डा-मोटी धार ), खण्ड ( टूटा हुआ ) खरधार ( कर्कश धारवाला ), अतिसू्यूल, अतिउर्च्छ, अति दीर्घ, अति हृस्व—ये आठ शब्द के दोष हैं। इनसे विपरीत गुणोंवाले शब्द को ग्रहण करना चाहिये। परन्तु यह करपत्र के लिये नहीं है। क्योंकि इसकी धार दांतोंवाली होती है, यह अस्थि 'छेदन के कार्य में होता है ॥ ९ ॥
तत्र धारा भेदनानां मासूरी, लेखनानामर्धमासूरी, न्यधनानां विस्त्रावणानां च कैशिकी, छेदनानामर्धकैशिकीति ॥ १० ॥
अष्टविध कार्य में धार का निश्चय—
भेदन कार्य में आनेवाले शब्दों की धार मसूर पत्र की धार के समान मोटी, मण्डलाग्र आदि लेखन शब्दों की धार मसूर दल की धार से आधी, कुटारिका सूची कुशपत्र आदि न्यधन कार्य में आनेवाले शब्दों की धार केश के समान पतली, वृद्धिपत्र आदि छेदन शब्दों की धार केश से आधी पतली होनी चाहिये ॥ १० ॥
बद्धिशं दन्तशङ्कुश्रान्ताग्रे। तीक्ष्णकण्टकप्रथमयव-पत्रमुख्येषणी ( गण्डूपदाकारमुखी च ) ॥ ११ ॥
बद्धिश आगे से कुछ झुका होना चाहिये, दन्तशंकु भी कुछ टेढ़ा होना चाहिये। एषणी तीन प्रकार की है। यथा—१—तीक्ष्णकण्टक, २—प्रथमयवपत्रमुखी ( जो के प्रथम पत्र के समान ), ३—गण्डूपदाकारमुखी ( गेंडुवे मुख के समान ) ॥ ११ ॥
तेषां पायना त्रिविधा क्षारोदकतैलेषु। तत्र क्षारपायितं शरशल्यास्थिच्छेदनेषु, उदकपायितं मांसच्छेदनभेदनपाटनेषु, तैलपायितं सिराण्यधनस्नानयुच्छेदनेषु ॥ १२ ॥
पायना—शब्दों में तीक्ष्ण आदि गुण सौष्ठव उत्पन्न करने के लिये इनको भिन्न २ वस्तुओं में बुझाया जाता है, इसी को पायना कहते हैं। यह पायना तीन प्रकार की है। यथा—क्षार जल और तैल में। इनमें जो शब्द क्षार द्वारा भावित हों, उनका उपयोग शर, शल्य-अस्थि के छेदन में; उदक में भावित शब्दों का उपयोग—मांस के छेदन भेदन पाटनकार्य में; तैल में भावित शब्दों का उपयोग-सिरा के वीथने में और स्नानु छेदने में करना चाहिये। पायना—पानी चढ़ाना। विवृत्तानां शस्त्राणां तत्क्षणान् द्रवद्रव्येषु पायना ।
वि० मन्तव्य—पायनानिर्माण के पश्चात् अथवा शाणु पर चढ़ाने के पश्चात् शब्दों को पान चढ़ाई जाती है इसी का नाम "पायना" है। शस्त्र के फल को तपाकर जल में अथवा आवश्यकतानुसार क्षारोदक तैल में बुझा दिया जाता है इस क्रिया से धार दृढ़ एवं चिरस्थायी हो जाती है। और विषद्रव में बुझाने से विषैली भी हो जाती है। चाकू आदि को शान पर चढ़ाकर जो जल में डुबोया जाता है वह "पायना" ही है ॥ १२ ॥
तेषां निशानार्थं शल्यशिला माषवर्णा धारासंस्थापनार्थं शालमळीफलकमिति ॥ १३ ॥
शब्दों को तेज करने के लिए उद्भव के समान काली चिकनी पत्थरी का उपयोग करना चाहिए। धार की तीक्ष्णता की रक्षा के लिए सिम्बल का फलक रखना
१ पायना के लिये—लेखक का शल्य तन्त्र देखिये।
अ० ६ ] ५
सूत्रस्थानम्
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चाहिये'। धारा संस्थापनार्थ—का अर्थ श्रीघाणेकर जी ने स्ट्रोपिंग (Stropping) किया है। इससे धार स्पष्ट और मृदु हो जाती है।
वि० मन्तव्य—धार को तीक्ष्ण करने के लिये—चमड़े का टुकड़ा तथा कपड़े का खण्ड भी उपयुक्त होता है ॥१३॥ भवति चात्र—
यदा सुनिशितं शस्त्रं रोमच्छेदि सुसंस्थितम् ॥ सुगृहीतं प्रमाणेन तदा कर्मसु योजयेत् ॥१४॥ कहा भी है—
धार की पहिचान—जिस समय शस्त्र रोम का छेदन करने लगे (बाल को साफ करनेलगे), तब उसे भली प्रकार तेज समझना चाहिये। शोभन आकारवाला पूर्वोक्त विधि से भली प्रकार पकड़ा हो, पूर्वोक्त प्रमाण में बना हो, तब शस्त्र को छेदन आदि कार्य में प्रयोग करना चाहिये। वामभट्ट में रोमच्छेदि के स्थान पर रोमवाही—बाल मड़नेवाला है।
वि० मन्तव्य—धार की उत्तम कोटि की तीक्ष्णता का लक्षण है सरलता से रोमों—बालों का छेदन—काट डालना ॥१४॥
अनुशस्त्राणि तु स्वक्सारस्फटिककाचकुशविन्दजलो- रिन्क्षारुनखगोजीशेफालिकाशकपत्रकरीरबालाकुल्य इति॥
शिशु—छी आदि में अथवा शस्त्र के अभाव में अनुशस्त्रों का उपयोग करना चाहिये। अनुशस्त्र—यथा—स्वक्सार—(बाँस की छाल), स्फटिक, काच, कुशविन्द—(लोहितशमरत्न प्रधान), जलौका, अग्नि, क्षार, नख, गोर्जो (गाजवा), शेफालिका (हरसिंगार), शकपत्र (सागौन का पत्ता), बाल अंगुलि—ये अनुशस्त्र हैं।
वि० मन्तव्य—अनुशस्त्र वे कहे जाते हैं जो लोह के शस्त्र नहीं होते, परन्तु उनसे शस्त्र का काम लिया जाता है। जैसे—फफोला आदि के भेदन का काम काच की नोक से ले लिया जाता है, लेखन का काम गाजवों के पत्र से जो खरदरा होता है ले लिया जाता है आदि २। शेष निचले श्लोकों में देखिये ॥
शिशूनां शस्त्रभीरूणां शस्त्राभावे च योजयेत्। स्वक्सारादिचतुर्वर्गं छेद्यं भेद्यं च बुद्धिमान् ॥१६॥
१ वामभट्ट ने धार की रक्षा के लिये शस्त्र कोषों का वर्णन किया है। यथा—
स्याच्चवांगुलविस्तारः सुघनो द्वादशांगुलः।
चौमपत्रोर्णकोशेयदुकूलमृदुचर्मजः ॥
विन्यस्तपाशः सुरयुतः सान्तरोर्णात् शस्त्रकः।
शलाकापिहितास्पृश्च शस्त्रकोपः सुसंचयः ॥
वामभट्ट०
शस्त्र कोषों का वर्णन अन्यत्र भी है।
आहार्यच्छेद्यभेद्येषु नखं जक्येषु योजयेत्।
विधिः प्रवक्ष्यते पश्चात् क्षारवहिजलौकसाम् ॥१७॥
ये स्मृसुखगता रोगा नेत्रवस्संगताश्च ये।
गोजीशेफालिकाशकपत्रैर्विद्यावयेत्तु तान् ॥१८॥
एष्येवेषण्यलाभे तु बालाकुल्यकुरा हिताः।
इन अनुशस्त्रों का विषय—
शिशुओं में, शस्त्र से डरनेवाले पुरुषों में अथवा शस्त्र के अभाव में छेदन-भेदन कार्य में स्वक्सार आदि चार (वंश, स्फटिका, काच, कुशविन्द) का प्रयोग करना चाहिये। आहरण, छेदन, भेदन जी कार्य नख से शक्य हों उनसे नख का प्रयोग करना चाहिये। क्षार वहि और जौक की विधि आगे कहेंगे। मुख रोगों में तथा नेत्र वर्त्म के रोगों में—गोजी, शेफालिका, शक—इनके पत्रों का उपयोग करना चाहिये। एष्य कार्य में एषणी के अभाव में बाल, अंगुलि-अंकुर हितकारी हैं। ॥१६-१८॥
शस्त्राण्येतानि मतिमान् शुद्धैक्यायसानि तु।
कारयेत् करणप्रामं कर्मारं कर्मकोविदम् ॥१९॥
बुद्धिमान् वैद्य—अपने कर्म में निपुण, कर्मपण्डित—कर्म को जाननेवाले लुहार से, शुद्ध मलरहित, तीक्ष्ण लोहे से शस्त्रों को बनवावे ॥१९॥
प्रयोगज्ञस्य वैद्यस्य सिद्धिर्भवति नित्यशः।
तस्मात् परिचयं कुर्याच्छस्त्राणां ग्रहणे सदा ॥२०॥
प्रयोग को जाननेवाले वैद्य को आरोग्य संपादन कार्य में सदा सफलता मिलती है। इसलिये सब से प्रथम शस्त्रों का परिचय (ज्ञान) बार-बार प्राप्त करना चाहिये।
वि० मन्तव्य—शस्त्रों के ग्रहण (पकड़ने तथा उपयोग)—प्रयोग में परिचय-ज्ञानकारी का अभ्यास सदा करते रहना चाहिये ॥२०॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने शस्त्रावचारणीयो
नामाष्टमोऽध्यायः ॥८॥
नवमोऽध्यायः
अथातो योग्यासूत्रीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे योग्यासूत्रीय (सम्यक् कर्माभ्यास रूपी) नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥
अधिगतसर्वशस्त्रार्थमपि शिष्यं योग्यां कारयेत्।
स्नेहादिषु छेद्यादिषु च कर्मपथमुपदिशेत्। सुबहुश्रुतोऽप्य- कृतयोग्यो भवति ॥३॥
१ योग्या को Operative surgery ऑपरेटिव सर्जरी कहते हैं। आजकल यह कार्य मृतशरीर पर सिखाते हैं।
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १० ]
सर्पूणं शास्त्र पदे हुए शिष्य को भी योग्या (कर्मभ्यास) करवाना चाहिये। स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन आदि, तथा लेंध, भेद्य, - वेध आदि शास्त्र कार्यों में कर्म करने की विधि वतानी चाहिये। क्योंकि बहुत अच्छी प्रकार शास्त्र पढ़ लेने पर भी, कर्माभ्यास किये बिना कार्यों में अयोग्य होता है ॥
तत्र, पुष्पफलालाबूकालिन्दकत्रपुसै (सो) वारूकककर्करुप्रभृतिषु छेद्यविशेषान् दर्शयेत्, उत्कर्तनापकर्तनानि चोपदिशेत्, दृतिवस्तिप्रसेवकप्रभृतिष्वृदकपङ्कपूर्णेषु भेद्ययोग्यां, सरोणि चर्मण्यतते लेख्यस्य, मृतपशुसिरामृतपलनालेषु च वेध्यस्य, घुणोपहतकाष्ठवेणुनलनालीशुष्कालाबूमुखेवेध्यस्य, पनसविम्बोबिल्वफलमञ्जमृतपशुदन्तेष्वहायस्य, मधुच्छिष्टोपलिप्तै गालमलोफलके विस्त्राण्यस्य, सूक्ष्मघनवखान्तयोर्भृदुवर्मान्तयोश्च सौन्यस्य, पुस्तमयपुरुषाङ्गप्रत्यङ्गविशेषेषु बन्धनयोग्यां, मृदुषु मांसखण्डेष्वनिक्षारयोग्यां, मृदुचर्ममांसपेशीपूष्यलनालेषु च कर्णसन्धिबन्धयोग्याम्, उदकपूर्णघटपाश्चस्त्रोत्स्यलाबूमुखदिषु च नेत्रप्रणिधानवस्तिव्रणवस्तिपीडनयोग्यामिति ॥४॥
पुष्पफल (कूष्माण्ड), अलाबु (वियाकद्वृद) कालिन्दक (तरबूजा), त्रपुस (खीरा), एवार्क (ककड़ी), कर्कार (ककड़ी भेद), आदि वस्तुओं में छेदन के सब भेदों को दिखाना चाहिये। उत्कर्तन (ऊपर को काटना), अपकर्तन (नीचे की ओर काटना) ये भी कार्य इन्हीं पर दिखाये। दृति (मशक), वस्ति (मूत्र से भरी) प्रसेवक (चर्म निर्मित भाण्ड), आदि पानी एवं कीचड़ से भरी वस्तुओं में भेदन योग्य कार्यों को, लोमयुक्त चर्म को फैलाकर उस पर लेखन कार्यों को, मृत पशुओं की खिराओं में तथा कमल नाली में वेधन कार्यों को, घुण से खाई लकड़ी आदि में, वेणु, नल, नाली एवं शुष्क अलाबु के मुखों में एषणी कार्यों को; पनस (कटहल), कन्दूरी, बिल्वफल की मजा, मृतपशुओं के दांतों में आहरण कार्यों को, सिम्बल के तस्ते को मोम से लिप्त करके इस पर विस्त्रावण कार्यों को, वस्त्रादि से या मिट्टी से बनी पुरुष प्रतिमाओं के अंग-प्रत्यङ्ग विशेषों में बन्धनयोग्य कार्यों को, कोमल चर्म, मांस-पेशी तथा कमल नालों में कर्णसन्धि-बांधने योग्य कार्यों को, पानी से भरे घड़े में पार्श्व में छेद करके और अलाबु मुख आदि में नेत्र प्रवेशन बस्ति पीडन कार्यों को दिखाना चाहिये।
१ पुस्त का लक्षण--
“मृदा वा दारुणा-वाय वस्त्रेणाप्यथ चर्ममणा।
लोहरन्तैः कृतं वापि पुस्तमित्यभिधीयते ॥
पुस्तो दान्यादिमय्यास्याद्याक्रुतरेषादानकारणं यद् वस्तु तदुच्यते ॥ अरण्यदत्त०
वि० मन्तव्य—पनसविम्बो, बिल्वफल की मज्जा अर्थात् बीज। मधुच्छिष्ट (मोम) से उपलिप्त तखती पर विस्त्रावण के स्थान में लेखन पाठ अधिक उपयुक्त है ॥४॥
भवतश्चात्र—
एवमादिषु मेधावी योग्याह्वेषु यथाविधि। द्रव्येषु योग्यां कुर्वाणो न प्रमुह्यति कर्मसु ॥५॥
उपसंहार, कहा भी है—
इस प्रकार से मेधावी शिष्य पुष्प-फलादि द्रव्यों में यथाविधि कर्मभ्यास करनेवाला कार्यों में मोहित नहीं होता ॥५॥
तस्मात् कौशलमन्विच्छन् शस्त्रक्षारानिकर्मसु। यस्य यत्रह साधर्म्यं तत्र योग्यां समाचरेत् ॥६॥
इसलिये शस्त्र, क्षार, अग्नि आदि कार्यों में कुशलता चाहने की इच्छा से, जिस कार्य की जिस द्रव्य में समानता देखे, उस द्रव्य में उसी कर्मभ्यास को करना चाहिये ॥६॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने योग्यासूत्रयो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
दशमोऽध्यायः
अथातो विशिखानुप्रवेशनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१॥
इसके आगे ‘विशिखानुप्रवेशनीय’ अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था। विशिखा—वैद्यक व्यवसाय का कर्म मार्ग यह अर्थ है। है। हाराणचन्द्र जी ने विशिखा का अर्थ रोगी के घर का मार्ग किया है ॥१,२॥
अधिगततन्त्रेणोपासिततन्त्रार्थेन हृष्टकर्मणा कृतयो- भ्येन शास्त्रं निगदता राजानुज्ञातेन नीचनखरोम्णा शुचिना शुक्लवस्त्रपरिहितेन छत्रवता दण्डहस्तेन सोपानत्केनातुदः तवेशेन सुमनसा कल्याणाभिग्याहारेणाकुहकेन बन्धुभू- तेन भूतानां सुसहायवता वैद्येन विशिखास्तुप्रवेष्टव्या ॥३॥
गुरु के मुख से शास्त्र को पढ़कर, गुरु के समीप तन्त्रार्थ का अभ्यास करके, कर्मों को देखकर, कर्मभ्यासस्वयं करके, शास्त्र को वदूा सकनेवाला, राजा की आज्ञा से (सरकार की आज्ञा प्राप्त करके)
१ जैन-ग्रन्थों में वैशिखा या विशिखा शब्द आया है। इसका अर्थ यह है कि मल्ल लोग कुस्ती से थककर जहाँ खड़े होकर विश्राम लेते हैं, उसे विशिखा कहते हैं। इसके लिये उत्तराध्ययन सूत्र में उज्जैन के अट्टेन मल्ल का उपाख्यात दिया है, वह देखना चाहिये।
अ० १० ]
सूत्रस्थानम्
३५
नख और बाल कटाकर, पवित्र होकर (स्नान करके), सफेद ब्रह्म पहिनकर, छत्र लेकर, दण्ड धारण करके, जूता पहिनकर, सुन्दर-सभ्य वेष के साथ, शान्त मन से, मंगल भाणी-व्यवहार से, विना कपटाचरण के, प्राणियों का बन्धु होकर, सहायक के साथ वैद्य को विशिखा-कर्म-मार्ग में (घर में) प्रविष्ट होना चाहिये।
वि० मन्तव्य—शास्त्राध्ययन के अनन्तर-'विशिखा' में प्रवेश किया जाता है। औषधालय खोलकर बैठा जाता है। विशिखा-विपणि (जहाँ लेन देन आदि व्यवहार होता हो), रथ्या (रथ आदि सवारियों चलती हों-सुलभ हों), प्रतौली (तोलने-बेचने-खरीदने नापने आदि का कार्य होता हो), पण्य-वीथिका (पैसा-धन के लिये हित-लामदायक बीथी) बाजार का नाम है और विशिखा का अर्थ है जहाँ विशेषरूप से-शयन किया जाय। तात्पर्यार्थ जमकर बैठ जाया जाय। वैद्य को प्रारम्भ में ही लाभ नहीं होने लगता है। वैद्य पुराना ही मान्य होता है। इस विशिखा में अनुकूल-सरल-साधु होकर प्रवेश करना चाहिये और वहाँ इस सूत्र के उपदेशानुसार बोलना, बैठना, चलना तथा रहना चाहिये ॥३॥
ततो दूतनिमित्तशकुनमङ्गलातुलोभ्येनातुरगृहमभिगम्य, उपविश्य, आतुरमभिपश्येत् सृष्टोत्तु पृच्छेच्छ च त्रिभिरेतेविज्ञानोपायै रोगाः प्रायशो वेदितव्या इत्येके तत्तु न सम्यक्, षड्विधो हि रोगाणां विज्ञानोपायः, तद्यथा पञ्चभिः श्रोत्रादिभिः प्रश्नेन चैति ॥ ४ ॥
इसके अनन्तर दूत, निमित्त-सुगन्धित वायु आदि, शकुन (पक्षि विशेष, के प्रशस्त वाक्य आदि), मंगल (भरे हुए घड़े, स्वस्तिक आदि), इनकी अनुकूलता (प्रशस्त होने) से, रोगी के घर में पहुँचकर, बैठकर, रोगी को मली प्रकार देखें, स्पर्श करे और पूछे। कई आचार्यों का मत है कि इन तीन ही विज्ञानोपाय (दर्शन, स्पर्श और प्रश्न) से प्रायः करके सब रोग जानने चाहिये। यह ठीक नहीं है। क्योंकि रोगों को जानने की विधि छे प्रकार की है। यथा श्रोत्र, आंख, त्वचा, रसना और नासिका ये पाँच तथा प्रश्न ये छे हैं। चरक ने जिह्वा को ज्ञान का साधन नहीं माना१ है।
वि० मन्तव्य—जब रोगी देखने जाना हो तो तिथि आदि का विचार करके जाना चाहिये। 'तत्तु न सम्यक् का तात्पर्य
१ रसं तु खलु आतुरशरीरगतम् इन्द्रियवैषयिकमपि अनुमानादवगच्छेत् । न ह्यस्य प्रत्यक्षप्रहृणमुपपद्यते । तस्मादातुरपरिप्रश्नेनैव आतुरमुखसर्सं विद्यात् । युकापसर्पणं त्वस्य शरीरवैरस्यम् । मक्षिकोपसर्पणं शरीरमाधुर्यम् ॥ चरक वि० अ० ४ ॥
है कि वह समीचीन अर्थात् बहुत ठीक नहीं है (ठीक तो है परन्तु बहुत ठीक नहीं) ॥ ४ ॥
तत्र श्रोत्रेन्द्रियविज्ञेया विशेषा रोमेषु व्रणस्त्रावविज्ञानोयादिषु बद्ध्यन्ते—'तत्र सफेन रक्तमीरयन्ननिलः सशब्दो निर्गच्छति' (सू. अ. २६) इत्येवमादयः, स्पर्शनेन्द्रियविज्ञेयाः शीतोष्णशुल्ककर्कशमृदुकठितत्वादयः शरीरोपचयापचयायुर्लक्षणबलवर्णविकारादयः । रसनेन्द्रियविज्ञेया अरिष्टलिङ्गादिषु व्रणानामव्रणानां च गन्धविशेषाः प्रश्नेन च विज्ञानीयादेशं कालं जातिं सात्त्व्यमातङ्कसमुत्पत्तिं वेदनासमुच्छ्रयं बलमन्तरगतिं वातमूत्रपुरीषाणां प्रवृत्ति-मप्रवृत्तिं कालप्रकर्षादींश्च विशेषान् । आत्मसदृशेषु विज्ञानाभ्युपायेषु तत्स्थानीयैर्जीनीयात् ॥ ५ ॥
इनमें श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा जानने योग्य विषयों का वर्णन 'व्रणस्त्राव विज्ञानीय' आदि रोगों में करेंगे। यथा—'सफेन रक्तमीरयन्ननिलः सशब्दो गच्छति'—इत्यादि। स्पर्शनेन्द्रिय द्वारा ज्ञातव्य शीत, उष्ण, शुल्क, कर्कश, मृदु, कठितत्व आदि स्पर्श विशेषों का वर्णन, ज्वर शोक आदि में करेंगे। चक्षु द्वारा जानने योग्य विषय—शरीर की स्थूलता, कृशता, आयु के लक्षण, बल, वर्ण विकार आदि हैं। रसनेन्द्रिय से जानने योग्य विषय—प्रमेह आदि में मधुर रस आदि हैं (पिपीलिका के उपसर्पण से मधुर रस का ज्ञान होता है)। प्राणेन्द्रिय से जानने योग्य विषय—अरिष्टलिङ्ग आदि में, अव्रण तथा व्रणों में जो गन्ध विशेष है ये नासिका द्वारा जाने जाते हैं। प्रश्न द्वारा देश, काल, जाति, सात्त्व्य (चेष्टा जन्म, आहार जन्म), रोगोत्पत्ति वात आदि वेदनाओं की उत्पत्ति, बल, जाटरागन, वातमूत्र मल की प्रवृत्ति या अप्रवृत्ति, कितने समय से यह रोग है—इत्यादि बातों को प्रश्न द्वारा जानना चाहिये। वैद्य यदि रोगी श्रोत्रादि किसी इन्द्रिय से हीन हो तो जानने योग्य बातों को रोगी के पास में स्थित पुरुष से पूछकर जाने१। (उपर्युक्त रोग विज्ञान के उपाय यदि स्वयं प्रत्यक्ष करने योग्य हों तो उन उपायों के (इन्द्रियों के) इन अधिष्ठानों द्वारा इन्द्रिय विक्षेप विषयों का ज्ञान कर लेना चाहिये—यह अर्थ श्री वाणेकर जी ने किया है) ॥
१ आत्मसदृशेषु—इस पाठ में उल्लेखार्थ ने अर्थ श्रोत्र किया है। उसका कहना है कि रोग ज्ञान के जो छे उपाय बताये हैं, उनमें से वातादि दोषों का स्वरूप जानने के लिये जो उपाय उपयोगी हों उनकी सहायता से रोगों का ज्ञान करना चाहिये। कबि-राज हाराणचन्द्र जी ने 'आत्मा सदृशेषु'—यह पाठ रखा है। यह संगत लगता है। आत्मसदृशेषु—पाठ में दोषसदृशेषु विज्ञानाभ्युपायेषु—'षड्विधेषु—श्रोत्रत्वं चक्षुरसनाज्याग्रहणं च' इत्यादि
३६
सुश्रुतसंहिता
[अ० ११]
एवमभिसमोदय साध्यान् साधयेत्, याप्यान् यापयेत्, असाध्यान्नेवोपक्रमेत्, परिसंवत्सरोत्थितांश्च विकारान् प्रायशो वर्जयेत् ॥ ६ ॥
इस प्रकार से रोगों की परीक्षा मली प्रकार से करके साध्य रोगों की चिकित्सा करे, याप्य रोगों को बढ़ने से रोके और असाध्य रोगों की चिकित्सा न करे। एक साल पुराने रोगों को प्रायः करके छोड़ देना चाहिये-क्योंकि ये प्रायः असाध्य होते हैं।
भवति चात्र—
मिथ्याहृष्टा विकारा हि दुराख्यातास्तथैव च।
तथा दुष्परिमृष्टाश्च मोहयेयुश्चिकित्सकम् ॥ ७ ॥
कहा भी है—
मिथ्याहृष्टा (ठीक प्रकार से न जाने हुए), दुराख्याता (रोगी द्वारा ठीक प्रकार से वर्णन न किये), दुष्परिमृष्टा (ठीक प्रकार से न पूछे या न विचारे हुए), रोग मिथक् को मोहित कर देते हैं—धोखा दे देते हैं ॥ ७ ॥
तत्र साध्या अपि व्याधयः प्रायेणैषां दुष्टिकित्त्यतमा भवन्ति। तद्यथा—श्रोत्रियनृपतिस्त्रीबालवृद्धभीरुराजसेवककितवदुर्बलवैद्यविदग्धन्याधिगोपकदारिद्रकृपणकोधनानामनात्मवतामनाथानां च, एवं निरूप्य चिकित्सां कुर्वन् धर्मार्थकाममयांसांसि प्राप्नोति ॥ ८ ॥
निम्न व्यक्तियों में साध्य रोग भी प्रायः करके (सर्वत्र नहीं) अति कष्टसाध्य होते हैं। यथा—श्रोत्रिय (नित्य वेदाध्यायी, स्नान पाठ करने से), राजा (स्वतन्त्र प्रवृत्ति से), स्त्री (सुकुमारता या लज्जावश), बालक-वृद्ध, भीरु (कोमल-डरप्रकोप होने से) राजसेवक (राजा के अधीन होने से), कितव (जुबारी-कोमल-प्रवृत्ति), दुर्बल, वैद्याभिमानी (वैद्य का तिरस्कार करनेवाला), व्याधि को छिपानेवाला, दरिद्र, कपटी, क्रोधी, अपथ्यसेवी, अजितेन्द्रिय, और अनाथ इन पुरुषों के साध्य रोग भी कष्टसाध्य होते हैं। इस प्रकार विचारकर चिकित्सा में प्रवृत्त होने से धर्म अर्थ काम और यश वैद्य को मिलता है। चरक में कहा है—
सदातुराः श्रोत्रियराजसेवकाः,
तयैव वेश्या सह पण्यजीविभिः ॥
द्विजो हि वेदाध्ययनव्रताह्निः
क्रियादिभिर्देहहितं न चेष्टते।
नृपोपसेवी नृपचित्तरक्षणत
परानुरोधात् बहुचिन्तनाद् भयम् ॥
इत्यादि चरक सि० अ० १२।
वि० मन्तव्य—वैद्यविदग्ध—जो अपने को वैद्य समझता हो और अतः चिकित्सा व्यवस्था में व्यर्थ ननु नच करता हो ॥
भवति चात्र—
स्त्रीभिः सहास्यां संवासं परिहासं च वर्जयेत्।
दत्तं च ताभ्यो नादेयमन्नादन्यद्विषग्वरैः ॥ ९ ॥
कहा भी है—
स्त्रियों के साथ एक आसन पर बैठना, एक साथ रहना और स्त्रियों के साथ परिहास, छोड़ देना चाहिये। अन्न आदि से भिन्न स्त्रियों से दी हुई कोई भी वस्तु हो तो ग्रहण नहीं करनी चाहिये। (यह नियम वहाँ के लिये है जहाँ पर चिकित्साव्यवसाय वैद्य करता हो—सर्वत्र नहीं)।
वि० मन्तव्य—यदि स्त्री स्वतन्त्र हो अथवा अपने संरक्षक की सम्मति से अन्न के अतिरिक्त धन आदि कोई द्रव्य देवे तो ले लेना चाहिये। स्त्री ही नहीं—कोई भी व्यक्ति जो देन-लेन में स्वतन्त्र न हो उससे कोई भी वस्तु नहीं लेनी चाहिये, अन्यथा वात का बतझड़ हो सकता है ॥ ९ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने विशिखानुप्रवेशानीयो नाम दशमोऽध्यायः ॥
एकादशोऽध्यायः
अथातः क्षारपाकविधिसध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
इसके आगे क्षारपाक विधि की व्याख्या करते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥
शास्त्रानुशस्त्रेभ्यः क्षारः प्रधानतमः, छेद्यभेद्यलेख्यकरणान्निदोषस्तत्वाद्विशेषक्रियावचरणात् ॥ ३ ॥
मण्डलाग्र आदि शब्दों में, त्वकसार आदि अनुशब्दों में क्षार ही सब से मुख्य है, (अग्नि एवं जौं के भी अधिक है) क्योंकि—क्षार से छेदन, भेदन तथा लेखन कार्य हो जाता है। नाना प्रकार की औषधियों से बनने के कारण त्विदोष नाशक है। विशेष क्रिया करने से—पीने में भी वरता जाने से, यह क्षार मुख्य है ॥ ३ ॥
तत्र क्षरणात् क्षणनाद्वा क्षारः ॥ ४ ॥
क्षरणात्—दुष्ट मांस आदि के काटने से, क्षणनात् त्वचामांस आदि के हिसन करने से इसे 'क्षार' कहते हैं। चरक ने "भित्त्वा भित्त्वाशयान् क्षारः, क्षरत्वात् क्षारयत्वधः" अर्थात् क्षरना अर्थ किया है ॥ ४ ॥
१ चरक में 'न कदाचित् स्त्रीदत्तमाभिषमावातव्यम्। अननुज्ञातश्च भर्त्राऽथवाऽप्यक्षेण। आभिष-भोग्यवस्तु।' अन्न-द्रव्य-वृत्ति-जीवनका कारण, होने से प्राप्नु है।
अ० ११ ]
सूत्रस्थानम्
३७
नानीषधिसमवायात्त्रिदोषनः, शुक्लस्वात् सौम्यः, तस्य सौम्यस्यापिसतो दहनपचनदारणादिशक्तिरविरुद्धा, आग्नेयोषधिगुणभूयिष्ठत्वात् । कटुक उष्णस्तीक्ष्णः पाचनो विलयनः शोधनो रोपणः शोषणः स्तम्भनो लेखनः क्रुम्या-मकफकुष्ठविषमेदसासुपहन्ता पुंस्त्वस्य चातिसेवितः ॥४॥
वात पित्त-कफ हर औषधियों से बनने के कारण त्रिदोष-नाशक है । शुक्ल स्फेद होने से सौम्य है, क्षार के सौम्य होने पर भी इसमें दहन, पचन (पाक), दारण, आदि कार्यों की शक्ति अप्रतिहत रहती है, क्योंकि इस क्षार में अग्नि गुण की प्रधानता रहती है, इसलिये क्षार कटु रस, उष्ण वीर्य, तीक्ष्ण गुण, व्रण शोथ पाचक, गुल्म आदि का विलायक, दुष्टवृणादि का शोधक, शुद्धवृण का रोपक, व्रण क्लेद का शोधक, अति रक्तक्षय का स्तम्भक, कठिन उन्नत मांस का लेखन, क्रुमि, आम, कफ-कुष्ठ-विष एवं मेद का नाशक, अति मात्रा में सेवन करने से पुंस्त्व नाशक है१ । (रक्तपित्त में खासकर—गले के रक्तक्षय में, चरक ने२ 'क्षारस्य चैवोत्पलनालजस्य' में शीतल वस्तुओं का क्षार देने को कहा है ।
वि०—यदि क्षार को जल आदि के संयोग से मृदु कर लिया जाता है तो वह सौम्य (सोमगुण युक्त) या आह्लादक हो जाता है, यथा—चूना आदि किसी भी क्षार को जल में घोलकर वृक्षिक के दंश पर सेवन करने से विषवेदना-दाह की शान्ति हो जाती है, पौने से पित्तशूल-यकृतशूल शान्त हो जाता है, पित्त ज्वर में प्लोत रखने से दाह का शमन होता है आदि २ । और यदि तीक्ष्ण रहता है तो दाह पाक आदि करता ही है—यह सर्वविदित है । लेप रूप में व्रणशोथ को पकाता है, पक्ववृण का दारण करता है, चूर्णों आदि में खाने से पाचनआहार का पाचक है, मृदुक्षार वृण का रोपण करता है, तीक्ष्ण क्षार पूय अथच मांस वृद्धि का लेखन करता है, अधिक मात्रा में खाने से—वमन विरेचन रूपसे शोथन करता है और अल्पमात्रा में खानेसे वमन विरेचन आदि का स्तम्भन भी करता है । विलयन—चना उरद आदि को गलाता है । मीठा सोड़ा मृदुक्षार ही है । शोषण—जिन वृणों में से पन्छा बहता है उनका मृदुक्षार द्रव द्वारा सेवन करने से अथच मृदुक्षार बुरकने से पन्छा सूख जाता है । क्रुमिनाशन—साबुन सोड़ा क्षार ही तो है । वह आम को पचाता है, कफ को ढीला करता है, लेपन से दहू आदि कुष्ठों को नष्ट करता है, सर्पवृंश पुर लगाने से विषनाशक है । नौषादर दंशपर लगाया जाता है । मेदोनाशन—पुंस्त्वनाशन—अधिक सेवन करनेसे कुशता
तथा नपुंसकता को उत्पन्न करता है । चूना; कली पत्थर का क्षार है, कास्टिक सोडा लवण का क्षार है, सज्जी आदि रेह का क्षार है ॥ ५ ॥
स द्विविधः—प्रतिसारणीयः पानीयश्च ॥ ६ ॥
यह क्षार दो प्रकार है । प्रतिसारणीय (प्रतिसारण के योग्य) और पानीय (पीने के योग्य) है ।
वि० मन्तव्य—प्रतिसारणीय—लेपन, मलना, लमाना या रगड़ना, त्रिसना आदि बाह्यप्रयोग का नाम प्रतिसारण है, अञ्जन—दन्त मञ्जन आदि बाह्यप्रयोग ही है । प्रतिसारणके योग्य या उसमें उपयोगी क्षार का नाम "प्रतिसारणीय" है । और चूना का पानी जो यकृत विकार में तथा मन्दाग्नि में दिया जाता है वह "पानीयक्षार" ही है । किसी क्षार को द्रव में घोल पानीय बनाया जा सकता है—जैसा सोड़ा वाटर ॥६॥
तत्र प्रतिसारणीयः कुष्ठकटिभेददुष्पण्डलकिल्लासभगन्दरावृंदागौदुष्टव्रणनाडीचर्मकौलतिलकालकन्यच्छव्यङ्गमशकबाह्यविद्रधिक्रुमिषिषादिपूपादिज्यते समसु च मुखरोगेपूजहिाधिजिह्वाविजिह्वापोकुशदन्तवैदभंषु तिसृषु च रोहिणीषु, प्लेव्वेवानुशस्त्रप्रणिधानमुक्तम् ॥ ७ ॥
इनमें प्रतिसारणीय क्षार-कुष्ठ, कटिभेद, दहू, किलास, मण्डल, भगन्दर, अबुंद, दुष्टवृण, नाडीवृण, चर्मकौल, तिलकालक, न्यच्छ, व्यंग, मशक, बाह्य विद्रधि, क्रुमि, विष-जंतु मणि आदि में प्रयोग किया जाता है । उपजिह्वा आदि तीन रोहिणी आदि चार—इन सात मुख रोगों में, उपजिह्वा, अधिजिह्वा उपकुश दन्त विदर्भ, रक्तजन्म सन्निपात एवं असाध्य रोहिणी रोग में—क्षार का उपयोग होता है ।
हाराणचन्द्र जी का मत है कि प्रथम शास्त्रानुशस्त्र से काम करके पीछे क्षार का प्रयोग करना चाहिये ॥ ७ ॥
पानीयस्तु गरगुरुमोदराग्निसङ्काजीर्णोरोचकानाहश-कंराइर्मर्यभ्यन्तरविद्रधिक्रुमिषिषाशः सूपयुज्यते ॥ ८ ॥
पानीयक्षार-क्रुमि, विष, वृषि, गुल्म, उदर, जिन रोगों में अग्नि मन्द हो जाती है; (यथा विस्चिका, अलसक, विलम्बिका आदि) अजीर्ण, अरुचि, आनाह, शर्करा, अश्मरी, अभ्यन्तर विद्रधि, क्रुमि, विष, अर्श में उपयोग होता है ॥८॥
अहितस्तु रक्तपित्तज्वरितपित्तप्रकृतिबालवृद्धदुर्बलभ्रममदमूर्च्छातिमिरपरीतेभ्यांडन्येभ्यश्चैवविधेभ्यः ॥ ९ ॥
जिन रोगोंमें क्षार निषिद्ध है—रक्तपित्त, ज्वर, पित्तप्रकृति बाल, वृद्ध, दुर्बल, भ्रम, मद, मूर्च्छा, तिमिर—इन रोगों से आक्रान्त तथा अन्य इसी प्रकार के रोगों से आक्रान्त व्यक्तियों में क्षार का उपयोग नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥
तं चैतरक्षारवद् दग्ध्वा परिस्रावयेत, तस्य विस्तरोऽन्यत्र ॥ १० ॥
१ देखिये—चरक—विमान अ० १ में—क्षारं नात्यर्थमुपयुज्यते । २—क्षारः पुंस्त्वभ्रान्तां श्रेष्ठः, चरक सू० ।
३८
मुञ्चतसंहिता
[ ३० ११ ]
इस पानीय स्नान को प्रतिस्नानार्थीय स्नान की भांति जलाकर तय्यार कर लेना चाहिये । इसका विस्तार अन्यत्र गुल्म अध्याय में है । पानीय स्नान की मात्रा—उत्तमा मात्रा—एक पल, मध्यमा तीन कर्ष, अधमा—आधा पल ।
वि० मन्तव्य—पलाश, अपामार्ग आदि स्नानार्थीय द्रव्यों को जलाकर जैसे प्रतिस्नानार्थीय—स्नान स्नान बनाया जाता है वैसे ही पानीय स्नान भी बनाया जाता है, परन्तु उसे जल में घोलकर पीने योग्य बना लिया जाता है । इसके निर्माण तथा उपयोग का विस्तार से वर्णन—गुल्म आदि रोगों की चिकित्सा में देखिये ॥ १० ॥
अथेतस्त्रविधौ मृदुमध्यस्तीक्ष्णश्च । तं चिकीर्षुः शरदि गिरिसानुजं शुचिरुपोष्य प्रशस्तैऽहनि प्रशस्तदेशजातमनुपहतं मध्यमवयसं महान्तमसितमुष्कमधिव्यास्थापरेषुः पाटयित्वा खण्डशः प्रकल्प्यावपाटय निवाते देशे निचिति कृत्वा सुधाशर्कराश्च प्रक्षिप्य तिलनलैरारोपयेत् । अथोपशान्तेऽन्यौ तद्भस्म पृथग्गृह्णीयाद्भस्मशर्कराश्च । अथानेतैव विधानेन कुटजपलाशश्चकर्णपारिभद्रकविभीतकारवधमिल्वकाकर्स्तुहपासार्गपाटलान्तमालवृषकदलीचित्रकपूतौकेन्द्रवृक्षारुकोताश्चमारकसप्तच्छदगनिमन्थगुञ्जाश्चतस्रश्च कोशातकीः समूलफलपत्रशाखा दहेत् । ततः स्नानद्रोणमुदकद्रोणैः षड्भिरालोड्यमूर्त्रैर्वा यथोक्तैरकविशतिकृत्वः परिस्राण्य, महति कटाहे शनैर्दुर्ग्याऽवघट्टयन् विपचेत् । स यदा भवत्यच्छो रक्तस्तीक्ष्णः पिच्छिलश्च, तमादाय महति वस्त्रे परिस्राण्येतं विभज्य पुनरन्नावधिश्येत् । तत एव स्नानोदकात् कुडवसमध्यं वाऽपनयेत् । ततः कटशर्करामशर्कराक्षीरपाकशंखनाभीरनिवर्णाः कृत्वाऽऽयसे पात्रे तस्मिन्नेव स्नानोदके निषिच्य पिषु तेनैव द्विद्रोणैऽष्टपलसमितं शंखनाभ्यादीनां प्रमाणं प्रतिवाप्य, सततमप्रमत्तश्चैनमवघट्टयन् विपचेत् । स यथा नातिसान्द्रो नातिद्रवश्च भवति तथा प्रयतेत् । अथैनमागतपाकमवतार्यानुगुणमायसे कुम्भे संवृतमुखे निद्ध्यादप मध्यमः ॥ ११ ॥
प्रतिस्नानार्थीय स्नान तीन प्रकार का है । मृदु, मध्य और तीक्ष्ण । इस स्नान को बनाने की इच्छा से शरद ऋतु में पवित्र एवं उपवास करके पर्वत के समीप प्रशस्त दिन में उत्तम देश में उत्पन्न, अग्नि आदि से न जले, मध्यम आयुवाले, बहुत बड़े काले फूल के मुष्क (घण्टा पाखलि) वृक्ष के पास जाकर मन्त्र के समान बलि कर्म करे । (मूर्तों को दूर करने के लिये वृक्ष को बलि कर्म देना चाहिये) * इसके दूसरे दिन निम्नमंत्र से—हे
१ भोज ने भी कहा है—
निवसन्तीह भूतानि यायस्मिन् कानिचित् द्रुमै ।
अपक्रामन्त्व स्वेद्यः परार्थं स्वो ह्यगं द्रुमः ॥
अग्नि के समान महावीर्य ! तेरी शक्ति नष्ट न हो । कल्प्याण स्वरूप ! यहाँ रहो—मेरे कार्य को करोगे । मेरा कार्य करने के पीछे स्वर्गलोक में जाओगे । श्वेत एवं लाल फूलों से हवन करे—आहुति देनी चाहिये । इस वृक्ष को काटकर—टुकड़े करके, इन टुकड़ों को और छोटा करके, वायु रहित प्रदेश में एकत्रित करके चूने के पत्थर डालकर तिल नालों से जलाये । अग्नि शान्त होने पर तिल नालों की भस्म और भस्म शर्करा पृथक् पृथक् एकत्रित कर लेनी चाहिये । इसी मुष्क की विधि से कुटज (कूड़ा), पलाश (डाक), अश्वकर्ण (शाल भेद), फरहद, विभीतक, आरुवध (अमलतास), तिल्वक, अर्क (आक), स्नेही (थोर), अपामार्ग (चिरचिटा), पाटला, नक्तमाल (करञ्ज), वृष (वासा), कंदली, चित्रक, पूतीक (नाटा करञ्ज), इन्द्र वृक्ष (कुटज भेद), आस्कोत (शारिवा), अश्वमार (कनेर), सप्तर्ण (सतवन), अग्निमन्थ (अरणी) गुञ्जा, कोशातकी—चार प्रकार की (बृहत्फल, श्वेतपुष्प, पीतपुष्प, अल्पफल)—इन वृक्षों की मूल-पत्र, फल-शाखा समेत जलाना चाहिये । (वाग्मट्ट में काकजंवा और यवशूकनाल अधिक है) ।
स्नान दहन करने के पश्चात्—दो भाग मुष्क भस्म, एक भाग कुटजादि भस्म (अथवा दोनों परस्पर सम भाग) मिलित एक द्रोण भस्म लेकर छेः द्रोण पानी में मिला देना चाहिये । अथवा 'दुन्दुभि स्वनीय कल्प' में कहीं विधि से मूर्तों द्वारा २१ बार छान कर—बड़े भारी कड़ाहें में कछड़ी से धीरे धीरे हिलाते हुए पकाना चाहिये । जिस समय यह पकता हुआ स्नान निर्मल, उग्र गन्धवाला, चिपचिपा हो जाय—तब बड़े वस्त्र में इसको छानकर इसके दो भाग कर लेने चाहिये । एक स्नानोदक (नितरा पानी) दूसरा भस्म किह भूत स्नान (नीचे का भाग) । इस स्नानोदक को फिर आग पर रख देना चाहिये—और इस स्नानोदक से एक कुडव था डेढ़ कुडव निकाल लेना चाहिये । इसके आगे—कट शर्करा (गंगेछी अमाव में खटिका—खडिया मिट्टी), भस्म शर्करा (पहिले कही), क्षीरपाक (जलशुक्ति), शंखनाभि (शंखप्रस्थ), इनको लाल अंगारों के समान बनाकर लोहे के पात्र में रक्खे, स्नानोदक में मिलाकर (कट शर्करा) आदि की मात्रा प्रत्येक आठ पल; (कई आचार्य—दो-दो पल प्रत्येक मानते हैं) निर्वापण के लिए बचे स्नानोदक के साथ शंखनाभि आदि की पीसकर (स्नान में गुणोत्पादन के लिए मिलाकर) निरन्तर बिना आलस्य के स्नान को कछड़ी से हिलाते हुए पाक करना चाहिए । यह स्नान न बहुत घना (ठोस) और न बहुत पतला रहे ऐसा यत्न करना चाहिए । जिस समय यह स्नान पाक हो चुके (पाक के समीप पहुँच जाये) तब इसको
१ मुष्क वृक्ष-श्वेतपुष्पः कालपुष्पो रक्तपुष्पस्तथैव च । पीतपुष्पोवरस्तेषु कालपुष्पः प्रकीर्तितः ।
अ० ११]
सूत्रस्थानम्
३६
आग पर उतारकर लोहे के घड़े में डालकर—मुख बन्द करके लूह छिपाकर रख देना चाहिये। यह मध्यम स्तर है।
वि० मन्तव्य—यदि पाक के पश्चात् कड़ी धूप में सुखा दिया जाय तो सूखा "स्तर" बन जाता है, जैसा—जौखार, नौसादर एवं सजी खार आदि बाजार में मिलते हैं। मुश्क कृष्ण को मोखा भी कहते हैं। गिरिसानुज—पर्वत की चोटी पर उत्पन्न। संक्षेपतः—मोखा आदि किसी एक अथवा कुटज पलाश आदि अनेक खारीय काष्ठों या अपामार्ग आदि के पद्माक्ष को जलाकर भस्म बना लें, भस्म को ६-८ गुने जल में भिगो दें या घोल दें—८-१२ ग्रह में भस्म का स्तर घुल जाता है (भस्म नीचे रह जाती है जो फेंक दी जाती है इस में कुछ नहीं रहता) और नितारकर जल को पृथक् कर लिया जाता है। स्तर मिट्टी के पात्र को खार देता है, अतः लोहपात्र लगे अन्यथा स्तर पसीज जाता है, भाण्ड में मोर्चा लग जाता है, वर्ण एवं रस विकृत हो जाते हैं। इससे भी उत्तम काच भाण्ड (बोतल) होता है ॥११॥
एष चैदाप्रतीवापः पक्वः संयुद्धिमो मृदुः ॥१२॥
इसी मध्यम स्तर में यदि प्रतिवाप्य द्रव्यों का प्रक्षेप न करके पाक कर लिया जाये, तो यही मृदुस्तर बन जाता है। (प्रतिवाप्यद्रव्य—शंखनाभि आदि है) ॥१२॥
प्रतिवापे यथालाभं दन्तीद्रवन्तीचित्रकलाङ्गलीपूती-कप्रवालतालपत्रीविडसुवर्चिकाकनकक्षीरीहिङ्कुवचातिविषाः समाश्लक्षणचूर्णाः शुक्तिप्रमाणः प्रतीवापः। स एव सप्रतीवापः पक्वः पाक्यस्तीक्ष्णः ॥१३॥
तीक्ष्णस्तर—कट शर्करा आदि प्रक्षेप दिये (मध्यम) स्तर में यथायोग्य दन्ती (जमाल-गोटा), द्रवन्ती (मोगलई एरण्ड), चित्रक, लांगली (कलि हारिका), पूतीक पल्लव (नाटा करञ्ज के पत्ते), तालपत्री (मूसली), विडनमक, हुलहुल, कनकक्षीरी (स्वर्ण पुष्पी चोक), हींग, वच, अतीस ये सब शुक्ति प्रमाण में लेकर—बारीक चूर्ण करके मिला देना चाहिये। इन प्रतिवाप्य द्रव्यों के साथ पकाया हुआ स्तरपाक नामक तीक्ष्ण होता है। प्रतिवाप का लक्षण—द्रवद्रव्ये द्रव्यान्तरं श्लक्षणपिष्टं दीयते स प्रतिवाप उच्यते ॥१३॥
१ स्तर में गुणाधिक्य के लिये—दक्ष शक्नुत आदि भी डालते हैं। यथा—
श्लक्षणं शक्नुदक्षशिखिगुधकंककपोतजम् ।
चतुष्पातपक्षि पिताल मनोह्ला लवणानि च ॥
(२) लोहे के पात्र में रखने से गुणाधिक्य है।
(३) मुष्कादवहामानांचु रसः प्रच्यवते यदा।
भस्मना सह संयुक्तं काठिन्यमधिगच्छति ॥
तेषां यथाव्याधिवलमुपयोगः ॥१४॥
इन मृदु मध्य-तीक्ष्ण-स्तरों का व्याधि के अनुसार उपभोग करना चाहिये ॥१४॥
क्षीणबले तु स्तारोदकमावपेद्रुलकरणार्थम् ॥१५॥
यदि काल के कारण अथवा हीनोपधि के कारण स्तर मृदु हो जाये, तब स्तर में पूर्व विधि से बनाया स्तारोदक मिलाकर फिर पाक करना चाहिये, जिससे कि तीक्ष्णता-बल उत्पन्न हो जाये ॥१५॥
भवतश्चात्र—
नैवातितीक्ष्णो न मृदुः शुक्लः श्लक्ष्णोऽथ पिच्छलः।
अविष्यन्दी शिवः शीघ्रः स्तारो ह्यष्टगुणः स्मृतः ॥१६॥
कहा भी है— स्तर के गुण दोष—स्तर का अति तीक्ष्ण (१०० तक गिनने से पूर्व यदि स्तर एरण्ड नाल को जला देता है—तो अति तीक्ष्ण) न होना, न मृदु होना, शुक्ल—सफेद, श्लक्ष्ण—(कर्कश न होना), पिच्छल, अविष्यन्दी (न फैलनेवाला), शिवः (सौम्य), शीघ्र (शीघ्रकारी)—ये स्तर के आठ गुण हैं।
वि० मन्तव्य—अविष्यन्दी—पसीजा हुआ न हो ॥१६॥
अतिमाद्वर्चश्रेत्सौषण्यतैक्ष्णयपेच्छित्यसर्पिताः।
सान्द्रताऽपक्वता हीनद्रव्यता दोष उच्यते ॥१७॥
स्तर के दोष—अति कोमल, बहुत ठण्डा, अति उष्ण, अति तीक्ष्ण, अति पिच्छल, बहुत फैलनेवाला, बहुत घना, कच्चा पका हुआ (अपक), हीन द्रव्यों से बना ये स्तर के दोष हैं। वाग्भट ने अतितु यह एक दोष स्तर का अधिक दिया है ॥१७॥
तत्र स्तारसाध्यव्याधिव्याधितमुपवेश्य निवातातपे देशेऽसंबाधेऽग्नौपहरणीयोक्तेन विधानेनोपसंभूतसंभारं, ततोऽस्य तमवकाशं निरीक्ष्यावृष्ट्यावलिष्य प्रच्छयित्वा, गलाकया स्तारं प्रतिसारयेत्, दक्खा वाक्शतमात्रमुपेतोत् ॥
स्तर प्रतिसारण विधि—
स्तर द्वारा साध्य रोग से पीड़ित मनुष्य को वायु रहित, सूर्य के प्रकाश में, खुले स्थान में बिठाना चाहिये। अग्नोपहरणीय अध्याय में कहे प्रशस्त तिथि करण नक्षत्र मुहूर्त आदि की विधि से स्तरकर्म के लिये सब समान तैयार करके (यन्त्र-शस्त्र स्तर-अग्नि आदि पास में रखकर) इस रोगी के रुग्ण
१ संव्यूहं हिमस्तथा पाक्यो द्विविधः चार इष्यते।
पाक्यस्तु सप्रतिवापः तीक्ष्णोऽन्यस्तु भवेत् पुनः ॥
सुधादिवर्गं पिष्ट्वा तु सिचेत् स्तारोदकैः शनैः।
तेनैव तं पुनः पिष्ट्वा त्वपः पात्रे निधापयेत् ॥
एष संव्यूह हिमस्तारो मृदुः।
४०
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ११ ]
स्थान को देखकर, पित्त दुष्ट स्थान का घर्षण करके, वात दुष्ट स्थान का लेखन करके, कफ दुष्ट स्थान पर पाछने—लगाकर शलाका द्वारा क्षार लगाना चाहिये। क्षार लगाकर सौ अक्षर के बोलने के समय तक प्रतीक्षा करनी चाहिये। इतने समय में जो क्षार जला देता है, वह क्षार उत्तम है।
वि० मन्तव्य—वाक् शत या १०० मात्रा (१ मिण्ट)। १८८
यस्मिन्निपतिते व्याधौ कृष्णता दग्धलक्षणम्।
तत्राम्लवर्गः शमनः सर्पिर्मधुकसंयुतः ॥१६॥
अथ चेतु स्थिरमूलत्वात् क्षारदग्धं न शीर्यते।
इदमालेपनं तत्र समग्रमवचारयेत् ॥२०॥
✓रुग्ण स्थान में जलने से यदि कृष्णमा उत्पन्न हो जाये तो भली प्रकार से दग्ध समझना चाहिये।
सम्यग् दग्ध होने के पीछे—सौवीरक, तुषोदक, धान्याम्ल आदि अम्लवर्ग को धी एवं मुल्हड्डी से मिलाकर लगाना चाहिये। यह पीड़ा शामक है। यदि जड़ के टूटने होने से क्षार से जला हुआ भाग विशीर्ण नहीं होता, तो आगे कहे सम्पूर्ण लेप को लगाना चाहिये।
वि० मन्तव्य—क्षार के प्रभाव को अम्ल रस मन्द तथा शान्त कर देता है, फलतः क्षार से उत्पन्न दाह आदि बेदना शान्त हो जाती है और सूर्य की तीक्ष्ण किरणें भी क्षारीय होती हैं, अतएव 'लू', या 'उष्णोपधात' (शा० सं० प्र० खं अ० ७) में आम का पन्ना या इसली आलू बुलारा का पन्ना (घोल-पानक) पीने से लाभ होता है और चूना से मुखगक (निनामा-सर्वस्वर नामक मुख रोग) हो जाने पर कांजी के कुरले करने से लाभ होता है। माधुर्य का तात्पर्य है मृदु या मन्द हो जाना। क्षारदग्ध पर अम्लरस को मृदु बनाकर लगाना चाहिये, यथा कांजी। तीव्र अम्ल हानिकारक होता है। गन्धकाम्ल आदि अम्ल दाहक होते हैं। क्षार के समान अम्ल भी दाहक होता है परन्तु मृदु कर लेने पर दोनों ही दाह शामक हो जाते हैं।
अम्लकाञ्चिकबीजानि तिलान् मधुकमेव च।
प्रपेक्ष्य समभागाणि तेनैनमनुलेपयेत् ॥११॥
तिलकल्कः समधुको घृताको त्रणरोपणः।
लेप—अम्ल काञ्चिक के नीचे स्थित द्रव्य (किण्व), तिल, मुल्हड्डी, इनको समान भाग में पीसकर क्षारदग्ध स्थान पर लेप करना चाहिये। क्षारदग्ध भाग के विशीर्ण होने के पश्चात् उत्पन्न वृण में वृण को भरने के लिये मुल्हड्डी के साथ तिल कल्क को धी में मिलाकर लगाने से क्षार जन्म वृण भर जाता है। (संग्रह में—माखती वृषाकोलनिम्यास्फोतपटोलीकरवीरपत्र-क्वाथेन वृणप्रक्षालनम्। एषामेव च कल्कक्वाये सिद्धं सर्पि-स्तैलं वा रोपणम्) ॥२१॥
रसेनाम्लेन तीक्ष्णेन बीर्याण्णेन च योजितः ॥२२॥
आग्नेयेनाग्निना तुल्यः कथं क्षारः प्रशाम्यति।
एवं चेन्मन्यसे वत्स ! प्रोन्मयमानं निबोध मे ॥२३॥
अम्लवर्जान् रसान् क्षारे सर्वानेव विभावयेत्।
कटुकस्तत्र भूयिष्ठो लवणोऽनुरसस्तथा।
अम्लेन सह संयुक्तः स तीक्ष्णलवणो रसे ॥२४॥
माधुर्य भजतेऽत्यर्थं तीक्ष्णभावं विमुञ्चति।
माधुर्याच्छममाप्नोति बहिर्माद्विरिवाप्लुतः ॥२५॥
✓है वत्स ! यदि तुम यह समझो कि तीक्ष्ण गुण युक्त, उष्ण वीर्य, आग्नेय गुणी अम्लरस से मिलकर अग्नि के समान गुणी क्षार किस प्रकार शान्त होता है—तो इसको सुनो—क्षार में अम्ल को छोड़कर और सब रस होते हैं। क्षार में कटु रस की प्रधानता रहती है और लवण रस अनुरस हैं। (कड़ियों का विचार है कि लवण रस प्रधान रहता है और कटुरस अनुरस होता है, क्योंकि अम्ल खाने पर, लवण रस ही खाते हैं)। तीक्ष्णलवणरस अम्लरस के साथ मिलकर बहुत अधिक मधुर हो जाता है। अपनी तीक्ष्णता को छोड़ देता है। माधुर्य के कारण शान्त हो जाता है, जिस प्रकार की आग पानी से शान्त हो जाती है। (चरक में कहा है—'क्षारो हि याति माधुर्यं शीघ्रमम्लोपसंहितः')। *चरक चि० अ० २४ ॥२२-२५॥
तत्र सम्यग्दग्धे विकारोपशमो लाघवमनास्त्रावश्व।
हीनदग्धे तोदकण्डुजाड्यानि व्याधिबुद्धिश्च।
अतिदग्धे दाहपाकरागस्त्रावाङ्गमर्दकलमपिपासामू-
च्छोः स्मुरंरणं वा ॥२६॥
सम्यक प्रकार से जलने पर—अङ्गों में लघुता आ जाती है, रोग की शान्ति और किसी प्रकार का स्त्राव नहीं होता।
हीन दग्ध—(कम जलने पर) होने पर—तोद (पीड़ा), कण्डू एवं जड़ता तथा रोग की बुद्धि होती है।
अति दग्ध होने पर—दाह (जलन), पार्क (पकना), रोंग (लुलिया), स्राव, अङ्गमर्द (अङ्गों का टूटना), कलम (रुलानि), पिपासा, मूच्छा अथवा मूल्य होती है ॥२६॥
क्षारदग्धव्रणं तु यथादोषं यथान्याधि चोपक्रमेत् ॥२७॥
क्षार से जले वृण की—दोषानुसार—तथा रोग की अपेक्षा से चिकित्सा करनी चाहिये ॥२७॥
अथ नैते क्षारकृत्याः--तद्यथा--दुर्बलबालस्थविरभीरु-सर्वाङ्गशूनोदरिरुपित्तगभिष्ययुत्तमतीप्रवृद्धस्वविरप्रमेहिरुक्ष-
१ अम्लो हि शीतः स्पृशेन क्षारस्तनोपसंहितः।
यात्याशु स्वादुता तस्माद्विनावापयेत्तन्नाम् ॥
(२) यत्तश्चोण्णतमः क्षारः शैत्यं चाऽम्लरसेऽधिकम्।
तस्मात् सेकप्रदेहाभ्यामम्लं क्षारं तिबर्त्तयेत् ॥वाग्भट्ट॥
अ० १२ ]
६
सूत्रस्थानम्
४९
क्षतक्षीणतृष्णा मूच्छोपद्रुतकलीबापवृत्तोद्बुत्तफलयोनयः ॥
निम्न पुरुषों में क्षार कर्म नहीं करना चाहिये—यथा— दुर्बल, बालक, बुद्ध, भीरु, जिसके सब अङ्गों पर सूजन आ गई हो, उदर रोगी, रक्तपित्त रोगी, गर्भिणी, श्रुतुमती, तीव्र ज्वर रोगी, प्रमेही, उरःक्षत रोगी, क्षीण, तृष्णा रोगी, मूच्छा रोगी, कलीब, क्षीण शुक्र, स्थान से योनि के ऊपर चढ़ जाने पर या स्थान से योनि के भ्रंश हो जाने पर, स्थान से अण्ड के ऊपर चढ़ जाने पर, तथा स्थान से अण्ड के भ्रंश हो जाने पर क्षारकर्म नहीं करना चाहिये। (इनमें कुछ रोगी प्रतिसारणीय क्षार के, कुछ पानीय क्षार के लिये निषिद्ध हैं। सर्वाङ्गशूनोदरी को कोई पृथक् पृथक् मानकर, जिसका सारा शरीर सूज गया, एवं जलोदरी में क्षार कर्म न करे—ऐसा अर्थ करते हैं)।
वि० मन्तव्य—यहाँ योनि—गर्भाशय या धरा का नाम है ॥२८॥
तथा समसिरास्नायुसन्धितरुणास्थिसेवनीधमनीगलनाभिन्खान्तःशोफःक्षोतःस्वल्पमांसेषु च देशेऽवदणोश्च न दद्यादन्यत्र वर्त्मरोगात् ॥२९॥
प्रदेश विशेष से निषेध—मर्म, शिरा, स्नायु, सन्धि, तरुणास्थि, सेवनी, धमनी, गल, नामि, नख, शिरन के अन्दर क्षोता में, जिन स्थानों में मांस कम हो, और वर्त्म रोग को छोड़कर आँखों में भी क्षार कर्म नहीं करना चाहिये ॥२९॥
तत्र क्षारसाध्येष्वपि व्याधिषु शूनगात्रमस्थिशूलिनमःत्रद्वेषिणं हृदयसन्धिपीडोपद्रुतं च क्षारो न साध्यति ॥३०॥ क्षार कर्म द्वारा साध्य रोगों में भी—निम्न अवस्थाओं में क्षार कर्म सफल नहीं होता। जिनका शरीर सूज गया हो, अस्थि शूल युक्त, अचक्षुषी, हृदयरोगी, सन्धिरोगी में क्षार कर्म सफल नहीं होता। (दुर्बल, बालक और बुद्ध आदि प्रतिसारणीय क्षार के लिये अयोग्य हैं)।
वि० मन्तव्य—तीक्ष्ण या तीव्रक्षार—सवमुत्त विष के समान विषादजनक या मारक, अग्नि के समान दाहक—जलन उत्पन्न करनेवाला, शस्त्र के समान छेदन-भेदन करनेवाला और बिजली के समान सद्योमारक होता है। कास्टिक सोडा, लवणारू (लवण का तेजाव), तथा अन्यान्य क्षार कितने भयानक हैं यह सर्वसाधारण भी जानते हैं। इनका प्रयोग लगाने तथा खाने में बहुत सोच-समझकर करना चाहिये ॥३०॥
भवति चात्र—
विषाग्निनशाशनिमृत्युकल्पः
क्षारो भवत्यल्पमतिप्रयुक्तः ।
स धीमता सम्यगनुप्रयुक्तो
रोगान्निहन्त्यादचिरेण घोरान् ॥३१॥
कहा भी है—
अल्प मतिवाले मनुष्य से प्रयुक्त किया हुआ क्षार—विष, अग्नि, शस्त्र, बिजली के समान मारक होता है। बड़ी क्षार बुद्धिमान् मनुष्य से प्रयुक्त किया जल्दी से तीव्र रोगों को शान्त कर देता है, जिस प्रकार विष-मनुष्य को शीघ्र मार देता है, उसी प्रकार से क्षार भी ठीक प्रकार से प्रयोग न किया हुआ—मनुष्य को मार देता है ॥३१॥
इति श्रीशुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने क्षारपाक-
विधिनामैकादशोऽध्यायः ॥११॥
द्रादशोऽध्यायः
अथातोऽग्निनिकर्मविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे अग्नि कर्म की व्याख्या करते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था।
वि० मन्तव्य—अग्नि द्वारा दागना, रूग्ण स्थान को जलाना आदि “अग्निनिकर्म” कहाता है ॥१,२॥
क्षारादग्निगरीयान् क्रियासु व्याख्यातः, तद्ग्रहणानां रोगाणामपुनर्भावदाद्भेषजशस्त्रक्षारैरसाध्यानां तत्साध्यत्वाच्च ॥३॥
क्षार (गुरु) से अग्नि कर्मों में श्रेष्ठ (गुरुतर) है। अग्नि से जले हुए रोगों के फिर उत्पन्न न होने के कारण, भेषज-शस्त्र एवं क्षार द्वारा असाध्य रोगों के इसके द्वारा साध्य होने से अग्नि श्रेष्ठ है। (अंग्रेजी में दाह को ‘एकच्युल कोटरी’ कहते हैं। इसके सिवाय विद्युत् तथा आग से दहन कर्म होता है) ॥३॥
अथेमानि दहनोपकरणानि भवन्ति—तद्यथा—पिप्प-त्यजाशक्रदुग्दोदन्तशरअलाकाजाम्बवौष्टितरलौहाः क्षौद्रगुडस्नेहाश्च । तत्र, पिप्पत्यजाशक्रदुग्दोदन्तशरअलाकास्वग्गतानां, जाम्बवोष्टेतरेलौहा मांसगतानां, क्षौद्रगुडस्नेहाः सिरास्नायुसन्ध्यस्थिगतानाम् ॥४॥
१ तन्त्रान्तर में क्षारविधि—
प्रशस्तेऽग्निन नक्षत्रे कृतं मंगलपूर्वकम् । कालमुक्तकमादाय दग्ध्वा भस्मं सभावेत् ॥ आढकं त्वेकमादाय जलद्रोणे पचैद् भिषक् । चतुर्भगिावशिष्टं तु वस्त्रपूतेन वारिणा । शस्त्रचूर्णस्य कुडवं प्रक्षिप्य विपत्तं पुनः । शनेर्मुद्रनिना पाच्यं यावत् सान्द्रं तनुर्भवेत् ॥ सजिकायावशुकाभ्यां शुण्ठीमरिचपिप्पलीः । वचाभतिविर्वा चैव हिगुचित्रकयोस्तथा ॥ एषां चूर्णं विनिक्षिप्य पृथक्त्वेनाष्टमाषकम् । दव्यां संघट्टितं चापि स्थापयेदायसे घटे । एष वक्ष्मिसमः चारः कीर्तितः काश्यपादिभिः ॥
भानुभवी ।
४२
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १२
दहन कार्य के निम्न साधन हैं। यथा—पिप्पली, अजा शकृत (बकरी की मींगनी), गाय का दन्त, शर, शलाका, जाम्बवौष्ट, इतरलोह (लोहा ताँवा-चाँदी आदि), शहद, गुड़ और स्नेह (तैलादि)। इनमें पिप्पली, अजाशकृत, गोदन्त, शर, शलाका से त्वचा के रोगों में, जाम्बवौष्ट, इतरलोह से मांस के रोगों में, मधु, गुड़ और स्नेह से सिरा, स्नायु, सन्धि-गत रोगों में अग्निकर्म करना चाहिये ॥४॥
तत्राग्निकर्म सर्वतुषु कुर्यादन्यत्र अरद्भ्रीष्माभ्यां, तत्राप्यात्ययिकेऽग्निकर्मसाध्ये व्याधौ तत्प्रत्यनीकं विधिं कृत्वा ॥५॥
शरद् (पित्तप्रकोप के कारण), और श्रीष्म श्रुतु को छोड़कर अन्य सब ऋतुओं में अग्निकर्म करना चाहिये। इन ऋतुओं में भी यदि आवश्यकता पड़े तो, विपरीत उपचार (शीताच्छादन, भोजन आदि) करके, अग्निकर्मसाध्य रोगों में अग्निकर्म करना चाहिये। यथा—चरक में—“आत्ययिके पुनः कर्मणि काममृतुं विकल्प्य कुत्रिमगुणोपधेन यथर्तुगुणविपरीतेन भेषजं संयोगसंस्कारप्रमाणविकल्पेनोपपाद्य प्रमाणवीर्यसमं कृत्वा प्रयोजयेत्” ॥५॥
सर्वव्याधिष्वतुषु च पिच्छिलमन्मं सुक्तवतः मृदुगर्भाऽमरीभगन्दरोदराग्रीमुखरोगेष्वसुक्तवतः कर्म कुर्यात् ॥६॥
सर्व रोगों में और सब श्रुतुओं में पिच्छिल (बलकारक) गुणवाला अन्न खिलाकर अग्निकर्म करना चाहिये। मृदुगर्भ, अश्मरी, भगन्दर, अर्श, मुखरोगों में त्रिना भोजन कराये कर्म करना चाहिये ॥६॥
तत्र द्विविधमग्निकर्महुरेके-त्वरदग्धं, मांसदग्धं च, इह तु सिरास्नायुसन्ध्यस्थिष्वपि न प्रतिषिद्दोऽग्निरः ॥७॥
कई आचार्यों का मत है कि—अग्निकर्म दो प्रकार का है। यथा—त्वरदग्ध और मांसदग्ध। इस शास्त्र में सिरास्नायु, सन्धि, अस्थि आदि में आवश्यकतानुसार अग्निकर्म करना चाहिये, इसमें अग्निकर्म का निषेध नहीं है ॥७॥
तत्र, शब्दप्रादुर्भावो दुर्गन्धता त्वकसंकोचश्च त्वगदग्धे, कपोतवर्णताऽल्पश्वयथुवेदना शुष्कसंकुचितव्रणता च मांसदग्धे, कृष्णेनन्तव्रणता स्नावसन्निरोधश्च सिरास्नायुदग्धे रूक्षाकृणता कर्कशस्थिरव्रणता च सन्ध्यस्थिदग्धे ॥८॥
त्वचा के जलने पर—शब्दोत्पत्ति, दुर्गन्धता और त्वचा का संकोच होता है। मांस के जलने पर—कबूतर का जैसा
१ कई आचार्यों से अभिप्राय—काव्यप से है। यथा—
“न सिरास्नायुसन्ध्यस्थिममंस्वपि कथंचन।
देशस्योत्कर्त्तनं कार्यं दाहो वा भिषजाऽनिना ॥”
परन्तु रक्ततिस्राव की अवस्था में इनके अन्दर भी अग्निकर्म करना चाहिये। यथा “सिरास्नायुसन्ध्यस्थिच्छेदशोणितातिप्रवृत्तिषु सिरादिदाहः। संग्रहः।
नीला रङ्ग, थोड़ी सूजन, वेदना; व्रण शुष्क और संकुचित होता है। सिरा एवं स्नायु के जलने पर—काला रङ्ग, व्रण का ऊपर उठ जाना, और स्नाव का निरोध हो जाता है। सन्धि-अस्थि के जलने पर—रूक्षता, लालिमा, कर्कशता और व्रण में कठिनता आ जाती है ॥८॥
तत्र शिरोरोगाधिमन्थयोर्भूल्लटाटशङ्खप्रदेशेषु दहेन, वत्सरोरोषवाद्ग्रील्लक्तप्रतिच्छन्नां दृष्टिं कृत्वा वत्सरोमकृपात् ॥९॥
शिर के रोगों में तथा अधिमन्थ (अक्षिरोग) में—भू, ल्लटाट, शङ्ख-प्रदेश में दाह कर्म करना चाहिये। वत्स रोगों में दृष्टि को गीले वस्त्र से ढाँपकर पलकों के बालों को जड़ों में जलाना चाहिये ॥९॥
त्वक्मांससिरास्नायुसन्ध्यस्थिस्थितेऽत्यग्रहजि वायावुच्छितकठिनसुप्तमासे व्रणे ग्रन्थ्यशोर्बुदभगन्दरापचीरलीपदचर्मकीलतिलकालकान्त्रवृद्धिसन्धिंसिराच्छेदनादिषु नाडीशोणितातिप्रवृत्तिषु चार्मिकर्म कुर्यात् ॥१०॥
त्वचा, मांस, सिरा, स्नायुसन्धि-अस्थि में स्थित वायु की तीव्र वेदना में, व्रण में मांस उठ जाये, चेतना रहित मांसयुक्त व्रण में, ग्रन्थि, अर्श, अर्बुद, भगन्दर, अपची, रलीपद, चर्मकील, तिलकालक, अन्त्रवृद्धि, सन्धि रोग, सिरा, छेदन आदि कार्यों में, नाडीव्रण, रक्त के अतिस्राव होने पर—अग्निकर्म करना चाहिये ॥१०॥
तत्र वलय-विन्दु-बिलेखा-प्रतिसारणानीति दहनविशेषाः ॥११॥
रोग के आश्रय भेद से अग्निकर्म चार प्रकार का है। यथा—वलय (गोल चिह्न), विन्दु, बिलेखा (तिरछी, मृग, टेदी—नाना प्रकार की रेखायें) प्रतिसारण—(गरम लोहे की शलाकाओं से अवधर्षण), ये दहनकर्म के भेद हैं। इसके अतिरिक्त संग्रह में—अर्धचन्द्र, स्वस्तिक और अष्टापद तीन अधिक दिये हैं ॥११॥
भवति चात्र—
रोगस्थ संस्थानभवेदय सम्यज्
तरस्य मर्मानि बलायलं च।
व्याधिं तथर्तुं च समोदय सम्यक
ततो व्यवस्येद्विषगग्निकर्म ॥१२॥
कहा भी है—
रोगोत्पत्ति के स्थान को भली प्रकार देखकर, मनुष्य के मर्मों का बल और अवल का विचार करके, श्रुतु, आदि को देखकर वैद्य अग्निकर्म में प्रवृत्ति या निवृत्ति का निश्चय करे ॥१२॥
१ संग्रह में दाहविधि—अथ दाहाहंमातुरं कृतस्वस्त्ययनमुपहृतसर्वोपकरणं प्राक्शिरःसविष्टमाप्ताव-