सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ५ ]
अस्थि, गर्भोत्पत्ति के कारण द्रव्य ( शुक्र-शोणित ) समूहों का विभाग, इसी प्रकार-त्वचादि में छिपे शल्य का निकालना, वातादि के भेद से व्रण का निश्चय, भ्रम के भेद ( अनेक प्रकार के), रोगों का साध्य, याप्य, और असाम्य भेद आदि की दृष्टि से हजारों प्रकार के भेद बन जाते हैं। इन भेदों का चिन्तन ज्ञान बहुत विशाल बुद्धिवाले मनुष्य की बुद्धि को भी विचलित कर देता है, फिर अल्प बुद्धिवाले मनुष्य का क्या कहना ? इसलिये आचार्य को अवश्य ही एक-एक पद, पाद और श्लोक की व्याख्या भली प्रकार करनी चाहिये, और शिष्य को सुननी चाहिये ॥५॥
अन्यशास्त्रोपपन्नानां चार्थानामिहोपनीतानामर्थवशा तेषां तद्विधेभ्य एव व्याख्यानमनुश्रोतव्यं, कस्मात् ? न ह्येकस्मिन् शास्त्रे शक्यः सर्वशास्त्राणामवरोधः कर्तुम् ॥
प्रयोजन वश जो व्याकरण, सांख्य, न्याय, वैशेषिक, ज्योतिष शास्त्र आदि यहाँ इस शास्त्र में आये हैं—उन शास्त्रों को उन शास्त्रों के ज्ञाताओं से समझना और सुनना चाहिये। क्योंकि—एक ही शास्त्र में सब शास्त्रों का समावेश करना असम्भव है ॥६॥
भवति चात्र—
एकं शास्त्रमधीयानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम् ।
तस्माद्विदुह्रतः शास्त्रं विज्ञानीयाच्चिकित्सकः ॥७॥
कहा भी है—एक ही शास्त्र को पढ़नेवाला व्यक्ति शास्त्र के निश्चय को नहीं जान सकता। इसलिये जिसने बहुत से शास्त्र पढ़े हों वही चिकित्सक शास्त्र को समझ सकता है ॥७॥
शास्त्रं गुरुमुखोद्गीर्णसादायोपास्य चासक्तु ।
यः कर्म कुरुते वैद्यः स वैद्योऽन्ये तु तस्कराः ॥८॥
गुरु के मुख से उपदेश किये शास्त्र को ग्रहण करके, पाठ एवं अर्थ द्वारा बार-बार अभ्यास करके जो वैद्य कर्म करता है वह वैद्य है, शेष सब चोर हैं१ ॥८॥
औपधेनवमौरश्च सौश्रुतं पौष्कलावतम् ।
शेषाणां शल्यतन्त्राणां मूलान्येतानि निर्दिशेत् ॥९॥
गूढ़ार्थ को समझने के लिये जिन तन्त्रों को समझना चाहिये उनको व्याज से कहते हैं। औपधेनव, औरश्च, सुश्रुत, पौष्कल, करवीर्य, गोपुररक्षित आदि शेष शल्य तन्त्रों में यही तन्त्र प्रधान है ॥९॥
इति सुश्रुतसंहितायां स्वस्थाने प्रभाषणीयो नाम
चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
१ ये तु शास्त्रविदो दक्षाः शुचयः कर्मकोविदाः ।
जितहस्ता जितात्मानस्तेभ्यो नित्यं कृतं नमः ॥ चरक ।
पञ्चमोऽध्यायः
अथातोऽग्नोपहरणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे यन्त्रादि के सम्भार को बताने के लिये 'अग्नी-पहरणीय' नामक अध्याय कहते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिए कहा था ॥१,२॥
त्रिविधं कर्म—पूर्वकर्म, प्रधानकर्म, पश्चात्कर्मतिः तद्व्याधिं प्रति उपदेक्ष्यामः ॥३॥
कर्म तीन प्रकार का है—पूर्व कर्म (शस्त्रावचरण से पूर्व), प्रधान कर्म (शस्त्र कर्म) और पश्चात्कर्म (शस्त्रावचरण के पीछे का कर्म), इन कर्मों का उपदेश प्रत्येक व्याधि में करेंगे, यहाँ पर विस्तारमय से नहीं कहा१ ।
वि० मन्तव्य—कर्म-छेदन आदि शस्त्रकर्म तथा वमन-विरेचन आदि काय-चिकित्सा का नाम है। प्रधान कर्म के पूर्व जो उपचार किये जाते हैं ये 'पूर्वकर्म' तथा पश्चात् (पीछे) जो उपचार किये जाते हैं वे 'पश्चात्कर्म' कहे जाते हैं।
सम्भार (सामग्री) अर्थात् चिकित्सा कर्म में उपयोगी या आवश्यक सहायक वस्तुएँ। परिकर्मी—चिकित्सक के सहायक, इधर उधर का सब काम करनेवाले, कर्मचारी ॥३॥
अस्मिन्तु शास्त्रे शस्त्रकर्मंप्राधान्याच्छस्त्रकर्मैव तावत् पूर्वमुपदेक्ष्यामस्तत्सम्भाराश्च ॥४॥
इस शास्त्र में शस्त्र कर्म की प्रधानता है। इसलिये सबसे प्रथम शस्त्र कर्म को तथा इसके द्रव्य सम्भारों कहते हैं ॥४॥
तच्च शस्त्रकर्मोष्ट्रविधः, तद्यथा—छेद्यं, भेद्यं, लेख्यं, वेध्यम्, एष्यम्, आहार्यं, विज्ञाव्यं, सौव्यमिति ॥५॥
यह शस्त्र कर्म आठ प्रकार का है। यथा—छेद्य (भगन्दर आदि का दो करना), भेद्य (विद्रधि आदि का विदारना), लेख्य (उपजिहिका आदि का लेखन), वेध्य (छोटे मुखवाले शस्त्रों से वेंचना-शिरा आदि में छेद करना), एष्य (शलाका आदि से नाड़ी व्रण आदि का दूँटना), आहार्य (दन्त आदि का निकालना), विज्ञाव्य (विद्रधि आदि में जलौका आदि से खून बहाना), सौव्य (पद्मकोप आदि में सीना)। वामट ने—उत्पाटन, कुष्ठन, मन्थन, ग्रहण और दाहन कर्म
१ कई आचार्य इसका यह अर्थ करते हैं—
'लंघनादि विरेकान्तं पूर्वकर्म व्रणस्य च । पाचनं रोपणं यच्च प्रधानं कर्म तत्समूतम् । बलवर्णनिकार्यं तु पश्चात्कर्म समादिशेत् ॥