भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ५ ]

सूत्रस्थानम्

१७

अधिक माने हैं। चरक ने शस्त्र कर्म छे प्रकार का माना है। यथा—पाटनं व्यधनं चैव छेदनं लेखनं तथा। प्रच्छनं सीवनं चैव षड्विधं शस्त्रकर्म तत् ॥५॥

अतोऽन्यतमं कर्म चिकीर्षता वैद्येन पूर्वमेवोपकल्पयितव्यानि भवन्ति। तद्यथा—यन्त्रशस्त्रक्षारान्निशलाकाशुङ्गजलोकालावृजाश्वबौष्टपिचुप्रो( सो )तसूत्रपत्रपट्टमधुघृतवसापयस्तेलतर्पणकषायालेपनकल्कन्यजनशोतोष्णोदक्कटहिदीनि,परिकर्माणश्च स्निग्धाःस्थिरा बलवन्तश्च । पुनः इन आठों में से कोई एक भी कार्य करने से पूर्व वैद्य की निम्न वस्तुएँ तैयार कर लेनी चाहिये। यथा—यन्त्र, शस्त्र, क्षार, अग्नि, शलाका, शुङ्ग, जाँक, अलावू, जाम्बवौष्ट (जामुन के समान मुखवाला लौह से बना यन्त्र जलाने के लिये), पिचु (रूई का पोया), प्रोत (कपड़े का टुकड़ा), सूत्र (धागे) पत्र (केले-एरण्ड आदि के), पट्ट (रेशमी वस्त्र-पट्टियाँ), शहद, घी, वसा, दूध, तैल, तर्पण (वृत्तिकारक अन्न सक्तू दूध), कषाय (व्रण शोधनादि द्रव्य कृत कषाय) आलेपन (प्रलेप), कल्क (क्षत में लगाने लायक लेप), पंखा, ठण्डा-गरम पानी, कड़ाही आदि लोहे के बने पात्र, सब कर्मों को करनेवाले स्निग्ध-अनुरक्त, दृढ़ एवं बलवान् परिचारक तैयार कर लेने चाहिये। (चरक में भी उपकल्पनीय अध्याय में समारम्भ एकत्रित करने का विधान है) ॥६॥

ततः प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रेषु दध्यक्षतात्र-पानरत्नैरग्नि विप्रान् भिषजश्चाचर्यित्वा, कृतबलिमङ्गलस्वस्तिवाचनोलघु मुक्तवन्तं प्राङ्मुखमातुरमुपवेश्य, यंत्रयित्वा, प्राङ्मुखो वैद्यो मर्म्मसिरास्नायुसन्ध्यस्थिधमनीः परिहरन्, अनुलोमं गच्छ निदध्यादाप्यदर्शनात्, सकृदेवापहरेच्छस्त्रमाशु च, महत्स्वपि च पाकेषु दध्यगुलान्तरं व्यङ्गुलान्तरं वा शस्त्रपदमुक्तम् ॥७॥

प्रधानकर्म —इसके पश्चात् श्रेष्ठ तिथि, करण, मुहूर्त, नक्षत्र में दधि, अक्षत, खान-पान, रत्नों से अग्नि, ब्राह्मणों और वैद्यों की पूजा करके, बलि (पूजोपहार), मंगल (गीतादि), स्वस्ति-वाचन (आशीर्वाद उच्चारण) करके, रोगी को थोड़ा सा अन्न खिलाकर, रोगी का मुख पूर्व दिशा में रखते हुए बिठाये। रोगी को मली प्रकार बाँध दे जिससे हिले नहीं। फिर वैद्य भक्षिम की ओर मुख करके—सिरा, स्नायु, सन्धि, अस्थि और धमनी को बचाकर लोगों के अनुकूल यथायोग्य शस्त्र को पूय (पीब) के निकलने तक गहरा चलाये। शस्त्र को एक बार ही और शीघ्रता से चलाना चाहिये। बहुत बड़े पाक में भी दो अंगुल या तीन अंगुल तक परिमित लम्बा शस्त्र का घाव करना चाहिये। घाव की गम्भीरता व्रण की अपेक्षा से है। अरुणदत्त

का कहना है कि दो या तीन अंगुल के बीच में दूसरा व्रण नहीं करना चाहिये।

वि० मन्तव्य—यन्त्रयित्वा—रोगी को बाँधकर या आत जनों से पकड़ाकर शस्त्रकर्म करने का विधान क्रियासौकर्य के लिये है, परन्तु आजकल—यह कार्य—क्लोरोफॉर्म सुधाकर कर लिया जाता है। व्रण का अर्थ है घाव—चौरा। उत्सङ्ग-व्रण के भीतर का कोटर जिसको पूय बना लेता है—जहाँतक उत्सङ्ग होता है व्रण किया जाता है या करना चाहिये। बड़े-बड़े पाकों में २ अथवा ३ अंगुल के अन्तर अर्थात् दूरी पर एक से अधिक व्रण भी किये जाते हैं। यह व्रण-शोथों में चौरा लगाने की विधि है ॥७॥

तत्रायतो विशालः समः सुविभक्तो।

निराश्रय इति व्रणगुणाः ॥८॥

व्रणकर्म में व्रण की प्रशस्त आकृति—आयत (दीर्घ) त्रिभुज (विस्तीर्ण), सम (विषम नहीं बराबर), सुविभक्त मली प्रकार से सब अवयव प्रथक हो गये हों, निराश्रय—ये व्रण के गुण हैं। निराश्रय का अर्थ—पूय के लिये कोई कोटर न रह जाय।

वि० मन्तव्य—व्रण-शोथ में ऐसा व्रण अर्थात् घाव करे जो आयत अर्थात् चौड़ा हो जिससे भीतरी समस्त दोष-विकार पूय निकल जा सके। विशाल अर्थात् लम्बा व्रण करे अर्थात् जहाँतक उत्सङ्ग-कोटर हो, जिससे वहाँतक लेपौषध एवं कव-लिका लगायी-पहुँचायी जा सके। सुविभक्त-जिसमें चौरा लगाते ही या शस्त्र निकालने पर मुखरोध न हो जाय। निराश्रय-व्रण शोथोत्पादक दोष के आश्रय को समूल निकाल देना चाहिये। यह व्रण के गुण (सदगुण) हैं अर्थात् इस प्रकार से व्रण करना चाहिये। अन्यथा बार-बार व्रण करने की आवश्यकता पड़ सकती है। पड़ जाती है ॥८॥

भवतश्चात्र—

आयतश्च विशालश्च सुविभक्तो निराश्रयः।

प्राप्तकालकृतश्चापि व्रणः कर्मणि शस्यते ॥९॥

कहा भी है—

आयत, दीर्घ, विशाल, निम्नोन्नतरहित, मलीप्रकार अलग हुआ, अंगुली द्वारा सम्पूर्ण पूय निकल जाने से निराश्रय; प्राप्त काल (ठीक समय पर-कच्चे व्रण में न किया) हुआ व्रण शस्त्र-कर्म में प्रशस्त होता है।

१ यहाँ पर अन्तर शब्द विचारणीय है, इसका अर्थ यदि चौड़ाई में किया जाय तो ठीक है। दो या तीन अंगुल चौड़ा व्रण करे, क्योंकि लम्बा व्रण देर में भरता है यह मान्यता ठीक नहीं। पेट के शल्यकर्मों में आठ अंगुल लम्बा शस्त्रकर्म करना होता है।