भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ५ ]

सूत्रस्थानम्

१९

भानुमतीवाली निषेध सागर की पुस्तक में—पत्रेणाच्छाद्य के स्थान पर कल्केनाच्छाद्य पाठ है ॥१७॥

ततो गुग्गुल्यगुरुसजंरसवचागौरसर्पपचूर्णैर्लवणनिम्बपत्रविमिश्रैरज्ययुक्तैर्घृष्येत, आज्यशेषेण चास्य प्राणान् समालभेत ॥१८॥

उदकुम्भाच्छापो गृहीत्वा प्रोक्षयन् रक्षाकर्म कुर्यात्, तद्वदयामः—॥१९॥

धूपन द्रव्य—इसके अनन्तर, गुग्गुलु, अगर, राल, बच, श्वेत सरसों, सैन्धानमक, नीम के पत्ते इनको मिलाकर घी के साथ धूपन करना चाहिये। धूपन कार्य से बच्चे घी आदि द्रव्य से रोगी के मर्म स्थानों को मलना चाहिये, इससे रोगी में जान आती है। बड़े में से हाथ में पानी लेकर रोगी का परिमार्जन करते रक्षा कर्म१ करना चाहिये ॥१८, १९॥

कृत्यानां प्रतिघातार्थं तथा रक्षोभयस्य च । रक्षाकर्म करिष्यामि ब्रह्मा तदनुमन्यताम् ॥२०॥ नागाः पिशाचा गन्धर्वाः पितरो यक्षराक्षसाः । अभिद्रवन्ति ये ये त्वां ब्रह्माद्या घ्नन्तु तान् सदा ॥२१॥ पृथिव्यासन्तरिक्षे च ये चरन्ति निशाचराः । दिक्षु वास्तुनिवासान्श्च पान्तु त्वां ते नमस्कृताः ॥२२॥ पान्तु त्वां मुनयो ब्राह्म्या दिव्या राजर्षयस्तथा । पर्वतारुचैव नद्यश्च सर्वाः सर्वे च सागराः ॥२३॥ अग्नी रक्षतु ते जिह्वां प्राणान् वायुस्तथैव च । सोमो न्यानमपानं ते पर्जन्यः परिरक्षतु ॥२४॥ उदानं विद्युतः पान्तु समानं स्तनयित्वनवः । बलमिन्द्रो बलपतिर्मनुमन्ये मतिं तथा ॥२५॥ कामांस्तै पान्तु गन्धर्वाः सत्त्वमिन्द्रोऽभिरक्षतु । प्रज्ञां ते वरुणा राजा समुद्रा नाभिमण्डलम् ॥२६॥ चक्षुः सूर्यां दग्धः श्रोत्रे चन्द्रमाः पान्तु ते मनः । नक्षत्राणि सदा रूपं छायां पान्तु निशास्तव ॥२७॥ रेतस्त्वाण्याययन्त्वापो रोमाण्याषधयस्तथा । आकाशं खानि ते पान्तु देहं तव वसुन्धरा ॥२८॥ वैश्वानरः शिरः पातु विष्णुस्तव पराक्रमम् । पौरुषं पुरुषश्रेष्ठो ब्रह्माऽऽत्मानं ध्रुवो ध्रुवौ ॥२९॥

१ रक्षाकर्म—धूपन कार्य से जहाँ ब्रण की दुर्निधि मिटती है, वहाँ पर कृमि आदि का भी सम्बन्ध नहीं होता ! आर्य ग्रन्थों में कृमि, राक्षस, निशाचर आदि प्रायः वर्त्तमान कालीन germs को ही कहते हैं। क्योंकि इन दोनों के कार्य-भोजन, रहने का स्थान, एवं चिकित्सा एक ही है। अपवित्र वस्तुओं से इनको स्नेह है, पवित्र कार्यों से दूष है। इसी से Sterilization या Aseptic कार्य को 'रक्षा कर्म' वास्तव में कहा है।

एता देहे विशेषेण तव नित्या हि देवताः । एतास्त्वां सततं पान्तु दीर्घमायुरवाप्नुहि ॥३०॥ स्वस्ति ते भगवान् ब्रह्मा स्वस्ति देवाश्च कूर्वताम् । (स्वस्ति ते चन्द्रसूर्यौ च स्वस्ति नारदपर्वतो ॥) स्वस्थगिनश्चैव वायुश्च स्वस्ति देवाः सहन्द्रगाः ॥३१॥ पितामहकृता रक्षा स्वस्यायुवधंतां तव । ईतयस्ते प्रशाम्यन्तु सदा भव गतव्यथः ॥३२॥ इति स्वाहा ॥ रक्षा कर्म को कहते हैं—

कृत्या (अभिचार जनित राक्षसी कर्म) के निवारण के लिये, तथा राक्षसों के भय को दूर करने के लिये रक्षाकर्म कर्त्तव्य,— ब्रह्मा इस कर्म का अनुमोदन करें, (सहायता करें)।

जो जो बासुकि आदि नाग, पिशाच (मांस खानेवाले), गन्धर्व, कुबेरादि यक्ष, रावण आदि राक्षस जो जो दुष्ट वृणी को पीड़ित करते हैं, उन सबों को ब्रह्मा आदि देवता नष्ट करें।

पृथ्वी में, अन्तरिक्ष में, दिशाओं में जो जो राक्षस विचरते हैं या घर में रहते हैं, वे सब नमस्कार ग्रहण करके, दुष्ट वृणी की रक्षा करें, सब पर्वत, सब नदियाँ और सब सागर तेरी रक्षा करें। अग्नि तेरी जिह्वा की रक्षा करे, वायु तेरे प्राणों की; चन्द्रमा ध्यान की, बादल तेरे अपान की रक्षा करें। विद्युत् तेरे उदान की, बादल तेरे समान—वायु की रक्षा करे। बलपति इन्द्र तेरे बल की, मनु-प्रजापति तेरी बुद्धि तथा मन्यों (श्रीवा के पिछे की दो शिराओं) की रक्षा करे। तेरी इच्छाओं की रक्षा गन्धर्व करें। तेरे सत्त्व (मन) की रक्षा इन्द्र करें; वरुण राजा तेरी प्रज्ञा की; समुद्र नाभिमण्डल की; सूर्य-आँख की; दिशायें कानों की; चन्द्रमा मन की; नक्षत्र तेरे रूप लावण्य की; रात्रियाँ तेरी छाया (समीप से देखनेवाली छाया) की; जल तेरे शुक्र की; ओषधियाँ लोमों की, आकाश इन्द्रियों की और पृथ्वी शरीर की रक्षा करे। वैश्वानर अग्नि तेरे शिर की; विष्णु तेरे पराक्रम (उत्साह) की; पुरुषोत्तम-नारायण तेरे पौरुष की; ब्रह्मा जीवन की, ध्रुव तारा ध्रुवों की रक्षा करें। ये उपर्युक्त देवता तेरे शरीर में सदा स्थित हैं। ये देवता सदा तेरी रक्षा करें और तुम को दीर्घायु प्रदान करें। भगवान्१-विशिष्ट ज्ञानवान् ब्रह्मा तेरे लिये मंगल करे; देवता लोग मंगल करें; चन्द्रमा—सूर्य मंगल करें, नारद एवं पर्वत, अग्नि-वायु कल्याणकारी हों; इन्द्रानुयायी देवता मंगल कारक हों। पितामह—ब्रह्मा द्वारा की हुई रक्षा तेरे लिये मंगलकारी हो एवं आयु को बढ़ाये। ईतिर्था

१ भगवान् का लक्षण—

उत्पत्तिं च विनाशञ्च भूतानामागतिं गतिम् । वैत्ति विद्यमानविद्याञ्च स वाच्यो भगवानिति ॥