सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रतस्थानम्
[ अ० ५ ]
वि० मन्तव्य—‘प्राप्तकालकृतः’ अर्थात् व्रण करने—चीरा लगाने का काल—समय प्राप्त होनेपर किया गया व्रण प्रशस्त होता है, पूर्व अथवा पश्चात् नहीं। तात्पर्य यह है कि आम शोफ में व्रण करना भी बुरा है और पक्व शोफ में व्रण न करना भी बुरा है ॥६॥
शौर्यमाशुक्रिया शस्त्रतैक्ष्ण्यमस्वेदवेपथू ।
अमंमोहश्च वैद्यस्य शस्त्रकर्मणि जस्यते ॥१०॥
वैद्य के गुण—
शौर्य ( उत्साह, निडरपन ) आशुक्रिया ( लघुहस्तता ) रोगी को अधिक देर नहीं लगती; शस्त्रतैक्ष्ण्य ( शस्त्र का तेज एवं धार उत्तम होना ), पसीने का न आना, और न काँपना, असंमूढता—ये वैद्य के गुण शस्त्रकर्म में प्रशस्त हैं। कायचिकित्सा में इन गुणों की इतनी जरूरत नहीं ॥१०॥
एकेन वा व्रणेनाशुध्यमानेनाऽन्तरा बुद्ध्याऽवेद्या- परान् व्रणान् कुर्यात् ॥११॥
यदि एक व्रणसे घाव पूर्णरूप में साफ न हो तो मनुष्य को चाहिये कि बुद्धि से विचारकर दूसरे व्रणों को बीच में बना दे ॥११॥
भवति चात्र—
यतो यतो गतिं विद्यादुत्सङ्को यत्र यत्र च ।
तत्र तत्र व्रणं कुर्याद्यथा दोषो न तिष्ठति ॥१२॥
कहा भी है—
व्रण में जिस स्थान पर पूय की गति को देखे, और जहाँ-पूय के संचित होने से उन्नत प्रदेश दिखाई दे, उन उन स्थानों पर व्रण कर देना चाहिये, जिससे कि व्रण में पूय दोष संचित न रहने पाये, बाहर आ जाये। ( यहाँ पर दोष शब्द पूय के लिये है ) ॥१२॥
तत्र भ्रूणण्डगङ्गललाटाक्षिपुटौष्ठदन्तवेष्टकक्षाकुक्षिव- ङ्गुष्णेषु तिर्यक् छेद उक्तः ॥१३॥
भ्रू, गण्डस्थल, शंख प्रदेश, ललाट, अक्षिवर्त्म ( पलक), दन्तवेष्ट ( मसूड़े ), कक्षा ( बाहुमूल ), कुक्षि ( उदर ), वंक्षण ( ऊरुरसिध ) इन स्थानों में तिरछा छेदन करना चाहिये १३ चन्द्रमण्डलवच्छेदान् पाणिपादेषु कारयेत् ।
अर्धचन्द्राकृतीश्चापि गुदे मेद्वे च बुद्धिमान् ॥१४॥
पाँव एवं हाथ के तन्तुओं में चन्द्रमण्डल के समान ( चन्द्राकार ) गोल छेदन करना चाहिये ( अंगुलियों की जड़ों में धमनियों का चक्र बनता है ) बुद्धिमान् मनुष्य गुद और मेद्व प्रदेश में भी अर्धचन्द्राकार छेदन करे। शेष स्थानों में सीधा छेदन करना चाहिये ॥१४॥
अन्यथा तु सिरास्तानुच्छेदनम् , अतिमात्रं वेदना, चिराद् व्रणसंरोहो, मांसकन्द्रीप्रादुर्भावश्चेति ॥१५॥
उपर्युक्त विधि के अनुसार छेदन न करने से सिरास्तानु धमनी आदि कट जाती है, बहुत पीड़ा होती है, और व्रण भी देर में भरता है ॥१५॥
मूढगर्भोद्वागोऽश्मरीभगन्दरमुखरोगेष्वभुक्तवतः
कर्म कुर्वीत ॥१६॥
निम्न रोगों में रोगी को बिना खिलाये शस्त्रकर्म करना चाहिए—
मूढगर्भ, उदररोग, अर्श, अश्मरी, भगन्दर, रोग में बिना खिलाये शस्त्रकर्म करना चाहिये। क्योंकि खिलाकर कर्म करने से वायु का कोप तथा यन्त्र आदि के चलाने में कठिनता होती है। मुख रोग में भी बिना खिलाये शस्त्रकर्म करना चाहिये। खिलाकर करने से वमन आदि होता है। कोई कोई अर्श, अश्मरी, और भगन्दर इनका पाठ यहाँ ठीक नहीं मानते क्योंकि इनमें भोजन कराकर शस्त्रकर्म किया जाता है ॥१६॥
ततः शस्त्रमवचार्य, शीताभिरद्भिःशतुरमाश्वत्थसम- न्नात् परिपीड्याङ्गुल्या, व्रणसभिसृद्य ( ड्य ), प्रक्षाल्य कृपायेण, प्रो( सो ) तेनोदकमादाय, तिलकलकमधुसर्पिः प्रगाढामौषधयुक्तां नातिस्निग्धां नातिरूक्षां वर्त्ति प्रणि- दध्यात् ; ततः कल्केनाच्छ्राद्य, घनां कवलिंकां दत्त्वा, वस्त्रपट्टेन बधनीयात् , वेदनारक्षोन्मैथुनैर्धूपैर्धूपयेत्, रक्षो- दन्तैश्च मन्त्रै रक्षां कुर्वीत ॥१७॥
पुश्चात्कर्म—शस्त्रकर्म के पश्चात् शस्त्र को निकालकर शीतल जल से रोगी का स्वेद आदि दूर करके उसे सान्त्वना देते हुए चारों ओर से व्रण को अङ्गुलि द्वारा भली प्रकार दबा- कर ( पूय निकालकर ) क्वाथ से व्रण को धोये। फिर प्लोत द्वारा व्रण का पानी सुखाकर तिलपिष्ट, शहद, घी, एवं मिश्रक अध्यायोक अजशृङ्गी आदि औषधियों से लिप्त, न बहुत स्निग्ध एवं न बहुत रूक्ष वर्त्ति व्रण में रखकर कल्क से व्रणको ढापकर मोटी ( सान्द्र-जिसमें हवा न जा सके ), कवलिंका ( गही ) रखकर पट्टी बाँध देनी चाहिए। वेदना नाशक, रक्षोन्मैथुनैर्धूपैर्धूपयेत् व्रण का धूपन करना चाहिए, तथा रक्षोन्मैथुनैर्धूपैर्धूपयेत् व्रण की रक्षा करनी चाहिए। व्रण संक्रमित न हो इस बात का ध्यान रखना चाहिए२। ( तिलकलकमधुसर्पिः प्रगाढां वर्त्ति प्रणिधाय पत्रेणाच्छ्राद्य कवलिंकां दत्त्वा बन्धनेनोपपादयेत्-यह भी पाठ है )
१ स्निग्धमृण्णम्, अल्पम् अर्धं द्रवप्रायं भुक्तवर्त्तं इति अर्थात् धिकारे त्वनिलप्रशमनार्थवर्त्तनं तु तथा भोजनं दर्शयतीति च विरोधः ।
२ पट्टी कवलिंका आदि सबको धूपन द्वारा संक्रमण रहित कर लेना चाहिये। जैसा कि वाग्भट्ट में कहा है— श्वित्ररूक्षमा दृढाः पट्टाः कवलाः सविकेशिकाः । धूपिता मूढवः श्लक्षणाः निर्वलीका व्रणे हिताः ॥