सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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है। इस काल के अधीन ही द्रव्यों के रस को समत्त् या व्यापत् है। मनुष्यों का जीवन एवं मरण भी इसी काल के वश में है। यह थोड़े काल के लिये भी नहीं रुकता, सर्वदा गतिशील रहता है। इसी से इस को काल कहते हैं। अथवा-सब प्राणियों का संहार कर इकट्ठा करता है—इस लिये, अथवा सब भूतों को सुख-दुःख के साथ युक्त करता है, इसलिये इसका काल कहते हैं। अथवा—सब का संक्षेप करता है, सब प्राणियों को मृत्यु के समीप लाता है, इसलिये काल है।
वि० मन्तव्य—यहाँ काल समय का नाम है। वह स्वयम्भू है, स्वभाव सम्भूत है, और अनादि तथा अनन्त है, अतः उसका कोई मध्य भी नहीं हो सकता है। काल के ही प्रभाव से इच्छु, इमली एवं मरिच आदि में मधुर आदि रसों की व्यापत्ति (विकृति) होती है, जैसे जनपदोर्वस आदि के पूर्व औषधियों के रस, वीर्य, गुण, विपाक तथा प्रभाव विकृत हो जाते हैं। और सम्पत्ति (उचित सम्पादन) होती है जैसे सुकाल में। और मनुष्यों के ही नहीं प्राणिमात्र के जीवन मरण अर्थात् उत्पत्ति विनाश का कारण वही काल है, इतना ही नहीं पार्थिव द्रव्यों के निर्माण का कारण भी काल है। उसका सूक्ष्मातिसूक्ष्म काल के लिये व्यवधान-उच्छेद नहीं होता, वह भूतों-प्राणियों तथा पृथिवी आदि भूतों का संकलन = संयोग या निर्माण तथा कलन विकलन वियोग या नाश करता है अर्थात् प्राणियों तथा विश्व के उत्पादन एवं विनाश का कारण काल है। सच यह है कि जैसे ईश्वरवादी उक्त सब का कारण ईश्वर को मानते हैं तथा अन्य सम्प्रदायवाले, शिव, विष्णु, शक्ति आदि को मानते हैं वैसे ही कालवादी काल को मानते हैं ॥३॥
तस्य संवत्सरान्तमनो भगवानादित्यो गतिविशेषेणाक्षिनिमेषकाष्टाकलामुहूर्ताहोरात्रपक्षमांसर्त्तयनसंवत्सरयुगप्र-विभागं करोति ॥४॥
इस संवत्सर रूप काल के भगवान् आदित्य (चन्द्रमा भी) अपनी गति विशेष से निमेष, काष्टा, काल, मुहूर्त, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर, युग का विभाग कर देता है ॥
वि० मन्तव्य—यद्यपि कला का कोई विभाग नहीं हो सकता और न होता ही है, तथापि भगवान् सूर्य की गति (उदय अस्त तथा उत्तरायण एवं दक्षिणायन और मेघादि
१ वृहदारण्यकोपनिषद् में भी कहा है “निह पुरा ततः संवत्सर आस” आनन्दगिरिव्याख्यायाम् पूर्वमिति प्रजापतेरादित्यात्मकत्वाद् तदधीनत्वाच्च संवत्सरव्यवहारस्य, आदित्यात् पूर्व तद्व्यवहारो नासीद् इत्यर्थः ॥
राशियों पर संक्रमण आदि) के भेद से काल के निमेष, काष्टा आदि) विभाग मान लिये जाते हैं ॥४॥
तत्र लब्धवक्षोचाराणमात्रोऽक्षिनिमेषः, पञ्चदशाक्षिनिमेषाः काष्टा, त्रिजग्लाष्टाः कला, विशतिकलो मुहूर्तः, कला-दशाभागश्च त्रिंशमुहूर्तमहोरात्रं, पञ्चदशाहोरात्राणि पक्षः, स च द्विविधः—शुक्लः कृष्णश्च, तौ मासः ॥५॥
इनमें आकारादि लघु अक्षर के उच्चारण में जितना समय लगता है, उसका नाम निमेष है। पन्द्रह निमेषों की एक काष्टा; तीस काष्टा की एक कला; बीस कला और कला का दसवाँ भाग—अर्थात् तीन काष्टा का—एक मुहूर्त; तीस मुहूर्त का एक रात दिन, पन्द्रह रात दिन का एक पक्ष; यह पक्ष दो प्रकार के हैं। शुक्ल और कृष्ण—इन दो पक्षों का मास होता है।
वि० मन्व्यय—यह समय-विभाग श्री धन्वन्तरि के मतानुसार है, भले ही ज्योतिःशास्त्र, धर्म शास्त्र तथा अर्थ शास्त्र के मतानुसार इसमें कुछ भेद क्यों न हों। आयुर्वेद में औषधि के संग्रह, निर्माण तथा सेवन में और वमन विरेचन आदि के विधि निषेध में स्वस्थ वृत्त के नियमपालन आदि में काल-समय का विचार आवश्यक है, अतः इसका ज्ञान भी आवश्यक है।
तत्र माघादयो द्वादश मासाः, द्विमासिकभृतु कृत्वा षड्वतवो भवन्ति; ते शिखिरवसन्तग्रीष्मवर्षाशरद्देमन्ताः, तेषां तपस्तपस्यो शिखिरः, मधुमाघवो वसन्तः, शुचिशुक्रो ग्रीष्मः, नभोनभस्यौ वर्षाः, इषोजौ गरत्, सहःसहस्यौ हेमन्त इति ॥६॥
इन मासों में माघ आदि बारह मास हैं। दो-दो मास के मिलने से छे ऋतुयें बनती हैं। यथा—शिखिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त। इन में—तप (माघ,) तपस्य (फाल्गुन) से शिखिर; मधु—(चैत्र), माघव (वैशाख) से वसन्त; शुचि (ज्येष्ठ) शुक्र (आषाढ़) से ग्रीष्म; नभः (श्रावण) नभस्य (भाद्रपद) से वर्षा; इष (आश्विन) ऊर्ज (कार्तिक) से शरद; सह (मार्गशीर्ष) सहस्य (पौष) से हेमन्त ऋतु होती है ॥
वि० मन्तव्य—सम्भव है शुभ्रतसंहिता के अर्थना काल में माघ मास से १२ मास गिने जाते हों; जैसे वैदिक काल में शरद ऋतु से गिने जाते थे। और आज का ज्योतिःशास्त्र वैशाखमास से गिनता है ॥६॥
त एते शीतोष्णवर्षलक्षणान्द्रादित्ययोः कालविभाग-करत्वादयने द्वे भवतो दक्षिणमुत्तरं च। तयोर्दक्षिणं वर्षाशरद्देमन्ताः, तेषु भगवानाप्यायते सोमः, अरुल्लवणमधुराश्च रसा बलवन्तो भवन्ति, उत्तरोत्तरं च सर्वप्राणिनां बलमभिवर्धते। उत्तरं च शिखिरवसन्तग्रीष्माः, तेषु भग-
१ देखिये चरक संहिता सूत्रस्थान अ० ६ सूत्र ४-८ ॥