भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३ ]

१२

विधि ये छि्यालीस अध्याय हैं। अर्थों को सूचित करने से (एक देश के कहने से अनुक्त अर्थ को ग्रहण करने से) अर्थों को यथास्थान रखने से, अर्थों के जानने से (अनुसन्धान से) इन छि्यालिस अध्यायों को सूत्रस्थान कहते हैं ॥ ४-१२ ॥

वातव्याधिकमर्गसि साश्मरिश्च भगन्दरः।

कुष्ठमेहोदरं मूढो विद्वधिः परिसर्पणम् ॥ १३ ॥

प्रन्थिबुद्धिबुद्धशुक्रमनाश्च मुखरोगिकम्।

हेतुलक्षणनिर्देशान्निदानानौति षोडश ॥ १४ ॥

निदानस्थान के अध्याय—

वातव्याधि, अर्श, अश्मरि, भगन्दर, कुष्ठ, प्रमेह, मूढगर्भ, विद्वधि, उदर, परिसर्प (विसर्प), प्रन्थि (प्रन्थि, अपची, अबुंद, गलगण्ड), बुद्धि (उपदंश, बुद्धि, श्लीपद), बुद्धरोग, शुक्ररोग, भग्नरोग और मुखरोग ये सोलह निदानस्थान में अध्याय हैं। रोगोत्पत्ति का कारण (हेतु) और लक्षण (रोग को बतानेवाले चिह्न) का निर्देश करने से इसको निदानस्थान कहते हैं ॥

भूतचिन्ता रजःशुद्धिगर्भावक्रान्तिरेव च।

व्याकरणं च गर्भस्य शरीरस्य च यत् स्मृतम् ॥ १५ ॥

प्रत्येकं मर्मनिर्देशः शिरावर्णनमेव च।

सिराव्यधो धमनीनां गर्भिण्या व्याकृतिस्तथा ॥ १६ ॥

निर्दिष्टानि दशैतानि शासीराणि महर्षिणा।

विज्ञानार्थं शरीरस्य भिषजं योगिनामपि ॥ १७ ॥

शारीरस्थान के अध्याय—

भूतचिन्ता (पञ्चभूत सम्बन्धी), रजःशुद्धि (शुक्रशोणित की शुद्धि), गर्भावक्रान्ति, गर्भव्याकरण शारीर, शरीरव्याकरण (शरीर का विवरण), प्रत्येक मर्म निर्देश, शिरावर्णनशारीर, सिराव्यध विधि, धमनी व्याकृति, गर्भिणी व्याकृति—ये दश अध्याय पूज्य धन्वन्तरि ने वैद्यों तथा रोगियों के लिये शरीर का विशेष रूप में ज्ञान कराने के लिये कहे हैं। (चरक में भी सुमुख के लिये निर्देश शारीर ज्ञान से सत्या बुद्धि उत्पन्न होकर मोक्ष में प्रवृत्त कराती है) ॥ १५-१७ ॥

द्विवर्णयो ज्रणः सद्यो भग्नानां वातरोगिकम्।

महावातिकमर्गसि साश्मरिश्च भगन्दरः ॥ १८ ॥

कुष्ठानां महतां चापि मैहिकं पैडिकं तथा।

मधुमेहचिकित्सा च तथा चोदरिणामपि ॥ १९ ॥

मूढगर्भचिकित्सा च विद्वधोनां विसर्पिणाम्।

प्रन्थिबुद्धयुपदंशानां तथा च क्षुद्ररोगिणाम् ॥ २० ॥

शुक्रदोषचिकित्सा च तथा च मुखरोगिणाम्।

शोफस्थानगतानां च निषेधो मिश्रकं तथा ॥ २१ ॥

१ इसी में कहा है

शरीरं सर्वथा सर्वं सर्वदा वेद यो भिषक्।

आयुर्वेदं सात्कृत्यैव वेद लोकमुखप्रदम् ॥

देखिये चरक शारीर ५-६

वाजीकरं च यत् क्षीणे सर्वाबाधशमोऽपि च।

मेधायुष्करणं चापि स्वभावव्याधिवारणम् ॥ २२ ॥

निवृत्तसंतापकरं कीर्तितं च रसायनम्।

स्नेहोपयोगिकः स्वेदो वमने सविरेचने ॥ २३ ॥

तयोर्न्यापन्चिकित्सा च नेत्रवस्तिविभागिकः।

नेत्रवस्तिविपत्सिद्धिस्तथा चोत्तरवस्तिकः ॥ २४ ॥

निरूहक्रमसंज्ञश्च तथैवातुरसंज्ञकः।

धमनस्य विधिश्चान्त्यश्चत्वारिंशदिति स्मृताः ॥ २५ ॥

प्रायश्चित्तं प्रशमनं चिकित्सा शान्तिकर्म च।

पर्यायस्तस्य निर्देशाच्चिकित्सास्थानमुच्यते ॥ २६ ॥

चिकित्सास्थान के अध्याय—

द्विवर्णीय, सद्योज्रण, भग्नरोग, वातव्याधि, महावातव्याधि, अर्शचिकित्सा, अश्मरि, भगन्दर रोग, कुष्ठ, महाकुष्ठरोग, प्रमेह, प्रमेह पिडिका, मधुमेह, उदररोग, मूढगर्भ, विद्वधि, विसर्प (नाड़ीस्तन रोग), प्रन्थि (प्रन्थि, अपची, अबुंद, गलगण्ड), बुद्धि (बुद्धि, उपदंश, श्लीपद), बुद्धरोग, शुक्ररोग, मुखरोग, शोफ-रोग, अनागत बाध प्रतिषेध (चिकित्सा,) मिश्रक, क्षीणबलीय वाजीकरण चिकित्सा, सर्वाबाधशम (रसायनसर्वाबाधशमनीय), मेधायुष्कामीय रसायन, स्वभाव व्याधि प्रतिषेधीय रसायन, निवृत्त संतापीय, स्नेहोपयोगीय, स्वेदावचरणीय, वमन विरेचन साध्योपद्रव, वमन विरेचन व्यापन्चिकित्सा, नेत्र वस्ति प्रमाण प्रविभाग, नेत्र वस्ति व्यापत्, उत्तर वस्ति, निरूहोपक्रम चिकित्सा, आतुरोपद्रव, धूमनस्यविधि (धूम, नस्य, कवल ग्रह) यह अन्तिम अध्याय है—इस प्रकार से ४० अध्याय इस स्थान में हैं। चिकित्सा के पर्याय—प्रायश्चित्त, प्रशमन, चिकित्सा, शान्तिकर्म, ये चिकित्सा के पर्याय हैं। चिकित्सा का विवरण होने से इसे चिकित्सास्थान कहते हैं। चरक में—व्याधिहर, पथ्य, साधन, प्रकृतिस्थापन और औषध ये अन्य भी पर्याय हैं।

वि० मन्तव्य—प्रायश्चित्त=रोगनिवृत्ति के लिए अनेक विध व्रत उपवास आदि कर्म, प्रशमन—शारीरिक एवं मानसिक दोषों की शान्ति के उपाय, चिकित्सारोगप्रतिकार, शान्तिकर्म—रोगजनक स्यादि ग्रहों तथा देवादि एवं बालग्रहों की शान्ति के कर्म, व्याधिहर—रोग नाशन के उपाय, पथ्य या जीवनयात्रा के लिये उपयोगी भाचार (आहार-विहार), साधन सिद्धि—सफलता के उपाय=जरा आलस्य आदि के नाशक उपाय, औषध=आत्ममस्त शरीर में औष=उचित ताप या दीप्ति का आधान करने-रखने का उपाय, प्रकृतिस्थापन-प्रकृति=स्वास्थ्य में स्थापित रखने का उपाय तथा हित=धारण एवं पोषण का उपाय। अतएव चिकित्सास्थान में केवल रोगप्रतिकार के ही उपाय नहीं लिखे गये हैं, अपितु स्वास्थ्य के लिये भी रसायन एवं वाजीकरण का वर्णन करने के लिये अनेक अध्याय