सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें१४
मुश्रुतसंहिता
[ अ० ३ ]
रसभेदाः स्वस्थवृत्तं युक्त्यस्तान्निकाश्या याः । दोषभेदा इति ज्ञेया अध्यायास्तन्त्रभूषणाः ॥४२॥ तन्त्रभूषण अध्यायों को कहते हैं—
रस भेद कल्प, स्वस्थवृत्त, तन्त्रयुक्तियाँ, दोषभेदकल्प—ये चार अध्याय शास्त्र के अलंकार हैं। इन से शास्त्र की प्रतिष्ठा है। (तंत्रयुक्तियाँ चरक कोटिल्य आदि सब में एक समान ही प्रायः दी हैं) ॥४२॥
श्रेष्ठत्वादुत्तरं ह्येतत्तन्त्रमाहूर्महर्षयः ।
बह्वर्थसंग्रहान्छेष्टमुत्तरं वाऽपि पश्चिमम् ॥४३॥
शालाक्यतन्त्रं कौमारं चिकित्सा कायिकी च या ।
भूतविद्येति चत्वारि तन्त्रे तूत्तरसंज्ञिते ॥४४॥
वाजोकरं चिकित्सासु रसायनविधित्थथा ।
विषतन्त्रं पुनः कल्पाः शल्यज्ञानं समन्ततः ॥४५॥
इत्यष्टाङ्गमिदं तन्त्रमादिदेवप्रकाशितम् ।
विधिनाऽधीत्य युञ्जाना भवन्ति प्राणदा मुनि ॥४६॥
उत्तरतंत्र के नाम का कारण—
महर्षि लोग इस तंत्र को श्रेष्ठ होने से उत्तरतंत्र कहते हैं।
इसमें शालाक्य, कुमार, कायचिकित्सा, भूतविद्या आदि बहुत से अर्थों का संग्रह होने से यह श्रेष्ठतंत्र है, पश्चिम (अन्तिम) होने से भी इस तंत्र को उत्तरतंत्र कहते हैं।
उत्तर तंत्र में कहे शालाक्य, कौमार, कायचिकित्सा, भूतविद्या, ये चार चिकित्सायें, वाजीकरण चिकित्सा, रसायन विधि, कल्पस्थानोक्त विष तंत्र; ये तीन प्रथम कहे शल्य तंत्र में सब तंत्रों में शल्य ज्ञान, यह आठ अंगोंवाला तंत्र धन्वन्तरि द्वारा प्रकाशित हुआ है। इस आठों अंगोंवाले तंत्र को विधि पूर्वक पढ़कर प्रयोग करता हुआ मनुष्य पृथिवी पर 'प्राणा-भिसर' प्राणों को देनेवाला कहलाता है। चरक में- कहा है—
(प्राणानामेकेऽभिसरा हन्तारो रोगाणाम् ।
रोगाणामेकेऽभिसरा हन्तारः प्राणानाम् ।) ॥४३-४६॥
एतद्द्रव्यवश्यमध्ययम्, अधीत्य च कर्माध्यवश्यमुपा- सितन्यम्, उभयज्ञो हि भिषग् राजाहो भवति ॥४७॥
यह तंत्र अवश्य ही पढ़ना चाहिये; और पढ़कर कर्म में अवश्य इसका अभ्यास करना चाहिये। दोनों कार्यों को जानने-वाला वैद्य राजा से पूजित होता है ॥४७॥
भवन्ति चात्र—
यस्तु केवलशास्त्रज्ञः कर्मस्वपरिनिष्ठितः ।
स मुह्यत्यातुरं प्राप्य प्राप्य भीरुरिवाहवम् ॥४८॥
यस्तु कर्मसु निष्णातो धाष्ट्यच्छास्त्रबहिष्कृतः ।
स सत्सु पूजां नाप्नोति वर्ध चच्छृति राजतः ॥४९॥
उभावैतावनिपुणवसमर्थो स्वकर्मणि ।
अर्धवेदधरावेतावेकपक्षविष द्विजौ ॥५०॥
'वर्ध चच्छृति राजतः' के स्थान में 'वर्ध चाहृति राजतः' पाठ अधिक उपयुक्त एवं संगत है।
कहा भी है—(यह शास्त्र की रीति है) गद्य के पीछे श्लोक से आरम्भ होता है जो मनुष्य-वैद्य केवल शास्त्र को ही जानता है, और कर्मों के विषय में अशिक्षित है; वह वैद्य रोगी को देखकर उसी प्रकार से घबरा जाता है, जिस प्रकार कि डरनोक आदमी संग्राम में पहुँचकर डर जाता है। और जो वैद्य कर्मों के विषय में भली प्रकार शिक्षित है और शास्त्र से बाहर है, धृष्टता के कारण जिसने शास्त्र का अध्ययन नहीं किया, वह वैद्य सज्जनों में पूजित नहीं होता, अपितु राजाद्वारा वर्ध किये जाने योग्य है। ये दोनों प्रकार के व्यक्ति अशिक्षित, अपने कार्य करने में असमर्थ, आधे ज्ञान को धारण करनेवाले-एक पाँखवाले पक्षी के समान हैं। जिस प्रकार कि एक पंख का पक्षी उड़ नहीं सकता, उसी प्रकार ये भी काम नहीं कर सकते ॥४८-५०॥
ओषधयोऽमृतकल्पास्तु शस्त्राग्निविषोपमा ।
भवन्त्यज्ञैरपहृतास्तस्मादेतान् विवर्जयेत् ॥५१॥
प्र०—किस कारणसे राजा द्वारा वर्ध किया जाने योग्य है ?
उत्तर—अमृत के समान प्रभाव करनेवाली औषधियाँ मूढ़ मनुष्यों द्वारा प्रयुक्त की जाने पर शस्त्र, विजली और विष के समान प्रभाव करती हैं। इसलिये इन ऊगर कहे मूढ़ वैद्यों का त्याग करना चाहिये ॥५१॥
स्नेहादिष्वनभिज्ञो यश्छेद्यादिषु च कर्मसु ।
स निहन्ति जनं लोभात् कुर्वैद्यो नृपदोषतः ॥५२॥
और जो वैद्य स्नेहादि कार्यों में तथा छेद्य आदि कर्मों में (शल्यतंत्र तथा कायचिकित्सा में—आठों में यही मुख्य है) अनभिज्ञ हैं, वे कुसित वैद्य राजा के प्रमाद के कारण लोभ वश से मनुष्य को मार देते हैं। (इसी से आगे कहेंगे कि राजा की आज्ञा से चिकित्सा कर्म करना चाहिये) ॥५२॥
यस्तुभयज्ञो मतिमान् स समर्थोऽथसाधने ।
आहवे कर्म निर्बोद्धुं द्विचक्रः स्यन्दनो यथा ॥५३॥
जो वैद्य शास्त्र एवं कर्म दोनों को जानता है तथा ऊहा-पोह जानवाला है, वह आरोग्य करने में समर्थ है, जिस प्रकार कि संग्राम में दोनों पहियोंवाला रथ कार्य करने में समर्थ रहता है ॥५३॥
अथ वत्स ! तदैतदध्ययेयं यथा तथोपधारय मया प्रोच्यमानम्—अथ शुचये कृतोत्तरासङ्गायाऽव्याकुलायोपस्थितायाध्ययनकाले शिष्याय यथाशक्ति गुरुरुपदिशेत् ।
१ चरक में—श्रुतदृष्टक्रियाकालमात्राज्ञानबहिष्कृताः । वर्जनीया हि ते मृत्योरुत्तरसूचरा भुवि ॥ (२) योगादपि विषं तीक्ष्ण-मृत्युर्भेषजं भवेत् । भेषजं चापि दुर्मुक्तं तीक्ष्णं संपद्यते विषम् ॥
चरक-सूत्र-अ० १