भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतस्थानम्

[ अ० ६ ]

वानाप्यायतेऽर्कः, तित्कृष्णायकटुकाश्च रसा बलवन्तो भवन्ति, उत्तरोत्तरं च सर्वंप्राणिनां बलमपहीयते ॥७॥

ये शीत उष्ण, वर्षा रूपी छे ऋतुयें, चन्द्रमा और सूर्य के द्वारा काल का विभाग होने से दो अयनों में विभक्त हो जाते हैं। यथा-दक्षिणायन और उत्तरायण, इनमें दक्षिणायन वर्षा, शरद, हेमन्त, इन तीन ऋतुओं से उपलक्षित है। इन वर्षादि ऋतुओं से भगवान् चन्द्रमा उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। अम्ल, लवण और मधुर रस बलवान् होते हैं। सब प्राणियों का बल उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। उत्तरायण-शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म से उत्तरायण बनता है। इन ऋतुओं में सूर्य का बल उत्तरोत्तर बढ़ता है, तित्क, कृष्ण और कटु रस बलवान् होते हैं, सब प्राणियों का बल उत्तरोत्तर घटता जाता है। जैसा चरक में कहा है-यूनां दौर्बल्यमावहन्ति—चरक, सू. अ.।

वि० मन्तव्य—स्थूलरूप से-शीत, उष्ण तथा वर्षा प्रधान-मोटे लक्षण या चिह्न हैं उन ६ ऋतुओं के। यूनानी चिकित्सा-शास्त्र के अनुसार-१-मौसिमे सरदी २-मौसिमे गर्मी तथा मौसिमे वरसात। यह च० वि० अ० ८ के सूत्र १२७ के हेमन्तो ग्रीष्मो, वर्षाश्चेति।—

चरकसंहिता में दक्षिणायन का नाम “विसर्ग” तथा उत्तरायण का नाम “आदान” है।

भारतवर्ष में उक्त दोनों अयनों का तथा तीनों मौसिमों का प्रभाव अन्य देशों की अपेक्षा अधिक व्यक्त होता है, क्योंकि मृण्डल पर ऐसे ही देश हैं जहाँ सवेंदा (वर्ष भर या अधिक मासों तक) एक एक मौसिम का प्रभाव रहता है, यथा-शीत कटिबन्ध के रूस आदि देशों में शीत का, उष्ण कटिबन्ध के अफ्रीका आदि देशों में उष्ण का तथा ब्रह्मा, जावा, सुमात्रा आदि देशों में वर्षा का प्रभाव या आधिक्य रहता है। यद्यपि महत्तर भारत में भी ऐसे तीन प्रकार के प्रदेश (प्रान्त) विद्यमान हैं। और यह क्रम पूर्ण रूप से कहीं भी नहीं घटता, तथापि भौगोलिक दृष्टि से सन्तोष जनक आवश्यक है ॥७॥

भवति चात्र—

शीतांशुः क्लेदयत्यूर्वा विवस्वान् शोषयत्यपि।

तावुभावपि संश्रित्य वायुः पालयति प्रजाः ॥८॥

शीतांशु—चन्द्रमा पृथ्वी को गीला-करता है, विवस्वान्-सूर्य पृथ्वी को सुखाता है। चन्द्रमा और सूर्य दोनों का आश्रय करके वायु प्रजा का पालन करती है। चन्द्रमा का आश्रय करके वायु जगत् में वृद्धि करता है, सूर्य का आश्रय करके

जगत् का शोषण करती है, इस से यथासमय रसोत्पत्ति होती है, जिससे कि प्रजा का पालन होता है।

वि० मन्तव्य—जहाँ पर चन्द्र, सूर्य तथा वायु की उक्त क्रिया जितनी ही व्यक्तरूप से होती रहती है वहाँ पर उतनी ही प्रजा (जनसंख्या) बढ़ती है ॥८॥

अथ खल्वयने द्वे युगपत् संवत्सरो भवति। ते तु पञ्च युगमिति संज्ञां लभन्ते। स एष निमेषादियुगपर्यन्तः काल-श्रकवत् परिवर्तमानः कालचक्रमित्युच्यत इत्येके ॥९॥

इन दोनों अयनों के एक साथ मिलने से संवत्सर बनता है। पाँच संवत्सरो के मिलने से एक युग बनता है। यह काल निमेष से लेकर युग पर्यन्त चक्र के समान घूमता हुआ—‘काल-चक्र’—नाम से कहा जाता है—ऐसा कई आचार्यों का मत है। “पाँचयुग=संवत्सरः, परिवत्सरः, इन्द्रावत्सरः, इद्वत्सरः वत्सरः-इत्येवं पञ्च वत्सराणि—ते पंचयुगमिति संज्ञा लभन्ते ॥” कौटिल्य ने भी पाँच वत्सर को युग कहा है।

वि० मन्तव्य—आयुर्वेदीय शल्यतन्त्र में ५ वर्ष का युग माना जाता है। कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी ५ वर्ष का ही युग माना गया है, यथा—‘पञ्चसम्बत्सरो युगमिति’ कौ० अ० शा० ४१। पुराणों में सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग का वर्णन भिन्न प्रकार से माना जाता है और स्मृतियों में भिन्न प्रकार से।

इह तु वर्षाभरद्वे मन्तवसन्तग्रीष्मप्रावृषः षड् ऋतुवो भवन्ति द्वाषोपचयप्रकोपशयनिमित्तं, ते तु भाद्रपदाद्येन द्विमासिकेन व्याख्याताः। तद्यथा—भाद्रपदाश्वयुजौ वर्षाः; कार्तिकमागशीर्षौ शरत्, पौषमाघौ हेमन्तः; फाल्गुनचैत्रौ वसन्तः, वैशाखज्येष्ठौ ग्रीष्मः, आषाढ़श्रावणौ प्रावृष्टि ॥

इस अध्याय में वर्षा, शरद, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म और प्रावृष्ट (वर्षा का प्रथम समय प्रावृष्ट कहाता है) ये छे ऋतुएँ वातादि दोषों के संचय, प्रकोप, प्रशमन में कारण हैं। ये छे ऋतुएँ भाद्रपद आदि दो दो मासों में उपलक्षित हैं। यथा—भाद्रपद-आश्विन में वर्षा; कार्तिक-मागशीर्ष में शरद; पौष-माघ में हेमन्त; फाल्गुन चैत्र में वसन्त; वैशाख-ज्येष्ठ में ग्रीष्म; आषाढ़-श्रावण में प्रावृष्ट ऋतु होती है।

वि० मन्तव्य—आयुर्वेद शल्यशास्त्र में वात, पित्त एवं कफ के संचय, प्रकोप तथा प्रशम को ध्यान में रखकर उक्त

१ सोम्याः खलु आपः अन्तरिक्षप्रभवाः प्रकृतिशीता लब्ध्याः अन्यत्तरस्राश्च। तास्तु अन्तरिक्षाद् भ्रश्यमाना भ्रष्टाश्च पंचमहा-भूतगुणसमन्विता जंगमस्थावराणां भूतानां मूर्तीरभिप्रीणमस्ति।

चरक० सू० अ० २६