भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

विषयानुक्रमणिका

१७

विषयपृष्ठ
क्षेत्र नष्ट करने के कई उपाय४२८
किलास नाश का उपाय४२८
नीलघृत४२८
महानील घृत४२८
कुष्ठरोगी के लिये वसन
विरेचन अवश्य४२९
कुष्ठरोग के लिये सिद्ध किया
पुरातन घृत कुष्ठ नाशक४२९
स्नान में क्वाथ४३०
नीम का क्वाथ४३०
कुष्ठ में क्रमि नाश के लिये४३०
वज्रक तैल४३०
महावज्रक तैल४३०
लाक्षादि तैल४३१
दोषों के शांत होने पर स्नान
क्वाथ तथा पीने के लिये४३१
दोष का प्रकोप न हो ऐसे
उपाय४३१
सम्पूर्ण रूप में वरता खैर कुष्ठ को
शक्ति भर नष्ट कर देता है४३१
दशमोऽध्यायः
महाकुष्ठ चिकित्सा व्याख्यान४३१
मन्थकल्प४३२
अरिष्टों का वर्णन४३२
आसवों का वर्णन४३२
सुरा का वर्णन४३२
लेहों का वर्णन४३२
चूर्ण किया४३३
अयस्कृतिका वर्णन४३३
खदिर विधान४३४
गिलोय का क्वाथ४३४
काले तिलादि का योग४३५
एकादशोऽध्यायः
प्रमेह चिकित्सा की व्याख्या४३५
दो प्रकार का प्रमेह४३५
रुध के लिये संस्कृत किया४३५
रक्त पुरुष के लिये अपतर्पणवाली
किया४३५
सब प्रकार के प्रमेही को
विषयपृष्ठ
त्यागने योग्य४३६
सब प्रकार के प्रमेही को खाने योग्य४३६
स्निग्ध प्रमेह रोगी के लिये४३६
पांच योग सब प्रमेहों के लिये४३६
विशेषरूप से वर्णन४३६
बड़े ऐश्वर्य वाले के लिये४३७
गरीब के लिये४३८
द्वादशोऽध्यायः
प्रमेह पिडका चिकित्सा व्याख्यान४३८
साध्य पिडकायें४३९
प्रमेह रोगी की प्रारम्भ में ही चिकित्सा४३९
धान्वन्तर घृत४३९
तीक्ष्ण विरेचन४४०
स्वेद कभी भी न देना चाहिये४४०
प्रमेहियों में दोष ऊपर को नहीं जाते४४०
अपक्व तथा पक्व पिडकाओं की चिकित्सा४४०
लेह सब प्रमेहों के नाश के लिये४४०
नवायस४४०
लोहारिष्ट४४०
त्रयोदशोऽध्यायः
मधुमेह चिकित्साका व्याख्यान४४१
शिलाजतु रंगादि छ में से किसी के मिला रहता है
जो शिलाजतु लौह से उत्पन्न होता है
रंगादि छ में से शिलाजतु उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होता है
सब प्रकार के शिलाजतु४४१
शिलाजतु सब रोगों को नष्ट करता है४४१
शिलाजतु और माक्षिक सेवन करनेवाला कपोत और कुलत्थ को छोड़ दे४४१
तुवरक फल का तैल४४१
विषयपृष्ठ
चतुर्दशोऽध्यायः
उदररोग की चिकित्सा का व्याख्यान४४२
बद्धगुदोदर और परिखावी असार्ध शेष कष्ट साध्य४४२
उदररोगी को खाने योग्य४४३
वातोदररोगी के लिये विदारीगन्धादि४४४
पित्तोदररोगी को काकोल्थादि४४४
कफोदररोगी को पिप्पल्यादि४४४
दृष्योदररोगी के लिये घृत४४५
इसमें सामान्ययोग४४५
कोष्ठ के क्रमियों को नाश करने के लिये४४५
आनाहवर्ति किया४४६
प्लीहोदररोगी के लिये४४६
घट्टपलक घृत४४६
प्लीहा की शांति के लिये४४६
बद्धगुद उदर तथा परिखावि उदर के लिये४४६
पञ्चदशोऽध्यायः
दकोदर रोगी के लिये४४७
मृदुगर्भ चिकित्साव्याख्यान४४७
मृदुगर्भ को निकालना महाकठिन४४८
मृदु गति आठ प्रकार की होती है
गर्भ के जीवित रहने पर
अपरा पातन की औषधियों का प्रयोग४४९
अन्य उपाय
पिप्पली आदि का प्रयोग४५०
बला तैल
तिलों को बला क्वाथ से भावित कर तैल निकालना४५०
शतपाकी तैल
बला तैल के समान तैल४५१
षोडशोऽध्यायः
विद्रधि की चिकित्सा का व्याख्यान४५१

१६

विषय

पच साध्य बिद्रधियां

वातजन्यविद्रषि

पित्तजविद्रधि

करंजादिघत

कफजन्यविद्रषि में

रक्तजन्य ओर आगन्व॒ज

विद्रधिर्या

कृफजन्य अन्तः विद्रधि

पक्र विद्रधि की चिकिस्छा

मज्जाजन्यविद्रषि सप्रदओोऽध्यायः विसरष-नाडी-स्तन रोग

चिकित्सा ६ साध्य तथा असाध्य विप

वातजन्यविसप

पित्तजन्यविसपं मे केप

गोयांदिघत

कृफजन्य विखप के लिये अजगन्धा

आदि्छेप

वरुणादिगण का प्रयोग

वरेण को शोघन करनेवाला

तेल ` पित्तजन्य नादी =

कोष्टस्थित नाडी को नष्ट

करने का घत

कफजन्य नाडी में

हाल्यजन्य नाडी में

कृश दुं पुरष की नाडी

सब वर्तयां नाड्यां में

बरतनी चाहिये

दुध क विक्त होने पर

उसका शोघन

स्तन विद्रधि

ग्रन्थि, अपची अदु द्‌, गक्ग्ण्ड ।

। चिकित्षा का व्याख्यान

४५

2

सुश्रतसं हितां

पुष | विषय

४५१ | पित्तजन्य म्रन्थि मे

४५१ | कफजन्य ग्रन्थि मं

५१ | जो ग्रन्थि उपरोक्त चिकित्षा

से शातन दहो उसे चीरकर

निकाल दं

मांस कन्दी के लि

मे दोजन्यग्रन्थि में

जीमूतक आदि से सिद्ध घुत

ममंस्थान से रहित स्थानों मे

अपक्त म्रथिरयों के विषय में

इन्द्रवस्तिमम

अपंचियों क निड्त्ति के यि

रोपण काल में

कर्कार चूर्णं आदि पित्ताबुदमें कफाबुद में

अन्द्‌ पर ल्ेपादि ` मेदो द स्वेदन आदिः

बातजन्य गण्ड मे स्वेद

कफजन्य गण्ड मं स्वेद आदि

४५४

४५४

४५४

४५४

४५४

$प्र ४

क न च ४५४

मेदोजन्य गलगण्ड में ४११ स्नेहन आदि

४१५

४५५

५२ का व्याख्यान `

बृद्धिरोग

वातब्रद्धि मे -

पित्तजन्य इद्धि में

फफजन्य बृद्धि भ

मेदजन्य ब्द्धि्मे ..

. | मूत्रजन्यव्रद्धिमे

-साध्यउपदंशोर्मे

वातजन्य उपदंश में

वैत्तिकं उपदंश मे

५५६

४५७ ४१७

| प्रकारे उपद्श् के ल्थि चूण

गर्रण्डरोग मे चिकट आदि `

एकोनविज्ञोऽध्यायः

चरद्धिः उपदंश, श्टीपद, चिकित्सा

अत्रबदिको छोड बाकी-छ ~ =:

--3 ४६२ - ४६३

२४६३

९२

~ ~

ः = < | < 4 ४६४ ४६४

४: कफजन्य उपदंश मँ ~ ˆ - : ४६४

| उपद्् चिक्त्ा सब : 1 ४६५ ६

पृष्ठ

४५८

४६८

४५६

४५६

४५६

४५६

४६०

४६०

४६१

४६१

४६१

४६१

४६१

४६२१

४६२ ~ ४६२

23

४६२

४६२

४६२

४६२

-जवुमणि आदि ्

न्यच्छ, व्यंग ओर नीलिका

-चिषश्ड प्रकशमं.

गुद्श्रशम -4

एकविंशतितमोऽध्यायः |

शक्रदोष चिकिस्वा का व्याख्यान . ४५

अष्टील्कामे ` -

विषय

उपद॑शों मँ रोपण के स्यि तेख तरणजन्य विषपं के.ख्यि चूं

रक्त जन्य ओर सन्निपातजन्य

उपदश

सन्निपातजन्य उपदंश में विशेष

चिकित्सा

वातजन्यश्लोपद मे स्नेहन आदि

कफजन्य श्लोपद्‌ में

पित्तजन्य श्लोपद्‌ में

पानीयक्षार

काकादनी आदिमे सिद

किथा तेख

त्रिफला क्राथ मिलाया क्षार

विंशतितमोऽध्यायः

लुद्ररोग चिकित्साका व्याख्यान

अपक्व अजगल्लिका मं

स्वेद तथा लेप

पित्तजन्य विसपुः

चिप्परोग~;“

पकी विदारिका को चीरना

शकरा दकी चिकित्सा

पाददारी मे स्नेहन आदि

अलसरोगण म~~

इन्द्रलुक्त मं

अरूषिका में

दाङ्णकःरोग मं मसूरिका मे


युवान पिड़काओं मे

पद्मिनी कटक रोगमं.

परिवर्तिकामं

वल्मीकमं ._

अहिपूतना रोग मं

सषपी मं व्रण रोपकः तेल

वि्ष॑य |

ग्रथित को निरन्तर नाडी स्वेद

अछ्जी को जोक लगाकर

मृदित को वला ते से

संमूढ पिडका में

अवमन्यमें

उत्तमा में

शतपोनक, रक्तजन्य मं

द्रा विञ्चतितमोऽध्यायः

मुखरोग चिकित्सा व्यास्यान

खाध्य ओष्ठ प्रकोपं की

चिकित्सा

दन्तमूल मेँ होनेवाल रोगों की

चिकित्सा

द्न्तवेष्टमें

उपकुशरोग में

शिरोविरेचन

दन्त नाडी को सामान्य

नस्य मेँ बरतने के ल्यि सिद्ध तैल

चिकित्सा

जिहागत साध्य रोगों की

चिकित्सा

ं ताह के रोगोंकी चिकित्सा

कण्ठ के रोगों की चिकित्सा । स्नेहिक धूम सवंसरमे ` उत्तम है

सअसाध्यमुखरोग

पष्ठ

४७०

४७०9

४७०

४७०9

४७१

४७१

४७१

४७१

४७१

४७९१

४७२९

४७९

, ४७२

४७२ ।

४७२९

४७३

४७४

` ४७४

४७४

४७१

त्रयोविशतितमोऽध्यायः `

शोफं की चिकित्साका

व्याख्यान

अवयव मे उत्पन्न शोफ छ

` प्रकारका दै सवसर शोथ पाच प्रकारका दहै श्वयथु शोथ

` वातजन्य शोथ

.. आमाशय मे स्थित दोष ऊपर के

भाम मे.शोय उसन्न करता ह . सामान्य्‌ चिकित्सा

फ को नष्ट करने के छ्यि

ष्याज्च 2,

४७

४७५

४७५

४७१

` ४७६

४७६ .

, ४७७

४७७.

विषय

सिु.रश्व्‌ र्‌ मनुष्य ध त नी ५ ~= 4 ¢> = र > क 99 क च क) य्‌ + ~ ~ = 4 भ्यः नि कि न्क + = क 9 , क क ^ # = ् क ऋ" ^, ~ र # ६

पृषु

चतुविशतितमोऽभ्यायः

अनागताबाधा प्रतिषेध अध्याय का

व्याख्यान ४७८

आरोग्य चाहनेवाले को एतिदिन

क्या करना चाहिये ४७८

प्रथम दातुन करना ४७८

जिह्वा साफ करने के छ्यि मुख

ग्रह्नाङक्न ४७८

आंखों मेँ आंजन क्गाना ४७६

पान खाना उत्तमदहै ४७६

शिर पर ते क्गाना ४७६

शिर पर लगने के ल्यितैल ४७६

कधी का करना ४७६

कानों मे ते डालना ४७६

स्नेह का अभ्यंप ४७६

सम्पूणं अंगों का परिषेक ४७६

स्नेह का अभ्यंग जहां नहीं करना

चाहिये ४८9

व्यायाम के संबंध में २

उबटन लगना ४८१

उद्घषण ओर उद्वतन ४८१

स्नान ४८१

पूखों कौ माला तथा

सुन्द्र्‌ बख्र ४८१

मुख पर ठेप करने से ४८२

ओखां मे काजल ठ्गना ४८२

आहार ' ४८२

पैरों का धोना तथा तैर मल्ना ४८२

जूते का पहनना ४८२

शिर पर पगड़ी आदि पहनना ४८२

छाते का धारण करना ४८२

हाथमे दण्डेका धारण करना ४८२

आराम करना 2८

मुसाफरी ४८२

सुखदायक शय्या पर सोना ठरे

संबाहन (चापी करना) ४८३

वायुसेवन्‌ ४८३

मनुष्य के त्यागने योग्य -४८३-४८१

श 9 । 4 क

विषय पृष

जो २ दोष ऊुपित होते हं ४८५

मेथुन मे अयोग्य तथा

योग्य स्री ४८ पंचर्विशतितमोऽध्यायः £

मिश्रक चिकित्सा का व्याख्यान ४८७

परिपोट ४८७

स्नेहदादि उपचार धटे

पठित रोग को नष्ट करने के स्यि तैक ` ४८टं बार घने, पंघराङे तथा कालत बनाने का तैक ४८८

मुख पर अभ्यंग करने के ल्य

सिद्ध धुत ४८८

राजाओंके योग्य छेष ४६०

षडबिशतितमोऽध्यायः, `

क्षीणव्रलीय वाजीकरण चिकित्सा

व्य सख्यान्‌ ४६९०

वाजीक्रण योग किनके ल्यं उत्तम ४६१ वाजोकरण के तीन प्रकार ४६१ क्खीबता का वणन ४६१

भ्रष्ठ वाजीकर विधि ४६२ वाजीकर अनेक योग ४६२-४६३

सप्रविशतितसोऽभ्यायः

सर्वोपघातशमनीय अध्याय का

व्याख्षान्‌ ४६३

वय स्थिर रहने का उपाय ४६३ विंडंग-तण्डुर चूणं ४६४

रक्त पित्तजन्य रोगां मे गम्भीरी कल्य ४६५

बल की चाहवाछरे के ल्यं

४ह१्‌ `

ओषधियां ४६५ .

वाराही कन्द मू का चूण ४६१.

ओंखों के तेज के छियं

अष्टाविरतितमोऽध्यायः

मेषायुष्कामीय रसायन चिक्रित्वा ` व्याख्यान

मेधा ओर आयु की कामनावाले

के छियि चण

मेघावी के ल्यि मण्डूकपणी

२०

सुश्रुतसंहिता

विषय

मेधावी के लिए ब्राह्मी आदि का योग ४६७-४६८

आयुर्वर्षक मंत्र और औषध के साथ एक वर्ष में फल देने वाली रसायन ४६८

पाप दौर्भाग्य नष्ट करने के लिये रसायन ४६८

वचा चूर्ण आदि योग ४६८

मधु का योग ४६८

एकोत्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः

स्वभावव्याधि प्रतिषेधनीय रसायन का व्याख्यान ४६६

सोम का विधान ४६६

चौवीस नाम के सोम ४६६

सोम सेवन विधि ५००-५०१

सोम के पत्ते आदि कैसे होते हैं ५०१

सोम कहाँ होता है ५०२

त्रिंशत्तमोऽध्यायः

निवृत्तसन्तापीय अध्याय का व्याख्यान ५०२

रसायन के सेवन से देवताओं का आनन्द ५०२

सात पुरुष रसायन को सेवन न करें और सात ही कारणों से रसायन गुण नहीं करते ५०३

औषधी (सोम के सहस्र) का व्याख्यान ५०३

औषधियों की प्रथक २ पहचान इन सातों औषधियों को उखाड़ने के मन्त्र ५०४

सात औषधियों को दूँढने के स्थान ५०५

एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः

स्नेहोपयोगिक चिकित्सा का व्याख्यान ५०५

स्नेह की उत्पत्ति स्थान दो प्रकार का है ५०५

स्थायर स्नेहों का वर्णन ५०५

कषाय स्नेह पाकविधि ५०६

विषय

पल कुडव आदि का परिमाण स्नेहपाकविधि ५०७

स्नेहपान विधि ५०७

घृतपान, तैल, वसा, मज्जा के योग ५०७

पित्तविकार, वायुरोग और कफ की अधिकता में घी कैसे लेना चाहिए ५०७

तिरसठ प्रकार के रसों से घी का सेवन ५०७

केवल स्नेहपान उत्तम है ५०८

ऋतुओं में स्नेहपान का समय स्नेहपान के पीछे प्यास लगने पर गरम पानी स्नेह की मात्रा जीर्ण होने पर किनके लिये उत्तम है स्नेह के जीर्ण होने पर क्या करना चाहिये स्नेह के लिये घृत स्नेहपान का निषेध स्नेहन के अयोग में सम्यग स्निग्ध के लक्षण अतिसिग्ध के लक्षण स्नेह तथा रूक्षण स्नेह के नित्य सेवन का फल

द्वान्त्रिंशत्तमोऽध्यायः

स्वेदावचारणीय चिकित्सा का व्याख्यान ५१०

स्वेद चार प्रकार का है तापस्वेद, उष्मास्वेद, उपनाह स्वेद, द्रवस्वेद ५११

निरग्नि और साग्नि स्वेद ५१२

नस्य, वसित और शोधन के पहले स्वाद देना चाहिए बिना स्नेहन किया शरीर स्वेद से नष्ट हो जायगा छिपे हुए दोष भी स्वेद पर बाहर निकल आते हैं भली प्रकार दिया स्वेद से जड़ बनी सन्धियाँ क्रियाशील बन जाती हैं ५१३

विषय

किनको स्वेद नहीं देना चाहिये ५१३

त्रयखिण्णत्तमोऽध्यायः

वमन-विरेचन साध्य उपद्रव चिकित्सा व्याख्यान ५१४

दोषों के लिये सिद्धान्त दोषों को निकालने के लिये वमन और विरेचन ५१४

वमन विरेचन की विधि वमन भली प्रकार हुआ जानने के लक्षण ५१४

भली प्रकार वमन हो जाने के बाद क्या देना चाहिए वमन करनेवाले व्यक्ति को जो दोष नहीं होते वमन द्वारा कफ शोधन वमन का निषेध ऊर्ध्ववायु का लक्षण वमन के अयोग्य पुरुषों को वमन देने से रोग कष्ट साध्य अपवाद वमन के योग्य विरेचन कित्ते देना चाहिए विरेचन से पहले लघु भोजन कोष्ठ तीन प्रकार का है विरेचन पीने पर मल को न रोके विरेचन में मूत्र, मल आदि क्रम से आते हैं भली प्रकार विरेचन न होने पर दोष भली प्रकार विरेचन के लक्षण ठीक विरेचन न होने पर पेया न पिलाये विरेचन से पित्तजन्य दोषों का नाश विरेचन के योग्य अयोग्य युक्त विरेचन स्वभाव से दोषों को अघोषार्ग से निकालता है मृदु कोष्ठवाले व्यक्ति में अतितीक्ष्ण विरेचन दोषों को भली प्रकार नहीं निकालता ५१८

विषयानुक्रमणिका

२१

विषयपृष्ठविषयपृष्ठविषयपृष्ठ
प्रातः पी हुई औषध प्रशस्त है५१८शुद्ध रक्त और अशुद्ध रक्त की परीक्षा५२२अयोगजन्य हानियों को चिकित्सा५३०
दुर्बल मनुष्य के दोषों को थोड़ा २ करके बाहर निकाले५१८अन्न के शेष रहने पर निर्बल शरीर आदि के अति-तीक्ष्ण उष्ण अतिलवण आदि को पीने पर५२२सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः अनुवासन उत्तर बस्ति चिकित्सा व्याख्यान५३१
पके हुए दोषों की उपेक्षा करना ठीक नहीं५१८कूरकोष्ठ अतिलवण या अतिसिन्धु पुरुष में बरती हुई औषध५२३अनुवासन कब देना चाहिये बिना शोधन किये मनुष्य को स्नेहबस्ति नहीं देनी चाहिये५३१
मन्दगनि और कूर कोष्ठवाले के लिये अतिशय स्नेहगान पर स्निग्ध विरेचन नहीं पीना५१८जो मूर्खता से औषध के वेग को रोकता है जिस पुरुष के दोष ऊपर या नीचे प्रवृत्त हुये हों५२३अर्श, ग्रहणी रोग आदि वायुजन्य रोग को नष्ट करने का योग५३१
स्नेहसात्प्य व्यक्ति के लिये कोमल प्रकृतिवाले को थोड़ी हानि करनेवाली औषध५१८पञ्चत्रिंशत्तमोऽध्यायः नेत्रबस्ति प्रमाणप्रविभाग चिकित्सा का व्याख्यान५२४वात रोगियों में अनुवासन रूप से बरतनेवाला तैल५३१
स्नेहन, स्वेदन के बिना संशोधन५१८स्नेहादि कर्मों में बस्ति मुख्य किन रोगों में बस्ति बरतनी चाहिये५२४बस्ति में देने योग्य अनेक प्रकार के तैल५३१-५३३
स्नेहन स्वेदन से चलायमान दोष वमन विरेचन द्वापा जाते हैं५१९बस्ति के भिन्न २ परिमाण बस्ति के विषय में बस्ति के दो प्रकार कौन किसमें देनी चाहिये वायु के वेग को बस्ति ही सहन करती है५२५भली प्रकार निरुद्ध होने पर विविध तैल अनुवासन के लिये५३३
चतुर्त्रिंशत्तमोऽध्यायः वमन विरेचन व्यापत् चिकित्सा का व्याख्यान५१९बस्ति के दोष५२५रात्रि में बस्ति का प्रयोग न करे५३४
वमन विरेचन की व्यापत्ति १५ प्रकार की५१९अतिशय जोर से अथवा धीरे से दवाई बस्ति का दोष और उसको ठीक करने के उपाय५२५अपवाद अनुवासन लेने का काल जिसको अनुवासन देना हो५३४
भली प्रकार वमन न होने से तीक्ष्ण वमन देना चाहिये५१९अतिस्निग्ध में रुक्षबस्ति तथा रुक्ष में स्निग्ध५२६भली प्रकार अनुवासन के लक्षण५३४
अशुद्ध आमाशयवाले तथा प्रचुर कफवाले को विरेचन ठीक न होने पर तुरन्त अतिशय तीक्ष्ण विरेचन देना चाहिये५१९पट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः नेत्रबस्ति व्यापत् चिकित्सा नेत्र के हिल जाने से या घूम जाने से बस्ति के मोटा या छोटे होने से दोष५२६१९ बस्तियाँ शुक्रगत रोगों को भली प्रकार अच्छा करती हैं५३६
भली प्रकार विरेचन होने पर लक्षण देखकर वमन कराये५१९अतिशय जोर से अथवा धीरे से दवाई बस्ति का दोष और उसको ठीक करने के उपाय५२६१८ निरुद्ध और १८ बस्तियाँ को पालनेवाला मनुष्य बड़ा बलवान् होता है५३६
किस किस अवस्था में अतितोष्ण विरेचन देना चाहिये वायु की अधिकता में अतिशय स्नेह देकर स्वेद कराके फिर शोधन देवे५२०अतिस्निग्ध में रुक्षबस्ति तथा रुक्ष में स्निग्ध५२६स्नेह बस्ति और निरुद्ध एक साथ सेवन न करे५३६
अति मात्रा में स्नेह और स्वेदन करने पर वमन के अतियोग पर विरेचन के अतियोग पर५२०किस प्रकार की बस्ति दोष करती है५३०बहुत वायुवाले व्यक्ति को प्रतिदिन स्नेह बस्ति स्नेह बस्ति जन्य हानियाँ उत्तर बस्ति की व्याख्या कौनसी बस्ति अच्छी है बस्ति के शोधन के लिये मात्रा उत्तर बस्ति के वापिस न आने पर५३७

२२

सुश्रुतसंहिता

विषयपृष्ठविषयपृष्ठविषयपृष्ठ
बस्ति में जलन होने पर५३६ग्राहीबस्ति५४५नस्य का समय५५३
उत्तर बस्ति किन रोगों को नष्ट करती है५३६बन्ध्या स्त्रियों के लिये बस्तियाँ५४५नस्य के पूर्व५५३
अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायःमाधुवैतलिक बस्तियाँ५४६स्नेह की मात्रा आठ बिन्दु५५४
निरुहक्रम चिकित्सा व्याख्यान५४०युक्तस्थ, दोषहर बस्ति, सिद्धनस्य में त्याज्य५५४
अनुवासन दिये हुये व्यक्ति कोबस्ति आदि५४६नस्य के योग, अतियोग अयोग के लक्षण५५४
निरुह बस्ति तथा उसे देने का प्रकार५४०एकोत्तचत्वारिंशत्तमोऽध्यायःशिरो विरेचन स्नेह की मात्रा५५४
बस्ति देने के लक्षण उत्पन्न होने पर निरुह बस्ति बन्द कर देवे५४०आतुरोपद्रव चिकित्सा का व्या० स्नेहपान, वमन विरेचन आदि लिये कायागनिमंद हो जाती तीनमाप यवागू५४७प्रयोग की दृष्टि से नस्य के तीन लक्षण५५४
कोमल प्रकृतिवालों को अधिक मात्रा में बस्ति न देवे५४०कफपित्त की अधिकतावाले के लिये तर्पणादि विधि५४७सर्पदष्ट, मूर्च्छित पुरुषों के लिये५५५
भली प्रकार निरुह हुआ जानने के लक्षण५४१रोगी एक एक अनुवासन बस्ति लेकर तीन दिन तक परहेज करे५४८कोमल प्रकृति स्त्रियों के सिर को शोधन के लिये५५५
भली प्रकार निरुह होने के पश्चात् कर्म५४२व्रण रोगी, आदि गिद्धी के कच्चे वर्तन के समान है५४८नस्य के लिये अयोग्य५५५
आस्थापन और स्नेह बस्ति से रोगी को शान्ति५४२क्रोध करने पर कुपित हुआ पित्त, दाह प्यास आदि करता है५४८अतिमात्रा, अतिशीत आदि से हानियाँ५५५
निरुह देने के दिन वायु के कोप का भय५४२चत्वारिंशत्तमोऽध्यायःहानियों की चिकित्सा कैसे५५५
एक मुहूर्त प्रतीक्षा करने पर निरुह बस्ति के बाहर न आने पर५४२धूमनस्य कवलग्रह चिकित्सा का व्याख्यान५५५प्रतिमर्श नस्य का उपयोग५५५
विपरीत गतिमान् वायु से दोष भोजन करने पर आस्थापन नहीं देना चाहिये५४२धूम पाँच प्रकार का है प्रायोगिक धूम के लिये वर्ति वमन करानेवाले द्रव्यों को वामनीय धूम में बरते५५०१४ समय५५६
अवस्थानुसार निरुह देना चाहिये५४२धूमनेत्र को बनाने के लिये धूम पीने के प्रकार५५०भित्र २ समय में लिये नस्य के गुण५५६
निरुह में देने योग्य५४२धूम पीने का समय५५०कवल ग्रहण की विधि५५६
स्वस्थावस्था में क्वाथ आदि का भाग५४२स्नेहिक धूम स्नेह एवं उपलेंप से वायु को शमन करता है५५०गण्डूष का लक्षण५५७
कल्पना विधि५४२धूमनेत्र को बनाने के लिये धूम पीने के प्रकार५५०कवल में शुद्धि के लक्षण५५७
बारह प्रसृतवाले निरुह५४३धूम पीने का समय५५०तिल आदि का कवल जले हुये मुल के दाह को नष्ट करता है५५७
पृथक् रूप से बस्तियाँ५४३-५४६स्नेहिक धूम स्नेह एवं उपलेंप से वायु को शमन करता है५५०औषध का बुद्धि पूर्वक विभाग करके चार रूपों में प्रतिसारण५५७
शोधनबस्तियाँ५४५धूम के गुण५५०
लेखनबस्तियाँ५४५धूमपान के तीन योग्य५५०
बुँहणबस्तियाँ५४५धूमपान में कितने कितने घूँट और कैसे लेने चाहिये५५०
बाजीकरबस्तियाँ५४५नस्य की विधि५५०
पिच्छाबस्ति५४५नस्य के पाँच प्रकार५५०
किन रोगों को ठीक करने के लिये नस्य लेना ठीक है५५३

कल्पस्थान

प्रथमोऽध्यायः

अन्नगान रक्षा कल्प का व्याख्यान५५८
वैद्य निरन्तर राजा की विष से रक्षा करे५५८
राजा को कभी किसी का विश्वास नहीं करना चाहिये
वैद्य की योगता५५८
रसोई कैसे हो५५६
रसोई का अधिकारी वैद्य गुणों

विषयानुक्रमणिका

२३

विषयपृष्ठ
से युक्त मनुष्य हो५५६
भन्य कैसे हों५५६
रसोई में काम करनेवाले सब वैद्य के अधीन हों५५६
विषदाता की पहचान५५६
कभी २ सज्जन पुरुष भी असाधुओं जैसी चेष्टा कर लेते हैं५६०
विष देने के साधन५६१
विषैले भोजन की परीक्षा में पशु पक्षियों का उपयोग५६०
विषैले अन्न के परोसने पर बाण के ऊपर जाने से हृदय आदि में दोष५६०
हाथों में लगा विषैला अन्न५६०
विषैला अन्न खाने से विकार५६१
अमाशय में गया विष५६१
पक्वाशय में पहुँचा विष५६१
दूध, मधु, पानी आदि तरल द्रव्यों में विष से विकार५६१
शाक, दाल, अन्न आदि में विष के विकार५६१
दातुन में विषका संचार होने से५६१
विषैला अम्यंग५६१
कंधी आदि के विष से युक्त होने पर दोष तथा उसका उपाय५६१
शिर, मुख, हाथी घोड़े ( आदि की पीठ पर ) विष लगाने से विकार तथा चिकित्सा५६२
नस्थ और धूम में विष होने से विकार तथा चिकित्सा५६२
विषले पुष्पों का विकार और चिकित्सा५६२
कान के तैल के विषैला होने पर विषैले अंजन से५६२
विषैले, जूते, खड़ाऊँ, आभूषण आदि के विकार तथा चिकित्सा५६२
वैद्य राजा को हर प्रकार से विष से बचाये५६३
विषयपृष्ठ
राजा सदा विषन्न द्रव्यों के साथ भन्य और भोजनों का सेवन करे५६३
द्वितीयोऽध्यायः
स्थावर विष विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान५६३
स्थावर और जंगम भेद से विष के दो प्रकार५६३
दस स्थावर विषके अधिष्ठान आठमूल विष, पांच पत्र विष, १२ फलविष, ५ पुष्प विष, ७ त्वक सार, ३ शीर विष, २ घातु विष, १३ कन्द विष५६३
सब मिलाकर ५५ स्थावर विष५६४
अवान्तर भेद५६४
भिन्न २ विषों के लक्षण५६६
तीक्ष्ण कन्दों का विस्तार५६५
विष के दसगुण५६५
दूषीविष संज्ञा५६५
दूषीविषके लक्षण५६५
विष नानाप्रकार के
रोगोत्पत्तिकारण५६६
स्थावर विष के लक्षण५६६
चिकित्सा५६६
अजेय घृत५६६
दूषीविषारि नाम का अगद५६७
तृतीयोऽध्यायः
जंगम विषविज्ञानीय कल्प का व्याख्यान५६७
जंगमविष के १६ स्थानों का विस्तार५६७
विष से दूषित जल और उसे दूर करने के उपाय५६८
विष से दूषित भूमि५६६
घास भूसा एवं भोजन गेहूँ आदि के विष से दूषित हो जाने पर उनकी चिकित्सा५६६
धूम या वायु के विष से युक्त होने पर५६६
विषयपृष्ठ
विष की उत्पत्ति५६६
विष में प्रायः सब गुण तीक्ष्ण होते हैं५६६
विष सॉप के सारे शरीर में फैला रहता है५७०
विषों में शीतल परिवेक, कीटों का विष मन्द होने से स्वेद दे सकते हैं५७१
विष से मरे प्राणी का मांस नहीं खाना चाहिये५७१
विषपान के लक्षण५७१
सभी विष उष्ण उपचार से दुगुने बढ़ते हैं५७१
असाध्य के लक्षण५७२
चतुर्थोऽध्यायः
सर्वदृष्टविज्ञानीय कल्प का व्याख्यान५७२
दंष्ट्रा विषवाले पृथ्वी के सॉप ८० प्रकार के हैं५७२
उनके पांच प्रकार के भेद तथा आकार दृष्टि से तीन प्रकार५७२
अतिशय क्रोधी सॉप काटते हैं और उनका काटना तीन प्रकार का है सर्पाङ्गभिद्य५७३
सॉपों के भिन्न २ विह्न आकार५७३
सॉपों के भी ब्राह्मण क्षत्रिय आदि चार वर्ण५७३
दर्वाँकर वायु को मण्डलि पित्त को राजिमान् कफ को कुपित करते हैं५७३
तीनों के धूमने का काल५७३
तीनों की अवस्था जो मृत्यु का कारण होती है५७४
डरनेवाले सॉप अत्यविष के होते हैं५७४
पुरुष, स्त्री तथा नपुंसक जाति सब सॉपों के दृष्ट लक्षणों के समान्य रूप५७६
भिन्न २ सॉपों के काटने से शरीर पर प्रभाव५७६

१४

सुभुतसंहिता

विषय पृष्ठ

साँपों के विष के सात वेग ५७६

विष का पशु-पक्षियों पर प्रभाव ५७६

पञ्चमोऽध्यायः

सर्पदण्डविष चिकित्सित कल्प ५७७

व्याख्यान ५७७

सर्प के काटे हुये स्थान पर अरिष्टा ५७७

बाँधनी चाहिये ५७७

जहाँ अरिष्टा न बाँधी जा सके वह ५७७

स्थान अभिनसे जला दे ५७७

मुख को वस्त्रों से भरकर ५७७

चूसना ५७७

मंत्र जाननेवाला अरिष्टा को ५७८

भी मंत्रों से बाँधे ५७८

तपस्वियों के मंत्रों से विष ५७८

औषधियों से भी जल्दी नष्ट ५७८

होता है ५७८

मंत्र सीखने के उपाय ५७८

अगद उपचार ५७८

साँप काटने की चिकित्सा ५७८-५८२

विषयुक्त वस्तु से विद्ध हुये ५७९

के लक्षण ५७९

अस्थि विष के कारण उत्पन्न ५७९

व्रण की चिकित्सा ५७९

महागद ५८१

अजित अगद ५८१

तात्पर्य अगद ५८२

श्रृषभ अगद ५८२

संजीवनी अगद ५८२

लसुड़ा आदि से बनाया अगद ५८२

द्राक्षा आदि से मिलाया अगद ५८२

क्षेप, अंजन, नत्य ५८२

कीट विषों के नष्ट करने के ५८३

लिये क्वाथ ५८३

चूहों के विष को नाश करने के लिये ५८३

एकसर गण ५८३

षष्ठोऽध्यायः

दुन्दुभिस्त्वनीय कल्प का व्याख्यान ५८३

घावड़ी आदि से क्षार की भाँति ५८३

अगद विष को नाश के लिये ५८३

विषय पृष्ठ

कल्याणक घृत ५८४

अमृतघृत ५८४

महासुगन्धि अगद ५८४

विषपीडित व्यक्तियों के लिये अन्न ५८५

अविष मनुष्य ५८४, ५८५

सप्तमोऽध्यायः

मूषिक कल्प का व्याख्यान ५८५

शुक्रविषवाले १८ प्रकार के चूहे ५८५

इनके काटने के लक्षण ५८५

विस्तार से ५८५, ५८६

सब मूषिकों में शिरावेधन, संशोधन ५८६

सब चूहों के दंश में सुखदायक योग ५८६

विरेचन के लिये ५८६

सारिवा आदि के क्वाथ और क्वाथ में सिद्ध घृत ५८६

न भरनेवाले व्रण की चीरकर चिकित्सा करे ५८७

पागल विषवाले पशु के काटने से ५८७

जिस प्राणी से काटा गया हो उसके समान ही चेष्टा करने पर मनुष्य मर जाता है ५८८

जल त्रास का लक्षण ५८८

जलत्रास भी असाध्य है ५८८

पागल जानवरों के विष को नष्ट करने के लिये ५८८

शरपुंवा आदि का योग ५८८

पागल कुत्ते के काटने में नहलाना और उसके बाद संशोधन देवे ५८९

हिसक पशुओं के नख या दान्तों से जो क्षत हुआ हो ५८९

अष्टमोऽध्यायः

कीटकल्प का व्याख्यान ५९०

साँपों के शुक्र मल मूत्र आदि के सड़ने से उत्पन्न कीट ४ प्रकार के ५९०

विषय पृष्ठ

१८ प्रकार के वात स्वभाव के कीट ५९०

२४ कीट पित्रा प्रकृति के ५९०

१३ कीट कफ प्रकोपक हैं उपद्रव छ गलगोलिका के काटने से ५९१

आठ प्रकार के शतपदी आदि मण्डूक आदि आठ ५९१

विश्वभमरा के काटने से अहिण्डुका, कण्डूका, शूकंबुन्त के काटने से ५९१

पिपीलिका ६ प्रकार की ५९१

मक्खियाँ छ प्रकार की ५९२

मशक पाँच प्रकार की एक जाति में छ असाध्य है विषैले शव, मूत्र, मल से दोष ५९२

कष्ट साध्य दंश ५९२

१२ कीट प्राण नाशक इन कीटों के तोड़ण विष में मन्द विष ५९२

इन कीटों के नानाप्रकार के योगों से बने चूर्ण को गर कदना ५९२

एक जातिवाले कीटों को सामान्य सेदों से काटने के लक्षणों से साध्य असाध्य पाँच गोधेरक के काटने से ५९२

उग्रविषवाले कीटों के काटने पर सर्प विष की भाँति चिकित्सा ५९२

स्वेदन, आलेपन आदि ५९२

उत्कारिका स्वेदन में उत्तम कूठ आदि त्रिकण्टक विष में उत्तम है ५९२

गलगोलिका के विष नाश करनेवाला अगद कान खजुरा के विष को नाश करनेवाला अगद ५९२

मण्डूकों के विष को नाश करने वाला अगद ५९३

विश्वभमरा के विष को नाश करनेवाला अगद ५९३

विषयानुक्रमणिका

२५

विषयपृष्ठ
अहिण्डुका " "५६३
शुक्रवृन्द " "५६३
विच्छू के तीन प्रकार५६३
विच्छू ३० हैं५६३
मन्द विष विच्छू का वर्णन"
मध्यम विष विच्छू " "५६३
तीक्ष्णविष वाले विच्छू५६४
तीव्र और मध्य विष वाले विच्छू की चिकित्सा सर्प दंश की तरह५६४
चिकित्सा५६४
मकड़ी विष अतिभयानक५६४
मकड़ी विष थोड़ी मात्रा में फैला हुआ कठिनाई से जाना जाता है५६४
मकड़ी विष सात से १५ दिनों में ही मार देता है५६४
मकड़ियाँ सात प्रकार से विष निकालती हैं५६४
लताओं के विषय में पुराना इतिहास, काटने के सामान्य लक्षण साध्यासाध्य और मेदों के साथ चिकित्सा५६५-५६८
कीटों के काटने से उत्पन्न ब्रणों की चिकित्सा५६८
कर्णिका को निकालने के लिये५६८
उत्तरतन्त्रम्
प्रथमोऽध्यायः
औपद्रविक अध्याय का व्याख्यान५६६
शिर के रोग५६६
आँख की आकृति५६६
आँख में मांस पृथ्वी से, रक्त अनि से आदि५६६
कृष्णमंडल तथा दृष्टि के भाग५६६
आँख में पाँच मण्डल६००
आँख में छू सन्धियाँ६००
आँख में छू पटल६००
आँखों को बाँधनेवाली खिरायुत श्लेष्मा६०१
विषयपृष्ठ
विपरीत गतिवाले दोष अतिशय भयानक रोग उत्पन्न करते हैं६०१
रोग का पूर्वरूप६०१
आँखों के उत्पन्न रोगों में पूर्वरूप देखकर चिकित्सा करें६०१
पहले कारण का परित्याग बाद में वातादि दोषों का६०१
नेत्रों में उत्पन्न रोगों के कारण६०१
आँख के ७६ रोग६०१
वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, रक्तजन्य तथा सर्वगत नेत्र रोगों में६०१
बाह्य रोगों में दो असाम्य हैं६०२
द्वितीयोऽध्यायः
सन्धिगत रोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान६०२
सन्धिगत रोग ६ हैं६०२
पूयालस किसे कहते हैं६०२
कनीनिका प्रदेश, पूयस्वाव, श्लेष्मस्वाव, रक्तस्वाव, पित्तस्वाव के लक्षण६०३
पर्वणी, अलजी, क्रमिग्रन्थि के लक्षण६०३
तृतीयोऽध्यायः
वर्त्तमगत रोगविज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान६०३
२१ रोग रोगवर्त्त में लक्षणों सहित६०३-६०६
चतुर्थोऽध्यायः
शुक्लगत रोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान६०६
आँख के शुक्ल भाग में ११ रोग६०६
पञ्चमोऽध्यायः
कृष्णगत रोगविज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान६०७
कृष्णभाग में होने वाले ४ रोग६०७
विषयपृष्ठ
षष्ठोऽध्यायः
सर्वगत रोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान६०८
सर्वगत रोगों में कुल १७ रोग हैं६०८
आँखों के सब रोग अभिष्यन्द के कारण हैं६०८
वाताभिष्यन्द, पित्ताभिष्यन्द, कफाभिष्यन्द तथा रक्ताभिष्यन्द में६०८
अधिमन्थ के सामान्य लक्षण वातज, पित्तज, कफज, रक्ताधिमन्थ में६०८
उपरोक्त कितने २ दिनों में दृष्टि नष्ट कर देते हैं६०९
सखोफ पाक६०९
हताविमन्थ६०९
वातपर्याप६०९
शुष्काक्षिपाक६१०
अन्वतो वात६१०
अस्लाधुषित६१०
सिरोत्पात-खिराप्रदर्ष६१०
सप्तमोऽध्यायः
दृष्टिगत विज्ञानीय अध्याय का व्याख्या६१०
दृष्टि का प्रमाण, उत्पत्ति आदि६१०
दृष्टि में आश्रित १२ भयानक रोग६१०
पटलों में प्रविष्ट तिमिर रोग रोग के लक्षण६११
परिल्लाधि रोग६१२
रक्तजन्य मण्डल६१२
छूः लिंगनाश६१३
पित्त से विदग्ध दृष्टि६१३
कफ से विदग्ध दृष्टि६१३
धूमदर्शी६१३
हृस्वजड्य६१३
नकुलान्ध६१३
गम्भीरका६१३
निमित्तजन्य रोग६१३
अनिमित्तजलिंगनाश६१३

२६

सुश्रुतसंहिता

विषय

आँख के यह कुछ छिहत्तर रोग ६१४

अष्टमोऽध्यायः

चिकित्सक प्रविभाग विज्ञानीय

अध्याय की व्याख्या ६१४

ग्यारह प्रकार के छेदन करने योग्य रोग ६१४

नौ रोग लेखन के योग्य ६१४

पाँच रोग भेदन के योग्य ६१४

पंद्रह रोग वेधन के योग्य ६१४

१२ रोग शस्त्रकर्म के अयोग्य हैं ६१४

सात रोग याप्य हैं ६१४

पन्द्रह रोग असाध्य हैं ६१४

नवमोऽध्यायः

बातामिष्यन्द प्रतिषेध चिकित्सा का व्याख्यान ६१५

अभिष्यन्द और अविमन्य वाले रोगी का सिरामोक्षण ६१५

योग्य उपनाहों से स्वेद दें ६१५

भोजन ग्राह्य ६१५

भोजनोपरान्त घृत पान ६१५

सिद्ध किया तैल नस्य में ६१६

सिद्ध किये दूध का परिषेक, आश्च्योतन में ६१६

अभिष्यंद में अंजनादि ६१६

दशमोऽध्यायः

पित्तामिष्यन्द प्रतिषेध का व्याख्यान ६१६

पित्त जन्य अविमन्य में पित्तज अभिष्यन्द आदि में ६१७

सिद्ध किया घृत, दूध, नस्य आदि के योग ६१७

आश्च्योतन ६१७

अम्लाद्युषित में सिरामोक्षण न करे ६१७

एकादशोऽध्यायः

श्लेष्माभिष्यन्द प्रतिषेध व्याख्या ६१८

कफजन्य अभिष्यन्द और अविमन्य में ६१८

बलासमप्रियत रोग में ६१९

विषय

पिष्टक रोग ६१९

योगांजन ६१९

द्वादशोऽध्यायः

रक्ताभिष्यन्द प्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान ६१९

अभिमन्य, अभिष्यन्द, सिरोत्पात और सिराहर्ष ६१९

उपरोक्त रोगों में पुरातन घृत तथा सिरामोक्षण करे ६१९

विरेचन के बाद शोधन ६२०

आँखों के चारों ओर प्रलेप ६२०

अतिशय पीड़ा होने पर चारों ओर के लिये विविध अंजन ६२०-६२३

त्रयोदशोऽध्यायः

लेख्य रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२३

लेखन के योग्य जो ९ रोग कहे हैं उनमें सामान्य विधि जिसमें रक्तस्त्राव आदि न हो वह लेखन भली प्रकार जानो ६२३

ठीक प्रकार लेखन न होने के दोष ६२३

अतिस्त्रावित का लक्षण ६२४

किन २ में लेखन करना चाहिये ६२४

चतुर्दशोऽध्यायः

मेघ रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२४

पकी हुई बिसग्रन्थि के लिये लगप के भिन्न हो जाने पर ६२४

अंजन नामिका में स्वेदन ६२४

कुमिग्रन्थि में स्वेदन करने से कफज उपनाह में ६२४

बिसग्रन्थि आदि पाँचों मेघ योग्य रोगों के अपक्व होने पर ६२४

पञ्चदशोऽध्यायः

छेद्य रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२४

सैंधव के चूर्ण से आँख में क्षोभ उत्पन्न करना ५२५

अर्म के क्षोभित हो जाने पर ६२५

जो अर्म मछली के जाल के समान फैला हो ६२५

विषय

प्रतिसारण के लिये ६२५

शूल होने पर ६२५

यदि अर्म कुछ वच जाये ६२५

जो अर्म छोटा दही के समान ६२५

जो अर्म चमड़े के समान मोटा हो ६२५

अगं के हट जाने से स्वाभाविक वर्ण ६२५

सिराजाल में जो सिरा कठिन हो ६२५

जो पिडका औषधियों से शान्त न हो ६२५

सिराजाल, सिरापिडका में यवक्षार से प्रतिसारण ६२५

अश्रुनाड़ी ब्रण होने के कारण ६२५

चूर्णांजन से अर्म, पिडका आदि नष्ट ६२५

पलक पर स्वेद देकर ६२६

षोडशोऽध्यायः

पद्मकोप प्रतिषेध का व्याख्यान ६२९

पलकों में होनेवाले पद्मकोप के विषय में ६२६

यदि इससे पद्मकोप शान्त न हो तो प्रतिसारण आदि ६२६

बालों की जो नई पंक्ति पैदा हो गई है उसके विषय में ६२७

पद्मकोप को नष्ट करने के लिये सब उपायों को बरते ६२७

सप्तदशोऽध्यायः

हृष्टिगत रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२७

३ रोग साध्य ३ असाध्य ६ याप्य ६२७

पित्तविदग्ध हृष्टि में ६२७

अंजन दोनों रोगों में उत्तम है ६२७

पित्त एवं कफ दोनों विदग्ध हृष्टियों में अंजन करे ६२८

दिवान्ध और राग्यन्ध दोनों को नष्ट करने के लिये अंजन ६२८

विषयांलुक्रमणिकां

३७

विषयपृष्ठविषयपृष्ठविषयपृष्ठ
पित्तविदग्ध हृष्टि में रसौतप्रशस्त शलाका६३४सेक आश्च्योतन पुटपाक की भांति
आदि६२८व्यधन के दोष से रोग६३४तीनों रूपों में६३८
पित्तविदग्ध हृष्टि के सौवेदना में अन्य योग६३४कितनी बूँद बरतनी चाहिये६३८
वीरांजन आदि चूर्ण६२८हृष्टि की निर्मलता के लियेपारिषेक का कारणकाल६३८
पित्तविदग्ध हृष्टि में अंजन६२८शुभ अंजन६३५कफज रोग में६३८
राज्यन्ध को नष्ट करनेवालाअष्टादशोऽध्यायःशिर में उत्पन्न अतिप्रबल रोगों
अंजन६२८क्रियाकल्य का व्याख्यान६३५को नष्ट करके६३८
राज्यन्ध में गोमूत्र आदि६२८आंखों पर तर्पण६३५दोष के लक्षण स्पष्ट होने पर६३८
राज्यन्ध में लुद्रांजन६२८तर्पण में तृप्ति के लक्षण६३५मधुर रस को छोड़कर पांच रस६३८
नक्तान्ध में अंजन६२९अतितर्पण से दोष६३६प्रसादन अंजन६३८
राज्यन्धता को नष्ट करने केहीनतर्पण से दोष६३६प्रातः सारथ वा रात्रि में कौन सा
लिये अन्य योग६२९इनमें दोषकी अधिकता केअंजन बरतना६३८
वातजःय तिमिर में संस्कृत तैल६२९अनुसार चिकित्सा६३६गुटिका, रसक्रिया, चूर्णभेद से
पुरातन घृत आदि तिमिरो मेंआँख जिसे तर्पण द्वारा अवश्यअंजन तीन प्रकार का है६३९
उत्तम६२९बल मिलता है६३६लेखन अंजन की वर्ति का प्रमाण६३९
पित्तजन्य तिमिर में६२९पुटपाक कब करनी चाहिये६३६रसांजन की मात्रा६३९
बकरी का घी नस्य में उत्तम है६२९पुटपाक के तीन प्रकार६३६इन अंजनों के लिये इनके
अणुतैल वायु एवं रक्तजन्यपित्त रक्तज व्रण के लियेसमान गुणवाले पात्र बरते६३९
तिमिर में६२९रोपण पुटपाक६३६शलाकाओं का अकार६३९
वातज तिमिर में६२९स्वेदन पुटपाक २०० गिनने तक६३६शलाका से अंजन को लगाना६३९
अन्य कई प्रकार के अंजन६२९लेखन द्रव्यों को मिलाकरप्रत्यंजन कब बरतना६३९
नस्य, रसक्रिया, धूमपान आदि६३०लेखन पुटपाक६३६किन में अंजन नहीं करना६३९
श्लैष्मिक लिंगनाश कीरोपण पुटपाक ३०० गिनने तक६३६किन हालतों में लगाने से
चिकित्सा६३२लेखन आदि पुटपाक कितनेअंजन दोष करता है६३९
वेधन के पीछे धावन सेदिन बरतना६३६अकालकृत अंजन से उत्पन्नरोग६४०
सेचन आदि६३२परहेज पालने का समय६३६लेखन अंजन के सम्यग् योग में६४०
भली प्रकार लेखन हुआतर्पण किये तथा पुटपाक लियेलेखन अंजन के अतियोग में६४०
जानने के लक्षण६३३व्यक्ति को त्याज्य६३७लेखन के हीन योग में६४०
सिरावेध विधि में६३३तर्पण और पुटपाक के मिथ्याप्रसादन अंजन के सम्यग् योग६४०
दैवकृत छेद से अन्यत्र वेधनआचरण में६३७प्रसादांजन के अतियोग में६४०
होने पर६३३पुटपाक के सम्यग् योग से६३७सफलता चाहनेवाला मात्रा से
अपांग के पास वेधन होने पर६३३पुटपाक के अतियोग से६३७अंजन करे६४०
पूर्ण पका धन शलाका के अग्रपुटपाक प्रसादन६३७अनुक्त अंजनों में हजारों रूप
भाग के छूने मात्र से नष्टअतिउष्ण और अतितीक्ष्णकी कल्पना६४१
होता है६३३तर्पण एवं पुटपाक६३७हृष्टिवल को बढ़ाने के लिये
लिंगनाश अपूर्ण कच्छा होनेठीक मात्रा में तर्पण बरतने से६३७श्रेष्ठ अंजन६४१
पर वेधन होने से वापिसतर्पण और पुटपाक के प्रारंभएकोनविंशतिसप्तमोऽध्यायः
आता है६३४और अन्त में६३७नयनाभिघात प्रतिषेध का व्याख्यान६४१
शलाका दोष६३४दोष के अनुसार उपयुक्ततीक्ष्णांजन, धूप, घूल, आदि से
आश्च्योतन६३७आंखों में आघात की चिकित्सा६४२

२८

सुश्रुतसंहिता

विषयपृष्ठ
इनका उपचार तुरन्त सात दिन से पहले करना६४२
चोट लगी आंख पर पटलों में हुये क्षत का साध्यासाध्य विचार६४२
यदि नेत्र अन्दर बहुत दब गया हो६४२
कुक्कुणक रोग और उसकी चिकित्सा६४३
पलकों को घोने के लिये इसमें उपयोगी अज्ञान लेपादि६४३
विशतितमोऽध्यायः
कर्णगत रोग विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान६४४
कर्णगत रक्त रोग६४४
कष्टसाध्य शूल६४४
कर्ण प्रसाद रोग६४४
वाषिर्ष रोग६४४
कर्णसंखाव६४४
कर्णकण्ठ६४४
कर्णगृध्र६४५
कर्णप्रतिनाह६४५
क्रमिकण६४५
कर्णपाक६४५
पूतिकर्णक६४५
एकविंशतितमोऽध्यायः
कर्णगत रोग प्रतिषेध का व्याख्यान६४५
कर्ण रोग में पथ्य६४५
कर्ण शूलादि चार रोगों में सामान्य औषध६४५
नाडीस्वेद और पिण्डस्वेद६४५
पीपल के पत्तों का तेल६४५
कर्ण शूल में वला तैल६४६
कानों में डालने की वसा६४६
वेदना की शान्ति के लिये स्नेह६४६
वेदना नाश के लिये लहसुन आदि६४६
कर्णशूल में घृत६४६
दीपिका तैल६४७
कर्ण शूल के लिये अन्य प्रयोग६४७
विषयपृष्ठ
कर्णशूल में मूत्र कई प्रकार के तेल कर्णशूल के लिये तथा अन्य कई योग६४७
द्वारविंशतितमोऽध्यायः
नासागत रोग विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान६४६
११ नासारोग६४६
अपीनसरोग के लक्षण६४६
पूतिनासा के लक्षण६४६
नासागाक के लक्षण६५०
पूररक्त के लक्षण६५०
क्ष्वशु के लक्षण६५०
भ्रंशशु के लक्षण६५०
दीप्त के लक्षण६५०
नासा प्रतिनाह६५०
नासा परिखाव६५०
नासा परिशोष६५१
सात अबुर्द६५१
पांच प्रकार के प्रतिशयाय६५१
त्रयोविंशतितमोऽध्यायः
नासागत रोग प्रतिषेधका व्याख्यान६५१
अपीनस और पूतिनासा में६५१
अवपीडन के रूप में नश्य६५१
नसापाक में६५१
पूररक्त में चिकित्सा क्ष्वशु और भ्रंशशु चिकित्सा६५१
दीप्त, नासानाह, नासाखाव६५२
चतुर्विंशतितमोऽध्यायः
प्रतिशयाय प्रतिषेधका व्याख्यान६५२
प्रतिशयाय के कारण६५२
पूर्वरूप६५२
वातजन्य, पित्तज, कफज, सन्निपातज रक्तजन्य, प्रतिशयाय में६५२
दुष्ट प्रतिशयाय६५३
नूतन प्रतिशयाय को छोड़ सब में घृतपान६५४
अपक्व प्रतिशयाय में स्वेद६५४
कफको शिरोविरेचनसे खींचना६५४
पीनस रोगी को असेव्य६५४
विषयपृष्ठ
तक्षण पीनस के लिये वातिक प्रतिशयाय में पित्तरक्त जन्य प्रतिशयाय में कफजन्य प्रतिशयाय में सन्निपातजन्य प्रतिशयाय इनमें तैल के योग६५४
पंचविंशतितमोऽध्यायः
शिरोरोग विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान६५५
११ प्रकार की शिरोवेदना६५५
सूर्यावर्त्तक६५६
वायु, पित्त, कफ के प्रकोप से शिरोरोग६५७
सन्निपात तथा रक्तजन्य, कुमिजन्य शिरो रोग६५७
अनन्त वात के लक्षण६५७
शंखक के लक्षण६५७
षड्विंशतितमोऽध्यायः
शिरोरोग प्रतिषेध का व्याख्यान६५७
वातजन्य में वातव्याधि की चिकित्सा६५७
इसमें खाने योग्य६५८
घृत तथा लेपादि६५८
कफजन्य में चिकित्सा६५८
क्षयजन्य की चिकित्सा६५८
जिस रोगी के शिर को क्रमि खाते हों६५९
अर्घावभेदक में६५९
अनन्त, शंखक, आदि की चिकित्सा६५९
सप्तविंशतितमोऽध्यायः
नवग्रहाकृति विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान६६०
बालकों के ग्रहों के लक्षण, उनकी चिकित्सा, उत्पत्ति तथा कारण६६१-६६२
अष्टाविंशतितमोऽध्यायः
स्कन्दग्रह प्रतिषेध का व्याख्यान६६२
स्कन्दग्रह से आकांत बच्चों की शान्ति के लिये उपाय तथा रक्ष्य विधि६६२

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ुश्र॑तसंहितौं ३9

विषय प्रष्ठ | विषय प विषय |

बात पित्त रमे क्वाथ क्षयरोगी को व्याञ्य ७१६ पाण्डुरोग चार प्रकारका है ९ ।

आदि ६८७ | धमं के अविरोधी विषय ७१६ | पूवर्प ०१

सन्निपात ज्वर मे क्वाथ आदि £ द्विचस्वारिशत्चमोऽभ्यायः खव पाण्डुरोग के रक्षण न |

सब्र उरो को नष्ट करने का गुल्मप्रतिषेध का व्याख्यान ७१७ | उशन्न ध ।

योग ६८६ | गुल्म पांच प्रकार का ७१७ | साध्य पाण्डुरोगी को धृत चूण 8

विषम उवरादि में भिन्नयोग ६६० | गुल्म का रक्षण ७१७ | आदि अनेक योग ०३९...

(प को नष्ट गुल्म के नाम काकारण ७१७ | पठ्चचत्वारिञत्तमोऽध्यायः |

र ६९० | गुल्म पकता नदी ७९७ | रक्त पित्त प्रतिषेध का

न २ सिद्ध किये तेल ६६० | पांच प्रकार का गुल्म कुपित व्याख्यान ह

0 ६६२ | होने पर तीन प्रकार के ७१७ | विदग्ध हआ रक्त दोनों मागो से

कफवातादि उवरां में ६६३ | पूवरूप ७१७ | प्रवृत्त होता है |

उपद्रव नाशक विशेष चिकित्सा ६६४ | वातः पित्त, कफः सन्निपातः साध्यासाध्य विचार ०

नस्य, विरेचन, स्नेह।दि ६९४ | रक्तजन्य गुल्म ७१८ | पूर्वरूप ० २

= ~ ७२४ ज्वर मे धृत देने का समय ६६६ | निरू श अनुवासनों से लाल ल (त

जवर मुक्त रोगी के लक्षण ६६७ | चिकित्वा` 8 || उन ७.५

ज्वर महादेव के क्रोध से ुभआ ६६७ | सलनिपातजन्य गुल्म मे तनिदोष ७९५ बदु

अतिसार प्रतिषेधका नाशक. चिकित्सा ७९६ भोषव ४ र

व्याख्यान | ही देनं ह

६६७ | चिकादि धृत िग्बायधृतः त २६

कारण ६६७ | दाधिक पूत, रसोनादि धृत॒ ७१६ | ऊर्ष्वमामी कौ

लक्षण व पंचतृणमूलादि घृत एर | विरेचन से ७२७ ,

सम््राति ६९७ । पानीयकषार ल उखके बाद्‌ ७३७

अतिषार छः प्रकार का है ६६८ अरिष्ट ९८ मृद वमन सिद्धघृत पशप ७२७

पूचस्प ६ | शटा, दन्ती आदि की गोलियां ७२१ रने के व्यि लेह्‌ तथाफल ७२७ |

असाध्य का लक्षण ६€ गुल्मरोगि्यों के लि | 2 पित्त नाच के छ्य अनेक

चिकित्छा (त ८ उद्ररोग, वात व्याधि आदिम ७२१ योग ७२७ ७३६ ,

एकचत्वारिखत्तमोऽध्यायः 8 श म ७२३ षट्चत्वारिसत्तमोऽध्यायः =

न त (१ शाः कर मू्खाप्रतिषेष का व्याख्यान ७३६

कारण तथा लक्षण ७१०.७१२ | योग मिन्न २ मूढ का करण ७३६

पूवरूप ७२४.७२७ | मोहमू्छी ७३९ `

अधः मृदु शोषन दे ७१४ निचस्वारिशत्तमोऽष्यायः || मृच्छा के छ प्रकार ७२६.

शोषन हो जाने पर. खाने हृद्‌गेग प्रतिषेष का व्याख्यान ७२७ | खश्चण | ७२६ .

७१४ | वाता र | ८

उपद्रव शान्त होने पर बृंहण ७ । < व प से ३ प्रकार रतजन्य, मयजनितृ . ।

व्यवायशोषी के लि क सान्नपरात्‌ से चार प्रकार ७२७ | विषजनित मछ म इसके ६

समनाकेष्मि ७११ | जन्य रो किमे अनेक योग ८५

~ ओोषरोग का एक = | ङभजन्य, हृद्रोग मं ७२७-२८ || संन्यास सं्ावाला ७४५

` महीनेमंनाश - चतुञ्चत्वारिरत्तमोऽध्याय संज्ञ ७१५ | पाण्डुरोग प्रतिषेष का 1 आ जाने पर ७४१

हुन दि | व्यास्यान २ सप्रच त्वारिशत्तमोऽभ्यांयः ^

७१५ | पाण्डुरोग कै कारण ` ७३ पानस्य प्रतिषेष का 1

= = € व्ाख्यान - ७४२ |

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३२

सुश्रुतसंहिता

विषयपृष्ठविषयपृष्ठविषयपृष्ठ
चार रसों के संयोग७६६षट्चषट्टितमोऽध्यायःकितने एकवाले, दो वाले अथवा
छ रसों का संयोग८००तंत्रयुक्ति अध्याय का व्याख्यान८०६तीन वाले८०९
स्वस्थवृत्त अध्याय का८०१३२ तंत्र युक्तियाँ८०६पथ्य रसों से अविकृत तीन
चिकित्सा प्रयोजन८०१तंत्र युक्तियों का लाभ८०६दोष८१०
जिस २ श्रुतु में जो २ दोषअधिकरण, योग, पदार्थ, हेतुर्थ,षोडश कलावाला पुरुष८१०
प्रकृपित होते हैं उन २उद्देश, निर्देश, उपदेश आदिसत्त्व, रज, तम के भिन्न प्रकार८१०
श्रुतुओं में वे २ रसके लक्षण८०७-८०९पृथक् रूप में वात, पित्त, कफ
देने चाहिये८०१-८०२षट्षष्टितमोऽध्यायःतीन दोषों में८११
भोजन के १२ विभाग८०४दोष भेदविकल्प अध्याय कादोष रक्तादि धातु आदि में
औषध के १० काल८०४व्याख्यान८०६मिलकर असंख्येय बनते हैं८१२
आहारकाल८०५रसभेदविकल्प में कहे ६२ भेदों मेंब्राह्म वचन८१२

N श्रीनिर्णयचर्या ॥

सुश्रुतसंहिता

सूत्रस्थानम्

प्रथमोऽध्यायः

अथोतो वेदोक्तिसंध्योर्येन्यदयाख्याम् ॥ १ ॥ एथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब इसके आगे 'वेदोक्तिसं' नामक अध्याय की व्याख्या करने— जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १ ॥

यत्तस्य—वेदोक्तिसं के अभिप्राय आयुर्वेदोक्तिसं का है। यथा—“तस्यानुकृष्टुमतेमो वेदो वेदविदा मतः—” चरक में आयुर्वेद की उत्पत्ति के सम्बन्ध में स्पष्ट किया है, कि—

“न द्राक्षुर्वेदस्याभ्योत्पत्तिस्फलदभ्यं, अन्यत्रात्रयोशोपदे- वाभ्यामि ॥ एतेहे ह्यमधिकृत्योत्पत्तिमुपदिशन्त्येके ॥” च० सू० अ० ३० ॥ २७ ॥

भगवान् बालक का अभिप्राय—अतिशये जनवान् पुरुष से है, जैसा कि भगवान् का उल्लेख किया है—

उत्पत्तिकारणं चैव भूतानामागतं गतिम् । चैत्ति विद्यामविद्यां च स श्रेयं भगवदिति ॥

अथवा इसका दूसरा अर्थ—समस्त परवर्य, यथा, श्री आदि से युक्त को भगवान् कहा है। क्योंकि योगपुरुषों का यही परवर्य है—जैसा कि चरक में कहा है—

आवेशभतसौ मानमर्थात्तौ हृन्दतः क्रिया । दृष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिषिष्ठतश्चाप्यदण्डानम् ॥

१ भगवान् का लक्षण— भुजपातः, भुजनाञ्चैव धारणादव्यवहृतिः । द्रुवस्थानं समुदितम्— ॥ ३० सू० अ० ३ ॥

अथवा—यथा भुजपातः भुज संहरणं विद्योयते । उपहाय तक्षदयनिस्तृषिण उपहाः कृतः ॥ ४ ॥ चरक सू० अ० ३० ॥ २८ ॥

हिरण्यशना चोत्थि—फलां को भुजके के लिये-भुज की उपहाय होते हैं, यही पर शरीर को झुकाने के लिये भुज लाहिये।

इत्युक्तेष्वेमाख्याते योगिनो वृद्धेभ्यवसम् । शुद्धकृत्वसमाधानात् तत् संयमुपजयते ॥

चरक सू० अ० ११३० ॥ २९ ॥

परवर्यस्य समस्तस्य माहात्म्य-यशसाः प्रियः । वेमास्यथ प्रयत्नस्तदपण्णा भग इतीडना ॥

मानुषमताः ।

धन्वन्तरिः—धनुः सत्यं, वरयान्तिष्विचिन्ति गृह्णतेति फल- स्तरीः—शब्द मात्रा के पारंगत होने से 'धन्वन्तरि' ।

विशेष मन्तःय—यह सुश्रुत संहिता श्री नारायण (प्रति- हरेर्ज्योतिषो नारायण एव० ड० टी०) द्वारा प्रतिसंस्कृत (सम्पादित) है और प्रतिसंस्कृत ग्रन्थ में ४ प्रकार के सूत्र या वाक्य रहते हैं अथवा यों कहिये कि प्रतिसंस्कृत ग्रन्थ ४ प्रकार के वाक्यों से भरपूरित होता है, यथा—१—गुरुमत्र = आचार्य की वाक्य, २—शिष्येभ्यः या श्रेता की वाक्य (प्रश्न), ३—प्रतिहरेर्यकां का सूत्र जैसे यहाँ तथा वहाँ वहाँ “यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः” आदि ३ और ४—एकीय सूत्र अर्थात् किसी एक ऋषि (आचार्य) का मत, जिसका सुन न मानते हो परन्तु कुछ अवश्य मानते हो या उसमें उपवेष्टि हो, या सत्यांश हो, यथा—श्लो० स्थान० अ० ३ में रामसमभव में ऋषियों के अनेक मतों का वर्णन तथा श्लो० अ० ६ में “तत्र केचिद् आहुः” और यत्र तत्र “यद् आहुः एते” “इति केचित्” आदि वाक्य । इस प्रकार उनके चार प्रकार के वाक्यों से भरपू- रित ग्रन्थ सुगम, सरल एवं संक्षिप्त होता है ॥ ३ ॥

अथ सलु भगवन्तमप्यवरस्यपिगणपरिवृतमोक्षमस्य कागिराज दिवोदास धन्वन्तरिस्मोपधेनवचेतरेणीरधो- ष्टोषावतकरवीर्य (२) गोध्रुरक्षितसुश्रुतप्रभृतय उच्युः ॥३॥

देवताओं में श्रेष्ठ, ऋषियों के समूह से घिरे, वानप्रस्थाश्रम में रहते हुए—कागिराज, भगवान्, दिवोदास धन्वन्तरि की

१ जगदर्यसाम्नाद् भगवन्तः-तस्यान्तो व्याधिः प्रका- तस्यसम्भटकोऽयमः, तस्यातिः स्याप्यकालमुपनिवशतान् ॥

आयुष्यते ।

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अ० १]

सूत्रस्थानम्

वि० मन्तव्यम्—'इह खलु' का तात्पर्य-इस ग्रन्थ में या इस अध्याय में या हमारे विचार में यह माना जाता है, निश्चय किया गया है या कहा जाता है भले ही अन्य ग्रन्थों में प्रकरणों में अध्यायों में अथवा अन्य आचार्यों के विचार मत में कुछ भी माना जाता हो निश्चय किया गया हो या कहा जाता हो। इस प्रकार विरोध तथा विरोधाभास का निराकरण हो जाता है जो मित्र २ प्रकारों, दृष्टिकोणों या विधिभेदों के अनुसार कहे गये विषय विरुद्ध (परस्पर या पूर्वोपर विरोधी) प्रतीत होते हैं ॥

तद्यथा—शल्यं, शालाक्यं, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्यम्, अगदतन्त्रं, रसायनतन्त्रं, वाजीकरणतन्त्रमिति ॥७॥

यथा—शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्य, अगदतन्त्र, रसायनतन्त्र और वाजीकरण तन्त्र ॥७॥

अथास्य प्रत्यङ्गलक्षणसमासः—

तत्र, शल्यं नाम विविधतृणकाष्ठपाषाणपांशुलोहलोष्टास्थिबालनखपूयास्त्रावदुष्टव्रणान्तर्गर्भशल्योद्भरणार्थं, यन्त्र-शस्त्रस्त्रारान्नप्रणिधानव्रणविनिश्चयार्थं च ॥१॥

शालाक्यं नामोर्ध्वजत्रुगतानां श्रवणनयनबदनघ्राणादिसंश्रितानां व्याधीनामुपशमनार्थम् ॥२॥

कायचिकित्सा नाम सर्वाङ्गसंश्रितानां व्याधीनां ज्वररक्तपित्तशोषोन्मादापस्मारकुष्ठमेहातिसारादीनामुपशमनार्थम् ॥३॥

भूतविद्या नाम देवासुरगन्धर्वयक्षरक्षःपितृपिशाचनागमह्राद्युपसृष्टचेतसां शान्तिकर्मबलिहरणादिग्रहोपशमनार्थम् ॥४॥

कौमारभृत्यं नाम कुमारभरणधात्रीक्षीरदोषसंशोधनार्थं दुष्टस्तन्यग्रहसमुत्थानां च व्याधीनामुपशमनार्थम् ॥

अगदतन्त्रं नाम सर्पकीटतूतामूषकादिदुष्टविषयज्जन्तार्थं विविधविषसंयोगोपशमनार्थं च ॥६॥

रसायनतन्त्रं नाम वयःस्थापनमायुर्भधाबलकरं रोगाहरणसमर्थं च ॥७॥

वाजीकरणतन्त्रं नामाल्पदुष्टक्षीणविशुष्करेतसामाप्याग्रनमसादोपचयजनननिमित्तं प्रहर्षजननार्थं च ॥८॥

अब इन आठ अङ्गों में से प्रत्येक अङ्ग का लक्षण संक्षेप में कहते हैं। इनमें—

शल्य से अभिप्राय—नाना प्रकार के तिनके, काष्ठ, पत्थर, धूलि, लोहा, घातु, ढेला, अस्थि, बाल, नख, पूय, स्त्राव, दूषित व्रण, अन्तः शल्य, गर्भशल्य आदि को निकालने के लिये और यन्त्र, शस्त्र, स्नार, अग्नि के प्रयोग के लिये एवं व्रण के निश्चय के लिये, शल्य शास्त्र है।१

जत्रु ( ग्रीवामूल अथवा अंस सन्धि ) से ऊपर के रोग अर्थात्, कान, आँख, मुख और नासिका आदि में होनेवाले रोगों की शान्ति के लिये शालाक्य शास्त्र है।

वक्तव्य—जत्रु—शब्द से मिलता हुआ शब्द 'जात' या 'जोता' है। बैलों को गाड़ी में जोतते समय उनके गले के नीचे जो पड़ी या रस्सी जूले में बाँधी जाती है, उसे जोत कहते हैं। यह पड़ी जहाँ गले में बाँधती है, उस भाग का नाम जत्रु है।

(२) शलाका—पटलवेधनी—यह अर्थ है। लिंग नाश की चिकित्सा में शलाका का उपयोग सुश्रुत में बताया गया है। यथा—

नाधो नोर्ध्वं न पाश्चाभ्यां छिद्रं देवकृते ततः।

शलाकया प्रयत्नेन विश्वस्तं यवकृया ॥

मध्यप्रदेशिन्यंगुष्ठस्थिरहस्तगृहीतया।

दक्षिणेन भिषक् सव्यं विध्येत् सव्येन चेतर्त् ॥

सु० उ० अ० १७ ॥५६,६०॥

और चूँकि जत्रु से ऊपर के मुख, नाक, शिर, कान के रोगों में आँख के रोग ही अधिक हैं और इनमें आँख ही प्रधान है, इसलिये इस अङ्ग का नाम शालाक्य रक्खा गया है१।

(३) काय चिकित्सा—सारे अङ्गों में होने (प्रभाव डालने) वाले रोगों की अर्थात्, ज्वर, रक्तपित्त, शोष, उन्माद, अपस्मार, कुष्ठ, प्रमेह, अतिसार आदि रोगों की शान्ति के लिये कायचिकित्सा है।

वक्तव्य—'काय' का अर्थ सम्पूर्ण शरीर है, इसकी चिकित्सा कायचिकित्सा। अथवा 'कायति शब्दं करोति—इति कायो जाठराग्निः, अंगुलिपिहिते कर्णयुगले धुक इति शब्दश्रवणात् तास्थ्याद् वा कायशब्देन अग्निरुच्यते। उक्तं च भोजेन—

जाठरः प्राणिनामग्निः काय इत्यभिधीयते।

यस्तं चिकित्सेत् सीदन्तं स वै कायचिकित्सकः ॥

क्योंकि ज्वर, अतिसार आदि रोग अग्नि के दोष से ही होते हैं। इसी से कहा है—

शान्तेऽग्नीं प्रियते, युक्ते चिरं जीवत्यनामयः।

रोगी स्याद् विकृते मूलं, अग्निस्तस्मान्निरुच्यते ॥

चरक चि० अ० १५।

(४) भूतविद्या—देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितर, पिशाच, नाग, ग्रह आदि के आवेश से दूषित मनवालों की

अतिप्रवृद्ध मलदोषजं वा शरीरिणां स्थावरजंगमानाम्।

यत् किंचिदाबाधकरं शरीरे तत् सर्वमेव प्रवदन्ति शल्यम् ॥

१ जत्रु से ऊपर के रोगों में प्रायः शलाका से काम किया जाता है इससे शालाक्य नाम है।

१ शल्यम्—शल्य-हिंसायाम्-अथवा, शल्य-शलनम्—हिंसा इत्यर्थः—इसी से कहा है—

"~~ "4

५ ुश्रतसं हिता

शान्ति कर्म बक्िदान आदि के द्वार प्रह की शान्ति क ल्य

भूतविद्या दै । |

(५) कौमारमूत्य--ब्रालकं के भरएपोपषण धात्री के दुघ

क दोभों के संशोधन के लिये, दूषित स्तन्य के कारण (शरा

सकि) एवं इ््रह के कारण ( आगन्त॒ज ) रोगो कौ शा न्तिके

व्यि कोमारमभृत्य दे । स

(६) अगदतन्ब-खाप, कीड़ा, मकड़ी, चे आदि कं दश॒

से उन्न विषरोग की परीक्षा के व्यि तथा नाना प्रकारं के

विधो के संयोग से उन्न इए विकारो कौ शान्ति क ल्य

अगदतन्तर हे ।

(७) रसायनतन््र-अवस्था को बनाये रखने के ल्यः

आयु, मेधा ओर ब को बढाने के व्यि, तथा रोगों को दूर

करने की शक्ति के व्यि, १रसायनतन्तर दे ।

(८) बाजीकरण तन्ब- स्वभाव से ही अल्पवीयवाटे

पुरुषों मे वीयं को बद़ाने के यि, वात आदि मे दूषित शुक्र￾वालों में श॒क्र के शोधन के ट्य, किन्दीं कारणों से स्वाभाविक

परिमाण मे क्षीणशयक्रवालो में शुक्र की ब्द्धि के व्यि, बदा

वस्था के कारण शुष्कवीयंवाखों मे शुक्र पेदा करने के ल्यि

` तथा खीप्रसङ्ग मे प्रहपं उत्पन्न करने के च्थि वाजौकरण हे 1

एवमयसायुवदोऽषटाङ्ग उपदिश्यते; अत्र कस्म किमु

च्यतामिति (€)

~~ -- ~ -----*

१ रसायन-'रसराब्देन

लाभोपायः रसायनम्‌ 1 जसा करि चरक मे कहा है-

लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम्‌ ॥

२ जिस प्रकार आजकरू रावित के माप की इकाई घोडा माना

गया है, उसी प्रकार प्राचीनकार मं घोड़े की ही शक्ति से तुरना

की जाती थी) इसी संकटा द-

` “ज्जवाजितनं वाजिने कुर्वन्ति मनेन -इति वाजीकरणम्‌ । येन वा

अत्यर्थ व्यज्यते स्त्रीषु शुक्रं तद्‌ बाजोकरणम्‌ 1” जैसा कि चरक

` मे कहा है--

येन नारीष साम्यं वाजिव्रल्लभते तरः ।

व्रजते चाधिके येन वाजीकरणमेव तत्‌ 11

अथवा वाजो वेग प्रस्तावाच्छक्रस्य, स ~ विद्यते येषां ते.

वाजिनः, ते क्रियन्तेऽनेन इति वाजीकरणम्‌ । अथवा ` वाजः, ाक्र- |

~ सोऽस्यास्ति-इति-वाजीः-अवाजी वाजी क्रियते येन तद वाजीकर- । . करणम्‌ 1 कि वां, वाजो मैथुनम्‌-उक्तं हि हारीते-- |

वाजो नाम प्रकारत्वाच्तच्च मेयनसंञ्जितम ।

| वाजीकरणसंनाभिः संजाभिः पुस्त्वमेव ` प्रचक्षते ॥

रसकार्यत्वात्‌ सवषामेव धातूनां

ग्रहणम्‌ 1 तेन रसादीनां शुक्रान्तानां, कि वा रसवीर्यवपाकानामयन `

राक्रसर तिकर“किचित्‌, किचित्‌ शक्रविवर्धनम्‌ ।

| अ०१

इस प्रकार से यह आयुर्वेद आठ अज्ञोवाखा कहा जाता

है। इन आठ अङ्गं मे से किस अङ्ग का तुम्हारे मे से किसके

लिय, उपदेश करू, वहं कहौ ॥६॥।

त ऊचुः अस्माकं सवषामेव शल्यज्ञानं मूं खो

पदिश्जतु भगवानिति ॥१०॥

उन शिष्यो ने कहा--हे भगवन्‌ ! आप राल्य ज्ञानको

मुख्य रखकर हम सब को आयुवेद का उपदेश दे ॥१०॥।

स उवाचेवमरिःति ॥११॥

भगवान्‌ धन्वन्तरि ने कहा-एेसा हौ सदी ॥११॥

त॒ उचुभूयोऽपि भगवन्तम्‌-अस्माकमेकमतीन

मतममिसमीदय सुश्रतो भगवन्तं प्रद्यति; अस्म चोपदि-

रयमानं वयमप्युपधारयिष्यामः ॥१२॥

स॒श्रत आपसे पूछेगा जौर इस सुश्रुत को सम्बोधन करके कै

उपदे को हम सव धारण करगं ॥१२॥

स होवाचेवमस्सिति ॥१३॥

भगवान्‌ धन्वन्तरि ने कहा--रेखा दी सही ।।१३॥

वत्स सुश्रत । इह खल्वरायुवदप्रयोजनं--व्याध्युपस￾छान्‌ व्याधिपरिमोक्षः, स्वस्थस्य रक्वणं च ॥१४।।

शाख का प्रयोजन-रोगोंसे आक्रान्त प्राणियों कोरोगं से

आयुरस्मिन्‌ विद्यते, अनेन वाऽध्युर्विन्दन्तिः इत्या-

युवद्‌ः ॥१५।। |

इनके संयोग का नाम आयु है, यह इस आयुवंद्‌ में हे, अथवा

इस शाख के दवारा आयु प्राप्त होती दहे, इसल्यि यह आयु

वेद हेर ॥१५॥

सर तिवद्धिकरं किचित्‌, तरिविधं वष्यम्‌ च्यते ॥

प्ररामनं च.1। चरक सूत्र अ०३०॥ - ५

२. (१) -हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्‌ ।

` _ - सान तच्च यच्चोवतमायुवदः स॒ उच्यते ॥

(२) हिताहिततः, सुखासुखंतः अ्रभााप्रपाणतक्च तदायु व॑द“

स स र^ | यतीत्यायुवंदः । यतस्चोयुष्याणिं, अनायुष्याणि च दव्यगुणकंमा

शठदास सत, यहं वाजकरण्‌ तीन भकार कहा है। यथा-- । वेदयति ततोऽप्ययमायुरवेदः ॥ च० सू ० अ० ३० ।

| ` तत्र स्‌ तिकर-स्त्रीस्पर्गादि, वद्धिकरं क्षीरादि; स तिवृद्धि

करं माषादि। | १ प्रयोजन. चास्य-स्वस्थस्थ स्व्ारथ्यरचणमातुरस्य विकार

उन िष्यों ने फिर मी भगवान्‌ धन्वन्तरि को कहा-क्रि

एक विचारवाल्ते हम खों के अभिप्राय कोष्यानमंरखक्रर्‌

हे वत्व सुश्रत ! आयुवद्रोद्पत्ति के विषय मे-आयुवंद्‌ . |

मुक्त करना ओर स्वस्थ मनुष्यों के स्वास्थ्य कीरक्षा करना है । ˆ

आयुवेद की निरुक्ति--शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व ओर आत्मा प

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