भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ३ ]

सूत्रस्थानम्

१३

लिखे गये हैं। पाठक ध्यान देने की कृपा करें— विशेषतः वे, जो कहा करते हैं कि रसायन एवं वाजीकरण के लिये पृथक् स्थान का सन्निवेश क्यों नहीं किया गया है ॥२६॥

अन्नस्य रक्षा विज्ञानं स्थावरस्येतस्य च ।

सर्पदृष्टविषज्ञानं तस्यैव च चिकित्सितम् ॥२७॥

दुन्दुभेर्मुषिकाणां च कीटानां कल्प एव च ।

अष्टौ कल्पाः समाख्याता विषभेषजकल्पनात् ॥२८॥

अध्यायानां शतं विशमेवमेतदुदीरितम् ।

कल्पस्थान के अध्याय

अन्नपानरक्षा विज्ञानीय, स्थावर विष विज्ञानीय, जंगमविष विज्ञानीय, सर्पदृष्ट चिकित्सा, दुन्दुभि स्वनीय, मूषिककल्प, कीट कल्प—ये आठ अध्याय इस कल्प स्थान में हैं। विषोषध के जानने से इसको कल्प कहते हैं। (कई लोग—दुन्दुभिस्वनीय को मूषिक कल्प के पीछे पढ़ते हैं।) इस प्रकार से पूर्व कहे हुए १२० अध्याय पूर्ण हो जाते हैं।

वि० मन्तव्य—कल्पस्थान अगदतन्त्र का नामान्तर है, जिसको विषविज्ञान भी कह सकते हैं। इस तन्त्र में औषध का ही नाम “अगद” है जिसका अर्थ है—जिसके सेवन से गद = रोग = विषविकार उत्पन्न ही न हो अथच नष्ट—दूर भी हो जाय ॥२७, २८॥

अतः परं स्वनाभनैव तन्त्रमुत्तरमुच्यते ॥२९॥

अधिकृत्य कृतं यस्मात्तन्त्रमेतदुपद्रवान् ।

औपद्रविक इत्येष तस्याप्रयत्वान्तिरुच्यते ॥३०॥

सन्धौ वर्त्मनि शुक्ले च कृष्णे सर्वत्र दृष्टिषु ।

संविज्ञानार्थमध्याया गदानां तु प्रति प्रति ॥३१॥

चिकित्साप्रविभागो यो वाताभिष्यन्दवारणः ।

पैतस्य श्लैभिकस्यापि रौधिरस्य तथैव च ॥३२॥

लेख्यभेवानिषेधौ च छेदानां वर्त्मदृष्टिषु ।

क्रियाकल्पोऽभिघातश्च कर्णात्थास्तच्चिकित्सितम् ॥३३॥

घ्राणोत्थानां च विज्ञानं तद्गदप्रतिषेधनम् ।

प्रतिशयायनिषेधश्च शिरोगदविचेचनम् ॥३४॥

चिकित्सा तद्गदानां च शालाक्यं तन्त्रमुच्यते ।

नवग्रहाकृतिज्ञानं स्कन्दस्य च निषेधनम् ॥३५॥

अपस्मारशकुन्योश्च रेवत्याश्च पुनः पृथक् ।

पूतनायास्तथाऽन्धायाः शीतपूतनमण्डिका ॥३६॥

नैगमेषचिकित्सा च ग्रहोत्पत्तिः सयोनिजा ।

कुमारतन्त्रमित्येतच्छाखोरैषु च कीर्तितम् ॥३७॥

शल्य तन्त्र का प्रतिपादन करके अर्थवशात् उत्तर तन्त्र को कहते हैं।

इसके आगे अपने (उत्तर) नाम से ही उत्तर तन्त्र कहते हैं। व्रण के उपद्रव ज्वर आदि को बताने के लिये इस तन्त्र को कहते हैं। इस उत्तर तन्त्र के प्रथम अध्याय में कहे हुए उपद्रवों का तथा दुःसाध्य एवं अपरिसंख्येय आँख आदि के

रोगों का वर्णन होने से इसके प्रथम अध्याय को ‘औपद्रविक’ कहते हैं ॥

सन्धि, वर्त्म, शुक्ल, कृष्ण, सर्वगत, और दृष्टिगत रोगों को बताने के लिये प्रत्येक के लिये पृथक् पृथक् अध्याय कहे हैं। इस प्रकार से छः अध्याय हैं। सातवां चिकित्सा प्रविभागीय, वाताभिष्यन्द, पिताभिष्यन्द, कृफाभिष्यन्द, रक्ताभिष्यन्द, लेख्यरोगप्रतिषेध, भेद्यरोग प्रतिषेध, छेद्यरोग प्रतिषेध, यद्मकोप प्रतिषेध, दृष्टिगत रोग प्रतिषेध, क्रियाकल्पोपक्रम, नयनाभिघात प्रतिषेध, कर्णगतरोग विज्ञानीय, कर्णगतरोग प्रतिषेध, नाखिकागत रोग प्रतिषेध, प्रतिशयाय प्रतिषेध, शिरोरोग विज्ञानीय, शिरोरोग प्रतिषेध, इनका शालाक्य तन्त्र में समावेश होता है।

कुमार तंत्र—नवग्रहाकृति विज्ञानीय, स्कन्दग्रह प्रतिषेध, स्कन्दापस्मारप्रतिषेध, शकुनि प्रतिषेध, रेवती प्रतिषेध, पूतना प्रतिषेध, अन्ध पूतना प्रतिषेध, शीत पूतना प्रतिषेध, सुख मण्डिका प्रतिषेध, नैगमेष प्रतिषेध, ग्रहोत्पत्ति, योनिच्चापत्तिषेध—इसका तथा शरीर स्थान में कहे (रजःशुद्धि और गर्भावकान्ति) को कुमारतंत्र कहते हैं।

वि०—मन्तव्य—उक्त १२० अध्यायों में जो अनेक स्थलों पर बार-बार कहा गया है कि ‘अन्य अर्थों (विषयों) को उत्तर तन्त्र में कहा जायगा’। उनका वर्णन किया गया है। और उसमें उपद्रव अर्थात् दोष विकृति—दोष वैषम्य से उत्पन्न तथा भूतावेश से उत्पन्न उपद्रवों—वाधाओं—रोगों का वर्णन किया गया है। कुमार तन्त्र कौमार भृत्य का नामान्तर है। शारीर स्थान के गर्भिणी व्याकरण नामक (१० वें) अध्याय में कौमार भृत्य का बहुत सा विषय लिखा गया है ॥२६—३७॥

ज्वरातिसारशोषाणां गुल्महृद्वोगिणामपि ।

पाण्डूनां रक्तपित्तस्य मूच्छीयाः पानजाश्च ये ॥३८॥

तृष्णायाश्छर्द्विहिकानां निषेधः श्वासकासयोः ।

स्वरभेदचिकित्सा च क्रुन्मुदावर्तिनोः पृथक् ॥३९॥

विस्मृचिकारोचक्योर्मूत्राघातविकृच्छ्रयोः ।

इति कायचिकित्सायाः शेषमत्र प्रकीर्तितम् ॥४०॥

कायचिकित्सा के अध्याय—

ज्वर, अतिसार, शोष, गुल्म, हृदयरोग, पाण्डु, रक्तपित्त, मूच्छी, पानाल्यप्रतिषेध, तृष्णा, छर्द्विहिका, श्वास, कास, स्वरभेद, क्रुमि, उदावर्त्त, विस्मृचिका, अरोचक, मूत्राघात, मूत्रकृच्छ्र, ये इसीसे कायचिकित्सा के शेष रोग इस उत्तरतंत्र में कह दिये हैं ॥३८-४०॥

अमानुषनिषेधश्च तथाऽऽपस्मारिकोऽपरः ।

उन्मादप्रतिषेधश्च भूतविद्या निरुच्यते ॥४१॥

भूतविद्या—अमानुषीय रोग प्रतिषेध, अपस्मार, उन्माद रोग प्रतिषेध, इन तीन अध्यायों को अपस्मार, कहते हैं ॥४१॥