सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतस्थानम्
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(सब प्रकार के कष्ट) संदां शान्त हो, तू पीड़ा रहित हो जाये। इति स्वाहा—इस प्रकार से उपरोक्त मंत्रों द्वारा आहुति देनी चाहिये ॥२०-३२॥
एतैर्वेदात्मकैर्मन्त्रैः कृत्यानाधिविनाशनैः । मयैवं क्रुतरक्षस्त्वं दीर्घमायुरवाप्नुहि ॥३३॥
इन सब उपयुक्त कृत्यानाशक वेद मन्त्रों से मुझ द्वारा रक्षा किया हुआ तू दीर्घायु को प्राप्त कर ॥३३॥
ततः क्रुतरक्षमातुरमागारं प्रवेश्य, आचारिकमादिशेत् ॥
✓ ब्रण रोगी को इस उपरोक्त विधि से रक्षा करके रोगी को घर में प्रविष्ट कराके आचारिक कर्म (आहार विहार रूपी ब्रणि-तोपासनीय अध्याय में कहे) का उपदेश कर देना चाहिये ॥
ततस्तृतीयेऽह्नि विमुच्यैवमेव बन्नीयाद् बन्धपट्टनः । न चैनं त्वरमाणोऽपरेद्युमांक्षयेत्, द्वितीयदिवसे परिमोक्ष- णाद्विप्रथितो ब्रणशिचरादुपसंरोहति, तीव्ररुजश्च भवति ॥
✓ इसके पश्चात् तीसरे दिन इस ब्रण को खोलकर कषाय से धोकर पूर्व की भांति फिर पट्टी से बाँध देना चाहिये। जल्दी की दृष्टि से इस ब्रण को दूसरे दिन नहीं खोलना चाहिये। क्योंकि दूसरे दिन ब्रण के खोलने से ब्रण अंकुरित नहीं होता, गांठ पड़ जाती है, देर में रुजता है और बहुत पीड़ा होती है ॥
अत ऊर्ध्वं दोषकालबलादीनवेद्य कषायालेपनबन्धा- हाराचारान् विदध्यात् ॥३६॥
तीसरे दिन के पश्चात् आगे दोष (वात आदि), काल (हेमन्त आदि), बल (हीन-मध्यम, उत्तम)--वयःसाल्य आदि को देखकर कषाय, लेपन, बन्धन, आहार, आचार (विहार) करना चाहिये ॥३६॥
न चैनं त्वरमाणः सान्तद्वीर्षं रोपयेत्, स ह्यल्पेनाप्य- पचारिणाभ्यन्तरमुत्सङ्गं कृत्वा भूयोऽपि विकरोति ॥३७॥
जल्दी के कारण से दोष सहित (पूय को अन्दर रखकर) ब्रण का रोपण नहीं करना चाहिये। क्योंकि इस प्रकार के ब्रण में थोड़ा सा भी विरुद्ध कर्म होने पर यह ब्रण अन्दर ही कोटर बनाकर विकार को करता है। मुनि ने शुद्ध ब्रण का लक्षण—
नातिरक्तो नातिपाण्डुनातिशयावो न चातिरक्तः ।
न चोत्सन्नो न चोत्संगी शुद्धो रोप्यः परं वणः ॥
यह किया है ॥३७॥
भवन्ति चात्र—
तस्मादन्तर्बहिश्चैव सुमुद्गं रोपयेद् ब्रणम् ।
रूढेऽप्यजीर्णव्यायामव्यायादीन् विवर्जयेत् ।
हर्षं क्रोधं भयं चापि यावत् स्थैर्योपसंभवात् ॥३८॥
कहा भी है—
इस लिये अन्दर और बाहर से शुद्ध हुए ब्रण का ही रोपण करना चाहिये। ब्रण के भर जाने पर भी जब तक ब्रण में
हृदता न आये तब तक अजीर्ण, व्यायाम, मैथुन, हर्ष, क्रोध, भय आदि का परित्याग करना चाहिये। अर्थात् संग्रह में—रूढेऽप्यजीर्णव्यायामव्यायादीन् विवर्जयेत् ।
मासान् षट् सप्त वा नूणां विधिरेष प्रशस्यते ॥३९॥
हेमन्ते शिशिरे चैव वसन्ते चापि मोक्षयेत् ।
ऽयहात् द्रव्यहात्करद्रुग्रीष्मवर्षास्त्वपि च बुद्धिमान् ॥३९॥
✓ हेमन्त और शिशिर ऋतु में तथा वसन्त में तीसरे दिन पट्टी करनी चाहिये। शरद्, ग्रीष्म और वर्षा में दूसरे दिन, पट्टी करनी चाहिये। क्योंकि हेमन्त आदि में शीघ्र पाक का भय नहीं, ग्रीष्म आदि में भी पैतिक ब्रण की अवस्था में दूसरे दिन पट्टी बदलनी चाहिये। शरद् ऋतु में पैतिक ब्रण की अवस्था में दिन में दो बार पट्टी बदलनी चाहिये ॥३९॥
अतिपातिषु रोगेषु नेच्छेद्विघिसंमं भिषक् ।
प्रदीप्तमागारवच्छोघ्रं तत्र कुर्यात् प्रतिक्रियाम् ॥४०॥
अपवाद-जिन आत्ययिक रोगों में जल्दी का काम हो (पूयसाव आदि उपद्रव अधिक हों) उन में वैद्य को चाहिये कि वह उपयुक्त विधि का खूँटा पकड़कर न बैठ जाये। ऐसी अवस्था में जलते हुए घर के समान जल्दी की चिकित्सा करनी चाहिये ॥४०॥
या वेदना शस्त्रनिपातजाता तीव्रा शरीरं प्रदुनोति जनतोः । घृतेन सा शान्तिमुपैति सित्ता कोष्णेन यद्योमधुकान्वितेना ॥
शस्त्रावचरण के कारण उत्पन्न हुई जो तीव्र वेदना रोगी को कष्ट देती रहती है, वह वेदना मुलहटी के चूर्ण को घी में मिलाकर-थोड़ा गरम करके लगाने से शीघ्र शान्त हो जाती है।
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽग्नोपहरणीयो
नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥
पञ्चोऽध्यायः ।
अथात ऋतुचर्यमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
हेमन्त आदि ऋतुओं में जिस प्रकार का आचरण करना चाहिये, वह कहते हैं; जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१;२॥
कालो हि नाम(भगवान्) स्वयम्भुरनादिमध्यनिधनः । अत्ररसव्यापत्संपत्ती जीवितमरणे च मनुष्याणामायत्ते । स सूदमामपि कलां न लीयत इति कालः, संकलयति कालयति वा भूतानीति कालः ॥३॥
जिस वस्तु के ऋतुर्प अंगभूत हैं, उस काल को कहते हैं—यह प्रसिद्ध काल-भगवान्-स्वयं उत्पन्न हुआ है, किसी ने इसको उत्पन्न नहीं किया; आदि मध्य निधन-विनाश से रहित